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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-अशोक प्रवृद्ध”-

 gravitational forceभारतवर्ष के प्रसिद्ध और जाने-माने वैज्ञानिक एवं भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) के भूतपूर्व प्रमुख जी माधवन नायर ने गत दिनों यह कहकर पाश्चात्य पद्धति से शिक्षित भारतीयजनों में हड़कम्प मचा दिया है कि वेद के कई श्लोकों में चन्द्रमा पर जल की उपलब्धता अर्थात मौजूदगी का विवरण अंकित है और आर्यभट्ट जैसे खगोलविद् न्यूटन से भी कहीं पहले गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में जानते थे। वेदों पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए पद्म विभूषण पुरस्कार से विभूषित इकहतर वर्षीय भूतपूर्व इसरो प्रमुख जी माधवन नायर ने कहा कि न्यूटन से १५०० साल पहले भारत को गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में जानकारी थी। भारतीय वेदों और प्राचीन हस्तलेखों में भी धातुकर्म, बीजगणित, खगोल विज्ञान, गणित, वास्तुकला एवं ज्योतिष-शास्त्र के बारे में सूचना थी और यह जानकारी उस वक्त से थी, जब पश्चिमी देशों को इनके बारे में पता तक नहीं था। वर्ष २००३ से २००९ तक इसरो के अध्यक्ष रहे नायर ने यह दावा भी किया कि हड़प्पा सभ्यता के दौरान शहरों के निर्माण में गणना के लिए ज्यामिति का इस्तेमाल किया गया और पायथागोरियन सिद्धांत वैदिक काल के समय से ही वजूद में है। उन्होंने कहा कि वेदों में दी गई जानकारी संक्षिप्त स्वरूप में थी, जिससे आधुनिक विज्ञान के लिए उन्हें स्वीकार करना मुश्किल हो गया। एक वेद के कुछ श्लोकों में कहा गया है कि चन्द्रमा पर जल है, लेकिन किसी ने इस पर भरोसा नहीं किया। हमारे चन्द्रयान मिशन के जरिये हम इसका पता लगा सके और यह पता लगाने वाला हमारा देश भारतवर्ष विश्व का पहला देश है। आदिग्रन्थ वेदों की प्रशंसा में नायर ने कहा कि वेदों में लिखी सारी बातें नहीं समझी जा सकतीं, क्योंकि वे क्लिष्ठ संस्कृत में हैं। पाँचवीं सदी के खगोलविद्-गणितज्ञ आर्यभट्ट की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा, हमें वास्तव में गर्व है कि आर्यभट्ट और भास्कर ने ग्रहों एवं बाहरी ग्रहों के विषय पर गहन कार्य किया है। यह एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र था। उन्होंने कहा, यहां तक कि चन्द्रयान के लिए भी आर्यभट्ट का समीकरण इस्तेमाल किया गया। वैदिक गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के बारे में भी न्यूटन को इसके बारे में करीब १५०० साल बाद पता चला, परन्तु गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त की यह जानकारी हमारे वैदिक और पौराणिक ग्रन्थों में पूर्व से ही अंकित है।

वेद और वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि न्यूटन के सहस्त्राब्दियों वर्ष पूर्व हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों से अपनी तपश्चर्या से गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को जान लिया था,जिसके समक्ष न्यूटन कहीं नहीं ठहरते हैं।यही कारण है कि वेद और वैदिक ग्रन्थों में गुरूत्वाकर्षण के नियम का विषद उल्लेख अंकित है और और यह भी सत्य है कि वैदिक ग्रन्थों में गुरूत्वाकर्षण के नियम को समझाने के लिये पर्याप्त सूत्र उपलब्ध हैं, परन्तु इन ग्रन्थों के अध्ययन नहीं करने के कारण पाश्चात्य शिक्षण पद्धति से शिक्षित भारतीयजन, प्रमुखतः आजकल के युवा वर्ग इस गौरवमयी भारतवर्ष की विद्वता से अनजान केवल पाश्चात्य वैज्ञानिकों के पीछे ही श्रद्धाभाव रखते हैं । जबकि यह सहस्त्राब्दियों वर्ष पूर्व से ही परमेश्वरोक्त आदिग्रन्थ वेदों में सूक्ष्म ज्ञान के रूप में वर्णित हैं , परन्तु इस बात से अनजान भारतीय सहित सम्पूर्ण संसार के लोग इसे न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त के नाम से जानते हैं । ऐसे लोगों ने आँग्ल शासकों द्वारा लागू की गई मैकाले की पाश्चात्य शिक्षा पद्धति द्वारा शिक्षित और दुर्भावना से प्रेरित बुद्धिजीवियों द्वारा विकृत किये गए भारतीय इतिहास को पढ़कर अपनी उपर्युक्त धारणाएँ बना रखीं हैं, उन्हें वेद और वैदिक ग्रन्थों तथा भारतीय परम्परा के अन्तर्गत लिखी गई इतिहास , पुराण के ग्रन्थों का शोधपरक अध्ययन करना चाहिए। उपर्युक्त कथन के विपरीत, सूर्य जैसा जगमगाता हुआ सच तो यह है कि भारतवर्ष के लोगों का गुरुत्वाकर्षण के साथ सर्वप्रथम परिचय न्यूटन से सहस्त्राब्दियों पूर्व हुआ था।अतः, इस कथन में कोई सच्चाई नहीं है कि गुरुत्वाकर्षण के नियम का आविष्कार सर्वप्रथम न्यूटन ने सेव के फल को पेड़ से गिरते हुए देखकर किया था।

