परिवार संस्कृति भुलाने का दर्द

– ललित गर्ग –

‘वसुधैव कुटुंबकम’ का भाव सदैव से धारण किए हुए भारतीय समाज ने पूरी वसुधा को अपना परिवार माना है। परंतु वर्तमान में विश्व तो दूर, हमारी परिवार परम्परा की बिखरने के कगार पर खड़ी है। संयुक्त परिवार में ही नहीं एकल परिवारों में कलह के बादल मंडरा रहे हैं। हमारी संस्कृति ने स्वयं में संपूर्णता को समेटे हुए है परंतु इसकी पहचान कहीं खोती जा रही है। भौतिकवादी युग में हम गुम होते जा रहे हैं कि अपनी संस्कृति और पहचान ही भुला दें। हमें इसे बचाने की ही नहीं, अपितु आगे बढ़ाने की भी जरूरत है। हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है। भारत सदियों से अपनी इसी अनूठी संस्कृति और विरासत के लिए विश्व पटल पर जाना जाता है। परंतु अब हम इस मामले में पिछड़ते जा रहे हैं। परिवार संस्कृति में आए अहितकारी बदलाव इसके संकेत देते हैं।
‘परिवार’ एक ऐसा आश्रय स्थल है, जहां हमारा ध्यान अच्छाइयों की ओर आकृष्ट होता है और उन अच्छाइयों को प्राप्त करने के लिए उद्योग करने को वहां प्रोत्साहन मिलता है, किन्तु इसे जीवन की किस  दिशा में प्रयुक्त किया जाए, इससे के लिये मार्गदर्शन अपेक्षित है। यह घर-आंगन में सूरज के आगमन का प्रतीक है। सूरज एक ऐसा भूमंडलीय नक्षत्र है जो संपूर्ण सृष्टि का संचालन करता है। आज जबकि परिवार नाम की संस्था का अस्तित्व धुंधला रहा है, परिवार बिखर रहे हैं, आपसी रिश्ते टूट रहे हैं, सामूहिक हितों की बजाय व्यक्तिगत हितों का बोलबाला है, घर-घर में तलाक, भ्रूणहत्या, दहेज हत्या, व्यभिचार एवं नशा पांव पसार रहा है तब ‘‘सूरज’’ रूपी परिवार के अस्तित्व एवं अस्मिता कैसे कायम बनाये रखा जाये? 
हालांकि भारत में एकल परिवारवाद अभी ज्यादा नहीं फैला है। आज भी भारत में ऐसे कई परिवार हैं जिनकी कई पीढ़ियां एक साथ रहती हैं और कदम-कदम पर साथ निभाती हैं। लेकिन दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ने लगी है। उम्मीद है जल्द ही समाज में संयुक्त परिवार की अहमियत दुबारा बढ़ने लगेगी और लोगों में जागरूकता फैलेगी कि वह एक साथ एक परिवार में रहें जिसके कई फायदे हैं। इंसानी रिश्तों एवं पारिवारिक परम्परा के नाम पर उठा जिन्दगी का यही कदम एवं संकल्प कल की अगवानी में परिवार के नाम एक नायाब तोहफा होगा।
हमने कई बार देखा है जो व्यक्ति अकेले होते हैं या अकेले रहते हैं किसी दुःख या परेशानियों के वजह से डिप्रेशन में आकर आत्महत्या कर लेते हैं। क्योंकि उनके पास कोई परिवार नहीं, जिससे वह अपने दिल की बात कहें। ऐसा भी कहा गया हैं कि बातें शेयर करने से दिल हल्का हो जाता हैं और दिल को सुकून भी मिलता है। लेकिन जब परिवार ही नहीं होगा तो व्यक्ति किसे अपनी बात कहे? इसलिए परिवार का होना बहुत जरुरी होता है। परिवार के साथ रहते हुए हम बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का समाना आसानी से कर सकते हैं। परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है। हमारी संस्कृति और सभ्यता कितने ही परिवर्तनों को स्वीकार करके अपने को परिष्कृत कर ले, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई। वह बने और बन कर भले टूटे हों लेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और उसके मूल्यों में परिवर्तन हुआ लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हो लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं।
