विनोद कुमार सर्वोदय

राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक ग़ाज़ियाबाद

धर्माधारित आतंकवाद –एक सच्चाई”

सन 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि तालिबान व अलक़ायदा आदि जिहादी संगठन पाक व अफगानिस्तान की सीमाओ पर अनेक छोटे छोटे बच्चों को धन देकर व जन्नत का वास्ता देकर “फिदायींन” बनाते है। तालिबान ने “फिदायीन-ए-इस्लाम” नाम से वजीरिस्तान में तीन ऐसे प्रशिक्षण शिविर तैयार किये हुए है जिसमें हज़ारो की संख्या में कम आयु (10 से 13 वर्ष) के मासूम मुस्लिम बच्चे प्रशिक्षण पा रहें है। अफगानिस्तान की तत्कालीन सरकार के अनुसार इन बच्चों को चौदह हज़ार से साठ हज़ार डॉलर में खरीदा जाता है और इनके माँ-बाप को समझाया जाता है कि धन के अतिरिक्त आपका बेटा इस्लाम के लिये शहीद होकर सीधे जन्नत पहुँचेगा।

“समान नागरिक संहिता” क्यों आवश्यक है…?

“समान नागरिक संहिता” ऐसी होनी चाहिये जिसका मुख्य आधार केवल भारतीय नागरिक होना चाहिये और कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति व सम्प्रदाय का हो सभी को सहज स्वीकार हो। जबकी विडम्बना यह है कि एक समान कानून की मांग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रुप में प्रस्तुत किया जाने का कुप्रचार किया जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी हम आज लगभग 70 वर्ष बाद भी उस विभाजनकारी व समाजघाती सोच को समाप्त न कर सकें बल्कि उन समस्त कारणों को अल्पसंख्यकवाद के मोह में फंस कर प्रोत्साहित ही करते आ रहे है। हमारे मौलिक व संवैधानिक अधिकारो व साथ में पर्सनल लॉ की मान्यताए कई बार विषम परिस्थितियां खड़ी कर देती है , तभी तो उच्चतम न्यायालय “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है।

साम्प्रदायिक सद्भाव एक मृग मरीचिका

राष्ट्रवाद को झुठलाने की एक और घटना जब सितम्बर 2008 में बटला हाउस (दिल्ली) में आजमगढ़ के आतंकियों को मारा गया तो उसमे दिल्ली पुलिस के शूरवीर इंस्पेक्टर के बलिदान को ही संदेहात्मक बना दिया और (छदम्) धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम आतंकियो के घर आजमगढ़ जाने की नेताओं में होड़ ही लग गयी थी। यहा तक समाचार आये थे कि उस समय सत्ता के शीर्ष को नियंत्रित करने वाली सोनिया गांधी ने भी आजमगढ़ के आतंकवादियों पर आंसू बहायें थे ।

“नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न” ….?

पिछले माह हमारे सेनानायक जनरल विपिन रावत ने अपने एक संदेश में स्पष्ट कहा था कि “जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बल ज्यादा हताहत इसलिए हो रहें है क्योंकि ‘स्थानीय लोग’ उनके अभियान में बाधा डालते है और कई बार आतंकवादियों को भगाने में भी मदद करते है।'” इसके साथ ही उन्होंने अपने कड़े संदेश में स्थानीय कश्मीरी लड़कों को चेतावनी भी दी थी कि “जिन लोगों ने हथियार उठाये है और इस्लामिक स्टेट व पाकिस्तान के झंडे लहराकर आतंकवादी कृत्य करते है तो हम उनको राष्ट्रविरोधी तत्व मानेंगे और उनको पकड़ कर उन पर कड़ी कार्यवाही होगी ।” इस साहसिक बयान पर नेताओं समेत अनेक तथाकथित बुद्धिजीवियों की आलोचनाभरी नकारात्मक टिप्पणियां आयी थी।

कश्मीर में पैलेट गन क्यों नही…

जबकि यह सर्वविदित ही है कि वर्षो से कश्मीर घाटी में अलगाववादियों व आतंकवादियों द्वारा प्रति लड़के/युवक को 500 से 1500 रुपये तक देकर सुरक्षाबलों पर हमले करवायें जाते आ रहे है। परिणामस्वरूप अनेक सुरक्षाकर्मी मारे भी गये और साथ ही सरकारी संपत्तियों की भी भारी क्षति हुई है। पिछले कुछ वर्षों के अतिरिक्त भी जुलाई 2016 में आतंकी बुरहानवानी के मारे जाने के बाद इन पत्थरबाजों की टोलियों ने कई माह तक विशेषतौर पर दक्षिण कश्मीर में सामान्य जनजीवन को ही बंधक बना दिया था।

