कविता भारतवर्ष- सौरभ राय ‘भगीरथ’ December 29, 2012 / December 29, 2012 by सौरभ राय 'भगीरथ' | Leave a Comment वो किस राह का भटका पथिक है ? मेगस्थिनिस बन बैठा है चन्द्रगुप्त के दरबार में लिखता चुटकुले दैनिक अखबार में | सिन्कदर नहीं रहा नहीं रहा विश्वविजयी बनने का ख़्वाब चाणक्य का पैर घांस में फंसता है हंसता है महमूद गज़नी घांस उखाड़कर घर उजाड़कर घोड़ों को पछाड़कर समुद्रगुप्त अश्वमेध में हिनहिनाता है विक्रमादित्य […] Read more »
कविता चलो नरेंद्र…….दिल्ली तुम को बोल रही December 28, 2012 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गुजरात के नये क्षितिज पर नवभारत की आशाएं कुछ डोल रहीं। चलो नरश्रेष्ठ, चलो नरेन्द्र! भारत माता की दिल्ली तुमको बोल रही।। पर दिल्ली जाने से पहले, भारत मां के पूत वेदों का ये संदेश कण्ठस्थ करो। मनुर्भव: जनया दैव्यं जनम और साथ में कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम हृदयस्थ करो।। राजसूय अभी शेष है […] Read more » poem for narendra modi
कविता नये साल का शोर क्यों? December 28, 2012 / December 28, 2012 by श्यामल सुमन | Leave a Comment कुछ भी नया नहीं दिखता पर नये साल का शोर क्यों? बहुत दूर सत – संकल्पों से है मदिरा पर जोर क्यों? हरएक साल सब करे कामना हो समाज मानव जैसा दीप जलाते ही रहते पर तिमिर यहाँ घनघोर क्यों? अच्छाई है लोकतंत्र में सुना है जितने तंत्र हुए जो चुनते हैं सरकारों […] Read more »
कविता भीगी यादें December 25, 2012 / December 25, 2012 by विजय निकोर | Leave a Comment विजय निकोर तुम्हारी रुपहरी यादें लौट आती हैं इस तरह जैसे प्रतीक्षक पर्वत पर बादल ! बादल आ-आकर करते आलिंगन शिलीभूत धीर शिख़र का, पर्वत से लिपटे और पर्वत से अलग भी, बिखरे-बिखरे, खेल-खेल में धूप-छाओं, अभी उजाला, अभी अंधेरा करते, माथा टकराते, बरस-बरस पड़ते । ऐसी बेमौसम बारिश में जाग उठती है सोई […] Read more »
कविता श्रध्दानन्द की अमर कहानी December 22, 2012 / December 22, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment हम सब मिल शीश झुकायेंगे, उस वीर धीर बलिदानी को, उस वेद राह लासानी की गायेंगे अमर कहानी को। अट्ठारह सौ सत्तावन में, तलवन की भूमि पावन कर दी, नानक, शिवदेवी के घर में, मुन्शी ने आकर खुशी भर दी। बुद्धि कुशाग्र सुन्दर बालक, मिल गया सेठ-सेठानी को॥ हम सब… पैसे की कोई […] Read more »
कविता अनुवर्त्ती रात December 15, 2012 / December 15, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on अनुवर्त्ती रात विजय निकोर दीवार पर दो घड़ियाँ लगा देने से रात कभी जल्दी नहीं कटती । कोई हादसा नया छोटा-सा, बड़ा-सा ढीठ और बेअदब संतरी-सा कमरे में खड़ा रात को सोने नहीं देता, सरकने नहीं देता । कितने पुराने असम्बद्ध हादसे कि जैसे सारे सोय संतरी जागे, इन आन्तरिक संतरियों की फ़ौज रात को अभित्रस्त […] Read more » अनुवर्त्ती रात
कविता शिखा श्रीवास्तव की कविता : कितनी अजीब है रिश्तों की कहानी… December 13, 2012 / December 13, 2012 by शिखा श्रीवास्तव | Leave a Comment ऐसी है बेईमान रिश्तों की कहानी, ताउम्र बंधन का दंभ भरने वाले रिश्ते, एक ही पल में बदल देते हैं अपना रंग और रूप कितनी अजीब है रिश्तों….। जिन मां-बाप ने पाला-पोसा बेटी को, विवाह की बेला आते ही क्यों कम हो जाता है, उनका हक और अधिकार कितनी अजीब है रिश्तों ….। जिस आंगना […] Read more »
कविता कविता : अजीब है ये जिंदगी भी December 13, 2012 / December 13, 2012 by मनीष जैसल | Leave a Comment अजीब है ये जिंदगी भी अजनबी सी ना जाने क्यों लगती है ज़िन्दगी , मुझ पर हसती सी क्यों लगती हैं ज़िन्दगी, रिश्तों की धुप में हमने देखे हैं कितने साये , किसी को अपना किसी को पराया समझती हैं ज़िन्दगी, पल पल में जुडती है इस ज़िन्दगी की सांसें एक ही पल में मगर […] Read more »
कविता मैं … शीर्षकहीन ! December 10, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on मैं … शीर्षकहीन ! विजय निकोर तुम ! तुम्हारा आना था मेरे लिए जीवनदायी सूर्य का उदित होना, और तुम्हारा चले जाना था मेरे यौवन के वसंतोत्सव में एक अपरिमित गहन अमावस की लम्बी कभी समाप्त न होती विशैली रात । मुझको लगा कि जैसे मैं बिना खिड़्की, किवाड़ या रोशनदान की किसी बंद कोठरी में बंदी थी, और […] Read more » poem by vijay nikor
कविता सम्प्रेषण और भंगिमाएं December 10, 2012 / December 10, 2012 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment सम्प्रेषण और भंगिमाएं दोनों की सीमाओं पर सतत निरंतर आँखों का सदा ही बना रहना और पता चल जानें से लेकर प्रकट हो जानें तक की सभी चर्चाओं पर सदा बना रहता है सूर्य. सूर्य के प्रकाश में भावों को भंगिमाओं में बदलनें की ऊर्जा मिलती तो है किन्तु परिवर्तन के इस प्रवाह में सम्प्रेषण […] Read more » . सम्प्रेषण और भंगिमाएं
कविता कविता – उम्र का हिसाब December 8, 2012 / December 8, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment कितने बदल चुके हैं सिकुड़े हुए अंतरिक्ष में मौन तिलक लगाकर मेहराब से टूटता कोई पत्थर कि युगों पुराना अदृश्य हाथ पसीने से सरोबार होकर इसी पत्थर में मेहराब की सर्जना की थी । पहली बार मुझे लगा अंतरिक्ष में दिशाहीन आवेश चेहरे पर आंखें गड़ाये टूकुर-टूकुर देख रहा है उन गोद में बसे […] Read more » poem by motilal कविता - उम्र का हिसाब
कविता जो कह चूका गीत उसे भी न भूल जाओ December 8, 2012 / December 8, 2012 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment तुम्हे मेरे सपनो में अब भी देखा करता हूँ कभी भी यहाँ वहाँ पहले की ही तरह अब भी भटका करता हूँ .. नहीं होते हैं चलती साँसों मैं पेंच अब उस तरह के पर हर साँस से मैं गिरते फूलो को थामा करता हूँ.. साँसों से खयालो की डोर अब भी खिचती चली आती […] Read more »