डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

प्रवासी भारतीयों, ठोकरों के लिए तैयार रहो!

पश्चिमी संस्कृतियाँ दैहिकता, भौतिकता और उपयोगिता प्रधान होती हैं, वें दैहिक-सुख-प्रधान युवावस्था के (फेज़ ) अंतराल में प्रकृष्टता (Intense)से प्रबल प्रेरक होती है। पर इस अंतराल का अंत जब होता है, तो उसके पश्चात उससे प्रभावित मनुष्य, वृद्धोंको, निरुपयोगी और अडचन मानकर उनकी उपेक्षा कर सकता है। आज भी कुछ परिवारों में ऐसी प्रक्रिया घटते देख रहा हूँ। किसी वृद्धाश्रम को भेंट देने का और स्वयं निर्णय करने का अनुरोध है।

समृद्धि का अर्थ-तंत्र

धनी व्यक्ति की मितव्ययिता समृद्धि नहीं लाती।
वो धन को रोककर  उत्पादन या सेवा  रोक देता है।
इस लिए, समर्थ और धनी व्यक्ति की मितव्ययिता (कम खर्च ) देश की समृद्धि नहीं ला सकती।