भारतीय परिप्रेक्ष में राष्ट्रीय राजनीति का उदय

निसंदेह एक साधारण से दिखने वाले युवक ने अपना जीवन धर्म की सेवा व साधना के लिये समर्पित करते हुए भगवा धारण किया। ‘भगवा’ मात्र रंग ही नही हमारी महान संस्कृति का सूचक और वाहक है। जिसका संदेश है…”असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय , मृत्योर्मामृतं गमय” अर्थात “हे भगवान मुझको असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर एवं मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो”। जिसको अपनाते हुए युवा अजय सिंह अपनी वर्षों की अथक तपस्या से योगी आदित्यनाथ बन गये।

अलगाववादियों से कैसा लगाव ?

बड़ा खेद होता है जब इन विपक्षी नेताओं में अनेक आतंकवादी घटनाओं में पीड़ित व विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की पीड़ा के प्रति कोई भाव ही नहीं जागता बल्कि उनकी दुर्दशा के जिम्मेदार अलगाववादियों से वार्तालाप करके मुसलमानों को ही संतुष्ट करना चाहते है । अनेक बार यह आवाज उठाई जाती है कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा ) को कश्मीर से हटा लिया जायें क्योंकि वहां सेनाओं के कारण सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है । परन्तु क्या वहां के आम नागरिको की सुरक्षा की कोई गारंटी लेगा ? बात-बात पर सेना को कोसने के पीछे केवल एक ही मंशा होती है कि भारत सरकार कश्मीरियों का उत्पीड़न कर रही है ।

“आई एस आई” आतंकवाद का पोषक

पिछले दिनों मोदी जी के “नोटबंदी” संबंधित कठोर निर्णय का स्वागत होना चाहिये क्योंकि आईएसआई के वर्षो पुराने “जाली मुद्रा” से सम्बंधित षडयंत्रो की विस्तृत जानकारी देश की जनता को है ही नही। जिसके अंतर्गत पिछले लगभग 25 वर्षो से ‘जाली मुद्रा’ के माध्यम से हमारी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचाने के साथ साथ आतंकवादियों की भी आर्थिक सहायता होती आ रही है। जिससे आतंकवादियों के सैकड़ो संगठन अपने हज़ारों स्लीपिंग सेलो द्वारा लाखों देशद्रोहियो को पाल रहे है।

बिगड़ैल आज़म खान की सरकारी अकड़

वैसे उनकी मानसिकता को समझने के लिए 8 फरवरी 2012 को पिछले चुनावों की गोरखपुर में हुई एक सभा में मुसलमानों को भड़काते हुए उन्होंने जो कहा था वह पर्याप्त है कि “बदलाव लाओ और सपा सरकार के गुजरे उस कार्यकाल (2002 से 2007) को याद करो जब थाने के लोग “दाढ़ी” पर हाथ धरने से डरते थे”।( दैनिक जागरण 08.02.2012)। आज़म खान प्रदेश में दादागिरी दिखाते हुए मुसलमानों को भी दबंग बने रहने के लिए कहते थे। वे अधिकारियों के लिए उनसे कहते थे कि “अधिकारी न आपके रिश्तेदार है और न मेरे, आप चाबुक हाथ मे रखिये वह सब सुनेंगे “।( दैनिक जागरण 31.01.2013) ।

मुस्लिम पोषित राजनीति को मुहंतोड़ जबाव

क्योंकि जब जिहाद के नाम पर सिम्मी, इंडियन मुजाहीदीन, लश्करे-ए-तोइबा, अलक़ायदा आदि ने तो बम ब्लास्ट करके हज़ारो निर्दोष नागरिको का रक्त बहाया तो मुस्लिम पोषित राजनीति के उदासीन होने रहने का दुष्परिणाम यह हुआ कि विश्व का सबसे खूंखार आतंकी संगठन आई एस ने हमारे देश भारत में 2020 तक निज़ामे-ए-मुस्तफा स्थापित करके “खुरासान” बनाने की धमकी ही दे दी है।