लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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dalit rajnitiडा. राधेश्याम द्विवेदी
दलित राजनीति की दशा और दिशा:- दलित राजनीति के जनक डॉ. आंबेडकर को विभिन्न राजनैतिक पार्टियों द्वारा हथियाए जाने की कोशिश कर रही है. इस में भाजपा, कांग्रेस बड़ी शिद्दत से लगी हुयी है. समाजवादी पार्टी भी सरकारी तौर पर डॉ. आंबेडकर जयंती के माध्यम से डॉ. आंबेडकर मानने वालों को लुभाने की कोशिश कर रही है. पिछले कुछ सालों से दलित नेताओं ने डॉ. आंबेडकर का राजनीतिक इस्तेमाल जिस तरह केवल वोट बटोरने के प्रतीक के रूप में किया है और आंबेडकर की विचारधरा को उस के क्रन्तिकारी सारतत्व से विरक्त कर दिया है. दलित आबादी भारत की कुल आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा है. इतनी बड़ी आबादी की राजनीति की देश की राजनीति में प्रमुख भूमिका होनी चाहिए परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं. वर्तमान में दलितों की कई राजनीतिक पार्टिया सक्रिय हैं. एक बहुजन समाज पार्टी है, दूसरी रिपब्लिकन पार्टी है जिसके कई घटक हैं और तीसरी रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी है. दक्षिण भारत में भी एक दो छोटी मोटी दलित पार्टियाँ हैं.बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश तक सिमट कर रह गयी है. रिपब्लिकन पार्टी महाराष्ट्र में सक्रिय है जिसके एक गुट के नेता रामदास आठवले और दूसरे के प्रकाश आंबेडकर. इस का तीसरा गवई गुट हमेशा से कांग्रेस के साथ रहा है.
हाशिये पर दलित राजनीति:-इन सभी पार्टियों की राजनीति व्यक्तिवादी, जातिवादी, अवसरवादी, सिद्धान्तहीन, मुद्दाविहीन और अधिनायकवादी है. इन पार्टियों के नेता आंबेडकर और दलितों के नाम पर व्यक्तिगत लाभ के लिए अलग अलग पार्टियों के से गठजोड़ करते रहते हैं. इन पार्टियों की इसी राजनीति के फलस्वरूप आज दलित राजनीति बहुत सी बुराईयों व कमजोरियों का शिकार हो गयी है जिस कारण दलित राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में न होकर हाशिये पर पड़े हैं. एक ओर दलित नेता दलितों का भावनात्मक शोषण करके उनका अपने लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. वहीँ दूसरी ओर दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ इन नेताओं की कमजोरियों से लाभ उठा कर इन्हें तथा दलितों की विभिन्न उपजातियों को पटाकर उनके वोट हथिया ले रही हैं. परिणामस्वरूप दलित इन दलित नेताओं और दूसरी पार्टियों के लिए वोट बैंक बन कर रह गए हैं जब कि उनके मुद्दे: गरीबी, भूमिहीनता, बेरोज़गारी, अशिक्षा, उत्पीड़न और सामाजिक तिरस्कार किसी भी पार्टी के एजंडे पर नहीं हैं.
वर्तमान दलित राजनीति अपने जनक डॉ.आंबेडकर की विचारधारा, आदर्शों और लक्ष्यों से पूरी तरह भटक चुकी है. अतः अब इसे एक नए रैडिकल विकल्प की ज़रुरत है. मायावती तो बसपा की एक मात्र मालिक है उसमें कोई दूसरा नेता कोई अहमियत नहीं रखता है. बाकी पार्टियों में भी राष्ट्रीय अध्यक्ष के इलावा किसी अन्य नेता का कोई वजूद नहीं है. डॉ. आंबेडकर व्यक्ति पूजा के बहुत खिलाफ थे. डॉ.आंबेडकर कहते थे कि मुझे भक्त नहीं अनुयायी चाहिए परन्तु इन पार्टियों में तो भक्तजनों की भरमार है. इसी प्रकार डॉ. आंबेडकर राजनीतिक पार्टी में आन्तरिक लोकतंत्र के प्रबल पक्षधर थे परन्तु दलित पार्टियों में तो घोर व्यक्तिवाद और अधिनायकवाद है.
