कविता कविता : संकल्प May 29, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा जो है खरा झंझावात में भी वही रह पायेगा खड़ा . नहीं दिखेगा वह कभी भी डरा-डरा . कोई भी उसे अपने संकल्प से नहीं डिगा पायेगा पर, जो खोटा है भले ही मोटा है देखने में चिकना चुपड़ा है सौन्दर्य प्रसाधनों का चलता-फिरता विज्ञापन है, मुखौटा हटते ही उसका असली चेहरा दिखेगा […] Read more » कविता : संकल्प
व्यंग्य व्यंग्य बाण : डंडा सैल May 28, 2013 / May 28, 2013 by विजय कुमार | Leave a Comment परसों शर्मा जी बहुत दिन बाद मिलने आये, तो उनकी सूजी हुई आंखों से दुख टपक रहा था। चेहरे से ऐसा लग रहा था मानो सगे पिताजी चल बसे हों। इतना परेशान तो मैंने उन्हें पिछले 25 साल में कभी नहीं देखा था। फिर आज… ? – क्या हुआ शर्मा जी, कुछ तो बताओ। बड़ों […] Read more » डंडा सैल व्यंग्य बाण : डंडा सैल
कविता मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी May 28, 2013 by पंकज त्रिवेदी | 1 Comment on मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी अब मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी कविताएँ ही पढ़ता हूँ कविता ही क्या ? तुम्हें भी तो पढता हूँ… महज़ एक कोशिश ! तुम्हारी मुस्कान के पीछे छुपा वो दर्द कचोटता है मेरे मन को तुम्हारी खिलखिलाती हँसी सुनकर लगता है जैसे किसी गहराई से एक दबी सी आवाज़ भी उसके पीछे से कराहती है […] Read more » मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी
कविता कितने प्यार से May 28, 2013 by पंकज त्रिवेदी | 1 Comment on कितने प्यार से सींचा था मैंने उस रिश्ते को अपने ही हाथों मे संभाला था उसे किसी फूल की तरह समझदार तो था मगर हरबार हौसला बढाता रहा मैं वो आगे बढता रहा आगे बढते हुए वो इतना आगे निकल गया कि अब वो मुडकर भी नहीं देख पाता गिला वो नहीं कि वो आगे […] Read more »
गजल गज़ल-मैंने देखा खून आज May 27, 2013 / May 27, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment (राघवेन्द्र कुमार “राघव”) मैंने देखा खून आज , राह में गिरा हुआ । पूछा खून किसका है, कोई तो बताइए । क्या हुआ जो आप सब, क्रोध में उबल रहे । व्यर्थ ही सामर्थ्य आप, ऐसे ना जलाइए । खून कौन हिन्दू है, कौन खून मुसलमान । सिखों का है खून कौन आइए बताइए । जाति – पांति भेद भाव, सियासती उसूल हैं । नफरतों […] Read more » मैंने देखा खून आज
कविता मेरे होने, न होने के बीच का अवकाश है तुम्हारे लिये … May 27, 2013 by पंकज त्रिवेदी | Leave a Comment मेरे होने, न होने के बीच का अवकाश है तुम्हारे लिये … कितना कुछ घुमड़ रहा है मेरे अंदर और बाहर से मेरे अंदर तक फैलता कोलाहल किसी धुएँ की तरह प्रदूषित कर देता है मेरे मन को… मैं हरपल – मेरे होने के साथ जीना चाहता हूँ मगर मेरे होने, न होने के […] Read more » न होने के बीच का अवकाश है तुम्हारे लिये ... मेरे होने