 

वैदिक ग्रन्थों में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का उल्लेख

गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लेख अनेक वैदिक ग्रन्थों में होने के कारण वैदिक सभ्यता-संस्कृति के प्रशंसक भारतीय जन इसे न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त नहीं वरन प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Nature’s Law Of Gravitation) कहते हैं ।आर्यभट्ट ने तो आपने ग्रन्थ में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का वर्णन का वर्णन किया ही है । इसके साथ ही गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का उल्लेख ऋग्वेद , बृहत् जाबाल उपनिषद् ,प्रश्नोपनिषद, महाभारत, पतञ्जली कृत व्याकरण महाभाष्य , वराहमिहिर कृत ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका, भास्कराचार्य द्वितीय पूर्व की सिद्धान्तशिरोमणि आदि अनेक वैदिक और पुरातन ग्रन्थों में अंकित मिलता है। वेदव्यासकृत महाभारत में गुरुत्वाकर्षण का अंकन देखकर वैदिक ग्रन्थों के विद्वतजनों , अध्ययनकर्ताओं का मत है कि वस्तुतः न्यूटन को जो गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त के आविष्कार का श्रेय मिला वह तो हमारे पितामह भीष्म को मिलना चाहिए,जो आइंस्टीन के सिद्धांत से अधिक समीप हैं । भूत पदार्थों के गुणों का वर्णन करते हुए भीष्म पितामह ने युद्धिष्ठिर से कहा था –

भूमै: स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्र्सवात्मना, गन्धो भारश्च शक्तिश्च संघातः स्थापना धृति ।

महाभारत-शान्ति पर्व . २६१

अर्थात- हे युधिष्ठिर! स्थिरता, गुरुत्वाकर्षण, कठोरता, उत्पादकता, गंध, भार, शक्ति, संघात, स्थापना, आदि भूमि के गुण है। -भीष्म पितामह

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण (बल) कोई शक्ति नहीं है बल्कि पार्थिव आकर्षण मात्र है । यह गुण भूमि में ही नहीं वरण संसार के सभी पदार्थो में है कि वे अपनी तरह के सभी पदार्थो को आकर्षित करते है एवं प्रभावित करते है। इसका सर्वाधिक उत्तम व अच्छा विश्लेषण हजारों वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने सादृश्य एवं आन्तर्य के सिद्धान्त से कर दिया था। गुरुत्वाकर्षण सादृश्य का ही उपखण्ड है। सामान गुण वाली वस्तुएँ परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करती है। उससे आन्तर्य पैदा होता है । पतंजलि ने कहा है –

अचेतनेश्वपी, तद-यथा-लोष्ठ क्षिप्तो बाहुवेगम गत्वा नैव तिर्यग गच्छति नोर्ध्वमारोहती प्रिथिविविकारः प्रिथिविमेव गच्छति – आन्तर्यतः । तथा या एता आन्तरिक्ष्यः सूक्ष्मा आपस्तासां विकारो धूमः । स आकाश देवे निवाते नैव तिर्यग नवागवारोहती । अब्विकारोपि एव गच्छति आनार्यतः । तथा ज्योतिषो विकारो अर्चिराकाशदेशो निवाते सुप्रज्वलितो नैव तिर्यग गच्छति नावगवरोहति । ज्योतिषो विकारो ज्योतिरेव गच्छति आन्तर्यतः ।