सिद्धान्तहीन गठजोड़ का शिकार:- वर्तमान दलित राजनीति सिद्धान्तहीन एवं अवसरवादी गठजोड़ का शिकार है. इस का सबसे बड़ा उदहारण बसपा द्वारा भाजपा से तीन बार किया गया गठजोड़ है. यह वही बसपा है जिस का नारा था: “तिलक, तराजू और तलवार; इनको मारो जूते चार” और “ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया चोर, बाकी हैं सब डीएसफोर” जो बदल कर “हाथी नहीं गणेश है; ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” हो गया था. मायावती का बहुजन अब सर्वजन की शरण में नतमस्तक है और व्यवस्था परिवर्तन की जगह समरसता की घुट्टी पीकर मस्त है. इसी तरह से मनुवाद को पानी पी पी कर गाली देने वाले इंडियन जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदितराज अब भाजपा में शामिल हैं. रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (ए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामदास आठवले ने भीम शक्ति और शिवशक्ति का गठजोड़ करके भाजपा की मदद से राज्य सभा में अपने लिए सीट प्राप्त कर ली है. लोकजनशक्ति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविलास पासवान ने भाजपा से गठजोड़ करके अपने लिए हमेशा की तरह मंत्री पद हथिया लिया है.
गठजोड़ व्यक्तिगत लाभ के लिए:-दलित नेताओं द्वारा किये गए गठजोड़ दलित हित में नहीं बल्कि व्यक्तिगत लाभ के लिए किये जाते हैं. यह बात इस तथ्य से अधिक स्पष्ट हो जाती है कि इन्होने जिन पार्टियों के साथ गठजोड़ किये हैं उनकी तथा इनकी पार्टी की विचारधार और एजंडे में कोई समानता नहीं है. दलित नेता अक्सर यह कहते हैं कि डॉ. आंबेडकर ने भी कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों के साथ गठजोड़ किये थे. उन्होंने यह गठजोड़ दलित हित में किये थे न के व्यक्तिगत लाभ के लिए. कांग्रेस के साथ वे संविधान बनाने के लिए जुड़े थे क्योंकि वे संविधान में दलितों को उनका हक़ दिलाना चाहते थे. उन्होंने प्रथम चुनाव में दूसरी पार्टियों के साथ गठजोड़ विचारधारा और एजंडा की समानता के आधार पर ही किया था.
मुद्दाविहीन राजनीति:- वर्तमान दलित राजनीति मुद्दाविहीनता का शिकार है. अपने आपको दलितों का मसीहा कहने वाली मायावती की पार्टी का आज तक कोई भी दलित एजंडा सामने ही नहीं आया है. यह तो दलित राजनीति का दिवालियापन है जिसका न तो कोई दलित एजंडा है और न ही कोई राष्ट्रीय एजंडा. इसीलिए दलित राजनीति न केवल दिशाविहीन है बल्कि इसी कारण दलित नेता अपनी मनमर्जी करने में सफल हो जा रहे हैं. एजंडा बनाने से नेता उससे बंध जाता है और उससे मुकर जाने पर उसकी जवाबदेही हो सकती है. इसीलिये दलित नेता अपने वोटरों से बिना कोई वादा किये आंबेडकर और जाति के नाम पर वोट लेते हैं. दलित पार्टियों द्वारा कोई भी एजंडा घोषित न करने के कारण दूसरी पार्टियाँ भी अपना कोई दलित एजंडा नहीं बनाती हैं और इतना बड़ा दलित समुदाय राष्ट्रीय राजनीति में केवल वोटर होकर रह गया है और उसके मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बिंदु नहीं बनते. यह वर्तमान दलित राजनीति की सबसे बड़ी विफलता है.
