आलोचना कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष – कौन पा रहा है, कौन खो रहा है? October 7, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष – कौन पा रहा है, कौन खो रहा है? -जगदीश्वर चतुर्वेदी वर्धा में महात्मा गांधी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कवि चतुष्टयी जन्मशती पर आलोचक नामवर सिंह ने जो कहा वह कमाल की बात है। अब हमारे गुरूवर बिना परिप्रेक्ष्य के सिर्फ विवरण की भाषा बोलने लगे हैं। परिप्रेक्ष्यरहित आख्यान और रिपोर्टिंग का नमूना देखें- “इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर जी ने बीसवी सदी […] Read more » University महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
पुस्तक समीक्षा कबीर की आंखें और आलोचना की रपटन October 5, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on कबीर की आंखें और आलोचना की रपटन -जगदीश्वर चतुर्वेदी कबीर पर पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम कीः कबीर की कविता और उनका समय’ (2009)निस्संदेह सुंदर किताब है। इस किताब में कबीर की कविता की तरह ही आधुनिक विषयों का रहस्यात्मक वर्णन है। कबीर बड़े लेखक हैं और कबीर पर लिखना मुश्किल काम है। पुरूषोत्तम अग्रवाल ने यह काम बहुत ही […] Read more » Kabir कबीर पुरुषोत्तम अग्रवाल
कविता कविता:उस शहर का मौसम कैसे सुहाना लगे October 5, 2010 / December 21, 2011 by पन्नालाल शर्मा | 5 Comments on कविता:उस शहर का मौसम कैसे सुहाना लगे उस शहर का मौसम कैसे सुहाना लगे, बारिश समय पर न हो, उगती फसल बर्बाद होने लगे, बढ रहे कंकरीट के जंगल वहां, फिर मौसम क्यों न गर्माने लगे। बदले जब मौसम तकदीर का, आंधी आए व आए तूफान, दीबार तब किस्मत की ढहने लगे। उस शहर का मौसम कैसे सुहाना लगे। औरों की तो […] Read more » poem
कविता कविता : रामजन्मभूमि October 3, 2010 / December 22, 2011 by मुकेश चन्द्र मिश्र | 20 Comments on कविता : रामजन्मभूमि थे राम अयोध्या के राजा ये सारा विश्व जानता है। पर आज उन्हें अपने ही घर तम्बू में रहना पड़ता है।। अल्लामा इकबाल ने उनको पैगम्बर बतलाया है। उनसा मर्यादा पुरुषोत्तम न पृथ्वी पर फिर आया है।। फिर भी इस सेकुलर भारत में राम नाम अभिशाप हुआ। मंदिर बनवाना बहुत दूर पूजा करना भी पाप […] Read more » Ram Birthplace रामजन्मभूमि
व्यंग्य इनका दर्द भी समझें October 3, 2010 / December 22, 2011 by विजय कुमार | 2 Comments on इनका दर्द भी समझें -विजय कुमार मेरे पड़ोस में मियां फुल्लन धोबी और मियां झुल्लन भड़भूजे वर्षों से रहते हैं। लोग उन्हें फूला और झूला मियां कहते हैं। 1947 में तो वे पाकिस्तान नहीं गये; पर मंदिर विवाद ने उनके मन में भी दरार डाल दी। अब वे मिलते तो हैं; पर पहले जैसी बात नहीं रही। अब वे […] Read more » Ram Birthplace अयोध्या विवाद बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि
व्यंग्य फिसलन का मौसम September 25, 2010 / December 22, 2011 by विजय कुमार | 1 Comment on फिसलन का मौसम -विजय कुमार इन दिनों देश में सावन और भादों का मौसम चल रहा है। इस मौसम की बहुत सी अच्छाईयां हैं, तो कुछ कमियां भी हैं। वर्षा कम हो या अधिक, परेशानी आम जनता को ही होती है। इन दिनों वर्षा के न होने से, न तो धरती की प्यास बुझेगी और न ही खेत-खलिहान […] Read more » Season मौसम
