कविता साहित्य हैरान कर देंगे June 21, 2013 by डा.राज सक्सेना | 2 Comments on हैरान कर देंगे कोई जीते कोई हारे, ये सब हैरान कर देंगे | मतों के दान के बदले, क़हर प्रतिदान कर देंगे | जो हारेंगे वे भरपाई, करेंगे लूट जनता को, जो जीतेंगे वसूली का , खुला मैदान कर देंगे | करेंगे क्षेत्र को विकसित,ये कहते हैं हमेशा सब, जहां मौका मिला,परिवार का उत्थान कर देंगे | कहा […] Read more » हैरान कर देंगे
कविता साहित्य ये आस कभी क्या पूरी होगी ! June 21, 2013 / June 21, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on ये आस कभी क्या पूरी होगी ! कोई भी दल लोकसभा मे, बहुमत नही पायेगा, क्योंकि सभी ने जनता को, कभी न कभी छला है। जनता भी असमंजस मे है, कौन बुरों मे भला है। मौन रहकर मनमोहन ने, राजमाता और राजकुँवर को ही बस पूजा है। दामाद सहित सब मंत्रियों ने, घोटाले पर घोटाले करके, देश को बेचा और लूटा […] Read more » ये आस कभी क्या पूरी होगी !
कविता साहित्य नया सफ़र June 20, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment लगता है जैसे वे कर रहे हों एक तैयारी आज शायद उनकी आ गयी है बारी क्या खोया, क्या पाया ठीक से समझ रहे हैं गुजरा हुआ एक एक पल फिर से जैसे जी रहे हैं कभी ख़ुशी, तो कभी गम के आंसू स्वतः निकल रहे हैं डाक्टरों ने जवाब दे दिया है बेतार माध्यम […] Read more » नया सफ़र
कविता गिद्धों के भाल पर June 19, 2013 / June 19, 2013 by डा.राज सक्सेना | 1 Comment on गिद्धों के भाल पर डा.राज सक्सेना कुर्सी ही श्रेष्ट बन गई, कलि के कराल पर | कितने ही ताज सज गए,गिद्धों के भाल पर | सम्पूर्ण कोष चुक गया बाकी रहा न कुछ, नेता की आंख गढ गई, वोटर की खाल पर | इस गंदगी के खेल को, कहते हैं राज-नीति, आकंठ सन गए सभी , कीचड़ उछाल कर […] Read more »
कविता साहित्य चलते -चलते June 18, 2013 / June 18, 2013 by लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | Leave a Comment मौसम बदला ,तस्वीर बदली, बदल गया इंसान घर के आँगन में पल रहा जुल्म का पकवान नया ,सबेरा होता है रोज फिर भी नही बदला इंसान मन में अजीब लालसा ,लेकर जी रहा इंसान शिक्षा की कसावट बदली टाइप राईटर का ज़माना बदला कलम की स्याही बदली नेता की नेता गिरी गुरु जी की छड़ी […] Read more » चलते -चलते
कविता साहित्य सपने बेचना June 17, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment वे सपने बेच रहे हैं एक अरसे से बेच रहे हैं भोर के नहीं दोपहर के सपने बेच रहे हैं तरह तरह के रंग बिरंगे सपने बेच रहे हैं खूब बेच रहे हैं मनमाने भाव में बेच रहे हैं अपनी अपनी दुकानों से बेच रहे हैं मालामाल हो रहे हैं निरंकुश हो रहे हैं होते […] Read more » सपने बेचना
कविता हास्य व्यंग्य कविता : परेशान ‘मेल’ June 13, 2013 / June 13, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा मैनेजर ने बड़े बाबू से पूछा, ये क्या हाल बना रक्खा है, टेबुल पर फाइलों का अंबार लगा रक्खा है ? क्या बात है, कुछ कहते क्यों नहीं ? सर, कहने से क्या लाभ हमीं अब बदल रहें है अपना स्टाइल, अपना स्वभाव ! सर, हम जो मर्द हैं न, अर्थात […] Read more » परेशान 'मेल' हास्य व्यंग्य कविता
कविता साहित्य वसुधा कैसे मुस्कुराये ! June 12, 2013 / June 12, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on वसुधा कैसे मुस्कुराये ! वसुधा कैसे मुस्कुराये ! एक सौ बाईस करोड़ का बोझ, कैसे उठा पाये ! बाग़ बग़ीचे खेत खलिहान सिमटे, फसल कोई कैसे सींचे । सबको खाना कैसे खिलाये ! वसुधा कैसे मुस्कुराये ! सूखते जल-स्त्रोत जायें, प्रदूषण ना रोक पायें, धरा के नीचे का पानी, और नीचे होता जाये, प्यास सबकी कैसे बुझाये! वसुधा […] Read more » वसुधा कैसे मुस्कुराये !
कविता साहित्य रोटी June 11, 2013 / June 11, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment ये वही हाथ है जिन्होंने आन्दोलन चलाया था अंग्रेजों के विरुद्ध हमनें उतारा था यूनियन जैक और लहराया था अपना प्यारा तिरंगा । ये वही हाथ है जिन्होंने पैदा किया देश के लिए हरित क्रांति और बुलन्द किया था जय जवान, जय किसान का नारा । ये वही हाथ है जिसने नाम बुलन्द […] Read more » रोटी
कविता साहित्य कैसा यह चलन June 11, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment कैसा है यह चलन हर तरफ जलन ही जलन पद से बढ़ा रहें हैं लोग अपना अपना कद हो रही है खूब आमद और खूब खुशामद रहते हैं पूरा लक – दक पद का ऐसा है मद नहीं मानते आजकल कोई भी हद भले ही बीच में क्यों न पिट जाए भद ज्ञानी जन कहते […] Read more » कैसा यह चलन
कविता कांच के टुकड़े June 10, 2013 / June 10, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on कांच के टुकड़े कांच के टूटने की आवाज़ बहुत बार सुनी थी, पर “वह” एक बार मेरे अन्दर जब चटाक से कुछ टूटा वह तुमको खो देने की आवाज़, वह कुछ और ही थी ! केवल एक चटक से इतने टुकड़े ? इतने महीन ? यूँ अटके रहे तब से कल्पना में मेरी, चुभते रहे हैं तुम्हारी हर याद में मुझे। अब हर सोच तुम्हारी वह कांच लिए, कुछ भी करूँ, […] Read more » poem by vijay nikor कांच के टुकड़े
कविता आज जब बादल छाए June 10, 2013 / June 10, 2013 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on आज जब बादल छाए कैसे होगा बादल कभी और नीचे और बरस जायेगा , फुहारों और छोटी बड़ी बूंदों के बीच मैं याद करूँगा तुम्हे और तुम भी बरस जाना . .(२)…………………………………………….. कुछ बूंदों पर लिखी थी तुम्हारी यादें जो अब बरस रही है , सहेज कर रखी इन बूंदों पर से नहीं धुली तुम्हारी स्मृतियाँ न ही नमी […] Read more » आज जब बादल छाए