दलित पहचान की राजनीति:- वर्तमान दलित राजनीति पहचान की राजनीति की दलदल में फंसी हुयी है. दलित नेता अपनी राजनीति दलित मुद्दों को लेकर नहीं बल्कि जाति समीकरणों को लेकर करते हैं. वे यातो अपनी अपनी उपजाति के वोटरों को जाति के नाम पर लुभाते हैं या फिर डॉ. आंबेडकर के नाम को भुनाते हैं. मायावती तो दलितों पर अपना एकाधिकार जताती है. वह यह बात भी बहुत अधिकारपूर्ण ढंग से कहती है कि उस का वोट हस्तान्तरणीय है, जैसे कि दलित वोटर उस की भेढ़ बकरियां हों, जिन्हें वह जिस मंडी में चाहे, मनचाहे दाम में बेच सकती है. मायावती ने एक बार दिल्ली चुनाव में तो यहाँ तक कह दिया था कि “जो दलित बसपा को वोट नहीं देगा मैं मानूंगी कि उसने अपनी मां बहिन की इज्ज़त बेच दी है.” यह दलितों के लिए कितनी शर्मनाक चुनौती है कि उनका नेता उन्हें किस तरह से ब्लैकमेल करता है. दलित वोटों पर इसी एकाधिकार के कारण ही तो वह अपने टिकट किसी भी माफिया, गुंडे बदमाश और दलित विरोधी को मनचाहे दाम पर बेच देती है और उसे दलित वोट दिलवा कर जितवा देती है. इसी कारण जीतने के बाद ये नेता दलितों का कोई काम नहीं करते है और खुले आम कहते हैं कि हमने मायावती को पैसा देकर टिकट लिया है और वोटरों को पैसा देकर वोट लिया है. मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडे बदमाशो, माफिययों और दलित उत्पीड़कों के हाथों बेच दिया है जिनसे उनकी लड़ाई थी. कुछ इसी प्रकार का व्यवहार अन्य दलित पार्टियों के नेता भी अपने वोटरों के साथ करते हैं. मायावती चाहे जो भी दावा करे वर्तमान में उसका दलित आधार बहुत हद तक खिसक गया है.
दलित राजनीति हिंदुत्व की पोषक:- दलित नेताओं की जतिवादी राजनीति के कारण जाति मज़बूत हुयी है जिस कारण हिन्दू धर्म मज़बूत हुआ है और हिंदुत्व की राजनीति प्रबल हुयी है. भाजपा हिन्दू धर्म और हिंदुत्व की सबसे बड़ी पैरोकार है. यह सर्विदित है बहुसंख्यक दलित अभी भी हिन्दू ही हैं. नवदीक्षित बौद्धों का प्रतिशत बहुत कम है. दलित नेताओं ने जाति व उपजाति की राजनीति करके जातिगत पहचान को उभारा है जिससे दलितों का उपजाति विभाजन प्रखर हुआ है जिसका फायदा भाजपा ने उठाया है. उसने दलितों की छोटी उपजातियों को बृहद हिन्दू छत्र के नाम पर कर तथा उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर बड़ी दलित उपजातियों के खिलाफ भड़काया है, जिससे दलितों में उपजाति विभाजन तथा टकराव तेज़ हुआ है. वर्तमान दलित उपजातियों की बहुत बड़ी संख्या भाजपा की हिंदु पहचान में शामिल हो चुकी है.दलित 500 से अधिक उपजातियों में बंटे हुए हैं जो एक दूसरे से जातिभेद करते हैं. जाति की राजनीति ने इस विभाजन को और भी उभार दिया है. इन दलित नेताओं की जाति की राजनीति ने बाबा साहेब के जाति विनाश के एजंडे को बहुत पीछे धकेल दिया है.
