व्यंग्य शहर में लगे ‘कर्फ्यू’ की वजह…? June 6, 2013 / June 6, 2013 by डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी | 1 Comment on शहर में लगे ‘कर्फ्यू’ की वजह…? शहर में ‘कर्फ्यू’ लग ही गया। ‘कर्फ्यू’ की अवधि में शहरवासियों का साँस लेना दूभर हो गया था। बूटो की खट खटाहट से शहर के वासिन्दे सहमे-सहमें मनहूस ‘कर्फ्यू’ से छुटकारा पाने की सोच रहे थे। शहर के ‘कर्फ्यू ग्रस्त’ इलाके में हर जाति/धर्म के लोग रहते हैं, सभी के लिए ‘कर्फ्यू’ कष्टकारी रहा, लेकिन […] Read more » शहर में लगे ‘कर्फ्यू’ की वजह...?
कविता साहित्य सोना हो चाहत अगर June 5, 2013 by श्यामल सुमन | 1 Comment on सोना हो चाहत अगर सोना हो चाहत अगर, सोना हुआ मुहाल। दोनो सोना कब मिले, पूछे सुमन सवाल।। खर्च करोगे कुछ सुमन, घटे सदा परिमाण। ज्ञान, प्रेम बढ़ते सदा, बाँटो, देख प्रमाण।। अलग प्रेम से कुछ नहीं, प्रेम जगत आधार। देख सुमन ये क्या हुआ, बना प्रेम बाजार। प्रेम त्याग अपनत्व से, जीवन हो अभिराम। बनने से पहले लगे, […] Read more » सोना हो चाहत अगर
व्यंग्य साहित्य थानेदार ढिल-ढिल पाण्डेय का अपना स्टाइल June 5, 2013 / June 6, 2013 by डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी | Leave a Comment पुरानी बात है जिले के एक थाना क्षेत्र में चोरियों की बाढ़ आ गई थी। जिससे आम आदमी की नींद हराम हो गई थी। जिले के आला अफसरों से लेकर पुलिस महकमें के सूबे स्तरीय अधिकारी इसको लेकर काफी चिन्तित थे। यह उस समय की बात है जब सूबे के पुलिस महकमें का मुखिया आई.जी. […] Read more » थानेदार ढिल-ढिल पाण्डेय का अपना स्टाइल
व्यंग्य साहित्य सांप और सीढ़ी June 5, 2013 by विजय कुमार | Leave a Comment परसों शर्मा जी के घर गया था। वहां उनसे गपशप का सुख तो मिलता ही है, कभी-कभी शर्मा मैडम के हाथ की गरम चाय भी मिल जाती है; लेकिन परसों शर्मा मैडम घर में नहीं थीं, इसलिए चाय की इच्छा अधूरी रह गयी। तभी शर्मा जी ने बताया कि उनके पड़ोस में एक नये किरायेदार […] Read more » सांप और सीढ़ी
कविता साहित्य सन्नाटा June 5, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on सन्नाटा कभी कभी एक सन्नाटा, छा जाता है, भीतर ही भीतर, तब कोई आहट , कोई आवाज़, बेमानी सी हो जाती है। इस सन्नाटे से डरती हूँ, क्योंकि इस सन्नाटे में, अतीत और भविष्य, दोनो की नकारात्मक, तस्वीरें उभरने लगती हैं, वर्तमान का अर्थ ही बदल जाता है, सब बेमानी होने लगता है। इस सन्नाटे से […] Read more » सन्नाटा
कविता साहित्य छोटी- सी आशा June 5, 2013 / June 5, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment जानता नहीं है कहाँ है उसका मुकाम । वह तो लगा रहता है बनाने में एक के बाद दूसरा बहुमंजिला मकान । छोटे-से गाँव का है वह एक कुशल कारीगर । आ गया है यहाँ अपना घर – द्वार छोड़कर । गाँव का वह झोपड़ीनुमा घर भी गिरवी रख आया था, जिसे कुछेक सालों में […] Read more » छोटी- सी आशा
