कविता कविता : रिश्तों की बुनियाद July 25, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा पहले खुद पर ऊँगली उठा सको तो जानें पहले गैर के आंसू पोंछ सको तो जानें . जानना समझना तो अभी बहुत कुछ है यहाँ कितने अज्ञानी है हम, पहले यही जान सको तो जानें . भाई – भाई में झगड़ा, बाप-बेटे में मतान्तर रिश्तों की बुनियाद अब क्या है […] Read more » रिश्तों की बुनियाद
कविता मनु-मोहम्मद-मसीह July 24, 2013 / July 24, 2013 by अशोक शर्मा | Leave a Comment अशोक शर्मा आज जब चारो ओर धर्मं के नाम पर मार काट मची है दुनिया इंसानों और देशो में कम और धर्मो में ज्यादा बंटी है तब धर्मो को बनाने वाले क्या ये सोचते होंगे कि हमें धर्मं बनाने की जरूरत की क्या पड़ी थी इससे तो दुनिया बिना धर्मो के ही भली थी!!!!!!!! […] Read more » मनु-मोहम्मद-मसीह
कविता मनमोहक है July 23, 2013 / July 23, 2013 by डा.राज सक्सेना | 4 Comments on मनमोहक है डा.राज सक्सेना अभिशाप बुढापा कभी न था,यह तो गरिमा का पोषक है | आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर रूप का द्योतक है | क्यों रखें अपेक्षा औरों से, अब तक भी तो हम जीते थे | हम कुंआ खोदते […] Read more » मनमोहक है
कविता कुछ यूँ ही बीत रहा होता था जीवन July 22, 2013 / July 22, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment पीड़ा कैसे व्यक्त हो सकती थी? वह तो थी जैसे कोमल, अदृश्य से रोम रोम में गहरें कहीं धंसी हुई, भला वह कैसे बाहर आ सकती थी? चैतन्य दुनियादारी की आँखों के सामनें पीड़ा स्वयं एक रूपक ही तो थी जो नहीं चाहती थी कभी किसी को दिख जाने का प्रपंच. रूपंकरों […] Read more » कुछ यूँ ही बीत रहा होता था जीवन
कविता कविता : तारीखें माफ़ करती नहीं July 20, 2013 by मिलन सिन्हा | 1 Comment on कविता : तारीखें माफ़ करती नहीं मिलन सिन्हा सोचनीय विषयों पर सोचते नहीं वादा जो करते हैं वह करते नहीं अच्छे लोगों को साथ रखते नहीं गलत करने वालों को रोकते नहीं बड़ी आबादी को खाना, कपडा तक नहीं गांववालों को शौचालय भी नहीं बच्चों को जरूरी शिक्षा व पोषण तक नहीं गरीब, शोषित के प्रति वाकई कोई संवेदना नहीं अपने […] Read more » कविता : तारीखें माफ़ करती नहीं
कविता हास्य व्यंग्य कविताएं : शिष्टाचार, भाईचारा, मौज July 19, 2013 / July 19, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा शिष्टाचार माल सब साफ़ किया विकास के नाम पर विनाश किया भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार है कहो न प्यार है. भाईचारा ‘भाईचारा’ का शानदार नमूना देखिये घर का चारा खानेवाला खा रहा अब ‘भाई’ का ‘चारा’ देखिये. मौज […] Read more » भाईचारा मौज हास्य व्यंग्य कविताएं : शिष्टाचार
कविता व्यंग्य कविता : मजाक July 16, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा मजाक मंत्री जी ने कहा, “पांच वर्ष के बाद देश में कोई भी अनपढ़ नहीं रहेगा।” अगर सचमुच ऐसा हो पाया तो सारा देश उनका आभारी रहेगा। पर, फिलहाल तो हमारे अनेक नेताओं /शिक्षकों को फिर से पढ़ना पड़ेगा, ‘ कुपढ़ ‘ नहीं, वाकई शिक्षित होना पड़ेगा। क्यों कि, शिक्षा को उन्होंने ही […] Read more » मजाक
कविता सांध्य किरणें July 13, 2013 / July 13, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment रोशनी की कुछ लंबी बीमार किरणें बड़ी देर से शाम से आज दामन में दर्द लपेटे, खिड़की पर पड़ी कमरे में अन्दर आने से झिझक रही हैं। यह कोमल सांध्य किरणें पीली, जाने कौन-सी व्यथा घेरे है इनके मृदुल उरस्थल को आज ! कोई दानव ही होगा जो कानों में सुना गया है इनको दु:ख […] Read more » सांध्य किरणें
कविता कविता : जरूरी तो नहीं July 10, 2013 / July 10, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा तुम जो चाहो सब मिल जाये, जरूरी तो नहीं तुम जो कहो सब ठीक हो, जरूरी तो नहीं। दूसरों से भी मिलो, उनकी भी बातें सुनो वो जो कहें सब गलत हो, जरूरी तो नहीं। सुनता हूँ यह होगा, वह होगा,पर होता नहीं कुछ जो जैसा कहे, वैसा ही करे, जरूरी […] Read more » कविता : जरूरी तो नहीं
कविता अव्यक्त चाँद July 8, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment अपनी पूरी व्याकुलता और बैचेनी के साथ किसी पूर्णिमा में चाँद उतर आता था साफ़ नर्म हथेली पर अपनी बोल भर लेनें की क्षमता के साथ. चाँद अभिव्यक्त भी न कर पाता था अपनें आप को कि उसकी मर्म स्पर्शी आँखों में होनें लगती थी स्पर्श की कसैली सुरसुराहट दबे पाँव उसकी व्याकुलता भी […] Read more » अव्यक्त चाँद
कविता कविता : जीवन दर्शन July 8, 2013 / July 8, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा अपने मन को जोड़ो हर जन से . न तोड़ो किसी का दिल अपने धन से . मत बनो तंग दिल सबके साथ रहो घुल मिल . हों ऐसे विचार जो बन सके कर्म का आधार […] Read more » कविता : जीवन दर्शन
कविता विचार तेरे शहर के July 7, 2013 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जब भी गये बंद मिले द्वार तेरे शहर के , करते हम कैसे भला दीदार तेरे शहर के । अमुआ के बाग में उल्लुओं का बसेरा है , ठीक नहीं लगते हैं आसार तेरे शहर के। दिलों पर खंजर के निशां लिये मिले लोग , तूं ही बता कैसे करें एतबार तेरे […] Read more » विचार तेरे शहर के