triple talaq

तीन तलाक,समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार

मुस्लिम महिलाओं की तरफ से समान नागरिक संहिता नहीं बल्कि एकतरफा तीन तलाक़, हलाला व बहुविवाह के खिलाफ आवाज उठायी जा रही है उनकी मांग है कि इन प्रथाओं पर रोक लगाया जाए और उन्हें भी खुला का हक मिले.

तीन तलाकः मुस्लिम बनें विश्व गुरु

पता नहीं, भारत के मुसलमान इतने दब्बू क्यों हैं? अरबों की घिसी-पिटी परंपराओं को वे अपनी छाती पर क्यों लादे रहना चाहते हैं? भारत के मुसलमानों को दुनिया के सारे मुसलमानों का विश्व-गुरु बनना चाहिए। क्या उन्हें पता नहीं है कि पाकिस्तान, मिस्र, मोरक्को, सीरिया, जोर्डन, सूडान और बांग्लादेश जैसे करीब दर्जन भर मुस्लिम राष्ट्रों ने तथाकथित शरीयती कानून को खूंटी पर टांग दिया है? उसकी अव्यवहारिक बातों को नकार दिया है।

तीन तलाक पर प्रगतिशील बने मुस्लिम समाज

हाल ही में जब कोर्ट ने केंद्र से तीन तलाक के विषय में कोर्ट में हलफनामा प्रस्तुत करनें के लिए कहा तब नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछली सरकारों की तरह इस मुद्दें पर कन्नी काटने व चुप बैठे रहनें के स्थान पर संविधान की धारा 44 के मर्म को समझ कर अपनी जिम्मेदारी निभाई व तीन तलाक के मुद्दे पर स्पष्ट असहमति व्यक्त कर दी है. 1840 में यह विवाद प्रथम बार उभरा था और

सुधार क्यों नहीं चाहता मुस्लिम समुदाय

यह कैसी प्रथा है कि फोन पर, ई-मेल से, एसएमएस से या पत्र से भी तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह देने भर से संबंध खत्म कर लिया जाता है। मुस्लिम महिला को इसमें समानता का अधिकार कहाँ है? उसके पास तो अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं है। इस कुरीति का समर्थन करने के लिए यह कहना कि यदि पुरुष के पास तीन तलाक का अधिकार नहीं होगा, तब वह महिला से छुटकारा पाने के लिए उसकी हत्या कर देगा। इसलिए तीन तलाक महिलाओं के हक में है, क्योंकि इससे उनका जीवन सुरक्षित होता है। यह कठमुल्लापन नहीं, तो क्या है?