पुस्तक समीक्षा पुराने दिनों के गायब होते लोगों के किस्से October 23, 2013 by संजय पराते | Leave a Comment संजय पराते हिन्दी-साहित्य पाठकों के लिए राजेश जोशी जाना-पहचाना नाम है। वे एक साथ ही कवि-कहानीकार-आलोचक-अनुवादक-संपादक सब कुछ हैं। हाल ही में उनकी रचना ‘कि़स्सा कोताह’ (राजकमल प्रकाशन) सामने आयी है। राजेश जोशी के ही अनुसार, न यह आत्मकथा है और न उपन्यास। यह एक गप्पी का रोज़नामचा भर है- जो न कहानी है और […] Read more » किस्सा कोताह
व्यंग्य अक्ल बड़ी या भैंस…. October 15, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment देश भर की भैंसो ने अपना संगठन मज़बूत किया है , उनका कहना है कि वो मनुष्य को गायों से कंहीं ज़्यादा दूध उपलब्ध कराती हैं इसलियें उन्हे भी गायों के बराबर दर्जा और सुविधायें चाहियें इसके लियें उन्होने अलग अलग शहरो मे आंदोलन शुरू कर दिया है। बेचारी भैंसे… आदमी की फितरत नहीं जानती […] Read more »
व्यंग्य अगर आज के समय में रामायण होती तो कैसी खबरे आती … October 15, 2013 / October 15, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 3 Comments on अगर आज के समय में रामायण होती तो कैसी खबरे आती … ● राजा दशरथ ने की श्रवण कुमार की हत्या , FIR दर्ज… ● अयोध्या के राजपाठ को लेके राजा-रानी में विवाद बढ़ा ● केवट द्वारा चरण धुलवाने से मायावती हुई नाराज़ , कहा ये हैं दलितों का अपमान सूर्पनखा की नाक कटाई के विरोध में महिला आयोग का अयोध्या में प्रदर्शन जारी ● राजा दशरथ […] Read more »
लेख हिंद स्वराज हिन्दी कविता में जन्मभूमि-वंदना October 14, 2013 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य हमारे कवियों ने मां भारती के प्रति हर देशवासी को जागरूक बनाये रखने हेतु समय-समय पर देशभक्ति और जन्मभूमि के प्रति समर्पण का भाव भरने हेतु प्रशंसनीय कार्य किया है। उनके कार्यों की वंदना यह लेखनी यूं कर सकती है :- धन्य उनकी लेखनी और धन्य उनके कार्य, हमको सदा बताते रहे […] Read more » हिन्दी कविता में जन्मभूमि-वंदना
कविता घनश्याम काका October 14, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment घनश्याम काका को, बहुत शिकायत हैं, अपने बेटे बहू से, शिकायतों की पूरी लिस्ट है जिसे, वो हर आये गये से शेयर करते हैं, जैसे ‘’मेरे पास बैठने का किसी के पास वख़्त नहीं है, मेरी दवाइयाँ कोई समय पर लाकर नहीं देता, ठंडा खाना खाना पड़ता है वगैरह वगैरह बच्चो की पढ़ाई की वजह […] Read more » घनश्याम काका
व्यंग्य मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो October 14, 2013 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन जब कृष्ण कन्हैया के मुख पर मक्खन लगा देख यशोदा पूछती है तो बाल गोपाल कहते हैं , ‘‘ मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो । ग्वाल बाल सब बैर पड़े हैं बरबस मुख लिपटायो ।’’ और मॉं यशोदा , यह मानकर कि चलो खाने पीने की चीज है , इधर उधर […] Read more »
कविता हिमालय के इस आँगन में October 14, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment हिमालय के इस आँगन में उषा की प्रथम किरणे अभिनन्दन करती हुई हिम से ढके पर्वतों को सफ़ेद मोतियों से पिरोती हुई श्यामल नभ में छोटे छोटे बादल के कण हिम पर्वतों को चादर सी ढकती हुई मदमस्त हो रही हैं धीरे धीरे पहाड़ियां आती जाती घटाओं में बर्फीली हावाओं में कुछ बारिश की बूदें […] Read more »
लेख जयप्रकाश बाबू होते तो इन समाजवादी नेताओं को देखकर फूट फूट कर रोते। October 12, 2013 / October 14, 2013 by जितेन्द्र ज्योति | Leave a Comment जितेन्द्र ज्योति ‘‘संपूर्ण क्रांति अब नारा है,भावी इतिहास हमारा है‘‘ कौन दिया था यह नारा ? 1974 में जेपी के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति की ज्योति बिहार में जल रही थी। इसी ज्योति में कई छात्र नेता नेतागिरी का ककहरा सीखने में लगे थे। ककहरा सीखने में लालू यादव सबसे आगे थे। पटना विश्वविद्यालय में […] Read more »
कविता चाँद तारे October 12, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बीनु भटनागर चाँद ने थोड़ी सी रौशनी, सूरज से उधार लेकर, हर रात को थोड़ी थोड़ी बाँट दी। अमावस की रात तारों ने, चाँद के इंतज़ार मे, जाग कर गुजार दी। अगले दिन चाँद निकला, थका सा पतला सा, तारों ने चाँद की, आरती उतार ली। ‘’महीने मे एक बार लुप्त होना, मजबूरी है मेरी, […] Read more » चाँद तारे
कविता कविता : जीवन का हिसाब October 12, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा तुमसे बेहतर तुम्हें जाने कौन मुझसे बेहतर मुझे जाने कौन लोग कहें न कहें मानें न मानें जानें न जानें पहचानें न पहचानें क्या फर्क पड़ेगा जैसे हम हैं वैसे हम हैं जैसा आगे करेंगे वैसा ही बनेंगे सच है, झूठ से सच कैसे साबित करेंगे गलत तरीके से जब जोड़ेंगे संपत्ति […] Read more » कविता : जीवन का हिसाब
राजनीति व्यंग्य एक पाती – लालू भाई के नाम October 10, 2013 / October 10, 2013 by विपिन किशोर सिन्हा | 1 Comment on एक पाती – लालू भाई के नाम आदरणीय लालू भाई, जै राम जी की। हम इहां राजी-खुशी से हैं। उम्मीद करते हैं कि आप भी रांची जेल में ठीकेठाक होंगें। ई सी.बी.आई का जजवा बउरा गया था क्या? ई बात उसका दिमाग में काहे नहीं घुसा कि आदमी जानवर का चारा कैसे खा सकता है? जानवर आदमी का चारा हज़म कर […] Read more »
व्यंग्य दास्तान-ए-सुविधा शुल्क October 10, 2013 / October 10, 2013 by एम. अफसर खां सागर | 1 Comment on दास्तान-ए-सुविधा शुल्क एम. अफसर खां सागर शर्मा जी को हमे शा कसक रहता कि वे सरकारी मुलाजिम न हुए। जब भी हमारे यहां उनकी आमद होती, बस एक ही रट लगाते। भाई साहब… काश! मैं भी सरकारी मुलाजिम होता। मेरे पास भी आलीशान बंगला, ए.सी. कार व रूपये का भण्डार होता। चाश्नीदार पकवान, रेमण्ड के सूट ,रीबाक […] Read more » सुविधा शुल्क