कला-संस्कृति प्रेम ‘पाप’ नहीं मगर….ठीक नहीं ‘वासना में वास’ February 13, 2025 / February 13, 2025 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल एक पक्ष द्वारा बरसों से 14 फरवरी यानि वैलेंटाइन दिवस का भारतीय संस्कृति के अनुरूप न होने की वजह से अश्लीलता एवं भौतिक प्रेम तथा देह तक सीमित रहने के आरोपों के साथ जबरदस्त विरोध किया जाता है तो दूसरी ओर प्रेम के पंछी हर बंधन को धता बताते हुए प्रेम प्रदर्शन […] Read more » ठीक नहीं ‘वासना में वास’
कला-संस्कृति त्यौहार-संस्कृति एवं जीवन-संस्कारों को धुंधलाने का दौर February 13, 2025 / February 13, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ः ललित गर्ग:-पाश्चात्य अंधानुकरण के कारण हमने न केवल भारतीय त्यौहारों के रंगों को धुंधला दिया है, बल्कि वैलेनटाइन डे जैसे पर्वों को महिमामंडित कर दिया है। भारत के प्रत्येक भू-भाग के अपने त्यौहार हैं, कुछ समान हैं तो कुछ उस भू-भाग की विशिष्टता लिए। परंतु इन्हें भी विकृत करने का व्यापक प्रयास हो रहा […] Read more » A period of blurring of festival-culture and life-rituals जीवन-संस्कारों को धुंधलाने का दौर
कला-संस्कृति त्रिवेणी स्नान आस्था के साथ साथ वैज्ञानिक महत्व भी रखता है यही सनातन है February 13, 2025 / February 13, 2025 by दिव्य अग्रवाल | Leave a Comment – दिव्य अग्रवाल अधात्यमिक दृष्टि के साथ साथ वैज्ञानिक दृष्टिगत जब कुम्भ स्नान किया जाता है तो एक मानव शरीर को में बहुत सारे हार्मोन्स ऐसे होते हैं जो संतुलित हो जाते हैं । ऑक्सीटोसिन,डोपामिन,सेरोटोनिन,एंडोर्फिन्स,कोर्टिसोल,मेलाटोनिन जैसे हार्मोन्स जिनमे त्रिवेणी स्नान के पश्चात सकारात्मक बदलाव होता है जो वैज्ञानिक शोध में प्रमाणित भी है। अब बात […] Read more » this is Sanatan. Triveni bath also has scientific importance
कला-संस्कृति तीर्थशिरोमणि प्रयागराज का पौराणिक इतिहास February 11, 2025 / February 11, 2025 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन है ओर इन संस्कृतियों का प्रमुख केंद्र स्थान प्रयाग है जो तीरथों का राजा माना जाता है तथा प्रयागराज तीर्थशिरोमणि के गौरव से अपनी पहचान बनाए हुये है। हमारे पुराणों में तीर्थराज प्रयाग को जितना महिमा मंडित किया है उतना ही […] Read more »
कला-संस्कृति राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण का गठन हो। February 10, 2025 / February 10, 2025 by डॉ .सुधाकर कुमार मिश्रा | Leave a Comment रामाशीष प्रकृति के पंचभूतों में से एक जल, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक परम आवश्यक अवयव है। विज्ञान,प्रौद्योगिकी और औद्योगिक क्षेत्र के विकास और उन्नयन हेतु जल एक अत्यावश्यक संसाधन है। समकालीन मानवीय प्रवृत्ति में जल की हर बूंद से धन बनाने का लोभ बढ़ता जा रहा है। आज हमारी नदियों के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं: १. एक निर्मलता की, और २. अविरलता की। ये दोनों एक दूसरे से संबद्ध हैं। अविरलता के अभाव में नदियों की निर्मलता संभव नहीं है । नदियां हमें पानी ही नहीं देतीं अपितु वे हमारी समग्र जीवन प्रणाली की रीढ़ हैं। जैव विविधता, मिट्टी-रेत , जल और अविरल प्रवाह ये सब मिल कर ही किसी नदी की गुणवत्ता निर्धारित करते हैं। नदी को स्वयं को साफ कर लेने का सामर्थ्य भी यही देते हैं। जितना महत्व प्राणियों के शरीर में ऑक्सीजन का है, उतना ही नदी के लिए इन सूक्ष्म से लेकर विशाल धाराओं के जाल का है। जैव- विविधता नदियों के लिए प्राणवायु के समान है,जो इनके जल को शुद्ध करके ऑक्सीजन से भरते हैं इसलिए नदी में कम से कम इतना पानी हो कि हम कह सकें नदी में जीवटता है, परंतु बिजली, सिंचाई, पेयजल और आबादियों को बाढ़ से बचाने के नाम पर नदियों के रास्तों और किनारों पर अनेक अवरोध खड़े कर दिए गए हैं जिससे नदी में उचित न्यूनतम प्रवाह, जिसे पर्यावरणीय प्रवाह या ई-फ्लो कहते हैं, नहीं बचा है। पर्यावरणीय प्रवाह के अभाव में नदी के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक जलीय जीवों जैसे मछलियां, घड़ियाल, डॉलफिन आदि के साथ ही जलीय वनस्पति के जीवन पर खतरा पैदा