व्यंग्य व्यंग्य/ एक बद्दुआ उनके लिए May 19, 2010 / December 23, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम वे अल सुबह हफ्तों से अनधुली वर्दी से बाहर होते शिमला- कालका रेलवे लाइन के इंजन की तरह हांफते जा रहे थे। पता नहीं किधर! कानून के बंदे हैं साहब! भगवान तक को बिन बताए पूरे हक से कहीं भी आ जा सकते हैं। उनके आने जाने के बारे में उनसे जब उनकी […] Read more » vyangya व्यंग्य
कविता कविता : पूर्णिमा May 19, 2010 / December 23, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on कविता : पूर्णिमा हीरक नीलाम्बर आवेष्टित, विहॅस रही राका बाला। शुभ सुहाग सिन्दूरी टीका, सोहत है मंगल वाला॥1॥ अलंकृता कल कला प्रेय संग, पहुँची मानो मधुशाला। छिन्न भिन्न छकि छकि क्रीड़ा में, विखरत मोती की माला॥2॥ -डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ”नन्द” Read more » Poems पूर्णिमा
कविता कविता : राजनीति May 19, 2010 / December 23, 2011 by अमल कुमार श्रीवास्तव | 1 Comment on कविता : राजनीति कुर्सी की लालसा में बढ रहा अब राजनीति का खेल हर नेता पाने को लोलुप कर रहा एक दूसरे से मेल। बुद्धिजीवी बनाकर बैठा घर को अपने जेल सत्ताधारियों के नंगे नाच की चल पडी अब रेल। आम आदमी करवा रहा है खुद से खुद का शोषण जनप्रतिनिधि के कुर्सी पर बैठा रहा विभीषण। जन्म […] Read more » politics राजनीति
कविता कविता: माँ May 19, 2010 / December 23, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 8 Comments on कविता: माँ -ललित गिरी प्यारी जीवन दायिनी माँ!, जब मैनें इस जीवन में किया प्रवेश पाया तेरे ऑंचल का प्यारा-सा परिवेश मेरे मृदुल कंठ से निकला पहला स्वर माँ! पूस की कॅंपी-कॅपी रात में, तूने मुझे बचाया। भीगे कम्बल में स्वयं सोकर, सूखे में मुझे सुलाया॥ तब भी नहीं निकली तेरी कंठ से, एक भी आह। क्योंकि […] Read more » Maa माँ
साहित्य स्त्री आत्मकथा का लक्ष्य है न्याय की तलाश May 15, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment -जगदीश्वर चतुर्वेदी ‘अन्या से अनन्या’ का मूल स्वर स्त्रीवादी है। स्त्रीवाद का लक्ष्य आत्मसंतोष या आनंद देना नहीं है बल्कि उसका लक्ष्य है न्याय। प्रभा की आत्मकथा इसी अर्थ में न्याय की तलाश में किया गया एक प्रयास है। इस किताब में अन्याय के कई रूप हैं, अनेक चरित्र हैं जो अन्याय से पीड़ित हैं, […] Read more » Woman अन्या से अनन्या प्रभाखेतान
पुस्तक समीक्षा स्त्री आत्मकथा के अनुत्तरित सवाल May 15, 2010 / May 15, 2010 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on स्त्री आत्मकथा के अनुत्तरित सवाल -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी का साहित्य संसार करवट बदल रहा है, धड़ाधड़ हिन्दी लेखिकाएं अपनी आत्मकथा लिख रही हैं, कहीं ये कथाएं अंशों में आ रही हैं तो कहीं किताब के रूप में। यह हिन्दी की नयी बदलती स्थिति है। हिन्दी में स्त्री आत्मकथा का लंबे समय से अभाव रहा है। हिन्दी के आलोचकों के लिए […] Read more » अन्या से अनन्या प्रभाखेतान
