आलोचना परवर्ती पूंजीवाद और साहित्येतिहास- भाग-1 May 28, 2012 / May 28, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on परवर्ती पूंजीवाद और साहित्येतिहास- भाग-1 जगदीश्वर चतुर्वेदी हिंदी साहित्य का प्रचलित इतिहास अधूरा है। रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास हो या हजारीप्रसाद द्विवेदी का लिखा इतिहास हो। इन दोनों में अधूरापन साफ नजर आता है। इसके बाबजूद छात्रों को हम यही पढ़ाते हैं कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मुकम्मल इतिहास लिखा था। इतिहास के अधूरेपन का पहला प्रमाण है इसमें स्त्री […] Read more »
आलोचना जनसत्ता का प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम और के. विक्रम राव का सफेद झूठ / जगदीश्वर चतुर्वेदी May 25, 2012 / June 28, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on जनसत्ता का प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम और के. विक्रम राव का सफेद झूठ / जगदीश्वर चतुर्वेदी जगदीश्वर चतुर्वेदी जनसत्ता अपनी प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम में एक कदम आगे बढ़ गया है. उसने के.विक्रम राव का जनसत्ता के 13मई 2012 के अंक में “न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद” शीर्षक से लेख छापा है। यह लेख प्रगतिशील लेखकों और समाजवाद के प्रति पूर्वग्रहों से भरा है। यह सच है राव साहब की लोकतंत्र […] Read more » के. विक्रम राव जनसत्ता प्रगतिशील मार्क्सवाद वैचारिक अश्पृश्यता
आलोचना महत्वपूर्ण लेख ‘नामवर सिंह आलोचक कम और साहित्य के प्रौपेगैण्डिस्ट ज्यादा नजर आते हैं’ May 10, 2012 / June 6, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 5 Comments on ‘नामवर सिंह आलोचक कम और साहित्य के प्रौपेगैण्डिस्ट ज्यादा नजर आते हैं’ जगदीश्वर चतुर्वेदी हाल ही में राजकमल प्रकाशन के द्वारा नामवर सिंह के विचारों,आलोचना निबंधों ,व्याख्यानों और साक्षात्कारों पर केन्द्रित 4 किताबें आयी हैं। चार और आनी बाकी हैं। इन किताबों का ‘कुशल’ संपादन आशीष त्रिपाठी ने किया है। ये किताबें आधुनिक युग में विचारों की भिड़ंत के सैलीबरेटी रूप का आदर्श नमूना है। सैलीबरेटी आलोचना […] Read more » आलोचना नामवर सिंह
आलोचना रानी को कौन कहे कि अग्गा ढक May 8, 2012 / May 8, 2012 by एल. आर गान्धी | 2 Comments on रानी को कौन कहे कि अग्गा ढक एल.आर.गाँधी महामहिम अपनी २३वी विदेश यात्रा के साथ अपनी अंतिम घुमक्कड़ जिज्ञ्यासा पूरी कर लेंगी और इसके साथ ही राष्ट्राध्यक्षों में सबसे अधिक विदेश यात्रु महामहिम का कीर्तिमान अपने नाम कर लेंगी . महामहिम पर अब तक करीबन २०६ करोड़ रूपए, इस घुमाकड़ जिज्ञासा को पूरे करने पर सरकार के खर्च आये. राजमाता के मित्त्व्ययता […] Read more »
आलोचना आ केहू खराब नइखे, सबे ठीक बा… May 8, 2012 / May 8, 2012 by संजय स्वदेश | 1 Comment on आ केहू खराब नइखे, सबे ठीक बा… संजय स्वदेश जब भी किसी राज्य की सरकार बदलती है, समाज की आबो-हवा करवट लेती है। भले ही इस करवट से कांटे चुभे या मखमली गद्दे सा अहसास हो, परिर्वतन स्वाभाविक है। बिहार में नीतीश से पहले राजद का शासन था। जब लालू प्रसाद का शायन काल आया था तब भी कमोबेश वैसे ही सकारात्मक […] Read more » police and humanity police and society
आलोचना नामवर सिंह और युवालेखन की उलटबाँसी May 7, 2012 / May 7, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on नामवर सिंह और युवालेखन की उलटबाँसी जगदीश्वर चतुर्वेदी नामवर सिंह को युवालेखन पसंद है। युवाओं को प्रोत्साहित करना उनके स्वभाव का सामान्य अंग है। लेकिन युवा संस्कृति को वे सरलीकरणों के जरिए व्याख्यायित करते हैं। युवाओं को सरलीकरणों के जरिए नहीं समझा जा सकता। युवाओं के साहित्य को परिवार,स्कूली शिक्षा के दर्शन ,मासकल्चर और मासमीडिया के प्रभाव के बिना नहीं समझा […] Read more » नामवर सिंह युवालेखन
