लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

ओंकारेश्वर बांध के जल भराव को कम करने व विस्थापितों को डूब में आर्इ जमीन के बदले जमीन देने संबंधी आंदोलनकारियों की मांगे फिलहाल सरकार ने भले ही माने ली हों, लेकिन सरकार अपने वचन को अमल में लाएगी ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि सरकार अभी इसी तर्ज पर पानी में रहकर बीते चौदह दिन से लड़ार्इ लड़ रहे हरदा आंदोलन की अनदेखी किए हुए है। यह जलसत्याग्रह इंदिरासागर बांध की डूब में आने वाले ग्राम खरदाना और बड़खलिया में चल रहा है। 60 आंदोलनकारी जल के बीच रहकर जंग जारी रखे हुए हैं। यहां प्रदेश सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवज्ञा कर रही है। इस आदेश के मुताबिक इस बांध में पानी 260 मीटर से उपर नहीं भरा जा सकता, लेकिन इस पर अमल नहीं किया जा रहा है। बलिक सरकार इस आंदोलन को कुचलने के काम में लग गर्इ है। इस कड़ी में सत्याग्रहियों के ग्रामों की बिजली कांट दी गर्इ और यहां रखी उन नावों को हटा दिया गया, जो लोगों के आवागमन का जरिया बनी हुर्इ थीं। इन जल सत्याग्रहों से जो खास बात उभरकर सामने आर्इ है वह यह है कि कर्इ दशक बीत जाने के बावजूद विस्थापितों के पूनर्वास की मुकम्मल व्यवस्थाएं नहीं की गर्इ हैं। ये हालात केंद्र व राज्य सरकारों की बदनीयति जाहिर करने वाले हैं।

17 दिन तक पानी में रहकर अपनी जायज मांगे मनवाने के लिए शारीरिक कश्ट की त्रासदी झेल रहे लोगों का दर्द सरकार द्वारा मांगे मान लिए जाने से तत्काल तो उड़न-छू हो गया। जल-सत्याग्रही सरकारी आष्वासन और जलस्तर घटते ही एक सुखद मुस्कान लिए वे अपने घरों की ओर लौट गए। लेकिन इंदिरा सागर बांध के जल-सत्याग्रही अभी पानी में ही डटे हैं। सरकार ने अभी उनकी ओर रुख भी नहीं किया है। यह सिथति सरकार की असंवेदनषीलता उजागर करती है। जाहिर है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की ओंकारेश्वर बांध से जुड़े विस्थापितों के पुनर्वास संबंधी घोशणा के बावजूद हरदा में जल में जंग जारी है। शायद इसीलिए सत्याग्रह से जुड़े कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल का कहना है कि अभी लड़ार्इ पूरी नहीं हुर्इ है। अब तक मात्र जमीन देने की घोषणा की गर्इ है। यह लड़ार्इ सभी विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन मिलने तक चलती रहेगी। जल सत्याग्रह स्थल अब भू-अधिकार स्थल के रुप में काम करेगा। इस लड़ार्इ के लंबे खिंचने के आसार इसलिए हैं, क्योंकि कुटिल चतुरार्इ से सरकार ने इसमें ऐसा पेंच डाल दिया है, जिसकी भरपार्इ नामुमकिन है। सरकार ने जमीन के बदले जमीन देना तो मंजूर कर लिया है, लेकिन जो शर्त लगार्इ है, उसे कितने ग्रामीण पूरा कर पाएंगे, यह कहना जल्दबाजी होगी। दरअसल सरकार ने बेहद समझदारी बरतते हुए इस मुददे को दिए मुआवजे की 50 फीसदी वापिसी और विषेश पुनर्वास अनुदान वापिसी की शर्त से जोड़ा दिया है। मांगे मान लेने की शर्तों में यह एक ऐसी शर्त है, जो सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे कहावत को चरितार्थ करेगी। हालांकि मुख्यमंत्री ने 90 दिन की समय सीमा में प्रकरणों का निराकरण करने की जो बाध्यता तय की है, वह एक अच्छी शुरुआत है। इस दौरान जो किसान मुआवजे की आधी राशि और विशेष पुनर्वास अनुदान लौटा देंगे उन्हें सरकार अपने भूमि बैंक से जमीन के बदले जमीन दे देगी। लेकिन किसान के पास हमेशा नौ लाए तेरह की भूख बनी रहती है, इसलिए कितने किसानों के पास मुआवजे की राशि बचत खातों में जमा होगी, यह सवाल अहम है ? प्रकृति की मार झेलता और कर्ज में डूबा किसान यह राशि कहां से लौटा पाएगा ? जाहिर है पेंच उलझा का उलझा ही रहेगा।

यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण व विरोधाभासी स्थिति है कि एक तरफ तो प्रदेश सरकार इन्वेस्टर्स मीट के मार्फत पूंजीपतियों को लाल कार्पेट बिछाकर आमंत्रित करती है और मुफत में जमीन, बिजली व पानी देने के साथ तमाम कर संबंधी रियायतें भी देती है। इसके बाद जब उधोगपति उधोग क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधन का भरपूर दोहन कर लेते हैं तो उधोग को घाटे में दिखाकर चलते बनते हैं। सबिसडी और बैंक ऋण भी ये उधोगपति आसानी से डकार जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ समय पहले अधिकृत जानकारी दी थी औधोगिक घराने राष्ट्रीयकृत बैंकों को अब तक दस लाख करोड़ का चूना लगा चुके हैं। मध्यप्रदेश के अकेले गवालियर अंचल में 15 साल के भीतर 700 उधोग बंद हुए और इनमें काम करके आजीविका चला रहे 40 हजार लोग बेरोजगार हो गए। ये सब वे उधोग हैं जो जमीन उपलब्ध कराने के साथ छूट की तमाम शर्तें सरकार द्वारा मान लिए जाने के बाद मध्यप्रदेश में आए थे। इन उधोगों में ग्वालियर का जेसी मिल, कैलारस का शक्कर कारखाना और शिवपुरी शारदा साल्वेंट प्लांट प्रमुख हैं। इन उधोगों पर हजारों करोड़ बैंकों का ऋण बकाया है। इसलिए सरकार को चाहिए जो ग्रामीण मुआवजे की आधी राशि और विशेष पुनर्वास अनुदान देने की सिथति में नहीं हैं, उनसे यह राशि लिए बिना ही जमीन के बदले जमीन दी जाए ?

हमारे देश में औधोगिक विकास, बड़े बांधों का निर्माण, परमाणु विधुत परियोजनाएं, राष्ट्रीय राजमागोर्ं का चौड़ीकरण और राष्ट्रीय उधानों व अभ्यारण्यों में दुर्लभ वन्य प्राणियों को संरक्षित करने के उपायों के चलते यदि सबसे ज्यादा त्रासदी जिन मानव समुदायों ने भोगी है, उनमें आदिवासी, मछुआरे और सीमांत किसान हैं। पिछले पचास सालों में आधुनिक विकास के नाम पर जितनी भी परियोजनाओं की आधारशिलाएं रखी गर्इ हैं, उनके निर्माण के मददेनजर अपनी पुष्तैनी जड़ों से उखाड़े गए चार करोड़ के करीब रहवासी विस्थापन का अभिशाप दशकों से झेल रहे हैं। यह केवल संयोग नहीं है कि अधिकांश परियोजनाएं एक सोची-समझी साजिश के तहत उन्हीं क्षेत्रों में वजूद में लार्इ जाती रही हैं, जहां का तबका गरीब व लाचार तो है ही, अड़ंगा लगाने की ताकत और समझ भी उसमें न हो। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अपढ़ तबका भी अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हो रहा है। यही वजह है कि न्याय पाने की उसकी इच्छाशकित मजबूत हुर्इ है। और वह आंदोलन से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक का दरवाजा खटखटा रहा है। इस सब के बावजूद देश की एक भी राज्य सरकार ऐसी नहीं है, जिसने विस्थापन की शर्तों का हूबहू पालन किया हो और हितग्राहियों को संपूर्ण लाभ दिए जाने की सूची सार्वजनिक की हो ? जाहिर है प्रदेश सरकारों की नीयत में खोट है और वे विस्थापितों को बाजिव हक देना नही चाहती

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