कविता अब दिवाली के पुराने दिन याद आते है October 29, 2018 / October 29, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment अब दिवाली के पुराने दिन याद आते है जब दीवारों को चूने से पुतवाते थे चूने को बड़े ड्रमों में घुलवाते थे उसमे थोडा सा नील डलवाते थे सीडी पड़ोसी से मांग कर लाते थे अगर पुताई वाला नहीं आता तो खुद ही सीडी पर चढ़ जाते थे अब दिवाली के पुराने दिन या आते […] Read more » अब दिवाली के पुराने दिन याद आते है चूने पुतवाते फुलझड़ियाँ
व्यंग्य आई .. आई .. सीबीआई ….!! October 29, 2018 / October 29, 2018 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment सीबीआई विवाद पर खांटी खड़गपुरिया तारकेश कुमार ओझा का पंच … तारकेश कुमार ओझा हम समझते थे , कुछ बात है तुममें जरा अलग है हस्ती तुम्हारी … लेकिन यह क्या , यहां भी वही छीनाझपटी और खींचतान की बीमारी वही मैं बड़ा और स्वार्थ का झगड़ा पद, पैसा और पावर का लफड़ा बड़ा शोर […] Read more » आई .. आई .. सीबीआई ....!! खींचतान छीनाझपटी
धर्म-अध्यात्म विविधा साहित्य द्वारिकापुरी की कहानी October 28, 2018 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्वरम में विश्राम […] Read more » द्वारिकापुरी की कहानी
कविता करवाचौथ पर पंजाबी टप्पे October 27, 2018 / October 27, 2018 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on करवाचौथ पर पंजाबी टप्पे दिन करवाचौथ दा आया है मांग भर ले तू सजनी तेरा साजन सिन्दूर लाया है दिन मेहंदी दा आया है हत्था नू तू रचा सजनी तेरा साजन मेहंदी लाया है दिन सुहागन दा आया है करले सोलह श्रंगार सजनी तेरा श्रंगार दा सामान आया है ये साल में एक बार आंदा है खुशियाँ मना तू […] Read more » करवांचौथ पर पंजाब टप्पे खुशियों चाँद
व्यंग्य अजीब है न लोकतंत्र का ई त्यौहार October 26, 2018 / October 26, 2018 by अभिलेख यादव | Leave a Comment अंकित कुंवर लोकतंत्र का बरसों पुराना त्यौहार नजदीक आ रहा है। यह त्यौहार सियासत के गलियारे में शामिल होने के लिए है। एक मौका है जिसपर चौका लगाना सबकी चाहत। अब तो समझो हम का कहना चाह रहें हैं। ई त्यौहार का नामकरण सोच समझकर फिक्स हुआ है। ‘चुनाव’ नाम है इसका। इस नाम का […] Read more » अजीब है न लोकतंत्र का ई त्यौहार कागज फोटो लोकतंत्र सोशल मीडिया
कविता करवाचौथ पर मेरे पति October 26, 2018 / October 26, 2018 by आर के रस्तोगी | 2 Comments on करवाचौथ पर मेरे पति भला है,बुरा है,मेरा पति मेरा सुहाग मेरा ख़िताब तो है भले ही पन्ने पुराने हो, वो मेरे दिल की किताब तो है क्यों निहारु दूर के चाँद को,जब मेरा चाँद मेरे पास है करता है मेरी पूरी तमन्ना,यही मेरे जीवन की आस है ये चंदा तो रोज घटता बढ़ता,कभी छुप जाता है आकाश में मेरा […] Read more » करवांचौथ पर मेरे पति
कविता आज का कवियों की विशेषता October 25, 2018 / October 25, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment कवि कविता कम,चुटकले ज्यादा सुनाते है वे हंसाते कम है,तालियाँ ज्यादा पिटवाते है कवि मुहँ लटका कर,मंच पर आकर बैठ जाते है चूकि आने से पहले घरवाली से पिट कर आते है कवि कल्पना के पास है पर कल्पना में खोये रहते है वे रात को जगते रहते है,पर दिन में सोये से रहते है […] Read more » आज का कवियों की विशेषता चुटकले मुहं लटकाये
कविता हम कोई कृति बनाते है October 22, 2018 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हमने जीवन के धागों को, धड़ी की सुँईं से टाँका है। रोज़ वही दिनचर्या है रोज़ वही निवाले हैं। कभी शब्द बो देते है तो कविता उगने लगती है। कभी कभी शब्दों की खरपतवारों को, उखाज़ उखाड़ के फेंका है। शब्द खिलौने से लगते हैं, मन बहलाते है, कभी हँसी ठिठोली करते हैं, कभी आँख […] Read more » कृति
कविता रावण की गर्जना व सन्देश October 19, 2018 / October 19, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment अबकी बार रावण दशहरे पर आया राम पर गरजा और ऐसे चिल्लाया पहले अपने देश को ठीक कर आओ फिर मुझ पर आकर बाण चलाओ कुम्भकर्ण को यूही बदनाम करते हो छ:महीने सोने का आरोप लगाते हो तुम्हारे नेता तो पांच साल सोते है जब चुनाव होते तो जाग कर आते है अपने इन नेताओ […] Read more » कौशल्या रावण की गर्जना व सन्देश रावण दशहरे
कविता रावण के मन की बात October 18, 2018 / October 18, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment तुम मुझे यू ना जला पाओगे तुम मुझे यू ना भुला पाओगे तुम मुझे हर साल जलाओगे मार कर भी तुम न मार पाओगे जली लंका मेरी,जला मैं भी तुम भी एक दिन जला दिए जाओगे मैंने सीता हरी,हरि के लिये राक्षस कुल की बेहतरी के लिये मैंने प्रभु को रुलाया बन बन में तुम […] Read more » राक्षसों राम रावण के मन की बात सीता हरी हरि
कविता कर के वे प्रगति अग्रगति आत्म कब लिये ! October 18, 2018 / October 18, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | 1 Comment on कर के वे प्रगति अग्रगति आत्म कब लिये ! कर के वे प्रगति अग्रगति, आत्म कब लिये; उर लोक की कला के दर्श, कहाँ हैं किये ! वे अग्रबुद्ध्या मन की झलक, पलक कब रचे; नेत्रों से मन्त्र छिड़के कहाँ, विश्वमय हुए ! है द्रष्ट कहाँ इष्ट भाव, भास्वरी भुवन; कण-कण की माधुरी का रास, भाया कब नयन ! कर के सकाश चिदाकाश, चूर्ण […] Read more » ‘मधु’ घृत पियें जिए भाया कब नयन रास
साहित्य हिन्दी लेखन में मेरी रुचि October 17, 2018 / October 17, 2018 by डॉ. मधुसूदन | 10 Comments on हिन्दी लेखन में मेरी रुचि डॉ. मधुसूदन न प्रवक्ता होता, न हिन्दी लेखन में मैं रुचि लेता. पहले टिप्पणियों में विचार रखा करता था. एक बार प्रवक्ता ने दीर्घ टिप्पणी को ही आलेख बना दिया. तो मुझे साहस हुआ और मैं आलेख भेजने लगा. वर्ष के अंत में प्रवक्ता ने लेखकीय सम्मान दिया, और मेरा उत्साह बढा. जन्मा गुजराती परिवार […] Read more » अर्थवाहिता एवं गुणदर्शक परिषद प्रचुरता संघ