व्यंग्य मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो October 14, 2013 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन जब कृष्ण कन्हैया के मुख पर मक्खन लगा देख यशोदा पूछती है तो बाल गोपाल कहते हैं , ‘‘ मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो । ग्वाल बाल सब बैर पड़े हैं बरबस मुख लिपटायो ।’’ और मॉं यशोदा , यह मानकर कि चलो खाने पीने की चीज है , इधर उधर […] Read more »
कविता हिमालय के इस आँगन में October 14, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment हिमालय के इस आँगन में उषा की प्रथम किरणे अभिनन्दन करती हुई हिम से ढके पर्वतों को सफ़ेद मोतियों से पिरोती हुई श्यामल नभ में छोटे छोटे बादल के कण हिम पर्वतों को चादर सी ढकती हुई मदमस्त हो रही हैं धीरे धीरे पहाड़ियां आती जाती घटाओं में बर्फीली हावाओं में कुछ बारिश की बूदें […] Read more »
लेख जयप्रकाश बाबू होते तो इन समाजवादी नेताओं को देखकर फूट फूट कर रोते। October 12, 2013 / October 14, 2013 by जितेन्द्र ज्योति | Leave a Comment जितेन्द्र ज्योति ‘‘संपूर्ण क्रांति अब नारा है,भावी इतिहास हमारा है‘‘ कौन दिया था यह नारा ? 1974 में जेपी के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति की ज्योति बिहार में जल रही थी। इसी ज्योति में कई छात्र नेता नेतागिरी का ककहरा सीखने में लगे थे। ककहरा सीखने में लालू यादव सबसे आगे थे। पटना विश्वविद्यालय में […] Read more »
कविता चाँद तारे October 12, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बीनु भटनागर चाँद ने थोड़ी सी रौशनी, सूरज से उधार लेकर, हर रात को थोड़ी थोड़ी बाँट दी। अमावस की रात तारों ने, चाँद के इंतज़ार मे, जाग कर गुजार दी। अगले दिन चाँद निकला, थका सा पतला सा, तारों ने चाँद की, आरती उतार ली। ‘’महीने मे एक बार लुप्त होना, मजबूरी है मेरी, […] Read more » चाँद तारे
कविता कविता : जीवन का हिसाब October 12, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा तुमसे बेहतर तुम्हें जाने कौन मुझसे बेहतर मुझे जाने कौन लोग कहें न कहें मानें न मानें जानें न जानें पहचानें न पहचानें क्या फर्क पड़ेगा जैसे हम हैं वैसे हम हैं जैसा आगे करेंगे वैसा ही बनेंगे सच है, झूठ से सच कैसे साबित करेंगे गलत तरीके से जब जोड़ेंगे संपत्ति […] Read more » कविता : जीवन का हिसाब
राजनीति व्यंग्य एक पाती – लालू भाई के नाम October 10, 2013 / October 10, 2013 by विपिन किशोर सिन्हा | 1 Comment on एक पाती – लालू भाई के नाम आदरणीय लालू भाई, जै राम जी की। हम इहां राजी-खुशी से हैं। उम्मीद करते हैं कि आप भी रांची जेल में ठीकेठाक होंगें। ई सी.बी.आई का जजवा बउरा गया था क्या? ई बात उसका दिमाग में काहे नहीं घुसा कि आदमी जानवर का चारा कैसे खा सकता है? जानवर आदमी का चारा हज़म कर […] Read more »
व्यंग्य दास्तान-ए-सुविधा शुल्क October 10, 2013 / October 10, 2013 by एम. अफसर खां सागर | 1 Comment on दास्तान-ए-सुविधा शुल्क एम. अफसर खां सागर शर्मा जी को हमे शा कसक रहता कि वे सरकारी मुलाजिम न हुए। जब भी हमारे यहां उनकी आमद होती, बस एक ही रट लगाते। भाई साहब… काश! मैं भी सरकारी मुलाजिम होता। मेरे पास भी आलीशान बंगला, ए.सी. कार व रूपये का भण्डार होता। चाश्नीदार पकवान, रेमण्ड के सूट ,रीबाक […] Read more » सुविधा शुल्क
कविता भारती का भाल October 10, 2013 by अनिल सैनी ‘अनि’ | 3 Comments on भारती का भाल भारती के भाल को लज्जा रहा है देश क्यों ? बेटों के शिश मुण्ड को देख कर भी चुप है क्यों ? क्यों मुख अब रक्तलाल नहीं, क्या वीरों के रक्त में उबाल नहीं ? क्यों बार-बार विवश है हम, क्या हम में स्वाभिमान नहीं ? अब छोड दो खुला इन रणबाकुरों कों, इन्हे मदमस्त […] Read more » भारती का भाल -
राजनीति व्यंग्य व्यंग्य बाण : आगे अम्मा की मरजी October 9, 2013 by विजय कुमार | Leave a Comment पिछले दिनों कई साल बाद एक घरेलू कार्यक्रम में गांव जाने का अवसर मिला। बहुत दिन बाद गया था, अतः पुराने संबंध और यादें ताजा करने के लिए मैं कुछ दिन और रुक गया। एक दिन मैं अपने पुराने मित्र चंपकलाल के घर बैठा गप लड़ा रहा था, तभी वहां एक अधेड़ महिला प्रेस के […] Read more » व्यंग्य बाण : आगे अम्मा की मरजी
प्रवक्ता न्यूज़ साहित्य सेकुलरिज्म का श्रेय हिंदुओं को: विभूति नारायण राय October 9, 2013 / October 9, 2013 by सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी | 9 Comments on सेकुलरिज्म का श्रेय हिंदुओं को: विभूति नारायण राय “हिंदुस्तान का बँटवारा मुस्लिम कौम के लिए एक अलग मुल्क की मांग के कारण हुआ। मुसलमानों ने अपने लिए पाकिस्तान चुन लिया। उस समय यह बहुत संभव था कि हिंदू भारतवर्ष में हिंदूराष्ट्र की स्थापना करने की मांग करते और जिस प्रकार पाकिस्तान से हिंदुओं को भगा दिया गया उसी प्रकार यहाँ से मुसलमानों को […] Read more »
लेख मौलिकता में समायी है सृजन की सुगंध October 8, 2013 by डॉ. दीपक आचार्य | Leave a Comment मौलिकता में समायी है सृजन की सुगंध बाकी सब शब्दों का आडम्बरी व्यापार – डॉ. दीपक आचार्य सृजन अपने आप में विराटकाय और व्यापक अर्थ लिए हुए है। इस शब्द का संबंध मन के विचारों से लेकर सृष्टि के मूर्तमान स्वरूप तक को परिभाषित करने का सामथ्र्य रखता है। यह सृजन जहां है वहाँ सकारात्मक […] Read more » मौलिकता में समायी है सृजन की सुगंध
कविता कविता : खिलौना October 8, 2013 / October 8, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ एक बार फिर खून से रंगे पड़े हैं दर्जनभर दबे-कुचले लोगों को मारकर आधे दर्जन दबंग असलहों के साथ सैकड़ों मूक दर्शकों के सामने निकल पड़े हैं वीर ( ? ) बने राजनीतिक बयानबाजी का टेप बजने लगा है अनवरत इधर, सत्ता प्रतिष्ठान की आँखों से बह निकली […] Read more » कविता : खिलौन