हो रहा है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने 12 वर्षों के शोध के बाद अभी हाल में गंगाजल को विशिष्ट बनाने वाले तीन तत्व खोजे हैं जो अविरल बहती गंगा को स्वच्छ करते रहते हैं। पहला है गंगा के पानी में घुली प्रचुर ऑक्सीजन। यह प्रति लीटर 20 मिमी तक होती है। दूसरा तत्व है गोमुख से हरिद्वार तक गंगा के मार्ग में पड़ने वाली वनस्पतियों से उत्पन्न रसायन टरपीन एवं तीसरा तत्व है दूषित जीवाणुओं को नष्ट करने वाला बैक्टीरियोफाज। ये तीनों तत्व गंगा की तलहटी में भारी मात्रा में मिले हैं। इन तत्त्वों के संपर्क में आकर पानी अपने आप निर्मल हो जाता है। प्रवाह धीमा होने और मार्ग में अवरोध होने से यह क्षमता कम होती जाती है। वर्तमान सरकार और राज्य सरकार ने इस दिशा में थोड़ी पहल की है । वर्ष 2018 में पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) के लिए देवप्रयाग से हरिद्वार तक अलग-अलग महीनों में 20 से 30 फीसदी तक पानी छोड़ने का प्रावधान हुआ था लेकिन यह मात्रा न तो पर्याप्त है और न ही तार्किक। नदी की निर्मलता के लिए पहली शर्त अविरलता है। 2015 में विभिन्न विभागों, आईआईटी और विशेषज्ञों ने मंथन के बाद गंगा के लिए हिमालय स्थित प्रवाह के लिए दिसंबर-मार्च के बीच 42 से 83 फीसदी, अप्रैल और मई के बीच 37 से 71 फीसदी और जून से अक्टूबर के बीच 35 से 59 फीसदी पर्यावरणीय प्रवाह की आवश्यकता बताई थी लेकिन यह रिपोर्ट सरकारी तंत्र में ही फंसी रह गई जबकि तत्कालीन जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री ने भी इस पर सहमति जताई थी। प्रवाह बनाने में सबसे बड़ी रुकावट जल विद्युत परियोजनाएं हैं, क्योंकि इनका पक्ष है कि अगर हम इतना जल छोड़ेंगे तो विद्युत संयंत्र बंद हो जाएंगे। हमें यह समझना होगा कि नदियां हमारी बिजली, सिंचाई और पेयजल की आपूर्ति भर के लिए ही नहीं हैं अपितु इस पर अन्य जीव-जंतुओं का भी अधिकार है। विशेषज्ञों के कई दलों ने अपनी रिपोर्ट में सूखा, सामान्य एवं बारिश के लिए पानी की गहराई क्रमश: 0.5-0.8-3.41 मीटर बताई है लेकिन इतने पानी में डॉल्फिन समेत कई जलचरों का पर्यावास सम्भव नहीं है। इसे भी ध्यान में रखना होगा। इसी को ध्यान में रखकर एनजीटी ने 2017 में गंगा की ऊपरी धाराओं पर बनी बिजली परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रवाह का मानक तैयार करते समय हरिद्वार से कानपुर के बीच बने सिंचाई बैराजों के लिए भी नियम बनाने का निर्देश दिया है। पर्यावरणविद 50 फीसदी से अधिक ई- फ्लो का समर्थन करते हैं। इंटरनेशनल वॉटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट 67%प्रवाह की सिफारिश करता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट भी अपने एक आदेश में उत्तर प्रदेश के सिंचाई बैराजों के लिए 50 % पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करने का निर्देश दे चुका है। अविरल गंगा और निर्मल गंगा के ध्येय वाक्य को सिद्ध करने के लिए तीन शर्तें आवश्यक हैं। पानी की प्रचुरता बनी रहे और प्रदूषण व अतिक्रमण पर रोक लगे। ई-फ्लो के लिए भूमिगत जल दोहन को भी नियन्त्रित करना पड़ेगा और वर्षा जल संभरण के लिए कड़े नियम बनाने होंगे, क्योंकि अद्यतन परिस्थितियों में सिर्फ ग्लेशियर के पानी से ई-फ्लो को बनाए रखना सम्भव नहीं है। नदी को ढांचे नहीं, ढांचों से मुक्ति चाहिए। नदी को शासन के बजाय अनुशासन चाहिए। इस तरह नदी का पर्यावरणीय प्रवाह या ई-फ्लो तय करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है- 1. नदी में रहने वाले जीव-जंतुओं (मछलियां और कछुए आदि) के लिए पर्याप्त जलस्तर और प्रवाह बना रहे। ऑक्सीजन का स्तर समेत पानी की गुणवत्ता संतुलित रहे; […] Read more » राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण का गठन
कला-संस्कृति भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी का महत्व February 3, 2025 / February 3, 2025 by डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी | Leave a Comment डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी बसंत पंचमी या श्री पंचमी भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसे हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। बसंत पंचमी पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ‘ऋषि पंचमी’ के नाम से भी जाना जाता है। […] Read more » Importance of Basant Panchami in Indian culture बसंत पंचमी का महत्व