दलित राजनीति में भ्रष्टाचार:- एक बार बाबा साहेब ने बातचीत के दौरान कहा था,” मेरे विरोधी मेरे विरुद्ध तमाम आरोप लगाते रहे हैं परन्तु मेरे ऊपर कोई भी दो आरोप नहीं लगा सका. एक मेरे चरित्र के बारे में और दूसरा मेरी ईमानदारी के बारे में.” आज कितने दलित नेता इस प्रकार का दावा कर सकते हैं? मायावती का भ्रष्टाचार तो खुली किताब है. ताज कोरिडोर, आय से अधिक संपत्ति और अब यादव सिंह का मामला तो मायावती के भ्रष्टाचार के कुछ प्रमुख उदहारण हैं. मायावती द्वारा अपनी और दलित महापुरुषों की मूर्तियां लगाने में भी बड़े स्तर का भ्रष्टाचार उजागर हुआ है. मायावती द्वारा ऊँचे दामों पर टिकट बेचना, अधिकारियों की पोस्टिंग व ट्रांसफर में पैसा लेना, रैलियों में थैली भेंट करवाना और करोड़ों के नोटों के हार स्वीकार करना खुला नहीं है तो और क्या है.? वैसे यह अलग बात है कि उसके कुछ अंधभक्त दूसरों के भ्रष्टाचार तथा पार्टी खर्चे के लिए धन एकत्र करने की ज़रुरत बता कर इसे उचित ठहराने की कोशिश करते हैं.
मायावती का व्यक्तिगत भ्रष्टाचार:- मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का पार्टी के कार्यकलापों और कार्यकर्ताओं पर बहुत बुरा असर पड़ा है. इसके कारण बसपा के काफी कार्यकर्त्ता भ्रष्ट हो गए हैं. इसका एक मुख्य कारण पैसे वाले लोगों द्वारा बसपा का टिकट खरीद कर चुनाव में पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को पैसा बाँट कर भ्रष्ट बनाना भी है. सर्वविदित है कि भ्रष्टाचार जनविरोधी होता है और उसका सबसे अधिक खामियाजा गरीब लोगों को भुगतना पड़ता है. मायावती के भ्रष्टाचार का खामियाजा उत्तर प्रदेश के दलितों को भुगतना पड़ा है जिस कारण वे राज्य द्वारा चलाई जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं के वांछित लाभ से वंचित रह गए.
”तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार.”
इस नारे के साथ एक ऐसी पार्टी उत्तर भारत की राजनीति में आई जिसने कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों के सारे समीकरण बिगाड़ दिए. बीएसपी के इस शुरुआती नारे में समाज के एक ऐसे तबके की बैचेनी और चुनौती देने की ताक़त का एहसास होता है, जिसे अब भी भारत के कई कोनों में हिकारत भरी नज़रों से देखा जाता है. ये वो संदेश था जो पिछड़ों की राजनीति करने के उस्ताद भी नहीं समझ पाए और बहनजी से गच्चा खा गए. मुलायम सिंह ने यूपी में और लालू ने बिहार में पिछड़ों की राजनीति की शुरुआत की. लेकिन, पिछड़ों की बात करने वाले यह दोनों नेता, एक हद के बाद रुक गए. दलितों की ताक़त का इन्हें एहसास नहीं था, लिहाज़ा दलितों के लिए इनके पास कुछ नहीं था. यूपी में मुलायम सिंह को दलितों की ताक़त का एहसास 1992 में हुआ, जब उन्होंने कांशीराम के साथ मिलकर नारा दिया,
”मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गया जय श्रीराम.”
कांग्रेस और बीजेपी के बाद यूपी में समाजवादी पार्टी और बीएसपी की गठबंधन सरकार आई. इसके बाद तो यूपी से निकली मौकापरस्त राजनीति पूरे देश में फैल गई. बीजेपी और कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई. समाजवादी पार्टी भी हांफ गई. मायावती का हाथी ऐसी चाल चला कि सब देखते रह गए. 13 साल बाद यूपी में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला. ‘जो बहुजन हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा’. नारा चल निकला. ‘तिलक, तराजू और तलवार’ पर निशाना साधने वाली पार्टी की हालके वर्षों में चाल भी बदली, चेहरा भी बदला और चरित्र भी.
”हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है.”
