गजल साहित्य तेरे जाने के बाद ही शाम हो गई June 11, 2013 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment तेरे जाने के बाद ही शाम हो गई शब् पूरी अंधेरों के नाम हो गई ! मैक़दे की तरफ बढ़ चले क़दम ज़िंदगी ही फिर जैसे ज़ाम हो गई ! आँखों से आंसु बन बह गया दर्द उम्मीद मेरी मुझ पे इल्ज़ाम हो गई ! वक्त का फिर कभी पता नहीं चला रफ़्ता रफ़्ता उम्र […] Read more » तेरे जाने के बाद ही शाम हो गई
कविता साहित्य रोटी June 11, 2013 / June 11, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment ये वही हाथ है जिन्होंने आन्दोलन चलाया था अंग्रेजों के विरुद्ध हमनें उतारा था यूनियन जैक और लहराया था अपना प्यारा तिरंगा । ये वही हाथ है जिन्होंने पैदा किया देश के लिए हरित क्रांति और बुलन्द किया था जय जवान, जय किसान का नारा । ये वही हाथ है जिसने नाम बुलन्द […] Read more » रोटी
कविता साहित्य कैसा यह चलन June 11, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment कैसा है यह चलन हर तरफ जलन ही जलन पद से बढ़ा रहें हैं लोग अपना अपना कद हो रही है खूब आमद और खूब खुशामद रहते हैं पूरा लक – दक पद का ऐसा है मद नहीं मानते आजकल कोई भी हद भले ही बीच में क्यों न पिट जाए भद ज्ञानी जन कहते […] Read more » कैसा यह चलन
कविता कांच के टुकड़े June 10, 2013 / June 10, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on कांच के टुकड़े कांच के टूटने की आवाज़ बहुत बार सुनी थी, पर “वह” एक बार मेरे अन्दर जब चटाक से कुछ टूटा वह तुमको खो देने की आवाज़, वह कुछ और ही थी ! केवल एक चटक से इतने टुकड़े ? इतने महीन ? यूँ अटके रहे तब से कल्पना में मेरी, चुभते रहे हैं तुम्हारी हर याद में मुझे। अब हर सोच तुम्हारी वह कांच लिए, कुछ भी करूँ, […] Read more » poem by vijay nikor कांच के टुकड़े
कविता आज जब बादल छाए June 10, 2013 / June 10, 2013 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on आज जब बादल छाए कैसे होगा बादल कभी और नीचे और बरस जायेगा , फुहारों और छोटी बड़ी बूंदों के बीच मैं याद करूँगा तुम्हे और तुम भी बरस जाना . .(२)…………………………………………….. कुछ बूंदों पर लिखी थी तुम्हारी यादें जो अब बरस रही है , सहेज कर रखी इन बूंदों पर से नहीं धुली तुम्हारी स्मृतियाँ न ही नमी […] Read more » आज जब बादल छाए
कविता चाँदनी June 10, 2013 / June 10, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on चाँदनी धूँधट हटाकर बादलों का चाँद ने, धरती को देखा तो लगी वो झूमने, खिले हैं फूल और छिटकी हुई है चाँदनी, पवन के वेग से उड़ती हुई है औढ़नी। सुरीली तान छेड़ी बाँसुरी पर, सजे सपने पलक पालकी पर, झंकार वीणा की मधुर है रागिनी, ढोल की थाप पर है लय बाँधनी। […] Read more » poem by binu bhatnagar ji चाँदनी
कविता साहित्य चक्रव्यूह June 8, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment दुनिया तो है एक मेला पर, देखिये इस मेले में आदमी कितना है अकेला . घिरा है भीड़ से पर, कैसे खोजें अपनों को अजनबियों के बीच से . भीड़ समस्याओं की भी लगी है चारों ओर . हर तरफ है शोर ही शोर . समस्याओं के एक चक्रव्यूह से निकलते ही , दूसरे में […] Read more » चक्रव्यूह
दोहे साहित्य मँहगी रोटी – सस्ती कार June 8, 2013 / June 8, 2013 by श्यामल सुमन | Leave a Comment सोने की चिड़िया कभी, अपना भारत देश। अब के जो हालात हैं, सुमन हृदय में क्लेश।। मँहगी रोटी हो रही, लेकिन सस्ती कार। यही प्रगित की माप है, समझाती सरकार।। भूखे हैं बहुजन यहाँ, उनके छत आकाश। संकट में सब खो रहे, जीने का विश्वास।। देख क्रिकेटर को मिले, रुपये कई करोड़। […] Read more » मँहगी रोटी - सस्ती कार
कविता साहित्य श्रंगार रस के कवि June 8, 2013 / June 8, 2013 by बीनू भटनागर | 3 Comments on श्रंगार रस के कवि मित्र एक कविता लिखें, चित्र भी संग चिपकायें, चित्र देख कविता लिखें, या लिखकर गूगल पर जायें। शब्द जाल ऐसा बिछायें, हम उलझ उलझ रह जायें। श्रँगार मिलन की वेला मे हवा मे ख़ुशबू उड़ायें। सूखे पत्तो से भी , कवि उनकी आहट पाँयें। दूजे मित्र कविता लिखें, समय के घाव बतायें, विरह की […] Read more » श्रंगार रस के कवि
दोहे साहित्य रीति बहुत विपरीत June 7, 2013 / June 7, 2013 by श्यामल सुमन | Leave a Comment जीवन में नित सीखते, नव-जीवन की बात। प्रेम कलह के द्वंद में, समय कटे दिन रात।। चूल्हा-चौका सँग में, और हजारो काम। डरते हैं पतिदेव भी, शायद उम्र तमाम।। झाड़ू, कलछू, बेलना, आलू और कटार। सहयोगी नित काज में, और कभी हथियार।। जो ज्ञानी व्यवहार में, करते बाहर प्रीत। घर में अभिनय […] Read more » रीति बहुत विपरीत
दोहे जैसे मैं उसके लिए मर गया June 7, 2013 / June 7, 2013 by भारत भूषण | Leave a Comment जैसे मैं उसके लिए मर गया, वैसे वो मेरे लिए मर गया ! पर सवाल इंसानियत का है, जो दोनों के दिलों में मर गया !! बिछड़े रिश्ते, नसतर की तरह होते हैं, जिक्र होते ही आखों में छलक आते हैं!! मलाल दोनों को है मगर, एहसास दोनों का मर गया!! भारत भूषण Read more » जैसे मैं उसके लिए मर
कविता साहित्य मंदिर जाता भेड़िया June 6, 2013 / June 6, 2013 by श्यामल सुमन | Leave a Comment शेर पूछता आजकल, दिया कौन यह घाव। लगता है वन में सुमन, होगा पुनः चुनाव।। गलबाँही अब देखिये, साँप नेवले बीच। गद्दी पाने को सुमन, कौन ऊँच औ नीच।। मंदिर जाता भेड़िया, देख हिरण में जोश। साधु चीता अब सुमन, फुदक रहा खरगोश।। पीता है श्रृंगाल अब, देख सुराही नीर। थाली में खाये सुमन, कैसे […] Read more » मंदिर जाता भेड़िया