कहानी साहित्य काट औ छाँट जो रही जग में ! October 10, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment काट औ छाँट जो रही जग में, दाग बेदाग़ जो रहे मग में; बढ़ा सौन्दर्य वे रहे प्रकृति, रचे ब्रह्माण्ड गति औ व्याप्ति ! कष्ट पत्ती सही तो रंग बदली, लालिमा ले के लगी वह गहमी; गही महिमा ललाट लौ लहकी, किसी ने माधुरी वहाँ देखी ! सेब जो जंगलों में सेवा किये, […] Read more » काट औ छाँट
कहानी साहित्य पारिजात के फूल October 7, 2017 / October 7, 2017 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on पारिजात के फूल भाग 1 – 1982 वह सर्दियों के दिन थे. मैं अपनी फैक्टरी से नाईट शिफ्ट करके बाहर निकला और पार्किंग से अपनी साइकिल उठाकर घर की ओर चल पड़ा. सुबह के 8:00 बज रहे थे. मैं अपने घर के सामने से गुजरा. मां दरवाजे पर खड़ी थी, मैंने मां को बोला ‘मां नहाने का पानी […] Read more » Featured पारिजात
कहानी साहित्य छोटी अम्मा की बेटी August 19, 2017 by सुधीर मौर्य | Leave a Comment सुधीर मौर्य मेरे पिता ज़मीदार नहीं थे पर उनका रुतबा किसी ज़मीदार से कम नहीं था। उनका रुतबा होता भी कैसे कम वो एक ज़मीदार के बेटे और ज़मीदार भाई थे। मेरे पिता तीन भाई थे और तीनो में वे छोटे। मेरे पिता के दोनों बड़े भाई स्कूल से आगे नहीं गए। सच तो ये […] Read more » छोटी अम्मा की बेटी
कहानी साहित्य औरत, औरत की दुश्मन.. August 10, 2017 / August 10, 2017 by अमन कौशिक | Leave a Comment हर शाम की तरह आज भी ऑफिस से आने के बाद घर का वही माहौल था। सब बैठ कर, एक टीम बना कर इधर उधर की बातें कम और चुगलियां ज्यादा कर रहे थे, और मम्मी हमेशा की तरह टीम की कप्तान थी। शायद वो सही कहता है, कि तुम्हारी माँ सब को अपने उंगली […] Read more » औरत औरत की दुश्मन
कहानी साहित्य कब्र का अजाब July 18, 2017 by आरिफा एविस | Leave a Comment आरिफा एविस ‘नहीं, मदरसे में रूही नहीं जायेगी . ‘पर क्यों अम्मी?’ ‘कहा ना अब वो नहीं जायेगी मदरसे में बस..’ ‘तो क्या रूही आपा अपना कुरआन पूरा नहीं कर पाएंगी ?’ ‘मैंने यह तो नहीं कहा कि रूही अपना कुरआन पूरा नहीं करेगी. मैंने तो इतना ही कहा कि वो अब मदरसे में पढ़ने […] Read more » Featured punishment in the grave कब्र का अजाब
कहानी साहित्य जाम का पेड़ July 7, 2017 / July 7, 2017 by आशीष श्रीवास्तव | 9 Comments on जाम का पेड़ आशीष श्रीवास्तव दादीजी अपने बेटे-बहू और पोती के साथ नये मकान में रहने आयीं तो देखा मोहल्ले में हरियाली का नामोनिशान नहीं। कहीं पर भी पेड़ नहीं फलदार पेड़ तो मोहल्ले के आसपास भी नहीं दिख रहे थे। लोगों ने कुछ पौधे अवश्य गमलों में उगा रखे थे लेकिन वे असली हैं या नकली, ये […] Read more » पेड़़
कहानी साहित्य पागल June 10, 2017 by तेजू जांगिड़ | Leave a Comment गाँव में उन दिनों खूब आंधी चल रही थी जिससे वहां की बालू रेत भी खूब उड़ रही थी। सारा माहौल कुछ मटमैले रंग का प्रतीत हो रहा था। एक तो आंधी ऊपर से ये तेज धूप, कोई अपने घरों से दोपहर को बाहर तक नहीं निकलता था। कौन खामखां आंधी में परेशानी उठाए भला। […] Read more » पागल
कहानी कलयुग के देवता May 24, 2017 / May 24, 2017 by मालचन्द कन्नौजिया 'बेपनाह' | Leave a Comment कहने को आजाद हो गये हम पर मिली आजादी किस बात की जब बिना रिश्वतखोरी के आती नहीं है साँसभी। घर से निकलते होती है मुलाकात रिश्वतखोर दलालों से येहैं कलयुग के देवता पाला न पड़े गद्दारों से।। कैसे छुपायें, पचती नहीं गैस बनती है बात भी बिना रिशवतखोरी के आती नहीं है साँसभी।। करप्सन,करप्शन, […] Read more »
कहानी चश्मा May 13, 2017 by देवेश शास्त्री | Leave a Comment देवेश शास्त्री ………. उन्हें नीति-नेम, धर्म-कर्म से कोई मतलब नहीं था। उसकी स्वाभाविक वृत्ति राजनैतिक रूप से ऐन-केन प्रकारेण अपना उल्लू सीधा करने यानी कमाऊ जुगाड़ भिड़ाने की रही है। कई बार चुनाव भी लड़ा और हारते रहे, उनका नजरिया चुनाव जीतने की बजाय आलाकमान से मिलने वाले चुनावी खर्चे को हड़पने और क्षेत्रीय रसूख […] Read more » ‘‘चश्मा’’
कहानी वरदान March 22, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment दूसरे ही दिन आशा के पिताजी का फोन आया और फिर वे अपनी पत्नी के साथ हमारे घर आ गये। प्रारम्भिक बात के बाद उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति और विवाह का बजट साफ-साफ हमें बता दिया। उन्होंने कहा कि यदि इसके बाद भी आप हमारी बेटी लेंगे, तो यह उनके लिए बहुत खुशी की बात होगी। आपके घर की बहू बनना आशा के लिए सौभाग्य की बात है। हम तो सोचते थे कि वह नर्स है, तो अस्पताल के किसी कर्मचारी से ही उसका विवाह कर देंगे; पर वह इतने अच्छे और सम्पन्न परिवार में जाएगी, यह तो हमने कभी सोचा ही नहीं था। Read more » वरदान
कहानी साहित्य इतिहास से सीख (लघुकथा) March 16, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी महाभारत के कौरव तथा पाण्डवों के बीच हुए युद्ध तथा विवाद के बारे में एक पिता पुत्र के मध्य वार्तालाप हो रही थी। पिता बार बार श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता की सराहना कर रहे थे और पुत्र बार बार तर्क देकर श्रीकृष्ण के नाटकीय चरित्र पर उंगली उठाकर आशंका व्यक्त कर रहा था। […] Read more » इतिहास से सीख
कहानी साहित्य आधुनिकता का गरुर March 8, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी पापा मुझे चोट लग गया खून आ रहा है। स्कूल के लिए निकलते एक बच्चे के मुख से ये शब्द निकला था। 5 साल के अपने बच्चे के मुँह से इतना सुनते ही लगभग 40 साल पूर्व साधारण सा दिखने वाले एक पापा सब कुछ छोड़ छाड़ कर बच्चे को गोदी में […] Read more » आधुनिकता