कविता धारा 497 की समाप्ति पर समाज में प्रभाव October 1, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment पशु-पक्षी और मनुष्य में अब फर्क क्या रह जायेगा जब किसी का हर किसी के साथ सम्भोग हो जायेगा 497 की समाप्ति पर शादी का क्या औचित्य रह जायेगा शादी के बाद भी स्त्री पुरुष सम्भोग में स्वतंत्र हो जायेगा रहेगे न कोई समाजिक नियम जब कानून ही बन जायेगा कानूनी कपड़ा पहन कर,अब समाज […] Read more » पशु-पक्षी पुरुष शादी रजिस्ट्रेशन स्त्री
कविता श्राद्ध , श्रद्धा है या आडम्बर October 1, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment जीवन में अजीब अचम्भा देखा जीते जी आदमी को भूखा देखा मरने के बाद उसको खाते देखा सदियों से चलती इस रीति को देखा श्राद्ध के नाम पर इस श्रद्धा को देखा देख रहे है आज उसे अनदेखा देखा वर्तमान की चिंता आज नहीं कर रहा भविष्य की चिंता आज किये जा रहा मानव किस […] Read more » भविष्य श्रद्धा है या आडम्बर श्राद्ध
व्यंग्य पाकिस्तान में शरीफ भैंस September 29, 2018 by विजय कुमार | 1 Comment on पाकिस्तान में शरीफ भैंस – विजय कुमार, किसी समय दूध का अर्थ था, जंगल में चरने वाली देसी गाय का दूध; पर समय बदला, तो दूध कई तरह का हो गया। यों तो हर स्तनपायी मादा के पास अपनी संतानों के लिए दूध होता है; पर गाय, भैंस, जरसी, बकरी, भेड़ या ऊंटनी का दूध मनुष्यों के काम भी […] Read more » पाकिस्तान में शरीफ भैंस क्रिकेट शरीफ मियां सेना प्रमुखों
कविता श्राद्ध पर कुंडलिया September 28, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment जब तक श्रद्धा न हो,श्राद्ध करना है बेकार किसी ने हाल न पुछा,जब था बाँप बीमार जब था बीमार,किसी ने दवाई को न पूछा मर गया बेचारा बाँप,पहने हुए एक कच्छा कह रस्तोगी कविराय,रिवाज ऐसे बनाओ श्राद्ध मत करो तुम,जीते जी खाना खिलाओ जीते जी बाँप के साथ करते दंगम दंगा मरने पर सारे बेटे […] Read more » दवाई बाँप बेटे श्राद्ध पर कुंडलिया
कविता दर्द भी दिया अपनों ने September 28, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ भी दिया अपनों ने उम्मीद भी अपनों से जाएँ कहा बिना उनके अपने तो अपने होते हैं। वो दूर चले गए कितने या हम पास न रह पाए कहने को तो बहुत है पर अपने तो अपने होते हैं। गिला-शिकवा अपनों से आस लगा के छोड़ देना आख़िर भुलाएँ तो कैसे अपने तो अपने होते हैं। Read more » दर्द भी दिया अपनों ने
कविता दुआ-ए-सलामती September 27, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | 3 Comments on दुआ-ए-सलामती डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ रखता हूँ हर कदम ख़ुशी का ख़याल अपनी डरता हूँ फिर ग़म लौट के न आ जाए अब भुला दी हैं रंज से वाबस्ता यादें यूँ आके ज़िंदगी में ज़हर न घोल जाएँ इक बार जो गयी तो फिर न आएगी यहाँ शौक महँगा है लबों पे हँसी रखने का अपनी आबरू का ख़याल […] Read more » कश्ती साहिल जहर हँसी
कविता हुनरमंद है वो September 26, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment विनोद सिल्ला वो भिगो लेता है शब्दों को स्वार्थ की चाशनी में रंग जाता है अक्सर अवसरवादिता के रंग में वो धार लेता है मौकाप्रसती के आभूषण ओढ़ लेता है आवरण आडम्बरों का नहीं होता विचलित रोज नया रंग बदलने में आगे बढ़ने के लिए रख सकता है पाँव अपने से अगले के गले पर […] Read more » रंग हुनरमंद है वो
कविता माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता — September 25, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment आर के रस्तोगी माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता माँ का ऋण कोई चुका नहीं सकता कितने भी लाख करो दान व तीर्थ माँ के बिना उद्धार नहीं हो सकता माँ के बैगेर कोई तुम्हे जन्म नहीं दे सकता माँ के बैगेर कोई कोख में रख नहीं सकता लेती है माँ,कितनी प्रसव पीड़ा जन्म […] Read more » माँ माँ बाँप शिक्षक स्वर्ग
गजल यकीं का यूँ बारबां टूटना September 25, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ यकीं का यूँ बारबां टूटना आबो-हवा ख़राब है मरसिम निभाता रहूँगा यही मिरा जवाब है मुनाफ़िक़ों की भीड़ में कुछ नया न मिलेगा ग़ैरतमन्दों में नाम गिना जाए यही ख़्वाब है दफ़्तरों की खाक छानी बाज़ारों में लुटा पिटा रिवायतों में फँसा ज़िंदगी का यही हिसाब है हार कर जुदा, जीत कर भी कोई तड़पता रहा नुमाइशी हाथों से फूट गया झूँठ का हबाब है धड़कता है दिल सोच के हँस लेता हूँ कई बार तब्दील हो गया शहर मुर्दों में जीना अज़ाब है ये लहू, ये जख़्म, ये आह, फिर चीखो-मातम तू हुआ न मिरा पल भर इंसानियत सराब है फ़िकरों की सहूलियत में आदमियत तबाह हुई पता हुआ ‘राहत’ जहाँ का यही लुब्बे-लुबाब है Read more » यकीं का यूँ बारबां टूटना ये आह ये जख़्म ये लहू
कविता सबसे अच्छा खिलौना September 25, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment विनोद सिल्ला बचपन में मेरे मित्र थोड़ी सी अनबन होने पर दुखाने के लिए मेरा दिल मेरे मिट्टी के खेल-खिलौने तोड़ देते थे लेकिन आजकल के मित्र थोड़ी सी अनबन में दिल ही तोड़ते हैं शायद आजकल यही सबसे अच्छा खिलौना है Read more » सबसे अच्छा खिलौना
कविता हिंदी की मुहावरे,बड़े ही बावरे है September 25, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment हिन्दी के मुहावरे,बड़े ही खरे है खाने पीने की चीजो से भरे है कही पर फल है कही पर आटा दाले है कही पर मिठाई है तो कही मसाले है चलो फलो से शुरू कर देते है उनका ही स्वाद चख लेते है कही आम के आम गुठली के दाम होते है जब अँगूर मिलते […] Read more » गुलगुले दूध नमक मुहावरे
कविता जीवन के कुछ कटु अनुभव September 25, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment पैर की मोच और छोटी सोच हमे आगे बढ़ने नहीं देती टूटी कलम दूसरो से जलन खुद को लिखने नहीं देती आलस्य और पैसो का लालच हमे महान बनने नहीं देता हम है उच्च दूसरे है नीच ये हमे इंसान नहीं बनने देता मिल जाती है दुनिया की सब चीजे पर अपनी गलती नहीं मिलती […] Read more » जीवन के कुछ कटु अनुभव शरीर साँसों