कविता धरणी नववर्ष January 5, 2019 / January 5, 2019 by आलोक पाण्डेय | Leave a Comment क्रुर संस्कृति, निकृष्ट परंपरा कायह अपकर्ष हमें अंगीकार नहीं,धुंध भरे इस राहों मेंयह नववर्ष कभी स्वीकार नहीं ।अभी ठंड है सर्वत्र कुहासा , अलसाई अंगड़ाई है,ठीठुरी हुई धरा – नील-गगन, कैसी सुंदरता ठिठुराई है।बाग बगीचों में नहीं नवीनता, नहीं नूतन पल्लवों का उत्कर्ष ;विहगों का झुंड सहमी – दुबकी ,अन्य वन्यजीवों में भी नहीं हर्ष […] Read more »
कविता नववर्ष January 2, 2019 / January 2, 2019 by डॉ नीलम महेन्द्रा | Leave a Comment बेशक आज हमारा कैलेंडर बदल गया लेकिन ऋतु नहीं बदली, न मौसम बदला,ना ही पृथ्वी का चक्र बदला,ना पेड़ों ने पत्ते बदले ,ना शाखों ने नए फूल ओढ़े,ना हवाओं का रुख़ बदला ,ना ही प्रकृति ने खुद को बदला,फिर हम क्यों खुद को बदलते जा रहे हैं?जो कहती है धरा,नही सुन पा रहे हैं?या फिर सुनना ही नहीं चाह रहे […] Read more »
कविता एक और कैलेंडर का बदल जाना …!! January 1, 2019 / January 1, 2019 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा————बचपन में सुना था हैप्पी है बर्थअरसे बाद जाना इसका अर्थफिर सुना हैप्पी न्यू ईयर हिंदी में बोले तो शुभ नववर्षउलझन ने मन को बहुत भरमायाएक खास दिन का उत्सव में बदल जाना देर तक अपनी समझ में न आयामथा खुद को सोचा खूबजीवन में कितनी छांव कितनी धूप क्या रोज की तरह […] Read more »
कविता रथ सुदर्शन बढ रहा है January 1, 2019 / January 1, 2019 by डॉ. मधुसूदन | 7 Comments on रथ सुदर्शन बढ रहा है डॉ. मधुसूदन देख पूरब में सबेरा। अब अंधेरा छँट रहा है। कल्याण*स्वर आलाप में, घण्ट घन घन बज रहा हैं || अर्थ: कल्याण = प्रभात का राग, (यहाँ सर्व जन कल्याण अर्थ में भी) *सब का साथ सबका विकास* का संदर्भ माने.आलाप = राग का सौम्य प्रारंभ (२) भ्रष्ट जर्जर जाल* ले कर| उड चलो […] Read more »
कविता अटल जी December 30, 2018 / December 30, 2018 by शकुन्तला बहादुर | Leave a Comment सदा मनस्वी रहे अटल जी, सरल निष्कपट वर्चस्वी । दृढ़-संकल्प औ’ कर्मठता से,बने सदा वे परम यशस्वी।। * आजीवन ब्रह्मचर्य था साधा, देश के हित संलग्न था जीवन। मन में सेवा-भाव भरे थे, किया समर्पित तन, मन, धन ।। * हँसकर संघर्षों को झेला, कभी लेखनी रुकी नहीं । साहसपूर्वक प्रेरणा भी दी, कविताएँ ऐसी […] Read more » अटल जी
कविता जाग रहा था ख्यालो में सो रहा था तन December 30, 2018 / December 30, 2018 by जयसिंह नारेङा | Leave a Comment जाग रहा था ख्यालो में सो रहा था तन,गला रुन्द रहा था रो रहा था मन…… जब निकलेगी किरणे तो देखेंगे अपने सपनो को,पेट के लिए हमने मिट्टी में मिला दिया है तन मन को, जवान होती बेटी को देख पसीजता है मन,दहेज के लिए दिन भर काम में झुकता है बूढा तन…..!! माँ बैठी […] Read more »
कविता हिमपात – कैलिफ़ोर्निया में लेक टाहो पर December 27, 2018 / December 27, 2018 by शकुन्तला बहादुर | 2 Comments on हिमपात – कैलिफ़ोर्निया में लेक टाहो पर एक बालगीत Read more »
कविता सबसे लम्बी रात का सुपना December 26, 2018 / December 26, 2018 by अरुण तिवारी | Leave a Comment सबसे लम्बी रात का सुपना नया देह अनुपम बन उजाला कर गया। रम गया, रचता गया रमते-रमते रच गया वह कंडीलों को दूर ठिठकी दृष्टि थी जोे पता उसका लिख गया। सबसे लम्बी रात का सुपना नया.. रमता जोगी, बहता पानी रच गया कुछ पूर्णिमा सी कुछ हिमालय सा रचा औ हैं रची कुछ रजत […] Read more » सबसे लम्बी रात का सुपना
कविता आज का आदमी December 10, 2018 / December 10, 2018 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on आज का आदमी आज का आदमी,आदमी कहाँ रह गया है वह तो आज की,चकाचोंध में बह गया हैअगर आज, आदमी,आदमी होता तो वह आज की चकाचोंध में न बहता आज के आदमी में,आदमियत निकल चुकी है वह तो आज स्वार्थ के हाथो बिक चुकी है अगर आज आदमी में स्वार्थ न होता तो वह आज आदमियत से बंधा होता आज आदमी,आदमी से […] Read more » आज का आदमी इर्ष्या घर्णा स्वार्थ
कविता राम लला का मंदिर December 6, 2018 / December 6, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मन ही मन सब मांग रहे है राम लला के मंदिर को कोई भी पहल न कर रहा है अयोध्या में इस मंदिर को मोदी जी भी मौन हुए है जो मन की बात करते है वोटो के चक्कर में नेता कुछ मजहबियो से डरते है कब तक राम लला रहेगे बांसों के बने इस […] Read more » मोदी जी राम लला का मंदिर
कविता जब तक पूर्ण नहीं हो पाते ! November 30, 2018 / November 30, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | 1 Comment on जब तक पूर्ण नहीं हो पाते ! (मधुगीति १८११२८ ब) जब तक पूर्ण नहीं हो पाते, सृष्टि समझ कहाँ हम पाते; अपना बोध मात्र छितराते, उनका भाव कहाँ लख पाते ! हर कण सुन्दरता ना लखते, उनके गुण पर ग़ौर न करते; संग आनन्द लिए ना नचते, उनको उनका कहाँ समझते ! हैं गण शिव के गौण लखाते, शून्य हिये बिन ब्रह्म […] Read more » जब तक पूर्ण नहीं हो पाते ! दोष द्रष्टि शिव
कविता आत्म मंथन कर आपने जो करना है कीजिए ! November 28, 2018 / November 28, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment (मधुगीति १८११२८ अ) आत्म मंथन कर आपने जो करना है कीजिए, अपने मन की बात औरों को बिना पूछे यों ही न बताइए; अपनी अधिक सलाह देकर और आत्माओं को कम मत आँकिए, स्वयं के ईशत्व में समा संसार को अपना स्वरूप समझ देखिए! अपनी सामाजिक संतति को बेबकूफ़ी करते हुए भी पकने दीजिए, आदर्श […] Read more » आत्म मंथन कर आपने जो करना है कीजिए !