व्यंग्य पेशेवर कांग्रेस August 5, 2017 / August 5, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment पिछले रविवार को शर्मा जी मिले, तो बहुत खुश थे। खुशी ऐसे छलक रही थी, जैसे उबलने के बाद दूध बरतन से बाहर छलकने लगता है। उनके मुखारविन्द से बार-बार एक फिल्मी गीत प्रस्फुटित हो रहा था, ‘‘दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे..।’’ – शर्मा जी, क्या परिवार में कोई […] Read more » Congress Featured पेशेवर कांग्रेस
व्यंग्य कैसी – कैसी आजादी …!! August 5, 2017 / August 5, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा फिर आजादी … आजादी का वह डरावना शोर सचमुच हैरान करने वाला था। समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह कैसी आजादी की मांग है। अभी कुछ महीने पहले ही तो देश की राजधानी में स्थित शिक्षण संस्थान में भी ऐसा ही डरावना शोर उठा था। जिस पर खासा राजनैतिक […] Read more » आजादी
व्यंग्य साहित्य घुन और खत-पतवार August 2, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment एक बार विजयनगर साम्राज्य के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय ने अपने दरबारी तेनालीराम से पूछा कि साल में कितने महीने होते हैं ? तेनाली ने कहा, “दो महाराज।” राजा हैरान हो गये। इस पर वह बोला, “महाराज, वैसे तो महीने बारह हैं; पर यदि उनमें से सावन और भादों निकाल दें, तो फिर बाकी सब […] Read more » Featured खत-पतवार
व्यंग्य साहित्य साहित्य का अग्निपथ July 31, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अमित शर्मा चतुर्वेदी जी मंझे हुए साहित्यकार है। वे हमेशा साहित्यिक साधना में लीन रहते है,उनके चारो और हमेशा साहित्य भिनभिनाता रहता है। साहित्यिक तेवर को ही वे अपना ज़ेवर मानते है। अपनी रचनात्मक चेत “ना” पर सवार होकर वे काफी लंबी साहित्यिक दूरी तय कर चुके है। इतना दूर आने के बाद उन्हें समझ […] Read more » अग्निपथ साहित्य साहित्य का अग्निपथ
व्यंग्य चट तलाक –पट ब्याह July 29, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन अबकी बार तो मुझे पक्का भरोसा है , निशा मौसी का नाम जरूर गिनीज बुक में दर्ज होगा . शाम को तलाक , रात होने से पहले सगाई और दिन निकलते ही फेरे . कमाल है मौसी का भी . शाम को तो लोग- बाग़ फूस –फूस कर रहे थे , अब […] Read more » Featured चट तलाक –पट ब्याह
व्यंग्य जा, तू टमाटर हो जा July 29, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment विजय कुमार बात उन दिनों की है, जब मैं चौथी-पांचवी कक्षा में पढ़ता था। तब टी.वी. भारत में आया नहीं था। रेडियो और टेलिफोन अति दुर्लभ और विलासिता की चीज मानी जाती थी। अखबार भी पूरे मोहल्ले में एक-दो लोग ही मंगाते थे। दोपहर में बुजुर्ग लोग अखबार पढ़ने के लिए उनके घर पहुंच जाते […] Read more » Featured टमाटर
व्यंग्य साहित्य पारदर्शी चंदा, मुसीबत का धंधा July 24, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment जब से वित्त मंत्री अरुण जेतली ने राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाने की बात कही है, तब से कई दलों की नींद हराम है। यद्यपि जेतली ने अभी बस कहा ही है; पर सब जानते हैं कि जेतली ने कहा है, तो सरकार अंदरखाने जरूर कुछ तैयारी कर रही होगी। विपक्ष (और अधिकांश सत्तापक्ष) वालों […] Read more » पारदर्शी चंदा मुसीबत का धंधा
