व्यंग्य साहित्य रजनी कान्त बर्खास्त : रजनी कान्त का कार्यभार नरेंद्र को सौंपा गया June 25, 2013 / July 19, 2013 by अरुण कान्त शुक्ला | 37 Comments on रजनी कान्त बर्खास्त : रजनी कान्त का कार्यभार नरेंद्र को सौंपा गया ईश्वर ने रजनीकान्त को बर्खास्त कर दिया है| अब रजनीकांत वो सारे कार्य नहीं कर पायेगा, जो ईश्वर भी नहीं कर पाता था| केदार बाबा से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बता गया है की ईश्वर से भी नहीं बन पाने वाले कार्यों को करने के लिए अब भगवान जपो आन्दोलन के प्रचारमंत्री और गुजरात में […] Read more » रजनी कान्त बर्खास्त : रजनी कान्त का कार्यभार नरेंद्र को सौंपा गया
दोहे साहित्य बस माँगे अधिकार June 25, 2013 by श्यामल सुमन | Leave a Comment कैसे कैसे लोग से भरा हुआ संसार। बोध नहीं कर्त्तव्य का बस माँगे अधिकार।। कहने को आतुर सभी पर सुनता है कौन। जो कहने के योग्य हैं हो जाते क्यों मौन।। आँखों से बातें हुईं बहुत सुखद संयोग। मिलते कम संयोग यह जीवन का दुर्योग।। मैं अचरज से देखता बातें कई नवीन। […] Read more » बस माँगे अधिकार
कविता साहित्य नारी June 25, 2013 by कुमार विमल | Leave a Comment प्रभु की अनुपम कृति , अनुपम रचना,वह है नारी, सो जब रचा था प्रभु ने इस कृति को, सोचा सब अर्पण कर दूँ , इसकी खाली आँचल को खुशियों से भर दूँ । सो दिया उन्होंने रूप रंग,सोंदेर्ये , वह सामर्थ ओंर सहनशीलता वह अतुलनीय नारी शक्ति । प्रभु को गर्व हुआ अपनी इस कृति […] Read more » नारी
कविता कविता – शहर का आदमी June 24, 2013 / June 24, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment मैं कागज काला करता रहा कि पानी खतरे के निशान पार कर रहा है लोगों ने पढ़ा किसी के चेहरे लटक गये कोई तनावग्रस्त हो गया कोई ढूँढने लगा सर छुपाने की जगह कुछ ऐसे भी थे पढ़कर फेंक दिया कूड़ेदान में और सो गया पाँव पसारकर बड़े इत्मिनान के साथ । मैं बार-बार लिखता […] Read more » कविता - शहर का आदमी
कविता वृद्ध- कुमार विमल June 24, 2013 / June 24, 2013 by कुमार विमल | 1 Comment on वृद्ध- कुमार विमल वह गुमनाम सा अँधेरा था , और वहाँ वह वृद्ध पड़ा अकेला था , वह बेसहाय सा वृद्ध वह असहाय सा वृद्ध , वह लचार सा वृद्ध । आज चारो तरफ मला था , पर वह वृद्ध अकेला था , चारो तरफ यौवन की बहार थी , पर वहाँ वृद्धावस्था की पुकार थी , […] Read more » वृद्ध वृद्ध- कुमार विमल
कविता रक्स करतीं थालियां June 24, 2013 by डा.राज सक्सेना | Leave a Comment डा. राज सक्सेना पी सुरा को मस्त होकर, मस्त फिरतीं प्यालियां | बैंगनों के घर में गिंरवीं, रक्स करतीं थालियां | कौरवों की भीड़, आंखें बन्द कर चलती मिली, नग्नतम् सड़कों पे खुलकर, चल रहीं पांचालियां | एक अच्छी व्यंग्य कविता,को समझ पाए न लोग, एक हज़ल पर देर तक, बजती रही थीं तालियां | […] Read more » रक्स करतीं थालियां