इस नए नारे के साथ बीएसपी ने यूपी में ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ा. पार्टी ने दलितों से ज़्यादा अगड़ी जातियों को टिकट बांटे. कई लोगों ने बीएसपी की प्रमुख मायावती पर टिकट बेचने का भी आरोप लगाया. मायावती की प्रयोगशाला में किया गया यह प्रयोग भी हिट रहा और यूपी में बीएसपी को बहुमत मिल गया था. दलितों की राजनीति और उनकी दशा को गौर से देखने वाले कहते हैं अब बीएसपी दलितों की पार्टी नहीं रही. जवाहरलाल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर तुलसीराम कहते हैं कि, ”बीएसपी अब सवर्णों की पार्टी है. ब्राह्मणों की पार्टी है. वह अंबेडकर को भूल चुकी है.” तुलसीराम कहते हैं कि भारत की कोई भी राजनीतिक पार्टी दलितों के लिए काम नहीं कर रही है. दलितों की बात करने वाली पार्टियां उन्हें उकसाकर अपनी चुनावी दुकान चला रही है.”
यूपी से दिल्ली तक:- बिहार में भी दलितों की राजनीति करने वाले रामविलास पासवान केंद्र में अक्सर मंत्रिमंडल का मज़ा लेते रहे हैं. इन चुनावों में पासवान अभी लालू के साथ खड़े दिख रहे हैं. भारत की राजनीति में सिफ़र से शिखर तक आने के लिए दलितों ने कितना संघर्ष किया. इसका पता इसी बात से चलता है कि जो मुकाम लालू और मुलायम जैसे नेताओं ने फटाफट हासिल कर लिया, उसे पाने के लिए कांशीराम को लंबा इंतज़ार और लंबा सफ़र तय करना पड़ा.
कांशीराम ने उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्यप्रदेश में दलितों का वोट बैंक तैयार किया और उसे एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया. कांशीराम ने उत्तर प्रदेश और उसके माध्यम से भारत की राजनीति में उथल-पुथल मचा दी. कांशीराम की राजनीति शुरू हुई ब्राह्मणवाद के विरोध से. लेकिन, पार्टी को सत्ता पर चढ़ाने के लिए उन्होंने किसी से समझौता करने से परहेज़ नहीं किया, न ही समझौता तोड़ने में संकोच किया. दलितों को ताक़त देने की बात कहते हुए मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश के महत्वपूर्ण पदों पर दलित अफ़सरों की नियुक्तियां की. वोट बैंक बढ़ाने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी को अति पिछड़ों और मुसलमानों के गरीब तबक़े से जोड़ा.अब उनकी बनाई पार्टी का दलितों को भूलती दिखाई पड़ती है. मायावती कांशीराम की दी गईं सीख भूलती दिखाई पड़ रही है. मायावती की पार्टी अब दलित वोट बैंक के दायरे के पार सवर्ण मतदाताओं में भी पकड़ बना रही है. बड़ा सवाल अब ये भी निकल रहा है कि क्या वाकई मायावती दलितों का प्रतिनिधित्व कर पा रही हैं या सिर्फ सत्ता सुख भोग चाह रही हैं ?
जनतान्त्रिक पार्टी हो :- उपरोक्त विवेचन से वर्तमान दलित राजनीति की जो कमियां, कमजोरियां, भटकाव और उलझनें दृष्टिगोचर हुयी हैं उनके परिपेक्ष्य में एक नए रैडिकल विकल्प की ज़रुरत है जो परम्परागत सत्ता की राजनीति की जगह व्यवस्था परिवर्तन की पक्षधर हो. वर्तमान दलित पार्टियों की संरचना के विवेचन से स्पष्ट है कि वे एक व्यक्ति आधारित पार्टिया हैं जो उनकी व्यक्तिगत जागीर हैं जिसका इस्तेमाल एक व्यापारिक घराने की तरह किया जाता है. इनके अध्यक्ष ही इनके सर्वेसर्वा हैं और उनके अलावा पार्टी में किसी दूसरे नेता का कोई अस्तित्व नहीं है. इनमें हद दर्जे का अधिनायकवाद है. इनकी कार्यकारिणी सम्मतियाँ केवल खाना पूर्ती मात्र है. पार्टी के अन्दर सामूहिक निर्णय लेने की कोई परम्परा नहीं है. अध्यक्ष का निजी मत ही पार्टी का मत है. पार्टी के अन्दर लोकतंत्र का सर्वथा अभाव है जब कि डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित पार्टियों की एक ख़ास विशेषता यह थी कि इनमें सामूहिक नेतृत्त्व और अंदरूनी लोकतंत्र का विशेष प्रावधान था. पार्टी के अन्दर व्यक्ति पूजा के लिए कोई स्थान नहीं था. उनके अंदर नेतृत्व की द्वितीय तथा तृतीय कतार थी. सभी निर्णय सामूहिक विचारविमर्श उपरांत ही लिए जाते थे. अतः वर्तमान व्यक्ति आधारित पार्टियों की जगह सामूहिक नेतृत्व वाली पार्टी का होना बहुत ज़रूरी है..
