विनोद कुमार सर्वोदय

राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक ग़ाज़ियाबाद

अंततः आतंकवाद °इस्लामिक” हो गया …..  

निसंदेह मोदी जी अमरीकी राष्ट्रपति के इस साहसिक वक्तव्य पर कोई टिप्पणी करने से अपने को अलग रखने को राजनैतिक कारणों से  विवश होगें  ? परन्तु उनके इस सतत प्रयास से उनके करोडों राष्ट्रवादी समर्थकों को अवश्य संतोष मिला होगा। उन्होंने भी आतंकियों की शरणस्थली व आतंकवादी संगठनों के प्रति कठोर कार्यवाही करके इस (इस्लामिक) आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने का अमरीका के साथ संयुक्त अभियान चलाने के लिये अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया है | उन्होनें स्पष्ट किया है कि आतंकवाद का सर्वनाश हमारी शीर्ष प्राथमिकताओं में एक है।

पोस्टरबॉय एनकाउंटर के बाद …..

यह बहुत कष्टकारी व पीडादायक है कि लगभग एक वर्ष से कश्मीर घाटी व सीमाओं पर आतंकियों व पाक सेनाओं के निरन्तर आक्रमणों से सुरक्षाबलों और सामान्य नागरिकों के हो रहे बलिदानों का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। यह ठीक है कि सीमापार से घुसपैठ में कुछ कमी आयी है परन्तु सीमाओं के दोनों ओर आतंकियों को मारने में सफलता मिलने के बाद भी हम  उनको नियंत्रित नहीं कर पा रहें है ?

मुसलमानों का सशक्तिकरण क्यों ?

यह भी समझना होगा कि कुल मुसलमानों की संख्या की तुलना में भी हिंदुओं की संख्या अधिक है जो पिछड़ी हुई है और संसाधनों की कमियों को झेल रही है।सुरेश तेंदुलकर समिति की संभवतः 2012-13 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 37.2 % भाग गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे रहता है। अतः इसके अनुसार बीपीएल के नीचे रहने वाले हिंदुओं की संख्या उस समय लगभग 35-36 करोड़ थी जोकि अधिकांशतः ग्रामीण क्षेत्रो व नगरों में झुग्गी – झोपड़ियों में रहने को विवश है।

“मेरा गीत मुझे गाने दो”…..स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर…..

आज राष्ट्र चेतना के धधकते अंगारे, हिन्दू राष्ट्र के प्रचंड परंतु सर्वाधिक प्रताड़ित योद्धा स्वातंत्र्यवीर

राष्ट्रीय सुरक्षा की अवहेलना क्यों ?

हमारी ढुलमुल शत्रु नीति व समझौतावादी प्रवृति का ही दुष्परिणाम है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी सीमाओं पर अनेक दर्दनाक घटनाऐं राष्ट्रीय सुरक्षा की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। इस पर भी आज राष्ट्र में पूर्णकालिक रक्षा मंत्री का न होना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सतर्कता व गंभीरता के अभाव का बोध करा रही है। कहा गये वो “आंख में आंख डाल कर उसी की भाषा में उत्तर देने वाले ” साहसिक नारे और कहां गई वह “एक के बदले दस सिर ” लाने के उत्साहवर्धक वक्तव्य ? क्या यह सब चुनावी लुभावने थोथे नारे थे या कुछ धरातल पर कर दिखाने की वास्तविक इच्छा ?

आतंकियों का पुनर्वास व मुस्लिम घुसपैठ…..