कला-संस्कृति महा कुंभ से सामाजिक समरसता को मिलेगी “संजीवनी” February 3, 2025 / February 3, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment प्रदीप कुमार वर्मा नीले आसमान में भगवा रंगों की लहराती ध्वज पताकाएँ। लगातार बजते घड़ी-घंटाल और संत ओर महात्माओं द्वारा गूंजते मंत्रोच्चार। चौबीस घंटे पवित्र गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम में स्नान करते असंख्य लोग। यज्ञशालाओं से निकलती हवन कुंड की अग्नि। भजन-कीर्तन के साथ प्रवचनों और हेलीकॉप्टरों द्वारा की जा रही पुष्प वर्षा। गंगा,यमुना और सरस्वती […] Read more » Maha Kumbh Maha Kumbh will provide "sanjeevani" to social harmon
कला-संस्कृति शांति, संस्कृति एवं शिक्षा का महापर्व है बसंत पंचमी January 31, 2025 / January 31, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment बसंत पंचमी – 2 फरवरी, 2025-ः ललित गर्ग:-बसंत पंचमी या श्री पंचमी हिन्दुओं का प्रमुख सांस्कृतिक एवं धार्मिक त्यौहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती, कामदेव और विष्णु की पूजा की जाती है। यह प्रकृति के सौंदर्य, नई शुरुआत, और सकारात्मकता का उत्सव भी है। इस दिन देवी सरस्वती की पूजा से मन में […] Read more » Basant Panchami is a great festival of peace culture and education. बसंत पंचमी
कला-संस्कृति हिंदू परंपराओं में महाकुंभ मेले का महत्त्व January 30, 2025 / January 30, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment — डॉo सत्यवान सौरभ इस वर्ष, महाकुंभ मेला पौष पूर्णिमा की शुभ तिथि पर शुरू हुआ, जो 13 जनवरी, 2025 को हुआ और 26 फरवरी, 2025 तक चलेगा। इस वर्ष का महाकुंभ मेला विशेष रूप से विशेष है क्योंकि नक्षत्रों का संरेखण ऐसा कुछ है जो हर 144 वर्षों में केवल एक बार होता है। […] Read more » Importance of Mahakumbh Mela in Hindu traditions.
कला-संस्कृति गुप्त नवरात्रि आज 30 जनवरी से, 8 दिन तक चलेगी विशेष साधना, देवी उपासना का मिलेगा पांच गुना फल January 30, 2025 / January 30, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment पं. शैलेन्द्र उपाध्याय आध्यात्मिक उन्नति और धार्मिक प्रगति का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में देखने को मिलेगा – पं. शैलेन्द्र उपाध्याय माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक माघी गुप्त नवरात्रि मनाई जाती है। इस वर्ष गुप्त नवरात्रि 30 जनवरी से 6 फरवरी तक रहेगी। यह नवरात्रि देवी उपासकों और साधकों के […] Read more »
कला-संस्कृति पांडव देवों के अंशावतार होने से प्रकृतिसिद्ध थे January 27, 2025 / January 27, 2025 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव सत्य स्वयं प्रतिष्ठित होता है ओर सब कुछ सत्य का आधार पाकर प्रतिष्ठित होता है। आज विश्व में प्रतिष्ठित होने वाला यह मनुष्य दुखी क्यों है? चारों युगों में सुख दुख असमान रूप से प्रतिष्ठित रहा है जिसमें अगर द्वापरयुग का प्रकरण लिया जाए तो यह सभी के लिए प्रासंगिक होगा। […] Read more »
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म महाकुम्भ : दक्षिण एशिया में भारतीय सॉफ्ट पावर का प्रतीक January 17, 2025 / January 17, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment गजेंद्र सिंहसामाजिक चिंतक एवं सामाजिक निवेश विशेषज्ञ दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक सभा, महाकुंभ मेला, 13 जनवरी 2025 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में शुरू हो गया है। कुंभ मेला दक्षिण एशिया में भारतीय सॉफ्ट पावर का अद्वितीय उदाहरण है। यह विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक सभा होने के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक शक्ति का प्रतीक है। कुंभ […] Read more » भारतीय सॉफ्ट पावर का प्रतीक महाकुम्भ