अरविन्द केजरीवाल

‘‘क्या 67 सीटों पर विजय ई.वी.एम. हैकिंग का ही कमाल है ?’’

क्या 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी की विजय इसी ई.वी.एम. हैकिंग का ही कमाल है ?जब आप के नेता इस तकनीकि से इतने परिचित हैं तब यह क्यों न माना जाय कि ई.वी.एम. में इस प्रकार का कोई कोड डालकर उन्होंने दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनावों में अपेक्षित लाभ प्राप्त किया होगा। यदि इस प्रकार का कोई कारनामा संभव है तो उसे किसी भी दल का कोई भी जानकार कर सकता है। फिर आरोप केवल भाजपा पर ही क्यों ?

अरविन्द केजरीवाल जैसा मुख्यमंत्री पालना कितना मुश्किल है

जेठामलानी की नज़र में मुक़द्दमा लेते समय तो केजरीवाल अमीर थे और फ़ीस देते समय अचानक ग़रीब हो गए हैं । इसलिए अब वे उनका मुक़द्दमा मुफ़्त लड़ेंगे । जेठामलानी की पारखी नज़र को मानना पड़ेगा । सारे देश में उन्होंने मुफ़्त मुक़द्दमा लड़ने के लिए मुवक्किल भी ढूँढा तो वह अरविन्द केजरीवाल मिला । यानि जो पौने चार करोड़ वक़ील को न अदा कर सके वह बीपीएल की श्रेणी में आता है । बिलो पावर्टी लाईन ।

दिल्ली का मौहम्मद तुगलक और अरविन्द केजरीवाल

पंजाब की जनता अपने लिए किसे चुनेगी यह तो समय ही बताएगा-पर हम यहां की जनता के निर्णय की परिपक्वता पर आज ही संतुष्ट हैं कि वह जो भी निर्णय लेगी उसे सोच समझकर ही लेगी। केजरीवाल यह भूल जाएं कि जनता कुछ भी नहीं जानती, इसके विपरीत यह मान लें कि यह जनता सब कुछ जानती है। दिल्ली पर शासन करके और अब यह मानकर कि दिल्ली की जनता तुझसे असंतुष्ट है और वह तुझे आगे शायद ही पसंद करे – पंजाब की ओर केजरीवाल का भागना उनकी अवसरवादी राजनीति का एक अंग है, जिसमें वह अपना भविष्य सुरक्षित देख रहे हैं। उनका यह निर्णय मौहम्मद तुगलक की याद दिलाता है जिसने राजधानी दिल्ली से दौलताबाद बनाने का निर्णय लिया था, पर अपनी फजीहत कराके वापस दिल्ली ही आ गया था। केजरीवाल को आना तो दिल्ली में ही है-पर अच्छा हो कि फजीहत कराके ना आयें।