प्रगतिशील एजंडा हो:- वर्तमान दलित पार्टियों का कोई स्पष्ट एजंडा नहीं है जिस कारण वे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और दिशाहीनता का शिकार हैं. बाबा साहेब द्वारा स्थापित पार्टियों का एक रैडिकल राजनीतिक तथा आर्थिक एजंडा था जिसमें दलितों के सामाजिक न्याय को प्रमुख स्थान दिया जाता था. चुनाव में जाति के नाम पर नहीं बल्कि एजंडे के आधार पर वोट मांगे जाते थे. अतः दलित पार्टियों का एक सपष्ट एजंडा होना ज़रूरी है जिसमें दलितों के विशिष्ट मुद्दों के इलावा पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों और महिलायों के मुद्दे भी शामिल हों. इसमें आर्थिक, औद्योगिक और विदेश नीति का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए.
सैद्धांतिक गठजोड़ हो :- वर्तमान दलित पार्टियाँ दलित हितों की बजाये व्यक्तिगत लाभ के उद्देश्य से दूसरी दलित विरोधी पार्टियों के साथ अवसरवादी गठजोड़ करती हैं जिससे कुछ व्यक्तियों का तो लाभ हो जाता है परन्तु व्यापक दलित समुदाय को कोई लाभ नहीं होता है. यह भी एक सच्चाई है कि दलित एक कमज़ोर अल्पसंख्यक वर्ग हैं जिनके लिए अकेले सत्ता प्राप्त करना संभव नहीं है. अतः उनके लिए दूसरे वर्गों और पार्टियों के साथ गठबंधन करना एक ज़रुरत है परन्तु गठबंधन वर्तमान की तरह सिद्धान्तहीन और अवसरवादी नहीं होना चाहिए. वह डॉ. आंबेडकर की पार्टियों की तरह समान विचारधार और साँझा एजंडा के आधार पर होना चाहिए.
जाति उन्मूलन एजंडा हो :- बाबा साहेब ने कहा था कि जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य है. उन का यह भी निश्चित मत था कि मूलभूत क्रांति के बिना दलितों की मुक्ति संभव नहीं है. यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि जाति उन्मूलन किये बिना न केवल दलितों बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज की मुक्ति संभव नहीं है. दलितों का वर्तमान शोषण, पिछड़ापन और उत्पीड़न जाति व्यवस्था का ही दुष्परिणाम है. अतः न केवल दलितों बल्कि हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों और ईसाईयों में जातिभेद के उन्मूलन का एजंडा नयी पार्टी का मुख्य कार्यक्रम होना चाहिए. यह तथ्य भी बहुत महत्वपूर्ण है कि दलितों की मुक्ति में ही सब की मुक्ति है और सब की मुक्ति में ही दलितों की मुक्ति है.
पार्टी की स्पष्ट भूमिका हो :– 1952 में शैड्युल्ड कास्ट्स फेडेरशन के संविधान में राजनीतिक पार्टी की भूमिका की व्याख्या करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था, “राजनैतिक पार्टी का काम केवल चुनाव जीतना ही नहीं होता, बल्कि यह लोगों को शिक्षित करने, उद्देलित करने और संगठित करने का होता है.” इसी प्रकार दलित नेता के गुणों का बखान करते हुए उन्होंने कहा था, “आपके नेता का साहस और बुद्धिमत्ता किसी भी पार्टी के सर्वोच्च नेता से कम नहीं होनी चाहिए. दक्ष नेताओं के बिना पार्टी ख़त्म हो जाती है.” इसके विपरीत यह देखा गया है कि वर्तमान दलित पार्टियाँ दलितों को शिक्षित करने, उद्देलित करने और संगठित करने की बजाये उनका इस्तेमाल केवल जाति वोट बैंक के रूप में करती हैं. इसी तरह वर्तमान दलित नेताओं का कद्द और बुद्धिमत्ता डॉ. आंबेडकर के मापदंडों से कोसों दूर हैं. अतः दलित पार्टी की राजनीतिक और सामाजिक भूमिका बहुत स्पष्ट होनी चाहिए और उन के नेता सुयोग्य होने चाहिए.