पतंजलि महाभाष्य, सादृश्य एवं आन्तर्य- १/१/५०

अर्थात -चेतन अचेतन सबमें आन्तर्य सिद्धांत कार्य करता है। मिट्टी का ढेला आकाश में जितनी बाहुबल से फेंका जाता है, वह उतना ऊपर चला जाता है, फिर ना वह तिरछे जाता है और ना ही ऊपर जाता है, वह पृथ्वी का विकार होने के कारण पृथ्वी में ही आ गिरता है। इसी का नाम आन्तर्य है । इसी प्रकार अंतरिक्ष में सूक्ष्म आपः (hydrogen) की तरह का सुक्ष्म जल तत्व का ही उसका विकार धूम है। यदि पृथ्वी में धूम होता तो वह पृथ्वी में क्यों नहीं आता? वह आकाश में जहाँ हवा का प्रभाव नहीं, वहाँ चला जाता है- ना तिरछे जाता है ना नीचे ही आता है। इसी प्रकार ज्योति का विकार अर्चि है। वह भी ना निचे आता है ना तिरछे जाता है। फिर वह कहा जाता है? ज्योति का विकार ज्योति को ही जाता है।

इसके पूर्व के मन्त्र व्याकरण महाभाष्य स्थानेन्तरतमः -१/१/४९ में महर्षि पतंजलि ने गुरूत्वाकर्षण के सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा है –

लोष्ठः क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यक् गच्छति नोर्ध्वमारोहति ।

पृथ्वीविकारः पृथ्वीमेव गच्छति आन्तर्यतः ।

महाभाष्य स्थानेन्तरतमः, १/१/४९ सूत्र पर

अर्थात- पृथ्वी की आकर्षण शक्ति इस प्रकार की है कि यदि मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका जाता है तो वह बहुवेग को पूरा करने पर, न टेढ़ा जाता है और न ऊपर चढ़ता है । वह पृथ्वी का विकार है, इसलिये पृथ्वी पर ही आ जाता है ।

उपनिषद ग्रन्थों में प्रमुख बृहत् जाबाल उपनिषद् में गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त का वर्णन है और वहाँ गुरुत्वाकर्षण को आधारशक्ति नाम से अंकित किया गया है।इस उपनिषद में इसके दो भाग किये गये हैं -पहला, ऊर्ध्वशक्ति या ऊर्ध्वग अर्थात ऊपर की ओर खिंचकर जाना । जैसे कि अग्नि का ऊपर की ओर जाना ।और दूसरा अधःशक्ति या निम्नग अर्थात नीचे की ओर खिंचकर जाना । जैसे जल का नीचे की ओर जाना या पत्थर आदि का नीचे आना ।

बृहत् उपनिषद् में भी गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त के सूत्रांकित हैं –

अग्नीषोमात्मकं जगत् ।

बृहत् उपनिषद् २.४

आधारशक्त्यावधृतः कालाग्निरयम् ऊर्ध्वगः । तथैव निम्नगः सोमः ।

–              बृहत् उपनिषद् २.८

अर्थात- सारा संसार अग्नि और सोम का समन्वय है । अग्नि की ऊर्ध्वगति है और सोम की अधोःशक्ति । इन दोनो शक्तियों के आकर्षण से ही संसार रुका हुआ है ।

प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी भास्कराचार्य ,जिन्हें भाष्कर द्वितीय (1114 – 1185) भी कहा जाता है , के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि है जिसमें लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित तथा गोलाध्याय नामक चार भाग हैं। भास्कराचार्य द्वितीय पूर्व ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-

आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत्

खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।

आकृष्यते तत् पततीव भाति

समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।

सिद्धान्त० भुवन० १६

अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं है और न गिरती है । वह अपनी कील पर घूमती है।

वराहमिहिर ने अपने ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका में कहा है-

पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः ।

खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।

–              पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१

अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।

 

अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है –

उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।

सिद्धान्तशेखर १५/२१ )

नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।

आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।।

सिद्धान्तशेखर १५/२२

अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।

 

