कविता मन का मेला May 28, 2018 by शकुन्तला बहादुर | Leave a Comment मेरे अतीत के आँगन में है,अनगिन सुधियों का मेला । कहाँ कहाँ ये जीवन बीता , कहाँ कहाँ ये है खेला ।। * रंग-बिरंगी लगीं दुकानें , तरह तरह के हैं झूले । उन सब में भटका सा ये मन,अपना सब कुछ भूले ।। * झूले के घोड़े पर बैठा , ये मन सरपट […] Read more » आँगन में कहीं ठहर जाता मेरे अतीत मेले में बिछड़े
कविता प्रतीक्षा में है बहुत कुछ May 26, 2018 / May 26, 2018 by पंखुरी सिन्हा | Leave a Comment हम कभी तो निकलेंगे धर्म के जंजाल से जातियों के मोहजाल से कर्मकांडो के मायाजाल से कि प्रगति सचमुच हमारी राह देखती है— पहुंचेंगे उस तक कभी हम जाने किस सूर्योदय के सुनहले पंख लिए होकर विजित जाने किन अस्मिताओं की कैसी लड़ाइयों में जो उभरती ही रहती हैं निरंतर शान्ति के पटल पर अकारण […] Read more » कर्मकांडो कुछ खेतों जंगलों प्रतीक्षा में है बहुत
कविता उचित अनुचित है अपेक्षित होता ! May 24, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment उचित अनुचित है अपेक्षित होता, बुरों को भी कोई बुरा लगता; अच्छों को अच्छे बहुत से लगते, बुरों को अच्छा कोई है लगता ! देखता सृष्टा सबों को रहता, लख के गुणवत्ता ढालता रहता; अधूरे अध-पके जीव सब हैं, सीखने सुधरने ही आए हैं ! निखरते निरन्तर ही रहना है, मापदण्डों में उसके गढ़ना है; […] Read more » ‘मधु’ टपकाता अपेक्षित होता उचित अनुचित माँगते रहते
कविता पंछियों के मंत्र पाठ से प्रभात, मंगल-प्रभात होता: May 19, 2018 by डॉ. मधुसूदन | Leave a Comment डॉ. मधुसूदन (एक) एक चुनौती भरी कठिन प्रस्तुति: कवि की कल्पना कविकल्पना ही कहलाती है. कवि जो देखता है वो रवि भी नहीं देख सकता. एक ऐसी ही थोडी कठिन कविता प्रस्तुत करता हूँ. कुछ बौद्धिक व्यायाम होगा. पर बिना बौद्धिक व्यायाम वास्तव में मनोरंजन भी संभव नहीं होता. कुछ पाठक तो लाभान्वित होंगे […] Read more » आंँगन आँगनों गुरुकुल वृक्ष-झुण्ड वृक्षों वृक्षों शाख शाख
कविता कर्नाटक का नाटक खत्म नहीं हुआ,अभी और देखना बाकी है May 18, 2018 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on कर्नाटक का नाटक खत्म नहीं हुआ,अभी और देखना बाकी है कर्नाटक का नाटक खत्म नहीं हुआ,अभी और देखना बाकी है अभी तो ट्रेलर देखा है तुमने,पूरी फिल्म अभी देखना बाकी है येदुरप्पा ने अभी शपथ ली है,औरो को शपथ दिलाना बाकी है येदुरप्पा को अभी सदन में,अपना बहुमत सिद्ध करना बाकी है राजनीति में जोड़-तोड़ की हवा चली है,खरीद-फरोख्त बाकी है कुछ एम एल ऐ […] Read more » कर्नाटक नाटक खत्म नहीं बहुमत सिद्ध राजनीति
कविता मिले न जब मन का मीत,मनमीत तुम किसे बनाओगी ? May 18, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment मिले न जब मन का मीत,मनमीत तुम किसे बनाओगी ? मै मीरा बनकर अपने मनमोहन को मनमीत बनाऊँगी जब तोड़ दे कोई ह्रदय तुम्हारा,फिर किसके द्वार तुम जाओगी ? जब तोड़ेगा कोई ह्रदय मेरा,अपने द्वारकाधीश के द्वार जाऊंगी जब मिले न कोई संग-साथ,फिर किसको संगीत सुनाओगी ? जब मिलेगा न कोई संग-साथ,मीरा बनकर भजन सुनाऊंगी […] Read more » अंतिम संस्कार कराओगी ? आंसू बहाओगी मन का मीत मिले न जब विष का प्याला
