कविता चार राग January 21, 2013 / January 21, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment भोर मे भैरवी के स्वर छिड़े हैं, इन्ही के साथ हम प्रभु से जुड़े हैं, संगीत साधना बनी आराधना , फिर कंहीं क्यों और करूँ प्रार्थना । स्वर ताल मे बंदिशों को बाँधकर , साज़ों मे संगीत लहरी ढालकर, तक धिं तक ता तारानों मे डालकर , गा भैरव कोमल रिषभ संभालकर । […] Read more »
कविता मै और तुम January 20, 2013 / January 20, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मै और तुम और ये साथ, संजोये चल रहे हैं साथ साथ, अन्तर का ये अंतहीन सिलसिला, पर कोई जोड़ नहीं है बिन सिला। मै अधीर तुम धीरज, मै बहाव तुम ठहराव, मै नदी तुम झील, संजोये चल रहे हैं ये साथ, बिना बिखराव। तुम मौन मै वाचाल मै धरा तुम आकाश, शान्त सागर तुम […] Read more » poem by binu bhatnagar
कविता मौन में पलने दो January 19, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment तुम मेरे संतृप्त स्नेह की शिल्पकार जैसे भी चाहो तराशो इसको, नाम दो, आकार दो, ….. पर शब्द न दो, कि शब्दों में छिपे होते हैं भ्रम अनेक, छंटता है इनसे अनिष्ट छलावा, शब्द छोड़ जाते हैं छलनी मुझको, प्रिय, मैं अब स्नेह से नहीं स्नेहमय शब्दों से डरता हूँ । आओ, बैठो पास, और पास मेरे, कहो […] Read more » मौन में पलने दो
कविता सच बतलाना January 16, 2013 / January 16, 2013 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment नहीं कहानी भूतों वाली कहना अम्मा, ना ही परियों वाला कोई गीत सुनाना| क्या सचमुच ही चंदा पर रहती है बुढ़िया, इस बारे में मुझको बिल्कुल सच बतलाना| कहते हैं सब चंदा पर अब , इंसानों के पैर पड़ चुके| वायुयान ले धरती वाले, चंदा पर दो बार चढ़ चुके| चंद्र ग्रहण पर उसको […] Read more »
कविता चाहत-ऋषभ कुमार January 16, 2013 / March 5, 2013 by ऋषभ कुमार सारण | Leave a Comment भूमिका: कविता “चाहत” के माध्यम से पाठक का ध्यान उसकी अपनी “चाहत” (जीवन का लक्ष्य) की और आकर्षित करने का प्रयास किया गया है, जिसके लिए उसका अंतर्मन अप्रत्यक्ष रूप से हमेशा उद्वेलित रहता है। ‘यार’ उपमा के द्वारा उस व्यक्ति को सांकेतिक तरीके से संबद्ध किया गया है, जो अपने जीवन में कुछ महान […] Read more »
कविता अबकी बार सिंहासन को ठोस फैसला करना होगा ….!! January 16, 2013 / January 16, 2013 by हितेश शुक्ला | Leave a Comment {शहीदों को समर्पित – हितेश शुक्ल } रोज रोज का झंझट अब यह ख़त्म हमे करना होगा ! अबकी बार सिंहासन को ठोस फैसला करना होगा !! कब तक बांध हाथ रोएंगे हम अपने शेरो की कुर्बानी पर ! बेहद शर्मिंदा है भारत माँ दिल्ली की कायरता पर !! वीर शिवा और भगत सिंह का […] Read more » poem dedicated to martyrs
कविता वियोग – विजय निकोर January 13, 2013 / January 13, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment सोचता हूँ, चबूतरे पर बैठी अभी भी क्रोशिए से तुम कोई नाम बुनती हो क्या ? ….इसका मतलब ? तो, “क्या” नाम बुनती होगी ? या, कोई नाम नहीं, रिक्तता, बस रिक्तता बुनती चली जाती होगी स्वयं तुम्हारे सुकोमल हाथों से । तुम्हारी विपन्न वेदना, बस बहती चली आती होगी, तुम्हारे व्योम-मंडल से … […] Read more » poem by vijay nikor
कविता पराकाष्ठा January 6, 2013 / January 6, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on पराकाष्ठा विजय निकोर आज जब दूर क्षितिज पर मेघों की परतें देखीं लगा मुझको कि कई जन्म-जन्मान्तर से तुम मेरे जीवन की दिव्य आद्यन्त “खोज” रही हो, अथवा, शायद तुमको भी लगता हो कि अपनी सांसों के तारों में कहीं, तुम्हीं मुझको खोज रही हो। कि जैसे कोई विशाल महासागर के तट पर बिता […] Read more » poem by vijay nikor
कविता कविता – हम कैसे बता दें January 6, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment मोतीलाल हम यह भी नहीं बता सकते कितने कंकड़-पत्थर हर अफरा-तफरी में महाद्वीप में तब्दील हो जाते हैं । कब से मंच के पीछे खड़े एक अदृश्य हाथ समय के धागे को पकड़कर हर उस रेत को पाटता रहा है नदी के दोनों छोरों में लगता है हमने इस विषय को विस्मृत होते संस्कार […] Read more » poem by motilal कविता - हम कैसे बता दें
कविता दामिनी तुम देश की बेटी बन गयी हो। January 2, 2013 / January 2, 2013 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य दामिनी तुम देश की बेटी बन गयी हो। दुष्टाचारी पापाचारी के सामने तन गयी हो।। तुम्हारे नाम से बहुत सी बहनों को मिलेगा सम्बल। तुम्हारी चिता से निकला चिंतन मचा गया है हलचल।। पर आज ही के अखबार में आयी है एक खबर। एक शिक्षिका तुम्हें श्रद्घांजलि देने पहुंची जंतर […] Read more » poem on gang raped girl
कविता कविताएं-स्पर्श एवं सिनेमा December 31, 2012 / December 31, 2012 by सौरभ राय 'भगीरथ' | Leave a Comment स्पर्श अजीब बात है दुनिया भर से हाथ मिलाकर मेरे हाथों ने खो दी है अपनी ऊष्मा स्पर्श की अनुभूति जड़ और चेतन के बीच फ़र्क कर पाने की क्षमता । मैं- महसूस करना चाहता हूँ सामने वाले के हाथों की मासूम थरथराहट उनका स्पंदन । चाहता हूँ महज़ स्पर्श कर बतला सकूं हाथ […] Read more »
कविता कविताएं-लोहा एवं चिड़ियाघर December 30, 2012 / December 30, 2012 by सौरभ राय 'भगीरथ' | Leave a Comment चुम्बक के छर्रे से खेलता बच्चा तपाक से पूछता है – कहाँ-कहाँ है लोहा ? माँ कहती हर तरफ लोहा ! चिमटा छेनी हथौड़ा संडासी फावड़ा खुरपी कुदाली चाकू हंसिया कुल्हाड़ी सेफ्टी पिन साईकिल रेलगाड़ी हर तरफ लोहा ! बच्चा बारी-बारी सबपर चुम्बक लगाता ताली पीटता ख़ुश हो जाता | फिर अचानक चुम्बक […] Read more »