व्यंग्य साहित्य फेसबुक टैगिंग या फिर डिजिटल रैगिंग July 24, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment डिजिटल आपाधापी के इस घोर कलयुग में भी इंसानियत समाप्त नहीं हुई है, अभी भी कई लोग टैग की गई सभी पोस्ट अपनी वाल पर दिखने के लिए allow कर देते है। दया और करुणा का एक्स्ट्रा रिचार्ज करवा कर धरती पर डिलीवर किये गए लोग तो टैग किए जाने पर इतने भावविभोर हो जाते है कि टैग किये जाने को ही अपना सम्मान समारोह समझ लेते है और कमेंट बॉक्स में "थैंक्स फॉर द टैग" लिखकर टैगीत होने के ऋण से उऋण होते है। Read more » Featured डिजिटल रैगिंग फेसबुक टैगिंग
व्यंग्य साहित्य हां, भगवान है July 19, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment अब पटना में देखो। वहां विपक्ष से अधिक बखेड़ा सत्ता पक्ष में ही चल रहा है। पहलवान हर दिन लंगोट लहराते हैं; पर बांधते और लड़ते नहीं। लालू जी का निश्चय है कि उनके घर का हर सदस्य उनकी भ्रष्ट परम्परा को निभाएगा। उन्होंने चारा खाया था, तो बच्चे प्लॉट, मॉल और फार्म हाउस खा रहे हैं। आखिर स्मार्ट फोन और लैपटॉप वाली पीढ़ी अब भी घास और चारा ही खाएगी क्या ? उधर नीतीश कुमार अपने सुशासन मार्का कम्बल से दुखी हैं। पता नहीं उन्होंने कम्बल को पकड़ रखा है या कम्बल ने उन्हें। इस चक्कर में शासन भी ठप्प है और प्रशासन भी। फिर भी हर साल की तरह वहां बाढ़ आ रही है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान का अस्तित्व जरूर हैं। Read more » Featured भगवान
व्यंग्य साहित्य जातिवाद पे सब बलिहारी July 7, 2017 / July 26, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment - जी हां। और प्रतिभा पाटिल के बारे में तो एक कांग्रेसी नेता ने ही कहा था कि उनके हाथ की बनी चाय इंदिरा जी को बहुत पसंद थी। इसलिए वे प्रायः प्रधानमंत्री भवन पहुंच जाती थीं। इसके पुरस्कारस्वरूप ही उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया। ये बात दूसरी है कि इतना कहने पर ही उसे कांग्रेस से बर्खास्त कर दिया गया। सुना तो ये भी गया है कि अवकाश प्राप्ति के बाद वे राष्ट्रपति भवन से काफी कुछ बटोर कर ले गयीं, जिसे फिर उंगली टेढ़ी करने पर ही वापस भेजा। Read more » जातिवाद
व्यंग्य साहित्य इंशा अल्लाह अब मेरे नाम के आगे भी लिखा जाएगा ‘‘बाबाजी का ठुल्लू एवार्ड प्राप्त’’ July 5, 2017 by डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी | Leave a Comment आज सुलेमान काफी संजीदा लग रहा था। मेरे लेखन कक्ष में सामने बैठा पता नहीं कुछ सोच रहा था, मैंने उसे डिस्टर्ब करना भी उचित नहीं समझा था। वह सोच रहा था और मैं लिख रहा था। कुछ देर उपरान्त वह बोल पड़ा- भाई कलमघसीट अब देर मत करो- ऐक्शन में आवो वर्ना……..कुछ हासिल नहीं […] Read more » बाबाजी का ठुल्लू एवार्ड प्राप्त
व्यंग्य जी एस टी –गिव सर्वाइवल टैक्स July 3, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन प्रकृति का सिद्धांत है जो विपरीत परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल पायेगा वही जीवित रहने का अधिकारी है , बाकी खल्लास . डार्विन ने भी बहुत पहले कह दिया था – सर्वाइवल ऑफ़ दि फिट्टेस्ट . अब भी आपको कोई संदेह है , तो आपका राम ही रखवाला है […] Read more » gst जी एस टी