आलोचना ‘मन करता है नामवर सिंह की खूब प्रशंसा करूँ, विवेक कहता है आलोचना करूँ’ May 3, 2012 / May 3, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 8 Comments on ‘मन करता है नामवर सिंह की खूब प्रशंसा करूँ, विवेक कहता है आलोचना करूँ’ जगदीश्वर चतुर्वेदी नामवर सिंह पर लिखना बेहद असुविधाएं पैदा करता है। मन करता है उनकी खूब प्रशंसा करूँ , विवेक कहता है आलोचना करूँ। आलोचना को विवेक संचालित करता है। लेकिन नामवर सिंह के लेखन में विवेक के साथ भावुकता का भी विशेष योगदान रहा है। वे जब भी बोलते हैं ,मन से बोलते हैं।भावुक […] Read more » जगदीश्वर चतुर्वेदी नामवर सिंह
आलोचना अमेरिकी पूंजी, अशोक वाजपेयी और आलोचना का अवमूल्यन April 29, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on अमेरिकी पूंजी, अशोक वाजपेयी और आलोचना का अवमूल्यन जगदीश्वर चतुर्वेदी भारत में जब से फोर्ड फाउंडेशन जैसी अमेरिकी संस्थाओं का कला,साहित्य,संस्कृति,सिक्षा आदि में पैसा आना आरंभ हुआ है उसके बाद तेजी से आलोचना और अकादमिक अवमूल्यन आरंभ हुआ है। हिन्दी आलोचना और साहित्य में अमेरिकी हस्तक्षेप कोई नयी चीज नहीं है। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के हिन्दी में आगमन के साथ यह सिलसिला […] Read more » अशोक वाजपेयी
आलोचना राजनीति अशोक वाजपेयी का मार्क्सवाद पर हमला, मार्क्सवादी चुप्प ! April 21, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on अशोक वाजपेयी का मार्क्सवाद पर हमला, मार्क्सवादी चुप्प ! जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी आलोचना में नव्यउदार पूंजीवादी चारणों के बारे में जब भी सोचता हूँ तो रह-रहकर अशोक वाजपेयी याद आते हैं। इन जनाब की भजनमंडली में ऐसे 2 दर्जन लेखक हैं। अशोक वाजपेयी की शिक्षा-दीक्षा अव्वल दर्जे की रही है, सरकारी पद भी अव्वल रहे हैं, उनके पास चमचे भी अव्वलदर्जे के रहे हैं, […] Read more » अशोक वाजपेयी जनसत्ता मार्क्सवाद
आलोचना बापू बिकता है ..खरीदने वाला चाहिए. April 18, 2012 / April 18, 2012 by एल. आर गान्धी | 3 Comments on बापू बिकता है ..खरीदने वाला चाहिए. एल. आर. गाँधी पूरे का पूरा बापू बिक गया और बापू के नाम पर सत्ता सुख भोग रहे ‘गांधियों ‘को पता भी नहीं चला ?….. बापू के एक कतरा खून की बोली ११,७०० ब्रिटिश पौंड अर्थात ९६०२२५.५५२ गाँधी छाप रुपैय्या लगाई गयी ! ब्रिटेन में बापू के चरखे और ऐनक के साथ साथ बापू के […] Read more » Mahatma Gandhi बापू बिकता है
आलोचना क्या काले लोगों का अस्तित्व नहीं ? March 31, 2012 / March 31, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 3 Comments on क्या काले लोगों का अस्तित्व नहीं ? रंगभेदी विज्ञापन क्यों ? लीना ‘अब व्हाइट जीतेगा’ चेस खेलने वाली एक गोरी महिला दावे के साथ कहती है। ब्लैक आउट व्हाइट इन- बड़े गर्व के साथ कहा जाता है। सिर्फ यही नहीं आप अच्छा गाती हैं लेकिन यदि काले या सांवले भी हैं तो गा नहीं पाएंगे, इसके लिए आपको क्रीम लगाकर पहले गोरा […] Read more » color discrimination ad रंगभेदी विज्ञापन
आलोचना जि़म्मेदार शख्सियतों के गैऱ जि़म्मेदाराना बयान ! March 28, 2012 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तनवीर जाफरी भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में अपने भक्तों व शिष्यों को शांति व प्र्रेम का सबक सिखाने वाले आर्ट ऑफ लिविंग यानी जीने की कला नामक मिशन के संस्थापक श्री श्री रविशंकर इन दिनों एक ऐसे विवाद मे उलझ गए हैं जिससे उनका बाहर निकल पाना मुश्किल हो रहा […] Read more » sri ravi shankar