ऊना दलित काण्ड का मास्टरमाइंड सोनिया गाँधी के करीबी अहमद पटेल:- सूत्रों के अनुसार हार्दिक पटेल द्धारा पाटीदार आन्दोलन व दलित कांड की पोल खुलने और उस पर सख्त कार्यवाही करना, मोदी मंडल में चिन्ता का विषय था । इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गोधरा दंगे में भी कांग्रेस का ही हाथ था और अब इस दलित कांड में भी. कांग्रेस का ही हाथ उजागर होने पर गोधरा की तर्ज़ पर सख्त कार्यवाही कर हमेशा के लिए सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि समस्त भारत से ऐसे षड्यंत्रकारियों को नेस्ताबूत किया जा सके। मामले की अब तक कि जांच में जो बातें सामने आई हैं वो साफ तौर पर कांग्रेस की ओर इशारा कर रही हैं। हालांकि साजिश को इतनी सफाई से अंजाम दिया गया है कि सबूतों को ढूंढने और उनके जरिए असली साजिशकर्ता तक पहुंचना बेहद पेचीदा काम साबित हो रहा है । इस सिलसिले में गिरफ्तार 22 लोगों से पूछताछ और मोबाइल फोन रिकॉर्ड्स से कुछ ऐसी जानकारियां सामने आई हैं जो बेहद चौंकाने वाली हैं। इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि अहमद पटेल ने इस पूरी साजिश को अपने करीबी कांग्रेसी विधायक वंश पंजाभाई भीमभाई के जरिए अंजाम दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में खुलकर कहा कि “दलितों का ठेका लेकर बैठे कुछ लोग उन पर अत्याचार करवाकर इश्यू क्रिएट कर रहे हैं। अगर उन्हें हमला करना है तो मुझ पर करें।”

ऊना के कांग्रेसी विधायक और मोटा समधियाला गांव के सरपंच प्रफुल्ल कोराट के बीच घटना से पहले एक महीने में 300 बार से अधिक बातचीत की बात सामने आई है। यह बातचीत विधायक के डायरेक्ट नंबर पर नहीं बल्कि किसी करीबी के नंबर पर हो रही थी। घटना पर हंगामा मचते ही सरपंच फरार हो गया। उसे अभी तक पकड़ा नहीं जा सका है। गांव के कई लोगों ने पूछताछ में बताया है कि सरपंच और लोकल कांग्रेसी विधायक में पहले से ही अच्छे संबंध रहे हैं।सरपंच का दलित परिवार से झगड़ा चल रहा था। वो उन्हें जमीन खाली करने और जानवरों की खाल उतारने का काम छोड़ने के लिए धमकियां दे रहा था।विधायक के कहने पर ही सरपंच पिछले कुछ समय से दलित बालू सरवैया के परिवार से अपने रिश्ते सुधारने में लग गया था, ताकि पहला शक उसी पर न हो।जांच में इस बात की पुष्टि हो गई है कि घटना का वीडियो सरपंच के मोबाइल फोन से ही बनाया गया है।सरपंच के फोन से यह वीडियो एक तेलुगु चैनल तक कैसे पहुंचा, इस बारे में कड़ियां अभी तक नहीं जुड़ पाई हैं। शक है कि सरपंच ने इसे विधायक के हवाले कर दिया था।फिलहाल आरोपियों में एक मुस्लिम लड़का भी है। उसने इस साजिश के बारे में कुछ अहम बातें जांचकर्ताओं को बताई हैं।यह बात भी पता चली है कि पकड़े गए किसी भी आरोपी ने पहले कभी गोरक्षा के लिए मारपीट नहीं की थी। सवाल ये है कि ऐसा क्या हो गया कि उनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने पहले गांव और फिर ऊना कस्बे में मारपीट की और उसका वीडियो भी बनाया?आरोपी अपनी गाड़ी पर शिवसेना का नाम लिखते थे, लेकिन यह पता चला है कि उनका शिवसेना से औपचारिक तौर पर कोई लेना-देना नहीं है।

