राष्ट्र की समृद्धि का मानक है निर्यात

-डॉ. मधुसूदन –

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(एक) राष्ट्र की समृद्धि का मानक है निर्यात:
बिना निर्यात के, अन्य नैतिक मार्गों से समृद्ध हुआ हो, ऐसा देश दिखा दीजिए। शायद ही आप को ऐसा देश मिले। आज आप को विचार के लिए आवाहन है; यदि भारत की समग्र समृद्धि चाहते हैं, सबका विकास चाहते हैं तो आप कुछ वैचारिक योगदान दीजिए।

आज के विश्व में कोई भी राष्ट्र निर्यात और आयाके बिना उन्नत नहीं माना जाता।

और निर्यात ३ प्रकारकी होती है।
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) प्राकृतिक कच्चे मालसामान की निर्यात।
(
) शासन द्वारा निर्मित उत्पादों की निर्यात।
(
) प्रजाद्वारा निर्मित उत्पादों की निर्यात।
तीनों में श्रेष्ठ मानी जाती है; प्रजा द्वारा निर्मित उत्पादों की निर्यात। कारण इससे प्रजा का साहस और पुरुषार्थ भी विकसित होता है। ऐसे साहस को प्रोत्साहन भी हमारा उद्देश्य होना चाहिए।


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दो)निर्यात के फलस्वरूप:
और ऐसी निर्यात के फल स्वरूप अधिकाधिक प्रजाजनों को काम और आजीविका  उपलब्ध होती है। आज ऐसी आजीविका भी, प्रजाजनों को उपलब्ध कराने की तीव्र आवश्यकता है; जब,हमारी कृषि वर्षानुवर्ष असफल हो रही है। उस असफलता के फलस्वरूप हताश हो कर, हमारा कृषक आत्महत्त्या कर रहा है। ऐसी आत्महत्त्याएँ भी रोकनी होगी। इस समस्या का स्थायी समाधान है; प्रजा द्वारा निर्मित उत्पादों की निर्यात। कच्चे नहीं पक्के उत्पाद की निर्यात।

भावना के स्तर पर अनेक भारत हितैषियों को यह स्वीकार करने में कठिनाई हो सकती है। पर निष्पक्षता से विचार का अनुरोध है।
क्यों कि, हम सारे भारत की परम्परागत कृषि प्रधान छवि से अभिभूत हैं। इस छवि को भी त्यागना नहीं है। कुछ जल के बाँध बनाकर, पुनरजलप्रबंधन भी सोचना है। मरूभूमियों को भी हरी करना है।जितनी भूमि अधिग्रहित होगी, उससे कई गुना अधिक भूमि उपजाऊ होनेवाली है। पर इस में समय लगेगा। और मान्सून की अनियमितता का जो बार बार अनुभव हो रहा है; उससे भी छुटकारा पाना है।

जब वर्षा नियमित होती है, तब भी, कृषि से जुडी ६० करोड की ( भारत की आधी) जनसंख्या, मात्र १५% घरेलू उत्पाद का ही योगदान करती है। तनिक सोचिए, ५०% जनसंख्या द्वारा मात्र १५% सकल घरेलू उत्पाद?

अधिग्रहण से, कृषि योग्य भूमि कुछ मात्रा में घटेगी; पर उपज बढेगी, जैसे गुजरात में भी, और विशेषतः कच्छ में भी अनुभव हो रहा है।
जैसे कच्छ की मरूभूमि, उपजाऊ और हरी होने की संभावना बढ गयी, वैसे कुछ भूमि के अधिग्रहण के बदले शेष भूमि ३ से ४  गुना उपजाऊ भी हो जाएगी। यह लाभ का ही व्यापार होगा। कुछ अधिग्रहित भूमिपर उद्योग भी खडे होंगे; जैसे गुजरात में साणंद का उदाहरण इसका प्रमाण है।

(तीन)मान्सून की अनियमितता।
जैसे ऊपर कहा गया है, कि, कृषि से संलग्न ५० ६० करोड की जनता, अर्थात भारत की ५० % (आधी) जनता, मात्र १५% (GDP) सकल घरेलू उत्पाद का ही योगदान करती है। तो यह घाटे का व्यापार है। इतना तो किसीके भी समझमें आ सकता है।

