व्यंग्य डौडियाखेड़ा से लौटकर November 10, 2013 / November 10, 2013 by विजय कुमार | 3 Comments on डौडियाखेड़ा से लौटकर हमारे प्रिय शर्मा जी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। कभी उनके भीतर का कवि जाग उठता है, तो कभी अभिनेता। कभी वे समाजसेवी बन जाते हैं, तो कभी पाकशास्त्री। इन दिनों उनके मन में छिपे पत्रकारिता के कीटाणु प्रबल हैं। वे हर घटना और दुर्घटना का एक अनुभवी और सिद्ध पत्रकार की तरह विश्लेषण करने लगते […] Read more » डौडियाखेड़ा से लौटकर
महत्वपूर्ण लेख साहित्य कश्मीर की देशभक्ति ने दो बार धूल चटाई थी महमूद गजनवी को November 7, 2013 by राकेश कुमार आर्य | 1 Comment on कश्मीर की देशभक्ति ने दो बार धूल चटाई थी महमूद गजनवी को राजाओं की गौरवपूर्ण श्रंखला से कश्मीर का इतिहास भरा पड़ा है। जब हम कश्मीर के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों का अवलोकन करते हैं तो ज्ञात होता है कि भारतीय संस्कृति को अपनी गौरव-गरिमा से लाभान्वित करने में कश्मीर के राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान किया। चूंकि यह योगदान अब से 1000 वर्ष पूर्व या उससे भी […] Read more » कश्मीर की देशभक्ति
कविता स्मृतियाँ November 7, 2013 / November 7, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बीनू भटनागर समृति के जब जुड गये तार, पंहुच गये कई वर्षो पार। मां की ममता कभी मनुहार, कभी कड़कती हुई फटकार। बचपन की वो भोली यादें, कभी यौवन की बिसरी बातें। सखी सहेलियों की बारातें, चुपके चुपके मनकी बातें। सुख समृद्दि वाले दिन रात, या दुख की जब हुई बरसात। ये जीवन चलचित्र समान, […] Read more »
महत्वपूर्ण लेख साहित्य हिन्दू ध्वजवाहक कश्मीर के वो गौरवशाली हिन्दू शासक November 5, 2013 by राकेश कुमार आर्य | 2 Comments on हिन्दू ध्वजवाहक कश्मीर के वो गौरवशाली हिन्दू शासक कश्मीर के गौरवशाली हिंदू इतिहास के विषय में हमने पिछले लेखों में सूक्ष्म सा प्रकाश डाला था। अब पुन: कश्मीर की उस केसर को इतिहास के गौरव पृष्ठों पर खोजने का प्रयास करते हैं, जिसकी सुगंध ने इस स्वर्गसम पवित्र पंडितों की पावन भूमि को भारतीय इतिहास के लिए श्लाघनीय कार्य करने के लिए प्रेरित […] Read more » गौरवशाली हिन्दू शासक
कहानी दीवाली के तीन दीये November 3, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment ख्वाजा अहमद अब्बास उस स्त्री ने कहा, ”मैं यहां तुम लोगों के पास रहती हूं… मैं इन खेतों के पास रहती हूं, जहां लक्खू भैया के बाबा अनाज उगाया करते थे और मैं उस कारखाने में भी रहती हूं, जहां लक्खू भैया मशीनों से कपड़ा बुनते हैं। जहां इंसान अपनी मेहनत से अपनी जरूरतें पैदा […] Read more »
कविता कविता : दीप जलाएँ November 2, 2013 by हिमकर श्याम | 1 Comment on कविता : दीप जलाएँ दिल से दिल के दीप जलाएँ मानव-मानव का भेद मिटाएँ दिल से दिल के दीप जलाएँ आंसू की यह लड़ियाँ टूटे खुशियों की फुलझड़ियाँ छूटे शोषण, पीड़ा, शोक भुलाएँ कितने दीप जल नहीं पाते कितने दीप बुझ बुझ जाते दीपक राग मिलकर गाएँ बाहर बाहर उजियारा है भीतर गहरा अंधियारा है […] Read more »