साहित्य मार्कण्डेय : जिनके पास अंतर को पढ़ लेने की एक्सरे जैसी आंखें थी May 14, 2010 / December 23, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment -सरला माहेश्वरी पिछले वर्ष दो अक्तुबर को पिताजी हमें छोड़ कर चले गये। पिताजी की शब्दावली में, शहरीले जंगल में सांसों की हलचल अचानक थम सी गयी। कोलाहल के आंगन में जैसे सन्नाटा पसर गया। इस सन्नाटे को कोई कैसे स्वराए? किससे बात करे एकाकी मन ? सागर जैसा एकाकीपन, नीले जल सा खारा तन–मन, […] Read more » Markanday मार्कण्डेय
व्यंग्य व्यंग्य/कुत्तों की मानहानि…….. May 14, 2010 / December 23, 2011 by गिरीश पंकज | 5 Comments on व्यंग्य/कुत्तों की मानहानि…….. -गिरीश पंकज इधर कुछ दिनों से संवेदनशील कुत्ते अपनी मानहानि की बढ़ती घटनाओं से बहुत दुखी थे। कुछ कुत्ते तो आदमी के खिलाफ मानहानि के मुकदमे की तैयारी भी करने लगे। मुझे किसी ने बताया, कि पिछले दिनों दिल्ली में कुत्तों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन भी हो गया, जिसमें आम कुत्तों ने शिरकत की। खास […] Read more » Dog कुत्ता
आलोचना कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन का सम्मान पद है धर्म May 13, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन का सम्मान पद है धर्म -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिंदी के बुद्धिजीवियों में धर्म ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ से ज्यादा महत्व नहीं रखता। अधिक से अधिक वे इसके साथ उपयोगितावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्यत्व की आत्मा है। मानवता का चरम है। जिस तरह मनुष्य के अधिकार हैं, लेखक के भी अधिकार हैं,वैसे ही धर्म के […] Read more » Rabindranath Tagore कविवर धर्म रवीन्द्रनाथ टैगोर
साहित्य अतृप्ति का विवेक : शमशेर May 11, 2010 / December 23, 2011 by अरुण माहेश्वरी | Leave a Comment -अरुण माहेश्वरी जन्मशताब्दी के मौके पर शमशेर बहादुर सिंह का स्मरण आदमी की अंतहीन दबी हुई इच्छाओं के एक पावन खजाने के स्मरण जैसा है। ‘चुका भी हूं मैं नहीं, कहां किया मैंने प्रेम अभी’ की अतृप्ति का रचनाकार, ‘आज निरीह कल फतहयाब निश्चित’ के आत्म–विश्वास से परिपूर्ण मानवता के भविष्य पर अटूट आस्था वाला […] Read more » Shamsher Bahadur Singh शमशेर बहादुर सिंह
साहित्य झगड़ा क्या है उर्दू और हिंदी का May 7, 2010 / December 23, 2011 by संजय द्विवेदी | 7 Comments on झगड़ा क्या है उर्दू और हिंदी का दोनों इसी जमीन की खुशबू से बनी भाषाएं हैं – संजय द्विवेदी ज्ञान की नगरी बनारस से एक अच्छी खबर आयी है। भाषाओं की जंग में फंसे देश में ऐसी खबरें राहत भी देती हैं और समाधान भी सुझाती हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एमए हिंदी के छात्र-छात्राएं अब गालिब की शायरी, मीर तकी मीर […] Read more » urdu उर्दू हिंदी
आलोचना पितृसत्ता से भागते तुलसीदास के आलोचक May 4, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on पितृसत्ता से भागते तुलसीदास के आलोचक -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी की अधिकांश आलोचना मर्दवादी है।इसमें पितृसत्ता के प्रति आलोचनात्मक विवेक का अभाव है।आधुनिक आलोचना में धर्मनिरपेक्ष आलोचना का परिप्रेक्ष्य पितृसत्ता से टकराए, उसकी मीमांसा किए बगैर संभव नहीं है। मसलन्, अभी तक तुलसी पर समीक्षा ने लोकवादी जनप्रिय नजरिए से विचार किया है और पितृसत्ता को स्पर्श तक नहीं किया है। आधुनिक […] Read more » Tulsidas तुलसीदास पितृसत्ता