व्यंग्य व्यंग्य/ महिला शौचालय का लोकार्पण October 22, 2010 / December 20, 2011 by अशोक गौतम | 4 Comments on व्यंग्य/ महिला शौचालय का लोकार्पण -अशोक गौतम शहर के मेन बस स्टैंड के पास बड़े दिनों से महिला शौचालय बनकर तैयार था पर कमेटी के प्रधान बड़ी दौड़ धूप के बाद भी उस शौचालय के लोकार्पण के लिए मंत्री जी से वक्त नहीं ले पा रहे थे और महिला यात्री थे कि पुरूष शौचालय में जाने के लिए विवश थे। […] Read more » vyangya व्यंग्य
साहित्य फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जन्मशती- भारतीय उपमहाद्वीप का सर्वहारा का महाकवि October 17, 2010 / December 20, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 4 Comments on फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जन्मशती- भारतीय उपमहाद्वीप का सर्वहारा का महाकवि -जगदीश्वर चतुर्वेदी आज भारत में अनेक हिन्दी-उर्दू कवियों और लेखकों ने भारत में सत्ता और संस्कृति उद्योग के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है। इन लोगों ने मजदूरों के पक्ष में बोलना बरसों से बंद कर दिया है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की मलाई खाने और प्रतिष्ठानी कर्मकांड का अपने को हिस्सा बना लिया है। […] Read more » Indian फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
व्यंग्य व्यंग्य/ मैं तो कुतिया बॉस की October 12, 2010 / December 21, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ मैं तो कुतिया बॉस की -अशोक गौतम वे आते ही मेरे गले लग फूट- फूट कर रोने लगे। ऐसे तो कभी लंबे प्रवास से लौट आने के बाद भी मेरी पत्नी जवानी के दिनों में मेरे गले लग कर भी नहीं रोई। हमेशा उसके मन में विरह को देखने के लिए मैं ही विरह में तड़पता रहा। पता नहीं उसमें […] Read more » vyangya व्यंग्य
कविता विजया सिंह की कविता- स्त्रीत्व का सुखद नैसर्गिक सौंदर्य October 11, 2010 / December 21, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on विजया सिंह की कविता- स्त्रीत्व का सुखद नैसर्गिक सौंदर्य पहली बार जाना, ‘कितना खतरनाक होता है दो स्तनों के साथ इस दुनिया में कदम रखना.’ पहली बार समझा, महज़ अंग नहीं सजीव चेतन हैं हमारे… और पहली बार ही, दर्द की कँटीली रेखाएँ खड़ी हो गई हैं शरीर के एकाधिक पोरों में. ‘मैं ठीक हूँ’ का अपाहिज झूठ आश्वस्त नहीं करता, न मुझे, न […] Read more » Woman औरत
कविता कविता- औरत October 11, 2010 / December 21, 2011 by सतीश सिंह | 7 Comments on कविता- औरत औरत तिल-तिल कर मरती रही, जलती रही अपने अस्तित्व को हर पल खोती रही दुख के साथ दुख के बीच जीवन के कारोबार में नि:शब्द अपने पगचापों का मिटना देखती रही सृजन के साथ जनम गया शोक रुदाली का जारी है विलाप सूख गया कंठ फिर भी वह आंखों से बोलती रही जीवन के हर […] Read more » Woman औरत
आलोचना चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह October 10, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह -जगदीश्वर चतुर्वेदी सवाल टेढ़ा है लेकिन जरूरी है कि चेग्वेरा क्यों नहीं बन पाए नामवर सिंह। उन्होंने क्रांतिकारी की बजाय बुर्जुआमार्ग क्यों अपनाया ? क्रांति का मार्ग दूसरी परंपरा का मार्ग है। जीवन की प्रथम परंपरा है बुर्जुआजी की। नामवरजी को पहली परंपरा की बजाय दूसरी परंपरा पसंद है। सवाल यह है कि दूसरी परंपरा […] Read more » Namwar Singh चे ग्वारा नामवर सिंह
आलोचना नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम October 9, 2010 / October 9, 2010 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 5 Comments on नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम -जगदीश्वर चतुर्वेदी भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना उसे साम्प्रदायिक हिंसाचार से […] Read more » नागार्जुन
आलोचना नागार्जुन जन्मशती पर विशेष-हिन्दी में कीर्त्ति फल के उपभोक्ता October 9, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on नागार्जुन जन्मशती पर विशेष-हिन्दी में कीर्त्ति फल के उपभोक्ता -जगदीश्वर चतुर्वेदी नागार्जुन पर जो लोग शताब्दी वर्ष में माला चढ़ा रहे हैं। व्याख्यान झाड़ रहे हैं। नागार्जुन के बारे में तरह-तरह का ज्ञान बांट रहे हैं ऐसे हिन्दी में 20 से ज्यादा लेखक नहीं हैं। ये लेखक कम साहित्य के कर्मकाण्डी ज्यादा लगते हैं। आप इनमें से किसी को भी फोन कीजिए ये लोग […] Read more » hindi नागार्जुन हिन्दी
व्यंग्य व्यंग्य / सत मत छोडों शूरमा, सत छौडया पत जाय October 9, 2010 / December 21, 2011 by रामस्वरूप रावतसरे | 5 Comments on व्यंग्य / सत मत छोडों शूरमा, सत छौडया पत जाय -रामस्वरूप रावतसरे तनसुख ने घर की बिगड रही हालत को सुधारने के लिये कहां कहां की खाक नहीं छानमारी। किस किस की चौखट पर नाक नहीं रगडी, लेकिन दरिद्र नारायण उसके यहां पर इस प्रकार बिराजे है कि बाहर जाने का नाम ही नहीं ले रहे है। हां, वह इस दरिद्रनारायण से पीछा छुडाने के […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य/ इक्कीसवीं सदी के लेटेस्ट प्रेम October 8, 2010 / December 21, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ इक्कीसवीं सदी के लेटेस्ट प्रेम -डॉ. अशोक गौतम वे सज धज कर यों निकले थे कि मानो किसी फैशन शो में भाग लेने जा रहे हों या फिर ससुराल। बूढ़े घोड़े को यों सजे धजे देखा तो कलेजा मुंह को आ गया। बेचारों के कंधे कोट का भार उठाने में पूरी तरह असफल थे इसीलिए वे खुद को ही कोट […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य/ चल वसंत घर आपणे…!!! October 8, 2010 / December 21, 2011 by अशोक गौतम | 2 Comments on व्यंग्य/ चल वसंत घर आपणे…!!! -डॉ. अशोक गौतम वसंत पेड़ों की फुनगियों, पौधों की टहनियों पर से उतरा और लोगों के बीच आ धमका। सोचा, चलो लोगों से थोड़ी गप शप हो जाए। वे चार छोकरे मुहल्ले के मुहाने पर बैठे हुए थे। वसंत के आने पर भी उदास से। वे चारों डिग्री धारक थे। दो इंजीनियरिंग में तो दो […] Read more » vyangya व्यंग्य
आलोचना कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान October 7, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान -जगदीश्वर चतुर्वेदी बाबा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय और शमशेर का यह जन्मशती वर्ष है। यह समारोह ऐसे समय में आरंभ हुआ है जब देश भयानक मंदी की मार और नव्य-उदार आर्थिक नीतियों की मार से गुजर रहा है। सवाल उठता है क्या इसे तिलांजलि देकर कवि चतुष्टयी की जन्मशती मनायी जा सकती है? लेकिन हिन्दी के […] Read more » Makhanlal Chaturvedi Patrakarita Vishwavidyalay महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय