कविता माया अखिलेश का सत्ता के लिए मिलन April 5, 2018 by आर के रस्तोगी | 3 Comments on माया अखिलेश का सत्ता के लिए मिलन आर के रस्तोगी जो कभी दुश्मन थे,आज सत्ता के लिए मिलन हो रहा आज अखिलेश माया का चुनाव के लिए मिलन हो रहा क्या ये दोनों का मिलन भविष्य में,क्या कोई गुल खिलायेगा ? सन २०१९ का आने वाला चुनाव क्या इनको सत्ता दिलायेगा ? जो कभी परछाई के दुश्मन थे,आज एक दूजे के गले […] Read more » Featured अखिलेश यादव जनता दलित दुश्मनी भारत बंद मामता मायावती सुप्रीम कोर्ट सोनिया
कविता सत्तर साल का आरक्षण हो गया,कब तक इसे गोद खिलाओगे ? April 4, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment आर के रस्तोगी आरक्षण को अब बंद करो,कब तक इसे और आगे बढाओगे ? सत्तर साल का आरक्षण हो गया,कब तक इसे गोद खिलाओगे ? जाति का आधार है ये क्यों,गरीबी का आधार क्यों नहीं ? सवर्ण जाति जो गरीब है,उसको आरक्षण मिलता क्यों नहीं ? प्रतिभाओं का हनन हो रहा,सरकार उसकी जिम्मेदार क्यों नहीं […] Read more » featuerd आन्दोलन आरक्षण गरीबी गुंडा-गर्दी सत्तर साल सुप्रीम कोर्ट
कविता साहित्य प्रतिभाओ को मत काटो, आरक्षण की तलवारो से April 3, 2018 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on प्रतिभाओ को मत काटो, आरक्षण की तलवारो से राजपूत भी मचल उठेंगे,भुजबल के हथियारों से प्रतिभाओ को काटो आरक्षण की तलवारो से निर्धन ब्राह्मण वंश,एक दिन परशुराम बन जायेगा अपने घर के दीपक से,अपना घर ही जल जायेगा भडक उठा अगर गृह युद्ध,भूकम्प भयानक आयेगा आरक्षण वादी नेताओ का,सर्वस्व मिटाके जायेगा अभी सभंल जाओ मित्रो,इस स्वार्थ भरे प्यार से प्रतिभाओ को मत काटो,आरक्षण […] Read more » Featured आरक्षण की तलवार प्रतिभाओ से मत काटो
कविता साहित्य पुन्य के नाम पर ढकोसले पर असली पुन्य क्या है समझो ? March 31, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment घर में माँ-बाप को झिडकी देते फिर भी वे तुमको आशीर्वाद देते मंदिर में मूर्ति के आगे गिड़गिड़ाते मूक है वे कुछ बोल नहीं पाते मंदिर के बाहर भिखारी खड़े है मंदिर के अंदर भक्त खड़े है फर्क है केवल तुम दोनों में भिखारी तुमसे,तुम भगवान से दोनों ही माँगने के लिए खड़े है ठण्ड […] Read more » ढकोसले
कविता अनेको ग्रह इस ब्रहमांड में March 31, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment अनेको ग्रह इस ब्रहमांड में,तब भी आपस में मिलकर रहते है इस पृथ्वी ग्रह के प्राणी,क्यों आपस में लड़ते झगड़ते है आपस में ये एक दूजे की परिक्रमा भी करते रहते है नहीं किसी से टकराते अपने रास्ते पर चलते रहते है नहीं शांति इस भू के प्राणी को,एटम बम बनाने में लगे हुए अपना […] Read more » ब्रहमांड
कविता साहित्य देखा नहीं अभी तक तुमको March 30, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment देखा नहीं अभी तक तुमको पर रोज तुमको याद करते तुम में क्या कशिश है जो रोज तुमको याद करते देखा नहीं हाथ अभी तुम्हारा पर उसकी रेखा हम पढ़ लेते स्पर्श नहीं किया बदन को पर उसकी सुगंध सूंघ लेते है कोई पूर्व जन्म का बंधन जो हम रोज ऐसा करते ये है दो […] Read more » देखा नहीं अभी तक तुमको