ऐसा घाटे का व्यापार कब तक चलाते रहेंगे? उपरांत, भूमंडलीय उष्मा (Global Warming) के कारण, अनियमित मान्सून के चलते हम कब तक कृषि उत्पादों का घाटा सहते रहेंगे? भूमंडलीय उष्मा का नियमन या अंकुश हमारे हाथ में नहीं है।
तो ऐसे घाटे के कारण ५०% प्रजा में से अनेक कृषक हताश हो कर आत्महत्त्याएँ करते हैं।

खेती को भी अधिक उपजाऊ करना ही चाहिए, पर सांप्रत अवस्था में, उसकी चरम १५ % की मात्रा भी अच्छी वर्षापर निर्भर करती है। ऐसी, अनिश्चित कृषि का कृषि में ही सफल समाधान खोजकर समृद्धि संभव नहीं।और दूसरा, आज संसार का कोई देश मात्र कृषि उत्पादों से समृद्ध नहीं दिखाई देता।साथ साथ, कृषि उत्पादों की निर्यात में, परदेशी स्पर्धा भी अपेक्षित है।

(चार) आज कोई देश पूर्णतः स्वावलम्बी नहीं।
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) आज, विश्व का कोई भी देश, पूर्णतः स्वावलम्बी हो नहीं सकता। इस वास्तविकता ने आज देशों देशों के बीच के समीकरण बदल दिए हैं।
अति विकसित होनेपर भी उसे आयात तो करनी ही पडती है।
अमरीका भी पेट्रोल,(ऑटोमोबिल)स्वचल यान, पुर्जे(इन्जन) संयंत्र, खाद्यसामग्री,  मदिराएँ, काफी, चाय, इत्यादि अनेक वस्तुएं आयात करता है।
विशेष, अमरिका सारे संसार से प्रतिभाएँ भी संशोधन सुविधाएँ देकर आकर्षित करता है।
आयात और निर्यात के संतुलन पर आज संसार के सारे देश टिके हुए हैं।

() जिनकी निर्यात मात्रा अधिक है, वें ऊपर है। जिनकी निर्यात मात्रा अल्प है, वे नीचे हैं। अति विकसित देश होने से लाभ अवश्य होगा, पर फिर भी उसे आयात तो करनी ही पडेगी।

विकसित होनेपर उसे लाभ यह होगा कि  कच्चा माल आयात कर, पक्का माल बनाकर वापस निर्यात करे।जैसे, हमारी कच्ची कपास अंग्रेजो द्वारा, मॅंचेस्टर जाकर वापस कपडा बन कर भारत के बाजार में ही बिकती थी। अविकसित रहने में, बडा घाटा है, कि, हमें अपना कच्चा माल, विदेशों को बेचना ही पडेगा।और अनेक गुनी कीमत पर पक्का माल आयात करना पडेगा।

(पाँच) राष्ट्रीय समृद्धि
राष्ट्रीय समृद्धि निर्माण की जाती है, उसे परम्परा से विरासत में प्राप्त नहीं किया जा सकता। देशो देशों के बीच की स्थिति और संबंध जैसे बदलते है, वैसे परस्पर पैंतरा भी बदलना पडता है।
National prosperity is created, not inherited.once created its momentum can be used till it lasts.

पर, आज का युग वैश्विक स्पर्धा का है। यह अनोखी स्पर्धा है, जो, हमारे आज तक के अनेक समीकरण, उक्तियाँ एवं नीतियाँ बदल कर रख देगी आज के भारत हितैषी विचारक से कुछ मौलिक विचार की अपेक्षा है। भाग्य है, हमारा, इस मौलिकता को समझने वाला प्रधान मंत्री हमारे पास है।

मौलिक विचार उक्तियों से ऊपर उठकर किया जाता है। बहुत बार विरोधी अर्थवाली उक्तियाँ भी मिल जाती है। इस लिए तारतम्यात्मक बुद्धि से  ऐसी समस्याओं पर विचार किया जाए। उक्तियों के ऊपर उठकर विचार का अनुरोध है। हमें हमारे भूतकालीन नेतृत्व और विचारकों से भी ऊपर उठकर सोचना पडेगा।क्यों कि, परिस्थिति बदली हुयी है।
आज, यदि हम स्पर्धा नहीं कर पाए, तो, फिरसे पिछड जाएंगे। विश्व में गला काट स्पर्धा है। बिना स्पर्धा फिर उन्नति संभव नहीं होगी। इस लिए, आज करो या मरो की स्थिति है। अभी नहीं तो कभी नहीं। और दूसरा कोई पर्याय दिखाई नहीं देता।