जम्मू-कश्मीर की एक और संवेदनशील समस्या विचार करने योग्य है कि पीओके के नागरिकों को कश्मीर में अपने बिछुड़े हुए परिवार से मिलने व स्वास्थ्य सम्बंधित सेवाओं के लिये पहले केवल एक माह तक रहने की छूट थी । परंतु पिछली सोनिया गांधी /मनमोहन सिंह की सरकार ने मार्च 2011 में इस अवधि को छह माह तक बढ़ा दिया और उसपर भी मल्टीपल एंट्री की छूट और दे दी। इस प्रकार पीओके से आने वाले विभिन्न लोग कश्मीर में छह माह तक रह सकते है और इन अवधि में वे कितनी ही बार पीओके व कश्मीर के मध्य आना जाना कर सकते है। जब यह वर्षो से सर्वविदित ही था और है कि पीओके में अनेक आतंकवादियों के अड्डे बने हुए है और उनका कश्मीर के रास्ते भारत मे आतंक फैलाने ही मुख्य मिशन है तो यह आत्मघाती निर्णय किस राजनीति का भाग है ?

देवभूमि कश्मीर का अहिंदुकरण

कश्मीरी हिन्दुओं को पुनः कश्मीर में बसाने के लिये व पाकिस्तान से आये शरणार्थी हिन्दुओं को वहां के सामान्य नागरिक अधिकार दिलवाने के लिये अनेक कठोर उपाय करने होंगे।अलगाववादियों व आतंकवादियों के कश्मीर व पीओके आदि के सभी ठीकानों व प्रशिक्षण केंद्रों को नष्ट करना होगा। बंग्ला देशी ,म्यंमार, पाकिस्तान,अफगानिस्तान आदि के मुस्लिम घुसपैठियों व आतंकियों को कठोरता से बाहर निकालना होगा। वहां के आतंकियो के स्लीपिंग सेलो व ओवर ग्राउंड वर्कर्स को भी चिन्हित करके उनको बंदी बनाना होगा।

कश्मीर का बिना शर्त भारत में पूर्ण विलय , फिर अनुच्छेद 370 का क्या औचित्य…❔

इस अनुच्छेद का अधिकांश लाभ सामान्य जनता को नही केवल वहां के सत्ताधारियों व अलगाववादियों को ही मिल रहा है । इसके कारण अलगाववादियों, आतंकियों एवं भारतीय ध्वज व संविधान का अपमान करने वालो पर कठोर कार्यवाही भी नही हो पाती । सन 2002 में पूरे देश मे लोकसभा क्षेत्रो का पुनर्गठन हुआ था पर इस विवादित अनुच्छेद के चलते यह जम्मू-कश्मीर में नही हो सका। क्या ऐसे में भारतीय संसद की भूमिका वहां अप्रसांगिक नही हो गई ? अतः यह विचार करना होगा कि अनुच्छेद 370 के होते वहां के सामान्य नागरिको को क्या लाभ हुआ और अगर देश के अन्य कानून वहां लागू होते तो उन्हें कितना लाभ होता ?

“यह कैसा विधान…. पत्थरबाज भी नही आते बाज…”⁉

विश्व के सभी देश अपने अपने नागरिकों के महत्व को समझते है और उसकी रक्षा के साथ साथ उसके समस्त मौलिक अधिकारों को यथा संभव सुरक्षा प्रदान करने के लिए संकल्पित है। परंतु हम सत्तर वर्ष के अपने स्वतंत्र राष्ट्र में इतने बौने हो गए है कि सैनिको का मान-मर्दन होता रहें और हम चिंता व निंदा करके केंडिल मॉर्च से अपने अपने दायित्व से मुक्त हों कर मीडिया में श्रद्धांजलियां देते हुए छपते रहना चाहते है । आज के सोशल मीडिया ने तो इस चलन की बाढ़ आती जा रही है ,यह कैसी राष्ट्रपरायणता है जो मानवीय संवेदनाओं से भी प्रचार की होड़ करवाती है । क्या पीड़ित हृदयो में आंसुओ का अकाल हो गया है या ह्र्दय ही इतना कठोर होता जा रहा है कि हमारी सुरक्षा में लगे इन सैनिकों को आक्रोशित हों कर भी आत्मग्लानि में जीने को विवश होना पड़ें ?