लेख आम आदमी के लिये संवेदनहीन हुई सरकार June 29, 2011 / December 9, 2011 by शादाब जाफर 'शादाब' | Leave a Comment एक बार फिर डीजल, रसोई गैस और मिट्टी के तेल में बढ़ोतरी कर केंन्द्र सरकार ने मंहगाई डायन को तगडी खुराक देने के साथ ही आम आदमी की रही सही जान निकालने के बाद डीज़ल, रसोई गैस और केरोसिन की कीमतो में कि गई वृद्वि पर रविवार को सार्वजनिक सफाई पेश करत् हुए अपने इस […] Read more » Insensitive आम आदमी सरकार संवेदनहीन
कविता आती है बरसात June 29, 2011 / December 9, 2011 by श्यामल सुमन | Leave a Comment नव-जीवन का बोध कराने आती है बरसात कई आशियां संग बहाने आती है बरसात कुम्हलाये से लोग तपिश में घास-पात भी सूखे हरियाली को पुनः सजाने आती है बरसात जोश नदी में भर देती है खेतों में मुस्कान हर जीवों की प्यास बुझाने आती है बरसात नव-दम्पति से कोई पूछे कितना मीठा […] Read more » Rain बरसात
कहानी कहानी/ अपनी-अपनी जिंदगी June 28, 2011 / December 9, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment आर. सिंह अमर थोड़ी देर पहले ऑफिस से लौटा था और चाय पीकर निकल पड़ा था यों ही सड़क नापने. चलते-चलते वह सोच भी रहा था कि क्या अजीब मूडी इंसान है वह भी. यह भी पता नहीं क्या करना है? कहाँ जाना है? पर सड़क नापे जा रहे हैं. सीधी सादी जिंदगी थी अमर […] Read more » life जिंदगी
व्यंग्य ठोकपाल विधेयक June 27, 2011 / December 9, 2011 by विजय कुमार | 2 Comments on ठोकपाल विधेयक विजय कुमार चिरदुखी शर्मा जी हर दिन की तरह आज भी चौराहे पर मिले, तो उनका गुस्सा छिपाए नहीं छिप रहा था। मिलते ही उन्होंने बगल में दबा अखबार मेरे हाथ में थमा दिया। – लो पढ़ो। मैं तो पहले से यही कह रहा था। – क्या बात हो गयी शर्मा जी, इन दिनों दिल्ली […] Read more » Corruption भ्रष्टाचार लोकपाल
कविता गीत/ विजयी निश्चय बन जाओगे June 23, 2011 / December 11, 2011 by क्षेत्रपाल शर्मा | Leave a Comment कुछ आगजनी, कुछ राहजनी अब दिन में ये होते आएं यदि चमन बचाना है भाई, उल्लू न बसेरा कर पाएं कुछ शाखों की कच्ची कलियां- मंहगाई ने हैं कस डाली मासूम हंसी, आचारहीन नागिन ने ऐसी डस डालीं उनकी बीती का मैं श्रोता, बीते तो ऑंखें पथराएं है डाल डाल विष बेल व्याप्त रिश्वत, दल्ला […] Read more » song
पुस्तक समीक्षा समकालीनता की दास्तान ‘मुक्त होती औरत’ June 23, 2011 / December 11, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on समकालीनता की दास्तान ‘मुक्त होती औरत’ समीक्षा-कथा संग्रह-मुक्त होती औरत शीना एन. बी. स्वस्थ सामाजिक जीवन के निर्माण के लिए सुदृढ़ राष्ट्रीय एवं आर्थिक परिस्थितियों की तरह स्वस्थ भावनात्मक तत्वों की भी अह्म भूमिका है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि भावनात्मक अंशों में प्रतिबंध लगाना स्वस्थ सामाजिकता के खिलाफ है। ऐसी ही एक भावनात्मकता है प्रणय। प्रणय हर एक […] Read more » Pramod Bhargav प्रमोद भार्गव मुक्त होती औरत
कविता कविता/जनता सब जानती है June 23, 2011 / December 11, 2011 by शास्त्री नित्यगोपाल कटारे | 1 Comment on कविता/जनता सब जानती है जिसको पुलिस नहीं पहिचाने जिसको न्यायाधीश न जानें चोर लुटेरे भ्रष्टाचारी घूम रहे हैं सीना ताने गफलत में मत रहना ये सबकी रग रग पहिचानती है जनता है ये सब जानती है।। किसने है यह सड़क बनाई किसने कितनी करी कमाई किसने कितना डामर खाया किसने कितनी गिट्टी खायी किसको कितना मिला कमीशन किसने कैसे […] Read more » poem
कहानी कहानी/ एक बार फिर June 23, 2011 / December 11, 2011 by राजनारायण बोहरे | Leave a Comment राजनारायण बोहरे वे फिर आ गये हैं। आज हर जगह यही सुनने को मिल रहा है। चारों घरों में यही चर्चा हैं। भीतर पहुंचते ही घर का कोई सदस्य फुसफुसाते हुये यह सूचना देता है और चुप हो जाता है। सूचना देने वाले के चेहरे पर दहशत के भाव झांकते हैं और उसकी आंखें फिर […] Read more » Story
व्यंग्य व्यंग्य/मुश्क़िल June 23, 2011 / December 11, 2011 by संजय ग्रोवर | Leave a Comment संजय ग्रोवर वह एक-एकसे पूछ रहा था। जनता से क्या पूछना था, वह हमेशा से भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ थी। विपक्षी दल से पूछा, ‘‘मैंने ही तो सबसे पहले यह मुद्दा उठाया था।’’ उनके नेता ने बताया। उसने शासक दल से भी पूछ लिया, ‘‘हम आज़ादी के बाद से ही इसके खि़लाफ़ कटिबद्ध हैं। जल्द ही […] Read more » vyangya
कविता कविता/ पुष्प और इंसान June 22, 2011 / December 11, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment पुष्प शोभा है उपवन का. कली का जीवन है प्रस्फुटित होकर, पुष्प बनने में. खिल कर अपनी बहार लुटाने में. तुम बनने कहाँ देते हो पुष्प को, बहार उपवन का. खिलने कहाँ देते हो कली को? तुम तो तोड़ डालते हो पुष्प को शोभा बनने से पहले. मसल डालते हो कली को असमय ही. मत […] Read more » poem कविता
कविता कविता/फादर डे पर June 20, 2011 / December 11, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment पिता का प्यार मां के बाद ही आंका जाता है पिता का स्थान भी मां के बाद ही आता है। मां के पैरों तले ही तो जन्नत भी होती है बाप के दिल से होके उसका रस्ता जाता है। माना कि मां का प्यार सबसे उंचा होता है बाप का रिश्ता भी तो बेटे से […] Read more » poem बाबू जी
व्यंग्य व्यंग/ मुफ्तखोरी की बीमारी June 14, 2011 / December 11, 2011 by राजकुमार साहू | Leave a Comment राजकुमार साहू बीमारी की बात करते हैं तो हर व्यक्ति, कोई न कोई बीमारी से ग्रस्त नजर जरूर आता है। बीमारी की जकड़ से यह मिट्टी का शरीर भी दूर नहीं है। सोचने वाली बात यह है कि बीमारियों की तादाद, दिनों-दिन लोगों की जनसंख्या की तरह बढ़ती जा रही है। जिस तरह रोजाना देश […] Read more » vyangya