कविता मै बड़ा भई,मै बड़ा March 30, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मै बड़ा भई,मै बड़ा सब कहते है मै बड़ा इसी बात को लेकर देवताओ में युद्ध छिड़ा पहले सबसे पावन गंगा बोली, मै तो सबके पापो को धोती अपने जल से निर्मल बनाती गंगोत्री से गंगा सागर तक जाती उनके पापो को अपने संग ले जाती इसलिय मै तो सबसे बड़ी मेरे आगे कोई नही […] Read more » Featured मै बड़ा भई
कविता सुकुमार सी मोहन हँसी ! March 30, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment सुकुमार सी मोहन हँसी, है श्याम सखि जब दे चली; वसुधा की मृदुता मधुरता, उनके हृदय थी बस चली ! करि कृतार्थ परमार्थ चित, हो समाहित संयत विधृत; वह सौम्य आत्मा प्रमित गति, दे साधना की सुभग द्युति ! है झलक अप्रतिम दे गई, पलकों से मुस्काए गई; संवित सुशोभित मन रही, चेतन चितेरी च्युत रही ! भूलत न भोले कृष्ण मन, वह सहजपन अभिनव थिरन; बृह्मत्व की जैसे किरण, विकिरण किए रहती धरणि ! वह धवलता सुकुमारिता, ब्रज वालिका की गहनता; हर आत्म की सहभागिता, ‘मधु’ के प्रभु की ज्यों खुशी ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ Read more » Featured सुकुमार सी मोहन हँसी !
कविता साहित्य आ रही है एक आवाज,देश की दसो दिशाओ से March 29, 2018 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on आ रही है एक आवाज,देश की दसो दिशाओ से आ रही है एक आवाज,देश की दसो दिशाओ से अगले चुनाव में बच कर रहना,इन झूठे नेताओ से सौदे बाजी ये करते है,सत्ता को ये कब्जाने में कुछ भी कर सकते है,कुर्सी को ये हतयाने में तरह तरह के झूठे लालच देकर,जनता को बह्लायेगे चुनाव जीत कर ये अपने घर से,जनता को बह्कायेगे बाँट रहे […] Read more » आ रही है एक आवाज देश की दसो दिशाओ से
कविता बचपन की शाम March 29, 2018 by राकेश कुमार पटेल | Leave a Comment बचपन की शाम बचपन की हर शाम होती थी हमारे नाम स्कूल से छुट्टी पाकर आँगन में शोर गुल हल्ला मचाकर किसी और की न मिले तो अपने कपड़े फाड़कर कुछ उपहास के साथ कोई टूटी फूटी गीत गाकर हर शाम बीतता था शोर गुल हल्ला मचा कर किसी की कलम चोरी करके लाये होते […] Read more » Featured बचपन की शाम
कविता आज की ताजा खबर March 29, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment पाकिस्तान की अमेरिका से मिली एक खैरात है कपड़े उतरवा कर तलाशी ली,यही उसकी औकात है इतनी बेइज्जती होने पर भी,अपने हाथ फैला कर पाकिस्तान अमेरिका से क्यों, माँग रहा खैरात है अगर थोड़ी सी गैरत बची है, अपने स्वाभिमान की चुल्लू भर पानी में डूब मरे,खातिर अपने अपमान की कोई जज्बात होता अपमान सहने […] Read more » आज की ताजा खबर
कविता सेक्स की मंडी March 28, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment पहले ये कोठो में लगती थी अब ये कोठियो में लगती है पहले ये छिप कर लगती थी अब ये सरे आम लगती है पहले ये शहर से बाहर लगती थी अब ये शहर के अंदर लगती है पहले ये रात में लगती थी अब ये दिन रात लगती है पहले ये गिने चुने शहरो […] Read more » सेक्स की मंडी