व्यंग्य खोदा पहाड़ और निकली चुहिया October 30, 2013 / October 30, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment 1000 टन सोने की तलाश मे खुदाई शुरू की गई थी और हाथ लगीं कुछ काँच की चूड़ियाँ, लोहे की कीलें पत्थर के छोटे से शेर,मिट्टी चीज़े और कुछ बीड़्स। अब पुरातत्व विभाग ने इतना खोज लिया काफी है, अब होता रहेगा इन पर शोध पर सोना तो एक ग्राम भी नहीं मिला जिसका सपना […] Read more » खोदा पहाड़ और निकली चुहिया
गजल तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती October 30, 2013 by सत्येन्द्र गुप्ता | 1 Comment on तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती सत्येंद्र गुप्ता तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती वक़त के हाथ की शमशीर नहीं बदलती। मैं ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी तलाशता रहा ज़िन्दगी , अपनी ज़ागीर नहीं बदलती। कितने ही पागल हो गये ज़ुनूने इश्क़ में मुहब्बत अपनी तासीर नहीं बदलती। प्यार ,वफ़ा,चाहत ,दोस्ती व आशिक़ी इन किताबों की तक़रीर नहीं बदलती। अपनी खूबियाँ, मैं किस के साथ बाटूं अपनों के ज़िगर की […] Read more » तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती
व्यंग्य व्यंग्य/ कुर्सी का व्यावहारिक पक्ष October 29, 2013 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ कुर्सी का व्यावहारिक पक्ष अषोक गौतम हे स्वर्गवासियो ! मेरा देश एक कुर्सी प्रधान देश है। वैसे तो यहां पर अनादि काल से कुर्सी की जय जयकार होती रही है लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से इस देष में कुर्सी की पूजा ईश्वर से अधिक होने लगी है। कुर्सी के प्रति तुच्छ से तुच्छ जीवों के इस लगाव को […] Read more »
व्यंग्य एक और सीक्वल October 26, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment ये मेरा तीसरा सीक्वल है। सबसे पहले मैंने एक गंभीर विषय पर लेख लिखा था ‘हिन्दी किसकी है?’ उसका सीक्वल था ‘‘हिन्दी सबकी है’’।‘’कवि और कल्पना’’ व्यंग लिखने के बाद ‘’कवि और कल्पना -2’’ भी लिखा। ‘आजकल सीक्वल फिल्मों की बाढ सी आगई है इसलिये मैंने सोचा अपने व्यंग ’तुम्हारा नाम क्या है?’’, जो बहुत […] Read more » एक और सीक्वल
महत्वपूर्ण लेख साहित्य ‘काश! इतिहास हमारे अवगुणों में भी ‘इतिहास’ खोजता’ October 25, 2013 / October 25, 2013 by राकेश कुमार आर्य | 1 Comment on ‘काश! इतिहास हमारे अवगुणों में भी ‘इतिहास’ खोजता’ मनुष्य के वैभव काल में उसके ‘सदगुण’ उसकी ढाल बनते हैं, जो हर प्रकार की आपदा से उसकी रक्षा करते हैं। परंतु पराभव काल में वही सदगुण उस व्यक्ति की विकृति बन जाते हैं। स्वातंत्रय वीर सावरकर ने ‘सद्गुण विकृति’ की इस रहस्यमयी पहेली को भारतीय इतिहास के संदर्भ में बड़ी सावधानी और विवेकशीलता से […] Read more » अवगुणों में भी 'इतिहास’ खोजता’
व्यंग्य व्यंग्य बाण : बंदर जी के तीन गांधी October 24, 2013 by विजय कुमार | 2 Comments on व्यंग्य बाण : बंदर जी के तीन गांधी विजय कुमार शर्मा जी ऊपर से चाहे जो कहें; पर सच यह है कि दिल्ली में रहने के बावजूद गांधी जी की समाधि पर जाने में उनकी कोई रुचि नहीं है। वे साफ कहते हैं कि जब मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हूं, तो फिर दिखावा क्यों करूं ? पर इस दो अक्तूबर को […] Read more »