व्यंग्य लूट सके तो लूट May 16, 2018 by विजय कुमार | 1 Comment on लूट सके तो लूट बचपन में हम लोग प्रायः अंत्याक्षरी खेला करते थे। इसकी शुरुआत कुछ ऐसे होती थी – समय बिताने के लिए करना है कुछ काम शुरू करो अंत्याक्षरी लेकर हरि का नाम। अंत्याक्षरी से कई लाभ थे। जहां एक ओर गर्मी में भीषण लू से बचत होती थी, वहां मनोरंजन और दिमागी कसरत […] Read more » Featured अंत्याक्षरी खाने चाराप्रेमी लालू जी तेजप्रताप रौद्र रूप लूट
कविता माँ ने पूछा,मै आई किसके हिस्से में ? May 15, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment सन्नाटा छा गया बटवारे के किस्से में माँ ने पूछा,मै आई किसके हिस्से में ? कहते है सभी लोग आज माँ का दिन है मै कहता हूँ,कौन सा दिन माँ के बिन है एक अच्छी माँ होती है सभी के पास होती नहीं अच्छी औलाद सभी के पास माँ तो एक सबसे बड़ी नियामत हे […] Read more » औलाद ज़िन्दगी नियामत बहन भाई मां
कहानी साहित्य साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के एक सूर्य का अस्त होना May 14, 2018 by मनोज कुमार | Leave a Comment मनोज कुमार मन आज व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि एक बुर्जुग का साया मेरे सिर से उठ गया है। मेरे जीवन में दो लोग हैं। एक दादा बैरागी और एक मेरे घर से जिनका नाम इस वक्त नहीं लेना चाहूंगा। दोनों की विशेषता यह है कि उनसे मेरा संवाद नहीं होता है लेकिन […] Read more » ‘समागम’ Featured आंखों आंसुओं पत्रकारिता राजनीति साहित्य साहित्यकार डॉ. सरोज कुमार सूर्य अस्त
व्यंग्य जूते के प्रयोग की संभावनाएं May 14, 2018 by विजय कुमार | Leave a Comment यों तो जूता ऐसी चीज है, जिसके बिना काम नहीं चलता। चप्पल, सैंडल, खड़ाऊं आदि इसके ही बिरादर भाई और बहिन हैं। जूते के कई उपयोग हैं। घर के अंदर एक, बाहर दूसरा तो नहाने-धोने के लिए तीसरा। आजकल तो सब गडमगड हो गया है; पर 25-30 साल पहले तक क्या मजाल कोई बिना जूते-चप्पल […] Read more » Benjamin Netanyahu Featured Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu may have insulted Japanese Prime Minister Shinzo with shoe-shaped desert dishes Shinzo जूता चाकलेट जूते के प्रयोग
कविता ‘फिर जुल्फ लहराए’ May 14, 2018 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment ‘फिर जुल्फ लहराए’ फिजा ठंडी हैं कुछ पल बाद ये माहौल गरमाए। कहीं चालाकियाँ ये इश्क में भारी न पड़ जाए। ज़रा सी गुफ्तगू कर लें, बड़े दिन बाद लौटे हो, नज़ाकत हुस्न वालों के ज़रा हालात फरमाए। अहा! क्या खूबसूरत आपने यह रंग पाया हैं, निशा का चाँद गर देखे तो खुद में ही […] Read more » इश्क खूबसूरत ज़ियारत बद्दुआएँ सजदा
गजल कमी है परवरिश में इसलिए मनद्वार ऐसे हैं, May 14, 2018 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment कमी है परवरिश में इसलिए मनद्वार ऐसे हैं, नई कलियाँ मसलते हैं, कई किरदार ऐसे हैं। नहीं जलते वहाँ चूल्हे, यहाँ पकवान हैं ताजा, हमारी भी सियासत के नए हथियार ऐसे हैं। हकीकत जान पाए ना, वहम से ही शिला तोड़ी, यहाँ अच्छे भले से लोग कुछ बीमार ऐसे हैं। सिसक होगी ज़रा सी बस […] Read more » गुलाब चाँद धर्म पुरुष कुंठा बादशाह सिकन्दर महफ़िल शक्ल