किसी भी समाज का केंद्र परिवार ही होता है। परिवार ही हर उम्र के लोगों को सुकून पहुँचाता है। अथर्ववेद में परिवार की कल्पना करते हुए जो कहा गया है उसका सारांश है पिता के प्रति पुत्र निष्ठावान हो। माता के साथ पुत्र एकमन वाला हो। पत्नी पति से मधुर तथा कोमल शब्द बोले।’ परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बन जाता। इसमें रिश्तों की एक मजबूत डोर होती है, सहयोग के अटूट बंधन होते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा के वादे और इरादे होते हैं। हमारा यह फर्ज है कि इस रिश्ते की गरिमा को बनाए रखें। हमारी संस्कृति में, परंपरा में पारिवारिक एकता पर हमेशा से बल दिया जाता रहा है। परिवार एक संसाधन की तरह होता है। फिर क्या कारण है कि आज किसी भी घर-परिवार के वातायन से झांककर देख लें-दुख, चिंता, कलह, ईष्र्या, घृणा, पक्षपात, विवाद, विरोध, विद्रोह के साये चलते हुए दीखेंगे। अपनों के बीच भी परायेपन का अहसास पसरा हुआ होगा। विचारभेद मनभेद तक पहुंचा देगा। विश्वास संदेह में उतर आएगा। ऐसी अनकही तनावों की भीड़ में आदमी सुख के एक पल को पाने के लिए तड़प जाता है। कोई किसी के सहने-समझने की कोशिश नहीं करता। क्योंकि उस घर-परिवार में उसके ही अस्तित्व के दायरे में उद्देश्य, आदर्श, उम्मीदें, आस्था, विश्वास की बदलती परिधियां केंद्र को ओझल कर भटक जाती हैं। विघटन शुरू हो जाता है। 
“परिवार” शब्द हम भारतीयों के लिए अत्यंत ही आत्मीय होता है। अपने घर-परिवार में अपने आपका होना ही जीवन का सत्य है। यह प्रतीक्षा का विराम है। यही प्रस्थान का शुभ मुहूर्त है। हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हो लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं। भारत गांवों का देश है, परिवारों का देश है, शायद यही कारण है कि न चाहते हुए भी आज हम विश्व के सबसे बड़े जनसंख्या वाले राष्ट्र के रूप में उभर चुके हैं और शायद यही कारण है कि आज तक जनसंख्या दबाव से उपजी चुनौतियों के बावजूद, एक ‘परिवार’ के रूप में, जनसंख्या नीति बनाये जाने की जरूरत महसूस नहीं की।  
संयुक्त परिवारों की परम्परा पर आज धुंधलका छा रहा है, परिवार टूटता है तो दीवारें भी ढहती हैं, आदमी भी टूटता है और समझना चाहिए कि उसका साहस, शक्ति, संकल्प, श्रद्धा, धैर्य, विश्वास बहुत कुछ टूटताध्बिखरता है। क्रांति और विकास की सोच ठंडी पड़ जाती है और जीवन के इसी पड़ाव पर फिर परिवार का महत्व सामने आता है। परिवार ही वह जगह है भाग्य की रेखाएं बदलने का पुरुषार्थी प्रयत्न होता है। जहां समस्याओं की भीड़ नहीं, वैचारिक वैमनस्य का कोलाहल नहीं, संस्कारों के विघटन का प्रदूषण नहीं, तनावों की त्रासदी की घुटन नहीं। कोई इसी परिवाररूपी घेरे के अंधेरे में रोशनी ढूंढ लेता है। बाधाओं के बीच विवेक जमा लेता है। भीड़ में अकेले रह जाता है। दुःख में सुख का संवेदन कर लेता है। घर-परिवार को सिर्फ अपनी नियति मानकर नहीं बैठा जा सकता। क्योंकि इसी घर में मंदिर बनता है और कहीं घर ही मंदिर बन जाता है।
प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

Leave a Reply

%d bloggers like this: