सुलगी हुई घाटी की नई आफत

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ दिन ढलने को था, आसमान से श्वेत कबुतर अपने आशियानों की तरफ लौटने ही वाले थे, कहवा ठण्डा होने जा रहा था, पत्थरबाजों के हौसले परवान पर थे, अलगाववाद और चरमपंथ अपनी उधेड़बुन में बूमरो गुनगुना रहा था, चश्म-ए-शाही का मीठा पानी भी कुछ कम होकर एक शान्त स्वर झलका रहा… Read more »

सत्ता प्राप्ति की आपाधापी से उपजी समस्याएं

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ललित गर्ग  किसान आन्दोलन, शिलांग में हिंसा, रामजन्म भूमि विवाद, कावेरी जल, नक्सलवाद, कश्मीर मुद्दा आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो चुनाव के निकट आते ही मुखर हो जाती है। ये मुद्दे एवं समस्याएं आम भारतीय नागरिक को भ्रम में डालने वाली है एवं इनको गर्माकर राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकने का सोचा-समझा प्रयास किया जा… Read more »

ज्वलंत सवाल : आठ राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक

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सुरेश हिनुस्थानी देश में कश्मीर से विस्थापित हुए हिन्दुओं के बारे में अगर उसी समय समाधान निकलता तो संभवत: अन्य राज्यों में इसकी पुनरावृति रुक सकती थी, लेकिन समाधान निकालने के किसी भी तरीके पर सरकार की ओर से कोई चिंतन नहीं किया गया। इस कारण यह समस्या आज पूरे देश में तेजी से पैर… Read more »

कश्मीर में रमजान पर युद्ध-विराम

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विनोद कुमार सर्वोदय जिस कश्मीर में “भारत काफ़िर है” के नारे लगाए जाते हो वहां युद्ध-विराम का क्या औचित्य है ? अनेक आपत्तियों के उपरांत भी केंद्रीय सरकार ने जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की मांग को मानते हुए रमजान माह  (अवधि लगभग 30 दिन ) में सेना को आतंकियों के विरोध में अपनी ओर… Read more »

नक्सलवाद को हराती सरकारी नीतियाँ

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डॉ नीलम महेंद्र 24 अप्रैल 2017 को जब “नक्सली हमले में देश के 25 जवानों की शहादत को व्यर्थ नहीं जाने देंगे” यह वाक्य देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, तो देशवासियों के जहन में सेना द्वारा 2016 में  की गई सर्जिकल स्ट्राइक की यादें ताजा हो गई थीं। लेकिन नक्सलियों का कोई… Read more »

जिहादी जनून से जलता कश्मीर

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क्या यह उचित है कि दुश्मन के छदम युद्धों का सिलसिला बना रहें और हम उसे कायराना हमला कहकर निंदा करके अपने दायित्वों से भागते रहें ? यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि शनिवार 10 फरवरी को सुबह जम्मू में सेना की सुंजवां ब्रिगेड पर हुए जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के हमले को अभी नियंत्रित भी नही… Read more »

कश्मीर, नेहरु और पटेल

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प्रधान मंत्री श्री  नरेन्द्र मोदी द्वारा संसद में कश्मीर, नेहरु और पटेल का मुद्दा चर्चा में लाने पर मुझे अपने छात्र जीवन की एक घटना याद आ गई। सन 1954 की बात है। मैं स्नातक कक्षा का छात्र था। मेरे एक शिक्षक थे प्रोफेसर जवाहर लाल वाकलू। उनकी पत्नी का नाम था विजयलक्ष्मी । विभागाध्यक्ष… Read more »

  मैडम महबूबा ! राजनीति नहीँ कश्मीर की सोचिए 

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 प्रभुनाथ शुक्ल राजनीति क्यों और किसके लिए होनी चाहिए। उसका उद्देश्य क्या होना चाहिए । राजनीति में नीति के साथ उसका धर्म और समावेशी सामाजिक विकास के साथ राष्ट्रीयहित शामिल होना चाहिए। लेकिन आज़ की राजनीति वैचारिक अकाल से जूझ रही है ।  उसकी सार्वभौमिकता सिकुड़ गई है । दृष्टिकोण सामरिक होने के बजाय दल, जाति… Read more »

कश्मीर की बदलती फिजा

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दुलीचन्द रमन कश्मीर घाटी ने उग्रवाद को लेकर 1989-90 से अब तक कई उतार-चढ़ाव देखे है। एक दौर वह था जब कश्मीरी पंड़ितों को रातों-रात पलायन पर मजबूर होना पड़ा था। लाखों लोग अपना सब कुछ छोड़-छाड़कर जान बचाने के लिए घाटी से निकल आये थे। हिन्दुओं और सिक्खों में डर का माहौल पैदा करने… Read more »

एनजीटी का सम्प्रदाय विशेष पर निशाना

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न्याय को सुलभ और आसान बनाने के लिए हमारे देश में समय-समय पर विधि में कुछ अच्छे परिवर्तन किए जाते रहे हैं। जिसके अन्तर्गत सीबीआई अदालतें, लोक अदालतें तथा पर्यावरण से संबंधित मामलों के लिए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम का गठन जैसे कुछ उदाहरण सामने हैं। लोकतांत्रित देश होने के कारण यहां कई बार न्याय… Read more »