क्या ५६ दिन अज्ञातवास में जीनेवाला अभिनेता, या धरनों से,अनुदान से,और बात बात में वाग्युद्ध करके राज्य चलानेवाला ऐसी मौलिक समृद्धि ला पाएगा?

(छः) धरना, आरक्षण, अनुदान,मुआवजो से मौलिक समृद्धि नहीं आती।

धरनों से, आरक्षणों से, अनुदानों से,वा मुआवजों से मौलिक समृद्धि निर्माण  नहीं की जा सकती।
ना ऐसी सहायता स्थायी रूपसे स्थापित की जाए। एक प्रकार से इसे शासकीय भीख ही माना जाना चाहिए। ऐसी सहायता दुःख निवारणार्थ तात्कालिक अनिवार्यता होने पर दी जा सकती है। पर, यह किसी प्रजाजन का स्थायी अधिकार नहीं होना चाहिए।
यह न स्वस्थ समाज का लक्षण है, न ऐसी सहायता समाज में पुरूषार्थ और साहस को प्रोत्साहित करती है।प्रजा का अपना भविष्य स्वयं गढने का स्वातंत्र्य छिन  जाता है। ऐसी प्रजाको जीवन भर सहायता की भीख पर निर्भर रहने का अभ्यास हो जाता है।ऐसा समाज आगे नहीं बढ सकता। और ऐसी परम्परा यदि राष्ट्र में फैल गयी तो सारा राष्ट्र पिछड जा सकता है। ऐसा पिछडा समाज न स्वयं पुरूषार्थ कर प्रगति कर पाता है, न बौद्धिक उन्नति कर पाता है। शारीरिक स्तरपर जीवित रहने की और सस्ते उपभोगों में लिप्त रहने की उसे आदत हो जाती है।

 (सात) मौलिक विचार का अवसर।
आज पुराने समीकरण बदलने का समय है। परम्परागत नीतियाँ और धारणाएँ  फिर से जांचने का अवसर है। और उनमें उचित परिवर्तन और सुधार करनेका समय है।
हमारे पुरखों ने ऐसा सुधार बारंबार किया था; इसी कारण हम टिक गए। हमारी सनातनता का भी रहस्य ऐसा बारंबार का सुधार और अन्य संस्कृतियों से प्रथाओं का स्वीकार कर अपनी परम्पराओं में उनको घोलना भी है। यह भी एक स्वतंत्र विषय है; जिसे आज प्रस्तुत करना उद्देश्य नहीं है।
एक समय था, हमारे , मसालों के व्यापार से ही हम समृद्ध रहा करते थे। ढाका की मलमल की धोती को मोडकर, आम की गुठली खोखली कर, उसमें भरकर भेजी जाती थी। यदि आपने मलमलका कपडा उंगलियों से छूकर देखा हो, तो आप समझ पाएंगे।  सारे संसार में हमारे जुलाहों की कुशलता का बखान होता था। हाथकरघेपर इतनी कुशलता आज भी अचंभित करती है।
भारत की समृद्धिपर विश्व स्तब्ध था। मेगस्थनीज़, प्लीनी, स्त्राबो और अन्य यूनानी व रोमन लेखक और पश्चात चीनी यात्री फाह्यान,और ह्यूएन्सांग सभी के वर्णनों में भारत की सम्पदा के प्रति श्रद्धा एवं आदर का भाव स्पष्ट झलकता है। उनकी बुद्धि स्तब्ध हो जाती थी।पर, ऐसा इतिहास हमें भी मतिभ्रमित भी कर सकता है।
भूतकाल के गौरव में हम खो न जाएँ। ऐसे गौरव से हम प्रोत्साहित अवश्य हो। पर उस के आधारपर निश्चिन्त होकर सो न जाएँ।