लेख नास्तिकों की बढ़ती संख्या June 4, 2013 / June 4, 2013 by प्रमोद भार्गव | 6 Comments on नास्तिकों की बढ़ती संख्या भगवान को मानने और न मानने वालों का भी एक विश्वस्तरीय सर्वे हुआ है। इस सूचकांक के अनुसार विश्व में नास्तिकों का औसत 13 प्रतिशत है। 57 देशों के 51 हजार लोगों से की गई बातचीत के आधार पर नास्तिकों की सबसे ज्यादा 50 प्रतिशत संख्या चीन में है। प्रत्येक देश में लगभग 1000 स्त्री-पुरुषों […] Read more » इनास्तिकों की बढ़ती संख्या नास्तिकों की बढ़ती संख्या
पर्यावरण लेख हिमालय के परिधि में भूकम्प का खतरा बरकरार बचने हेतु धार्मिक उपाय हेतु लोग मजबूर June 4, 2013 by मनोज श्रीवास्तव 'मौन' | 1 Comment on हिमालय के परिधि में भूकम्प का खतरा बरकरार बचने हेतु धार्मिक उपाय हेतु लोग मजबूर भारत के विशाल भूखण्ड में हिमालय की बहुत ही अहम भूमिका है, जिसके आधार पर यह राष्ट्र विश्व में आकर्षक राष्ट्र के रूप में प्रसिद्ध है। पर्यावरण के दृष्टि से यदि देखा जाए तो उत्तरीय भाग में हिमालय का अंशदान पर्यावरण के एक विराट संरक्षक का है। वहीं पर दक्षिण भाग में कम ऊंचे परन्तु […] Read more » हिमालय के परिधि में भूकम्प का खतरा बरकरार बचने हेतु धार्मिक उपाय हेतु लोग मजबूर
कविता भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है June 3, 2013 / June 3, 2013 by ऋतु राय | 1 Comment on भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है बिकने लगा सब कुछ विदेशी हाथों का औज़ार बन गया है इंसान बिक गया, ईमान बिक गया घर में रखा साजों-सामान बिक गया विचार बिक गया समाचार बिक गया आदमी की भीतर से बाहर तक शिष्टाचार बिक गया अब खिलौनों की क्या बात करे ना रहा दम-ख़म खेल […] Read more » भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है
कविता साहित्य आज का मानव June 1, 2013 / June 1, 2013 by मिलन सिन्हा | 1 Comment on आज का मानव आज हरेक के जेब में मानव हरेक के पेट में मानव पेट से निकला है मानव पेट से परेशान है मानव अन्तरिक्ष में क्रीड़ा कर रहा है मानव सड़क पर लेटा है मानव जोड़ – घटाव में व्यस्त है मानव वैरागी बन रहा है मानव मशीन बन रहा है मानव समुद्र की लहरें गिन रहा […] Read more » आज का मानव
व्यंग्य आज मैं ऊपर, आसमां नीचे…… June 1, 2013 / June 1, 2013 by अशोक गौतम | Leave a Comment आजकल अपने मुहल्ले में हर दूसरा जीव प्रदर्शनकारी हो गया है। लगता है मुहल्ले वालों ने जैसे सारे काम छोड़ प्रदर्शन करने का ठेका ले रखा हो। मेरे मुहल्ले का जीव देश के तमाम जीवों की तरह ऊपर से और किसी काम में पारंगत होकर आया हो या न, पर प्रदर्शन करने की कला और […] Read more » आज मैं ऊपर आसमां नीचे......
राजनीति व्यंग्य मनमोहन और “बोधि धर्म” June 1, 2013 / June 1, 2013 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment बात उस समय की है जब चीन में राजा वू का शासन था। एक दिन बौद्घ भिक्षु बोधिधर्म राजधानी में पधारे। राजा वू ने भिक्षु का श्रद्घा भाव से सत्कार किया। वह बौद्घ भिक्षु के पास गया और बोला-’स्वामी मैंने बुद्घ के अनेक मंदिर बनवाए, धर्मप्रचार पर अपार धन खर्च किया, अनेक धर्मशास्त्र बंटवाए, अब […] Read more » कम्यूनिस्ट पार्टी चीनी नेता माओ चीनी राजा डा.मनमोहन सिंह नक्सलवाद बोधिधर्म भारतीय नक्सलवाद भारतीय प्रधानमंत्री राजा 'वू'