कविता “स्वपन-परी” October 5, 2014 by रोहित श्रीवास्तव | Leave a Comment जब जब मेरा “चंचलरूपी” मन भवरें की भांति …… सपनों की “पुष्प-नागरी” मे मँडराता खुद को कभी इधर…… कभी उधर….. “बदनाम” तन्हा गलियो मे बिलकुल अकेला पाता मन-मंदिर मे बसी “अनदेखी-अनजानी” वो सपनों के संसार की “स्वपन-सुंदरी” जिसमे “सौंदर्यता” और “कोमार्यता” “कूट-कूट” के भरी….. सच कहता हूँ मे…. सच कहता हूँ मे….. वो […] Read more » “स्वपन-परी”
कविता “संघर्ष” का समय October 5, 2014 by रोहित श्रीवास्तव | Leave a Comment “संघर्ष” का समय “ज़िन्दगी” के होने का असल “आभास” कराये! “संघर्ष” के बिना इंसान “जीवन” की कोई भी “सफलता” न पाए! “संघर्ष-समय” ही है जो व्यक्ति को “आत्म-चिंतन” से लेकर “आत्म-ज्ञान” का त्वरित पाठ पढ़ाये! “संघर्ष” शब्द ही पूर्ण करता है “मनुष्य” के जीवन की परिभाषा.. कभी-कभी इस दौर मई “मृत” हो जाती […] Read more » "संघर्ष" का समय
कविता पीढ़ियों से जमी धूल-झाड़ कर उतार दो October 2, 2014 / October 4, 2014 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment पीढ़ियों से जमी है धूल, आज झाड़ कर उतार दो l हर परस्पर भेदभाव को, आज भूलकर बिसार दो Il हो कहीं भी दूरियां-दस्तूरियाँ, उनको अब मिटा दो चरैवेति-चरैवेति, स्वर चहुँओर- वह हमें भी सूना दो ll आज जब तुम झाड़ू लगा रहे, हमें अपनें में मिला दो l दो बातें हैं मेरें मन में, […] Read more » पीढ़ियों से जमी धूल-झाड़ कर उतार दो
कविता मैं हूँ अराजक September 28, 2014 by कुलदीप प्रजापति | 1 Comment on मैं हूँ अराजक रोज यही बस खबर दिख रही टी .वी .और अखबारों में, मेरे देश की बेटी लुटती आश्रम और गलियारों में | कुछ लोग मुझे कहते हैं अराजक जब आवाज उठाता हूँ उनकी भाषा में दिया जवाब सत्ता का लोभी कहलाता हूँ| पहले राजा अँधा था अब गूंगा बहरा आया हैं, हर बहन बेटी […] Read more » मैं हूँ अराजक
कविता कुक्कुरमुत्तों की कविता September 28, 2014 by डॉ. मधुसूदन | Leave a Comment डॉ. मधुसूदन सूचना: यह व्यंग्यात्मक रचनाहै। मनोरंजन के लिए।इसी अर्थ में उसका स्वीकार करें। १ टेढी पूँछ,एक कुक्कुरवो, ऊंची पिछली टाँग कियो; मसरुमवा सिंचित हुआ सारा, सो कुक्कुरमुत्ता कहलाया। २ दीक्सित हुयी सारी सैना, सीतल सिंचित धारासै। कुक्कुरमुत्ते बहर आयै हैं, टोपी झाडू सज धज कै। ३ अक्रमण्यता अदिकार, इनको किस्ना गीता में बोल्ल्यो है। […] Read more » कुक्कुरमुत्तों की कविता
कविता प्रेम September 28, 2014 by बीनू भटनागर | 1 Comment on प्रेम प्रेम इतना भी न करो किसी से, कि दम उसका ही घुटने लगे, फ़ासले तो हों कभी, जो मन मिलन को मचलने लगे। भले ही उपहार न दो, प्रेम को बंधन भी न दो, एक खुला आकाश दे दो, ऊंची उड़ान भरने का, सौभाग्य दे दो….. लौट के आयेगा तुम्हारे पास ही, ये तुम […] Read more » प्रेम
कविता भूल गया हूँ गाॉवं को, September 25, 2014 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment भूल गया हूँ गाॉवं को, बड़े शहर की चकाचोंध में, रखकर अपने पॉवं को , शायद अब कुछ याद नहीं , भूल गया हूँ गाॉवं को, ए.सी. की हेर शीतलहर में पेड़ घाना कहाँ दीखता हैं , ज्वर, बाजार ,मक्का नहीं यंहा बर्गर- पिज्जा बिकता हैं , मिटटी के घर भूल गया सब और […] Read more » भूल गया हूँ गाॉवं को
कविता गांधी फिर कब आओगे ? September 23, 2014 by डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव | 1 Comment on गांधी फिर कब आओगे ? डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव (गांधी जयंती २ अक्टूबर २०१४) मोहनदास कमरचंद जी की, देश प्रेम की आंधी थी। पीछे देश खड़ा मर मिटने, एसी हस्ती गांधी थी। इसीलिये तैयार हुये, नेहरू जाने को जेलो में। मालूम था सिर दे देंगे पीछे सब खेलों खेलों में। मालूम था कि थे पटेल, मौलाना किदवई जान लिये। वल्लभ […] Read more » गांधी फिर कब आओगे
कविता रे देवों के अंश जाग जा……… September 23, 2014 by के.डी. चारण | 3 Comments on रे देवों के अंश जाग जा……… रे देवों के अंश जाग जा……… कौटिक देखे कर्मरत, पर तुझसा दिखा न कोई। इतने सर संधान किये,फिर क्यों तेरी भाग्य चेतना सोई।। आज रौशनी मद्धम-मद्धम, तारों की भी पांत डोलती, खाली उदर में आती-जाती, सांय-सांय सी सांस बोलती, कितने घर चूल्हा ना धधका, सब घर चाकी सोई है। रे ! देवों के अंश […] Read more » रे देवों के अंश जाग जा
कविता हारी नहीं हूँ September 23, 2014 by बीनू भटनागर | 4 Comments on हारी नहीं हूँ 1. हारी नहीं हूँ थकी हूँ हारी नहीं हूँ, थोड़ा सा विश्राम करलूं। ज़रा सी सी दुखी हूँ फिर भी, थोड़ा सा श्रंगार करलूं। श्रंगार के पीछे अपने, आंसुओं को छुपालूं। ख़ुश नहीं हूँ फिर भी, ख़ुशी का इज़हार करलूं। शरीर तो दुख रहा है, फिर भी दर्द को छुपालूँ। भंवर मे फंसी है नैया, […] Read more » हारी नहीं हूँ
कविता आतंकवादी September 20, 2014 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment जन्मा जिस कोख से उसको भी लजाया हूँ , ना जाने कितने मासूमो का खून में बहाया हैं , ना कोई आशा हैं मुझसे ना मैं आशावादी , मैं तो बस एक जेहाद का मारा, नाम आतंकवादी | कर धमाका मार सबको ये मेरा गुरु ज्ञान हैं , जेहाद के खातिर मरे तो सबसे […] Read more »
कविता वर्षों बाद एक नेता को देखा है September 20, 2014 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment वर्षों बाद एक नेता को माँ गंगा की आरती करते देखा है, वरना अब तक एक परिवार की समाधियों पर फूल चढ़ाते देखा है। वर्षों बाद एक नेता को अपनी मातृभाषा में बोलते देखा है, वरना अब तक रटी रटाई अंग्रेजी बोलते देखा है। वर्षों बाद एक नेता को Statue Of Unity बनाते देखा है, […] Read more » वर्षों बाद एक नेता को देखा है