आलोचना सैलीबरेटी नामवर सिंह September 20, 2010 / December 22, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 8 Comments on सैलीबरेटी नामवर सिंह -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह लंबे समय से ‘गायब’ हैं। कोई नहीं बता रहा वे कहां चले गए। वैसे व्यक्ति नामवर सिंह साक्षात इस धराधाम में हैं और मजे में हैं। गड़बड़ी यह हुई है कि ‘आलोचक नामवर सिंह’ गायब हो गए हैं। उनका गायब होना एक बड़ी खबर होना चाहिए था। […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह
आलोचना कबीर के बहाने नामवरसिंह का पुंसवादी खेल September 20, 2010 / December 22, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 4 Comments on कबीर के बहाने नामवरसिंह का पुंसवादी खेल -जगदीश्वर चतुर्वेदी अभी एक पुराने सहपाठी ने सवाल किया था कि आखिरकार तुम नामवरजी के बारे में इतना तीखा क्यों लिख रहे हो ? मैंने कहा मैं किसी व्यक्तिगत शिकायत के कारण नहीं लिख रहा। वे अहर्निश आलोचना नहीं विज्ञापन कर रहे हैं और आलोचना को नष्ट कर रहे हैं। आलोचना के सम-सामयिक वातावरण को […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह
साहित्य राजभाषा हिन्दी और संवैधानिक सीमाएं September 19, 2010 / December 22, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment -हरिकृष्ण निगम क्या हमारे देश के करोड़ों हिंदी प्रेमियों को इस बात का अहसास है कि संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत हिंदी को यद्यपि संघ की राजभाषा का दर्जा मिला है, पर उसके ऊपर जो अंकुश प्रारंभ से ही लगाए गए हैं वे इसके सर्वांगीण विकास में आज भी रोड़ा बने हुए हैं। संविधान का यह […] Read more » hindi हिन्दी
साहित्य नामवर सिंह के भक्त और लोकसमाज के लोकसेवक September 17, 2010 / December 22, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on नामवर सिंह के भक्त और लोकसमाज के लोकसेवक -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी में अनेक आलोचक हैं जो अभी भी चेतना की आदिम अवस्था में जी रहे हैं. कुछ ऐसे हैं जो सचेत रूप से आदिम होने की चेष्टा कर रहे हैं। समाज जितना तेजी से आगे जा रहा है वे उतनी ही तेजी से पीछे जा रहे हैं। हमें इस फिनोमिना पर गौर करना […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह
साहित्य विवाद: चिप्स के चार पैकेट या सौ रुपये में दस किताबें हंगामा क्यों है बरपा? September 15, 2010 / December 22, 2011 by चंडीदत्त शुक्ल | Leave a Comment – चण्डीदत्त शुक्ल एक सवाल का जवाब देंगे आप? चिप्स के दो बड़े पैकेट ख़रीदने के लिए कितने पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं? चालीस रुपये ना!! और पांच के लिए? जवाब आसान है—सौ रुपये। क्या इतने पैसे में नामी-गिरामी लेखकों की अस्सी से सौ पेज वाली दस किताबें मिलें, तो इन्हें ख़रीदना अच्छा सौदा होगा? […] Read more » Books दस किताबें
साहित्य समझौतों के खिलाफ थी सर्वेश्वर की पत्रकारिता September 15, 2010 / December 22, 2011 by संजय द्विवेदी | Leave a Comment जयंती (15 सितंबर,1927 एवं पुण्यतिथि 23सितंबर,1983) पर विशेषः -संजय द्विवेदी अपने तीखे तेवरों से सम्पूर्ण भारतीय पत्रकारिता जगत को चमत्कृत करने वाले सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की उपलब्धियां बड़े महत्व की हैं। सर्वेश्वर जी मूलतः कवि एवं साहित्यकार थे, फिर भी वे जब पत्रकारिता में आए तो उन्होंने यह दिखाया कि वे साथी पत्रकारों से किसी […] Read more » Sarveshwar Dayal Sexena सर्वेश्वर दयाल सक्सेना