भारत त्योहारों का देश है। कभी पूर्णिमा है, तो कभी अमावस्या, संक्राति, एकादशी या त्रयोदशी। कुछ पर्व जाति, बिरादरी, धर्म, मजहब, पंथ, सम्प्रदाय, क्षेत्र और भाषा के अनुसार तो कुछ उम्र और स्त्री-पुरुष के अनुसार मनाये जाते हैं। सरकारी कार्यालयों में हड़ताल को भी आप एक पर्व ही मानें। कई कर्मचारी नेता साल भर की हड़तालों की योजना पहले ही बना लेते हैं। त्योहार की छुट्टियों या दूसरे शनिवार और रविवार के आगे-पीछे की हड़ताल से कई अवकाश और निकल आते हैं। साल में उन्हें डेढ़ सौ छुट्टियां तो सरकार ही देती है। इस तरह वे दस-बीस छुट्टी और जुगाड़ लेते हैं। आखिर ऐसे लोगों के बल पर ही तो हमारा भारत देश महान बना है।

पर इस छुट्टी में क्या करें, इस पर परिवार में मतभेद रहते हैं। महिलाएं चाहती हैं कि पतिदेव घर की सफाई करें या खाना बनायें, जिससे उन्हें मोहल्ले में गपबाजी का अवसर मिल सके। बच्चों के लिए छुट्टी का अर्थ खेल और पिकनिक होता है; पर आजकल कुछ लोगों के लिए बाकायदा ‘पिकनिक पर्व’ चल रहा है। वे आज दक्षिण में हैं, तो कल उत्तर या पूरब में। मेरा अभिप्राय विपक्षी नेताओं से है। लोकसभा चुनाव का डंका बज गया है। इसलिए ऐसे नेताओं की पिकनिक भी शुरू हो गयी है।

इसका दौर शुरू हुआ कर्नाटक से। वहां विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी भा.ज.पा. को इतनी सीट नहीं मिली कि वह सरकार बना सके। दूसरे नंबर पर कांग्रेस थी। उसने तीसरे नंबर वाले के सामने समर्पण कर दिया। बस फिर क्या था। सारे विपक्षी नेताओं को मानो अलीबाबा का खजाना मिल गया। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, मायावती, अखिलेश यादव, फारुख अब्दुल्ला..आदि बंगलुरू पहुंच गये। कुछ लुटे-पिटे थे, तो कुछ फटे-पुराने। फिर भी सबने मिलकर जश्न मनाया। हाथ में हाथ डालकर और सिर से सिर जोड़कर फोटो भी खिंचवाये। इसके बाद मौका जयपुर, भोपाल और रायपुर में आया। वहां भी वही खानपान, फोटो और अगले चुनाव में मिलकर लड़ने के इरादे।

ऐसा ही दौर कोलकाता में ममता दीदी के निमंत्रण पर हुआ। वे अपने पुलिस अफसर के समर्थन में ही धरने पर बैठ गयीं। फिर दिल्ली में चंद्रबाबू नायडू ने सबको बुलाया। उन्होंने सुबह नाश्ते के बाद रात के भोजन तक उपवास रखा था। उनका यह त्याग इतिहास में दर्ज होने लायक है। अगले दिन केजरीवाल साहब ने धरना दिया। वहां भी कई विपक्षी नेता पहुंचे।

मेरे विचार से ये धरने या भूख हड़ताल नेताओं का ‘पिकनिक पर्व’ है। वहां सब संकल्प लेते हैं कि जैसे भी हो, मोदी को हटाना है; पर फिर सबके सुर बदलने लगते हैं। चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश, केजरीवाल आदि तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें मोदी से लड़ना है या कांग्रेस से। फारुख साहब बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह हर जगह पहुंच जाते हैं। आखिर पिकनिक जो ठहरी।

ये पर्व कब तक चलेगा, सबको पता है। संभावना तो मोदी के फिर आने की है। मुलायम सिंह भी जाते-जाते संसद में यही कह गये हैं। तो मोदी के चुनाव जीतते ही यह पर्व समाप्त हो जाएगा। और अगर किसी कारण मोदी पिछड़ गये, तो इसकी बजाय एक-दूसरे की टांग खींचने और कपड़े फाड़ने का पर्व शुरू हो जाएगा, जैसा आजकल कर्नाटक में हो रहा है।

ज्यादा समय नहीं है। मई में नयी सरकार बन जाएगी। तब तक इन बेरोजगार विपक्षी नेताओं के पिकनिक पर्व का हम भी आनंद लें।– विजय कुमार,

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