कविता राजनीति राजीव दुबे की कविता : प्रश्नों के बढ़ते दायरे November 2, 2010 / December 20, 2011 by राजीव दुबे | 5 Comments on राजीव दुबे की कविता : प्रश्नों के बढ़ते दायरे प्रश्नों के दायरे बढ़ रहे हैं, और आवाजें फुसफुसाहटों से कोहराम में बदल रही हैं। ‘कलावती’ का नाम लेकर संसद में तालियाँ तो बज़ गईं, और ‘कलावती’ को कुछ रुपये भी मिल गये होंगे – सहायता के नाम पर। अब उसी ‘कलावती’ और उस जैसों के हजारों करोड़ लुट गए दिल्ली की निगरानी में – […] Read more » poem कविता
व्यंग्य व्यंग/बेटा अकादमी के चूहे का November 1, 2010 / December 20, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment -पंडित सुरेश नीरव वह आज भी दफ्तर से बिना काम किये शान से वेतन उठा रहा है। दफ्तर में वह कभी काम करता है यह कहकर मैं उसे सपरिवार अपमानित नहीं करना चाहता। बिना काम किए प्रमोशन पाने की खानदानी परंपरा को वह आज भी बरकरार रखे हुए है। पिताजी ने नसीहत देते हुए अपने […] Read more » vyangya
व्यंग्य व्यंग/गाली November 1, 2010 / December 20, 2011 by राम कृष्ण खुराना | 6 Comments on व्यंग/गाली -राम कृष्ण खुराना मुझे कुत्ता पालने का कोई शौक नहीं था। मैं कुत्ते, बिल्ली आदि जानवर पालने को अमीरों के चोंचले मानता था। सुबह शाम लोगों को कुत्ते की जंजीर हाथ में पकड कर टहलते हुए देखता तो मैं उनको फुकरा समझा करता था जो अपनी झूठी शान दिखाने के लिए आडम्बर करते हैं। पिक्चरों […] Read more » vyangya
व्यंग्य जूते भी ईमानदार हो गए… October 30, 2010 / December 20, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 5 Comments on जूते भी ईमानदार हो गए… -आशीष तिवारी दिल्ली में गिलानी की सभा में किसी ने उनपर जूता फेंक दिया. ये जूता उनको लगा नहीं. अब इसे क्या कहेगे आप? इससे पहले भी कई लोगों को निशाना बना कर जूते फेंके जा चुके हैं. कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी नीरिह जूते का निशाना बनाने की कोशिश की गयी थी पर […] Read more » Honest ईमानदार
कविता कविता: व्यस्तता October 30, 2010 / December 20, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 4 Comments on कविता: व्यस्तता व्यस्तता आज हम हर पल व्यस्तता का बहाना बना रहे हैं व्यस्तता की आड़ लेकर अपनों से ही बहुत दूर हुऐ जा रहे हैं जरा सोचिए, दिल से सोचिए कहीं हम रिश्तों के नाम पर औपचारिकता तो नहीं निभा रहे हैं आज हम हर पल व्यस्तता का बहाना बना रहे हैं पहले जब कोई दुःख […] Read more » poem व्यस्तता
व्यंग्य अगले जनम मोहे….. October 29, 2010 / December 20, 2011 by विजय कुमार | Leave a Comment -विजय कुमार बाबा तुलसीदास लिख गये हैं – हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ। सभी संतों ने इसे अपनी-अपनी तरह से कहा है। जहां तक पुर्नजन्म की बात है, भारतीय धर्म और पंथ तो इसे मानते हैं; पर विदेशी मजहब इसे स्वीकार नहीं करते। पिछले दिनों एक गोष्ठी में चर्चा का यही विषय […] Read more » vyangya
कविता उलूक दर्शन October 28, 2010 / December 20, 2011 by राजीव दुबे | 6 Comments on उलूक दर्शन उलूक दर्शन उल्लुओं की भाषा के जानकारों ने बताया है कि आजकल उल्लू अपनी हर सभा में चीख – चीख कर कह रहे हैं – “अगर घोड़ों ने सभ्यता के विकास के शुरुआती दौर में आदमी को अपने ऊपर चढ़कर अपना शोषण न करने दिया होता तो यह पूंजीवादी युग कभी नहीं आता । “ […] Read more » poem
कविता कविता/रामजन्मभूमि October 27, 2010 / December 20, 2011 by अमल कुमार श्रीवास्तव | Leave a Comment सुलग रहे है शोले रामजन्म स्थल पर भभक रही है ज्वाला अयोध्या के नाम पर नतमस्तक है जिन चरणों पर पूरा देश उस राम की सम्पूर्ण वंदना अभी रह गयी है शेष जाग उठो अब मां भारती के संतान करने को तैयार हो जाओ फिर भोले सा विषपान ना जागे तो हो जायेगी मातृभूमि कलंकित […] Read more » poem कविता
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य : जनाजा रिटायरात्मा का October 26, 2010 / December 20, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 3 Comments on हास्य-व्यंग्य : जनाजा रिटायरात्मा का -पंडित सुरेश नीरव नौकरी के नर्सिंगहोम में पूरे तीस साल ट्रांसफर और सीट बदल के झटकों को मुसलसल झेलने के बाद आखिरकार आज भैयाजी को रिटायरमेंट की मूर्चरी में भेज ही दिया गया। यूं भी मूर्चरी कोई अपने आप तो जाता नहीं है। कोई कितना भी भैरंट स्वावलंबी क्यों न हो मूर्चरी उसे भेजा ही […] Read more » vyangya व्यंग
कविता कविता : एक मुलाकात बापू से October 26, 2010 / December 20, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 6 Comments on कविता : एक मुलाकात बापू से एक दिन, मन था कुछ खिन्न मैं बाग के कोने में बैठा था उदास तभी सामने दिखाई दिये महात्मा गांधी श्री मोहनदास मैं चकरा कर बोला ”हैलो डैड , हाउ आर यू” उत्तर मिला ”मै तो ठीक हूं पर कौन है तू ? लोग मुझे बापू कहते थे तू डैड कह रहा है हिन्दुस्तानी है […] Read more » poem बापू
कविता अनामिका की कविता : चढ़कर इश्क की October 26, 2010 / December 20, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on अनामिका की कविता : चढ़कर इश्क की चढ़कर इश्क की कई मंजिले अब ये समझ आया इश्क के दामन में फूल भी है और कांटे भी और मेरे हाथ काँटों भरा फूल आया ————- फूल सा इश्क पाकर फूला न समाया पर बेवफाई का काँटा हर फूल ने ज़रूर चुभाया —————- अब तो मेरी हालत देख दोस्त ये कहे इश्क का तो […] Read more » Ishq इश्क
साहित्य ज्ञानप्रेम के दीवाने नामवर October 23, 2010 / December 20, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on ज्ञानप्रेम के दीवाने नामवर -जगदीश्वर चतुर्वेदी नामवर सिंह के व्यक्तित्व के कई कोण हैं। उनमें से एक है उनका ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ का कोण। हिन्दी के लेखकों में प्रेमचंद के बाद वे अकेले ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’ की पहचान वाले लेखक हैं। हिन्दी के लेखकों की नज़र उनके हिन्दी पहलू से हटती नहीं है। खासकर शिक्षकों-लेखकों का एक बड़ा हिस्सा उन्हें प्रोफेसर […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह