कालाधन वापसी का रास्ता खुला

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संदर्भः- स्विट्जरलैंड सूचना साझा करने पर राजी

 

प्रमोद भार्गव

स्विट्जरलैंड के बैंकों में कालाधन रखने वालों की चिंता बढ़ने वाली है, क्योंकि उनके खाते की पूरी जानकारी भारत सरकार तक पहुंचने का रास्ता साफ हो गया है। स्विट्जरलैंड सरकार ने स्वचालित सूचना आदान-प्रदान समझौते के लिए भारत के डाटा सुरक्षा और गोपनीयता के कानून को पर्याप्त बताया है। इस समझौते से स्विस बैंक में कालाधन रखने वालों की जानकारी सरकार तक लगातार पहुंचने का रास्ता खुल जाएगा। भारत के साथ वित्तीय खातों की जानकारी स्वतः आदान-प्रदान को लेकर आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित विस्तृत अधिसूचना और फैक्ट षीट में स्विस सरकार ने इसी तरह के समझौते के लिए अन्य वित्तीय कंेद्रों के फैसले का भी हवाला दिया है। उल्लेखनीय है कि स्विट्जरलैंड ने भारत और 40 अन्य देशों  के साथ अपने यहां संबंधित देश के लोगों के वित्तीय खातों, संदिग्ध काले धन से संबंधित सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था को इस साल जून में मंजूरी दी थी। ऐसी उम्मीद है कि 2019 से संदिग्ध खातेधारियों की जानकारी मिलना शुरू हो जाएगी।

नरेंद्र मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद केंद्रीय मंत्रीमंडल की पहली बैठक में ही विशेष जांच दल के गठन से साफ हो गया था कि सरकार कालाधन के कुबेरों के न केवल नाम उजागर करेगी, बल्कि धन वापसी का सिलसिला भी शुरू होगा। इस दिशा में   8 खाताधारियों के नाम उजागार कर दिए गए थे। इसके बाद स्विस सरकार ने वहां के बैकों में खाता रखने वाले 5 भारतीयों के नाम भी उजागार किए थे। इनके खिलाफ भारत में कर सबंधी जांच चल रही है। स्विट्जरलैंड के संघीय राजपत्र में ये नाम छापे गए हैं। इससे यह तय होता है कि सरकार के पास इन नामों से संबंधित पुख्ता सबूत हैं। क्योंकि इन खाताधारियों को अब अदालती कानूनी प्रक्रिया  से लेकर आयकर विभाग की कार्रवाई से भी गुजरना होगा। और ये लोग यदि विदेशी बैंकों में जमा अपने धन की वैघता पेष नहीं कर पाते हैं तो धन की वापिसी भी संभव हो जाएगी। वैसे अब तक  638 लोगों ने 3770 करोड़ रुपए का कालाधन उजागार कर दिया है। साफ है कि सरकार ओैर एसआईटी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। एसआईटी को जांच बड़े पैमाने पर करने का अधिकार दिया गया है। लिहाजा एसआईटी को सीधे मुकदमा चलाने की जिम्मेबारी भी सौंप दी गई है। जिसके कारगर परिणाम सामने आने लगे हैं। इस कड़ी में 800 खाताधारियों के नाम मिल भी गए हैं। लेकिन विदेशी बैंकों में खाता खोलना कोई अपराध नहीं है। बषर्तें खाते रिर्जव बैंक आॅफ इंडिया के निर्देषों का पालन करते हुए खोले गए हों और आयकर विभाग को जानकारी देने में संपूर्ण पारदर्शिता बरती गई हो। नियमों के मुताबिक रिर्जव बैंक प्रत्येक खाताधारी को एक साल में सवा लाख डाॅलर भेजने की छूट देता है। लिहाजा इस तरह से भेजी गई धन राशि कालेधन के दायरे में नहीं आती। जाहिर है,कानून काले और सफेद धन में स्पष्ट विभाजित रेखा खींचता है। काले कुबेरों की सूचियां जारी होने के सिलसिले से यह संदेह पुख्ता होता है कि डाॅ.मनमोहन सिंह सरकार दोहरे कराधान संधियों का हवाला देकर निहित स्वार्थों के चलते कालाधन वापिसी के मुद्दे को जान-बूझकर टालती रही थी।

इस बावत वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बयान दिया था कि मनमोहन सिंह सरकार ने स्विट्जरलैंड के बैंकों से भारतीयों के जमा काले धन को बाहर निकालने का अवसर दिया था। यदि ऐसा नहीं था, तो क्या वजह थी कि स्विट्रलैंड के साथ दोहरे कराधान संशोधित करने के लिए जो संशोधित प्रोटोकाॅल समझौता हुआ था, उसे हस्ताक्षर होने के 14 माह के बाद अमल में लाया गया। इस दौरान बड़ी मात्रा में सोने की शिलाओं के रूप में कालाधन देश में वापिस लाकर रियल इस्टेट के कारोबार में लगाया गया। इसीलिए 2010-11 और 12 में संपत्ति के कारोबार में सबसे ज्यादा उछाल देखा गया था।

संप्रग सरकार ने कालेधन को देश में लाने की इच्छा तब भी नहीं जताई थी, जब भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने एक संकल्प पारित किया था। इसका मकसद था कि गैरकानूनी तरीके से विदेशों  में जमा कालाधन वापस लाया जा सके। इस संकल्प पर भारत समेत 140 देशों  ने दस्तखत किए थे। यही नहीं संकल्प पारित होने के तत्काल बाद 126 देशों  ने तो इसे सख्ती से अमल में लाते हुए कालाधन वसूलना भी शुरू कर दिया था। यह संकल्प 2003 में पारित हुआ था, लेकिन भारत सरकार ने 2005 में जाकर इस पर दस्तखत किए थे। दरअसल दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ट्रांसफर प्राइसिंग, मसलन संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण के जरिए पैदा हो रही है। इसमें एक कंपनी विदेशों  में अपनी सहायक कंपनियों के साथ सौदों में 100 रुपए की वस्तु की कीमत 1000 रुपए या 10 रुपए दिखाकर करों की चोरी और धन की हेराफेरी करती हैं .  भारत में संबद्ध फर्मों के बीच अभी भी यह हेराफेरी धड़ल्ले से चल रही है, कालाधन पैदा करने का यह बड़ा माध्यम है। हालांकि जीएसटी लागू होने के बाद एक लाख फर्जी कंपनियां बंद हो गई हैं और तीन लाख पर बंद होने की तलवार लटकी हुई है।

स्विट्जरलैंड के यूबीए बैंक के सेवानिवृत् कर्मचारी ऐल्मर ने एक सीडी बनाकर सार्वजनिक की थी। इस सूची में 17 हजार अमेरिकियों और 2000 भारतीयों के नाम दर्ज हैं। अमेरिका तो इस सूची के आधार पर स्विस सरकार से 78 करोड़ डाॅलर अपने देश का कालाधन वसूल करने में भी सफल हो गया है। ऐसी ही एक सूची 2008 में फ्रांस के लिष्टेंस्टीन बैंक के कर्मचारी हर्व फेल्सियानी ने भी बनाई थी। इस सीडी में भी भारतीय कालाधन के जमाखोरों के नाम हैं। ये दोनों सीडियां संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान ही भारत सरकार के पास आ गई थीं। इन्हीं सीडियों के आधार पर सरकार कालाधन वसूलने की कार्रवाई को आगे बढ़ा रही है। इसलिए सीडी में दर्ज खातेधारियों के नाम सार्वजानिक करने की मांग भी संसद में गूंजती रही है। लेकिन सरकार भारतीय उद्योग संगठन के दबाव में सूची से पर्दा नहीं उठा रही है। इस बावत संगठन का तर्क है कि इन खाताधारियों के नाम उजागर करने के बाद यदि उनकी आय के स्रोत वैध पाए गए तो उनके सम्मान को जो ठेस लगेगी, उसकी भरपाई कैसे होगी ?

वैसे 2002 से विदेशी बैंकों में खाता खोलना कोई कानूनी अपराध नहीं है, बशर्ते उसमें काली-कमाई जमा न हो। असल में व्यापारियों के अलावा राजनेताओं और अधिकारियों का भी कालाधन विदेशी बैंको में जमा है। यह राशि विशुद्ध रूप से भ्रष्टाचार से उपजी धन राशि है। जब तक इन भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा नहीं कसेगा, तब तक इस मुहिम के सार्थक परिणाम आने वाले नहीं है। यहां यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि नेता और अधिकारी कोई उद्योगपति नहीं हैं कि उन्हें आयकर या दोहरे कराधान की समस्या से बचने के लिए विदेशी बैंकों में धन जमा करने की जरूरत पड़े ? यह सीधे-सीधे घूसखोरी से जुड़ा अपराध है। इस दिशा में अरविंद केजरीवाल ने 2012 में कुछ काले-कारोबारियों के नाम उजागार किए थे,इनमें एक बड़े आयकर अधिकारी की पत्नी का नाम भी शामिल था। यदि ऐसे संदिग्ध नामों पर जल्दी कार्रवाई की होती तो सरलता से कालेधन की वापसी का वैधानिक सिलसिला शुरू हो सकता था ? अन्यथा अवैधानिक तरीकों से कालेधन की वापिसी तेज होगी। क्योंकि मोदी सरकार ने जब से जांच में सख्ती बरतना शुरू की है,तब से स्विट्रलैंड से भारत में सोने के आयात में हैरतअंगेज बढ़ोत्तरी हुई है। इसी साल सितंबर तक 70 हजार करोड़ रुपए का सोना आयात किया जा चुका है। स्विस कस्टम विभाग द्वारा दी जानकारी के मुताबिक भारत को कुल 347 टन सोने और चांदी के सिक्के निर्यात किए गए हैं। हालांकि यह अच्छी बात है कि सोने-चांदी के रूप में ही सही काला धन लौट रहा है। लेकिन धातु के रूप में आया यह धन देश के आर्थिक विकास या गरीबी दूर करने में भागीदार नहीं हो सकता। क्योंकि धन के काले कुबेर इसे बैंक लाॅकरों और तिजोरियों में जमा कर देंगे। मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए चलायमान मुद्रा की जरूरत रहती है। इसलिए इस धातुई धन पर भी निगरानी रखने की जरूरत है।

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