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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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शुभम श्रीवास्तव

मानव सभ्यताओं के लाखों वर्षों से चले आ रहे क्रम में आज हम एक ऐसे मुहाने पर आ कर खड़े हो गए है जहाँ से भौतिकी दुनिया के विकास से इतर हम एक ऐसी आभासी दुनिया में पाँव जमाने जा रहे हैं जो आने वाले समय के लिहाज़ से एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा।
डिजिटल इंडिया कैम्पेन भारत सरकार का एक बहुत ही मात्वकांक्षी और सराहनीय पहल है। इस योजना के तहत देश के विकास का जो मॉडल तैयार किया गया है वह आने वाले समय की प्रासंगिकता के मद्देनज़र बहुत ही अहम कदम है। इस योजना के मद्देनज़र प्रधानमंत्री जी का अमरिका का यह दूसरा दौरा काफी महत्वपूर्ण है। सिलिकॉन वैली में विश्व की शिर्ष सुचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के सी.ई.ओ. से प्रधानमंत्री जी की मुलाक़ात काफी सफल रही। माइक्रोसॉफ्ट ने भारत के 5,00,000 गांवों में हाई स्पीड ब्रॉडबैंड का विस्तार करने में सहयोग पर हामी भरी तो वही गूगल ने देश के 500 रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई से लैस करने की जिम्मेदारी ली।
इस पुरे योजना की परिधि केवल सोशल साईट के प्रयोग और इससे हो रहे फायदे और नुकसान के बहस तक ही नहीं सीमित है, बल्कि इसका दायरा काफी बड़ा है। इस योजना के तहत पंचायतों को मंत्रालय से जोड़ने का काम, शासन के कार्य प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना, देश के सभी गाँवों तक इंटरनेट की उपलब्धता करना और साथ में देश के लिए रोजगार की बेहतर संभावनाओं का द्वार खोलने जैसे बहुत से महत्वपूर्ण बिन्दु हैं। ई- टिकटिंग, ई- गवर्नेंस और प्लास्टिक मनी को व्यापकता प्रदान करने जैसी सभी व्यवस्थाएं डिजिटल इंडिया के अतर्गत है।
एक तरफ जहाँ इस पुरे कैम्पेन की हर तरफ वाह-वाही हो रही है, वही एक बहुत बड़ा समूह इसके विरोध में अपने सुर तेज़ किए हुए है। विरोधी खेमा अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए शिक्षा और व्यक्ति की मूलभूत चीज़ों की दुहाई दे रहा है। उनका कहना है की ऐसा देश जहाँ की मात्र 74 फीसदी जनता साक्षर है और उनमे से भी बहुत काम लोगों को अंग्रेजी का ज्ञान है, ऐसे में डिजिटल इंडिया का कोई मतलब नहीं। लोगों की ये दलील जायज है और इस पर केंद्र को गंभीर हो कर के विचार कर के जल्दी से जल्दी हल निकलना चाहिए, पर मेरा मानना है ये एक नकरात्मक सोच है। जो लोग इस योजना का विरोध शिक्षा की दलील दे कर के कर रहे हैं, उनको तब ये भी सोचना चाहिए कि शिक्षा से पहले भोजन है। आज भी एक बहुत बड़ी आबादी तक दो वक़्त की रोटी नहीं पहुँच पाती तो क्या इस पर यह तर्क देना ठीक होगा कि देश के सभी विद्यालयों को बंद कर दिया जाए ? विकास का एक समानांतर रास्ता भी होता है, जिसमे नागरीकों की मूलभूत समस्याओं के हल के साथ साथ समय की प्रासंगिकता को समझते हुए भी विकास के रथ को बढ़ाया जाता है। मूलभूत समस्याओं पर निश्चित तौर पर विचार कर रास्ता निकलना चाहिए, पर इसका ये अर्थ नहीं कि वक़्त की मांग को नकार दिया जाए।
हालांकि इस परियोजना को की सफलता की राह में बहुत से रोड़े हैं। इस परियोजना को व्यापक रूप देने से पहले डिजिटल दुनिया की चुनौतियों पर काम करना जरुरी है। इसमें सूचनाओं की सुरक्षा, साइबर कानून में संसोधन, डिजिटल दुनिया के लिए कॉपीराइट जैसे नियमों पर विचार जैसे कई प्रमुख बिंदु है।
सुचना प्रोद्योगीकी के क्षेत्र की क्रांति का नतीजा है कि, देश में आज 97.8 करोड़ लोगों के पास मोबाइल फ़ोन है, 14 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता आज स्मार्टफोन के हैं। कुल मिला कर के देश में 24.3 करोड़ इंटरनेट के उपभोक्ता हैं। जिस तेज़ी से देश सुचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़ रही है, वो दिन दूर नहीं जब विश्व के सामने विकास के रथ पर बैठे, भ्रष्टाचार मुक्त और खुशहाल भारत का उदय होगा।

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