गजल साहित्य किसी को उस ने कबीरा बना दिया June 22, 2013 by सत्येन्द्र गुप्ता | 1 Comment on किसी को उस ने कबीरा बना दिया किसी को उस ने कबीरा बना दिया किसी को कृष्ण की मीरा बना दिया ! उसकी रहमतों का मै जिक्र क्या करूं मैं कांच का टुकड़ा था हीरा बना दिया ! किसी को खुशियों की सौगात दे दी किसी को दर्द का जज़ीरा बना दिया ! धूप और बारिश की दरकार जब हुई आसमा को […] Read more » किसी को उस ने कबीरा बना दिया
कहानी साहित्य “एक सौ नवासी का कफन” June 22, 2013 / June 22, 2013 by सेराज खान 'जासम' | 1 Comment on “एक सौ नवासी का कफन” जून का महीना था, सुबह के दस बजे होंगे| हवाओं मे इतनी गर्माहट थी मानो भट्टे से गर्म करके भेजी जा रही हो| खिड़की के सामने की दीवार पे एक पुरानी तस्वीर लगी थी तस्वीर दो कील वाली थी जिसकी एक कील गिर गयी है और तस्वीर एक कील पे दोलन गति कर रही थी| […] Read more » “एक सौ नवासी का कफन”
गजल साहित्य आँसू को शबनम लिखते हैं June 22, 2013 by श्यामल सुमन | 5 Comments on आँसू को शबनम लिखते हैं जिसकी खातिर हम लिखते हैं वे कहते कि गम लिखते हैं आस पास का हाल देखकर आँखें होतीं नम, लिखते हैं उदर की ज्वाला शांत हुई तो आँसू को शबनम लिखते हैं फूट गए गलती से पटाखे पर थाने में बम लिखते हैं प्रायोजित रचना को कितने हो करके बेदम लिखते हैं चकाचौंध में रहकर भी […] Read more » आँसू को शबनम लिखते हैं
कविता साहित्य कुत्तों को बिस्किट June 22, 2013 by डा.राज सक्सेना | 1 Comment on कुत्तों को बिस्किट खिलवाते कुत्तों को बिस्किट, लाखों भूखे सो जाते हैं | जनता के पैसे से नेता, जीवन भर मौज उड़ाते हैं | भारत में भूखे-नंगों को, दे नहीं पा रहे पानी तक , पाकिस्तानी जल प्लावन में, लाखों डालर दे आते हैं | घर अपना सिंगल कमरे का,सूनी आँखों का सपना है, मंत्री जी पच्चिस लाख […] Read more » कुत्तों को बिस्किट
कविता साहित्य हैरान कर देंगे June 21, 2013 by डा.राज सक्सेना | 2 Comments on हैरान कर देंगे कोई जीते कोई हारे, ये सब हैरान कर देंगे | मतों के दान के बदले, क़हर प्रतिदान कर देंगे | जो हारेंगे वे भरपाई, करेंगे लूट जनता को, जो जीतेंगे वसूली का , खुला मैदान कर देंगे | करेंगे क्षेत्र को विकसित,ये कहते हैं हमेशा सब, जहां मौका मिला,परिवार का उत्थान कर देंगे | कहा […] Read more » हैरान कर देंगे
व्यंग्य साहित्य वरिष्ठ जाड़ का दर्द June 21, 2013 by जगमोहन ठाकन | 4 Comments on वरिष्ठ जाड़ का दर्द पिछले कुछ दिनों से ‘‘वरिष्ठ जाड़ ’’ की सन्सटीविटी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी । ठण्डा खाओ तो दर्द,गर्म खाओ तो दर्द । इतनी भारी भरकम गर्मी में शरीर कहता है कि कुछ ठण्डा पिया जाये वर्ना डिहाइडरेसन का खतरा बढ़ जाता है । जीभ कहती है कि कुछ कूल-कूल हो जाये । पर […] Read more » वरिष्ठ जाड़ का दर्द