विविधा व्यंग्य व्यंग्य बाण : बेशर्म कथा May 27, 2013 / May 27, 2013 by विजय कुमार | 1 Comment on व्यंग्य बाण : बेशर्म कथा बात अधिक पुरानी नहीं है। शर्मा जी के मोहल्ले में एक जैसी सूरत और कद-काठी की दो जुड़वां बहनें रहती थीं। एक का नाम था शर्म और दूसरी का बेशर्म। ऐसा नाम उनके माता-पिता ने क्यों रखा, ये आप उनसे ही पूछिये। जुड़वां होने से उन्हें कई लाभ थे। दोनों बदल-बदल कर एक दूसरे के […] Read more » व्यंग्य बाण : बेशर्म कथा
कविता हवाओं में बसी देहगंध May 25, 2013 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on हवाओं में बसी देहगंध कहाँ से आ रही है हवा ? ये पता नहीं बस इसमें बसी देह गंध पहचान आती है. तभी तो पहचाना कि तुम बहती हवा की दिशा में हो. नहीं है इसमें वो सब कुछ जो एक पहाड़ पर होता है शिखर, गरिमा,संपदा, और थोड़ी जड़ता भी बस है तनिक सहजता जो सदा उँगलियों […] Read more » हवाओं में बसी देहगंध
कविता मैं सागर में एक बूँद सही May 25, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on मैं सागर में एक बूँद सही मैं सागर में एक बूँद सही, मैं पवन का एक कण ही सही, मैं भीड़ में इक चेहरा सही, जाना पहचाना भी न सही, मैं तृण हूँ धरा पर एक सही, अन्तर्मन की गहराई में कभी, मैंने जो उतर कर देखा है कभी, सीप में बन्द मोती की तरह, उन्माद निराला पाया है, उत्कर्ष शिखर का पाया है। जब भी कुछ मैंने लिखा है कभी, ख़ुद को ही ढ़ूंढ़ा पाया है । तब,लेखनी ने इक दिन मुझसे कहा, ‘’मैंने तुमसे तुम्हे मिलाया है।‘’ मैंने फिर उससे कुछ यों कहा, ‘’ओ मेरी लेखनी मेरी बहन! तूने मुझको तो मेरी नज़र में, कुछ ऊपर ही उठाया है।‘’ मैं सागर की एक बूंद सही, मैंने अपना वजूद यहाँ […] Read more » मैं सागर में एक बूँद सही
कविता हास्य व्यंग्य कविता : माडर्न पत्नी के माडर्न विचार May 24, 2013 / May 24, 2013 by मिलन सिन्हा | 2 Comments on हास्य व्यंग्य कविता : माडर्न पत्नी के माडर्न विचार मिलन सिन्हा सावन की सुहानी रात थी पति पत्नी की बात थी कहा, पति ने बड़े प्यार से देखो, प्रिये कल मुझे आफ़िस जल्दी है जाना वहां बहुत काम पड़ा है सब मुझे ही है निबटाना . प्लीज ,जाने मन कल, सिर्फ कल बना लेना अपना खाना इसके लिए मैं तुम्हारा ‘ग्रेटफूल’ रहूँगा आगे […] Read more » माडर्न पत्नी के माडर्न विचार हास्य व्यंग्य कविता
राजनीति व्यंग्य मनमोहन सिंह की अंतरिम उपलब्धि May 24, 2013 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | Leave a Comment सिद्धार्थ मिश्र”स्वतंत्र” समाचार पत्रों में प्रकाशित हालिया दो बड़ी खबरों ने हम सभी का ध्यान आकर्षित किया है । प्रथम मनमोहन सिंह जी की राज्यसभा चुनावों के लिए नामांकन की तथा दूसरी भारतीय इतिहास की सबसे भ्रष्ट और बेशर्म सरकार द्वारा शासन के नौ वर्ष पूरे करने की । इन दोनों खबरों में निहित सार […] Read more » मनमोहन सिंह की अंतरिम उपलब्धि
गजल नज़्म May 24, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” किसी की तासीर है तबस्सुम, किसी की तबस्सुम को हम तरसते हैं । है बड़ा असरार ये, आख़िर ऐसा क्या है इस तबस्सुम में ।। देखकर जज़्ब उनका, मन मचलता परस्तिश को उनकी । दिल-ए-इंतिख़ाब हैं वो, इश्क-ए-इब्तिदा हुआ । उफ़्क पर जो थी ख़ियाबां, उसकी रंगत कहां गयी । वो […] Read more » नज़्म