कविता भाषाई गुलामी का मुक्तियोद्धा January 16, 2021 / January 16, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —–विनय कुमार विनायकभाषाई गुलामी का मुक्तियोद्धनिपट अकेला समर भूमि मेंसिर में सिरस्त्रान नहीं, कर में कृपाण नहींकवच-कुण्ड़ल विहीन कर्ण सा!निपट अकेला मृतवजूदधारी लड़ रहाघोषित अज्ञात कुल शील का! भूत-भविष्य-वर्तमान से निर्लिप्तभाषाई गुलामी का मुक्तियोद्धापक्ष और विपक्ष के सम्मिलितगला काट साजिश के बीचभाग्य चक्र को फंसाए खड़ा! भौंचक्क रश्मिरथी अनुसंधान करेशस्त्र या निज प्राण बचाए जबकिसारथी […] Read more » भाषाई गुलामी का मुक्तियोद्धा
कविता कुरुक्षेत्र तब भी था और अब भी January 16, 2021 / January 16, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —–विनय कुमार विनायकयुद्ध लड़े और जीते जाते हैंहथियार नहीं विचार सेकुरुक्षेत्र तब भी था और अब भीयुद्धोन्मादी दुर्योधन होतेसौ-सौ की सैशे मेंतेरह अक्षौहिणी सेना से लैससंतोषी धीरोदात्त पाण्डव होतेमुट्ठी भर सेना के साथ! किन्तु कृष्ण तो कोई एक ही होतादोनों पक्ष में हथियार और विचार से सक्रियहथियार कृष्ण का था सत्ता के साथविचार कृष्ण का […] Read more » Kurukshetra was still and still is कुरुक्षेत्र तब भी था और अब भी
कविता अक्सर ये है पूछता , मुझसे मेरा वोट !! January 16, 2021 / January 16, 2021 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment पंचायत लगने लगी, राजनीति का मंच !बैठे हैं कुछ मसखरे, बनकर अब सरपंच !! घोटालों के घाट पर, नेता करे किलोल !लिए तिरंगा हाथ में, कुर्सी की जय बोल !! अभिजातों के हो जहाँ, लिखे सभी अध्याय !बोलो सौऱभ है कहाँ, वह सामाजिक न्याय !! गली-गली में मौत है, सड़क-सड़क बेहाल !डर-डर के हम जी […] Read more » मेरा वोट
कविता स्नेह January 15, 2021 / January 15, 2021 by अनिल सोडानी | Leave a Comment न वफ़ा है न शर्त हैरुसवाई है न बेवफाईइसमें न कुछ खोजते हैंन इसमें कुछ तौलते हैं खुद-ब-खुद बहती हैखुद-ब-खुद सिमटती हैहिसाब मांगती नहीं कभीउत्तर चाहती नहीं कभी सिर्फ देती ही रहती हैलेती नहीं कभी भी कुछन कुछ बोलते हुए भीबोलती रहती सब कुछ निर्गुण है पर सघन हैहँसता हुआ रुदन हैबहती है तो खिलतीरुकती […] Read more » स्नेह
कविता मंदिर बनाने के पहले दिल से राम बन जाना January 13, 2021 / January 13, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —–विनय कुमार विनायकलाशों की ढेर परमंदिर बनाने के पहले अच्छा है हमेंदिल-दिमाग से राम बन जानाबन जाओ आज्ञाकारी पुत्रराम सा कि माता का आदेश है! बन जाओ निस्पृह-त्यागीराम सा कि पिता की इच्छा है! छोड़ दो सिंहासन सुखकि लघु जनों को मिले अवसर!बनो ऐसा मर्यादावादी राम साकि बची रहे सबकी मर्यादा! कि तुम्हारी ब्याहतातुम्हारे विश्वास […] Read more » Become a Ram by heart before building a temple
कविता स्वामी विवेकानन्द जी को श्रद्धांजलि January 13, 2021 / January 13, 2021 by शकुन्तला बहादुर | Leave a Comment Read more » स्वामी विवेकानन्द
कविता दादी का संदूक ! January 13, 2021 / January 13, 2021 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment स्याही-कलम-दवात से, सजने थे जो हाथ !कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहें फुटपाथ !!बैठे-बैठे जब कभी, आता बचपन याद !मन चंचल करने लगे, परियों से संवाद !! मुझको भाते आज भी, बचपन के वो गीत !लोरी गाती मात की, अजब-निराली प्रीत !! मूक हुई किलकारियां, चुप बच्चों की रेल !गूगल में अब खो गए,बचपन के सब खेल […] Read more » दादी का संदूक
कविता राम चरित्र में सभी धर्मों का सार January 12, 2021 / January 12, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकराम नहीं तो हम नहींराम ईश्वर से कम नहीं!राम नाम के जपने सेहोती जीवन नैया पार,राम हैं ईश्वर के अवतार! राम हैं तो गम नहींराम ईश्वरीय रुप सहीईश्वर में जितना गुण हैसब राम ने किया साकार,राम नाम से चल रहा संसार! राम तबसे जबसे महीराम का रामत्व वहीजैसे होते हैं भगवानराम को मानवता […] Read more » राम चरित्र
कविता इस धुली चदरिया को धूल में ना मिलाना January 12, 2021 / January 12, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकचेहरे पे अहं, मन में बहम,कहां गया तेरा वो भोलापन,कुछ तो चीन्हे-चीन्हे से लगते हो,कुछ लगते हो तुम बेगानेपन जैसे! चेहरे की वो तेरी चहक,कहां गयी वो तेरी बहक,बचपन में बड़े अच्छे दीखते थे तुम तो,बुढ़ापे में क्यों हो गए तुम बचकाने से! कहां गया वो आत्मबल,क्यों होने लगे मरियल,यौवन का तेरा वो […] Read more » इस धुली चदरिया को धूल में ना मिलाना
कविता ज्ञान तो आ गया, पर विवेक अधर में January 12, 2021 / January 12, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकज्ञान तो आ गया, पर विवेक अधर में,ऐसे पातक का उद्धार कहां है जग में! रावण था ज्ञानी पर विवेक नहीं मन में,ऐसे महाज्ञानी की हार तय था रण में! ज्ञान मनन से जन्म लेता अंत:करण में,मनन से सद्विवेक जगता मुनिगण में! बिना मनन का ज्ञान पलता है बहम में,चिंतन-मनन-श्रवण करें मानव जन्म […] Read more » ज्ञान तो आ गया
कविता ज्ञान गुनने से बहु गुणित हो जाता है January 7, 2021 / January 7, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकज्ञान गुनने से,जीव गुणसूत्र ही बहुगुणित हो जाता हैस्व अंतर्मन में!करो सद्गुणों का विकास अंतःकरण मेंकि ज्ञान जीव के अंदर है! ज्ञान धुनने से,रुई की तरह ही आच्छादित हो जाता हैअपने रुह में!करो ज्ञान का विस्तारण स्व आत्मन मेंकि आत्मा ज्ञान का मंदिर है! ज्ञान रुंधने से,मिट्टी की तरह मूर्तिमान होने लगता हैअंतर […] Read more » ज्ञान गुनने से बहु गुणित हो जाता है
कविता विचारों का अंत नहीं,अवतार प्रतिस्थापित होते अवतार से January 6, 2021 / January 6, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment आज भाईयों को मरने मारने की,जो बात करे उसे भाईचारा कहते! क्या भाई कभी भी ऐसे हो सकते,जो भाई को मौत के मुंह ढकेलते? जो सबके अमन में खलल डालते,उनको अमन पसंद बिरादर कहते! क्या कभी ऐसे जाति-बिरादर होते,जो मासूम बच्चों में जहर घोलते? आज विश्व के मानवीय मजहबों में,मानवता नहीं मजहबी उन्माद होते! काश […] Read more » अवतार प्रतिस्थापित होते अवतार से