उस समय भी  निर्यात पर हमारी समृद्धि टिकी थी। संसार में कोई देश हमारा विशेष प्रतिस्पर्धी नहीं था।
हम उत्तर में हिमालय से और शेष तीनों दिशाओ में समुद्र से सुरक्षित थे।
आज परिस्थिति बदली हुयी है। आज इसी हिमालय और समुद्र रक्षित भूभाग में पाकिस्तान, और बंगलादेश ऐसे दो परदेश हमारे नेतृत्व ने ही स्वीकार कर हानि मोल ली है। उत्तर में भी आज के हवाई आक्रमण के युग में, संभवतः,  हिमालय लांघकर चीन भी हमपर आक्रमण कर सकता है।

(आठ) सक्षम प्रधान मंत्री
जानकार, चतुर, बुद्धिमान, दक्ष, कर्मठ, व्यवहारकुशल, और सक्षम प्रधान मंत्री जो हमें मिला है, वह, हमारी अमूल्य पूँजी है। कोई भी अन्य राष्ट्रीय नेता इस मह्त्वर्ण गुण में मोदी जी से टक्कर ले नहीं सकता। विशेष मोदी का गुजरात की सफलता का  अनुभव भी उन्हें असामान्यता प्रदान करता है। हमारा, भारत का भाग्य है,कि हमारे पास इस ऐतिहासिक विकट समय में मोदी जी के कर्तृत्व का लाभ प्राप्त है। तनिक उन्हें आज की ऐतिहासिक राजनीति के क्षेत्र से अलग कर के मात्र कल्पना कीजिए। सारा समझमें आ जाएगा। क्या आप सोच सकते हैं, कि, राहुल जैसे मोदी जी भी ५६ दिन बिना बताए, कहीं हिमालय की गुफामें जा कर ध्यान करते बैठे, तो क्या होगा ?

(नौ) हमारा मतिभ्रम।
संक्षेपमेंयह राष्ट्र की समृद्धि  निवेश से प्रारंभ होती है। इस लिए, सारे संसार से निवेश को प्रोत्साहित करने प्रवास करता हुआ, प्रधान मंत्री हम देखते हैं।
निवेश से उद्योग खडे होंगे; प्रजा को काम मिलेगा। निर्यात संभव होगी। और देश समृद्ध होगा।
इस लिए मोदी जी के परदेश प्रवास, और हर जगह निवेश का प्रस्ताव।
और, ऐसी परदेशी स्पर्धा के कारण हमारे निवेशक भी सतर्क होकर भारत का लाभ ही होगा। यह भी आवश्यक है।
पर यदि, हम अंबानी, अदाणी, टाटा इत्यादि भारतीय निवेशकों का निवेश नहीं चाहते, और परदेशी निवेशक भी नहीं चाहते। तो भारत उन्नति कैसे करें?
आप ही विचार कर बताइए।

जय भारत

2 thoughts on “राष्ट्र की समृद्धि का मानक है निर्यात

  1. भारत विविधताओं का देश है ।यह मै इस लिए नही कह रही हूँ की मै भारत से प्रेम करती हूँ । यह ज्ञान का विषय है । ज्ञान ही हमारे चक्षुओं को खोलता है , चाहे यह विविधता प्राकृतिक सम्पदाओ और संसाधनो ( अन्न जल , फल- फूल , जंगल -जमीन , ऋतुए , भाषाए , वेद , पुराण , योग-आयुर्वेद , आदि आदि आदि ) की हो या मानव संसाधनो की । जो भारत मे है वो कही नही है । यही कारण है की भारत ने किसी देश की सीमाओ का उल्लघन नही किया लेकिन भारत की सीमाओं का उल्ल्घन बहुतो ने किया । भारत अपने मे पूर्ण था लेकिन लोगो ने उससे लिया नही , सीखा नही उसे नोच डाला , बर्बाद किया अपने स्वार्थबस । भारत समस्त विस्व को एक परिवार की भाति आयात -निर्यात के द्वारा जोड़कर फलता फूलता देखना चाहता है । अभी अभी २१ जून को अंतराष्ट्रीय योग दिवस को मनाकर दुनिया को योग से जोड़कर सबको स्वस्थ और सुन्दर देखना चाहता है ।

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