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6 Comments on "दलित राजनीति एक चुनावी साजिश"

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इंसान
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सात माह और चौदह दिन पहले लिखी अपनी टिप्पणी को फिर से दोहराने को मन करता है| “डा: राधेश्याम द्विवेदी जी द्वारा प्रस्तुत विश्लेषणात्मक और सारगर्भित लेख “सबका विकास सबका साथ’’ का नारा कितना हसीन कितना यकीन पर रमश सिंह जी की टिप्पणी पढ़ मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि कोई उदंड व्यक्ति मंदिर में घुस भले लोगों का उपहास कर रहा है|” और, हाँ जब मंदिर की बात चली तो दो वर्षों पूर्व महाशय जी से मेरे वाद-विवाद का एक संक्षिप्त अंश भी प्रस्तुत करता हूँ| यहाँ दलित राजनीति जैसे गंभीर विषय की नीरसता से बचने हेतु यदि आप चाहें… Read more »
आर. सिंह
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सत्य से मुंह मोड़ने और मूल समस्या से ध्यान बताने का एक कुटिल प्रयास.

इंसान
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चित भी मेरी पट भी मेरी सत्यता को आप ही परिभाषित करते रहेंगे तो भारत देश आगे कैसे बढ़ेगा? कभी समय मिले तो घर से दूर नहीं, घर ही में बैठे भूजाल पर “Poor India” गूगल पर “Images” देखिये ताकि आप अपने सत्य को भलीभांति पहचान लें| जब कभी निंद्रा से उठ मातृभूमि के लिए संवेदना जागे तो श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में बीजेपी को अपना समर्थन देते उनके साथ मिल भारत पुनर्निर्माण में लग जाएं| अभी तो मुझे बताएं कि तथाकथित स्वतंत्रता के लगभग सात दशक पश्चात आज इक्कीसवीं सदी में हमारे बीच, मूल समस्या, कोई दलित… Read more »
आर. सिंह
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ये जितने लोग अपने राष्ट्र वादी होने का ढिढोरा पीट रहे है,उनमे अधिकतर अपने व्यक्तिगत जीवन में भ्रष्ट और बेईमान हैं,यानि मेरी परिभाषा के अनुसार चूंकि कोई भी भ्रष्ट और बेईमान राष्ट्र भक्त नहीं हो सकता ,इसलिए ऐसे सब लोग राष्ट्र द्रोही हैं.पहले जो टिपण्णी मैंने भेजी है,वह जरा विस्तृत है, अतःवह बहुतों के लिए दर्पण का काम करेगा.

आर. सिंह
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संपादक जी,मैंने अपनी टिपण्णी में भारत के सम्बन्ध में राष्ट्र प्रेमी और राष्ट्र द्रोहियों को परिभाषित करने का प्रयत्न किया है.क्या उसे आप प्रकाशित करेंगे?

इंसान
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डा. राधेश्याम द्विवेदी जी द्वारा प्रस्तुत राजनैतिक लेख “दलित राजनीति एक चुनावी साजिश” को सरसरी तौर से पढ़ते विचार आया है कि आज राष्ट्रद्रोही राजनीतिज्ञों के कारण देश की दयनीय स्थिति व सामाजिक कुरीतियों के वातावरण से पूर्णतया क्षुब्ध अधिकारी-तंत्र में यदि मातृभूमि के लिए उनके मन में संवेदना जाग उठे तो वे सब प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शासन के साथ मिल राष्ट्रद्रोहियों व देश के शत्रुओं को अनावृत करते उन्हें न्याय व विधि व्यवस्था के अंतर्गत दंडित करवा सकते हैं|

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