प्रश्न उपनिषद् में ऋषि पिप्पलाद ने कहा है-

पायूपस्थे – अपानम् ।

–              प्रश्न उपनिषद् ३.४

पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य० ।

   – प्रश्न उपनिषद ३.८

तथा पृथिव्याम् अभिमानिनी या देवता … सैषा पुरुषस्य अपानवृत्तिम् आकृष्य…. अपकर्षेन अनुग्रहं कुर्वती वर्तते । अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात् पतेत् सावकाशे वा उद्गच्छेत् ।

शांकर भाष्य, प्रश्न० ३.८

अर्थात- अपान वायु के द्वारा ही मल मूत्र नीचे आता है । पृथ्वी अपने आकर्षण शक्ति के द्वारा ही मनुष्य को रोके हुए है, अन्यथा वह आकाश में उड़ जाता ।

 

गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के लिए ऋग्वेद के यह मन्त्र प्रसिद्ध है –

यदा ते हर्य्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे ।

आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ।।

ऋग्वेद अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ३

अर्थात – सब लोकों का सूर्य्य के साथ आकर्षण और सूर्य्य आदि लोकों का परमेश्वर के साथ आकर्षण है । इन्द्र जो वायु , इसमें ईश्वर के रचे आकर्षण, प्रकाश और बल आदि बड़े गुण हैं । उनसे सब लोकों का दिन दिन और क्षण क्षण के प्रति धारण, आकर्षण और प्रकाश होता है । इस हेतु से सब लोक अपनी अपनी कक्षा में चलते रहते हैं, इधर उधर विचल भी नहीं सकते ।

ऋग्वेद के अन्य मन्त्र में कहा है-

यदा सूर्य्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः ।

आदित्ते विश्वा भुवनानी येमिरे ।।३।। -ऋग्वेद अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ५

अर्थात – हे परमेश्वर ! जब उन सूर्य्यादि लोकों को आपने रचा और आपके ही प्रकाश से प्रकाशित हो रहे हैं और आप अपने सामर्थ्य से उनका धारण कर रहे हैं , इसी कारण सूर्य्य और पृथ्वी आदि लोकों और अपने स्वरूप को धारण कर रहे हैं । इन सूर्य्य आदि लोकों का सब लोकों के साथ आकर्षण से धारण होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर सब लोकों का आकर्षण और धारण कर रहा है।

वैदिक ग्रन्थों में वर्णित गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त न्यूटन के तथाकथित सिद्धान्त से आगे की बात भी बतलाते हैं । पतंजलि महाभाष्य, सादृश्य एवं आन्तर्य- १/१/५०में वर्णित आन्तर्य के सिद्धांत से शरीर के स्थूल और सूक्ष्म सभी तत्वों का विश्लेषण किया जा सकता है । इनमे सभी स्थूल द्रव्य आदि अपने-अपने क्षेत्र की ओर चले जाते हैं ,परन्तु प्रत्येक क्षेत्र का अनुभव करने वाला अर्चि कहाँ जाता है? उसे भी आन्तर्य सिद्धांत से कहीं जाना चाहिए। उसका भी कोई ब्रह्माण्ड और ठिकाना होना चाहिए, जहाँ वह ठहर सके। जब इस प्रकार का ध्यान किया जाता है तब एक ऐसी उपस्थिति का बोध होता है जो समय, ब्रह्माण्ड, और गति से भी परे होता है! वह कारण चेतना ही ब्रह्म है।

योग का उद्देश्य शरीरस्थ क्षेत्रज्ञ को उस कारण सत्ता में मिला देना है ।आन्तर्य सिद्धांत ध्यान की इसी स्थिति को सिद्ध करता है। इसीलिए इसे प्रतिगुरुत्वाकर्षण बल कहा जा सकता है, अर्थात मन को अन्य सभी विकारों का परित्याग कर केवल चेतना को चेतना से ही, प्रकाश को प्रकाश से ही मिलाने का अभ्यास करना चाहिए। इसी से पदार्थ से परे, राग-द्वेष से परे शुद्ध-बुद्ध, निरंजन आत्मा और परमात्मा की अनुभूति की जा सकती है ।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि न्यूटन से हजारों वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का उल्लेख किया है तथा ऋग्वेद में गुरुत्वाकर्षण का उल्लेख होने से यह भी प्रमाणित सत्य है कि सहस्त्राब्दियों वर्ष पूर्व भारतीय गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से भली-भान्ति परिचित ही नहीं थे वरन न्यूटन के सिद्धांत से आगे की बात के अन्तः तक पहुँच चुके थे ।

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