मीडिया मर्यादा उल्लंघन का दंड November 6, 2016 / November 7, 2016 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment मीडिया को ऐसा सब-कुछ परोसने की छूट नहीं मिलनी चाहिए, जो राष्ट्रविरोधी हो ? वैसे भी टेलीविजन दृष्य व श्रव्य माध्यम है और इसका तत्काल व्यापक असर पड़ता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि टीवी पत्रकारिता को नियंत्रण में रखने या सजा देने के नियम हैं ही नहीं। केबल टीवी नेटवर्क (नियम) अधिनियम के तहत काबू करने के कानून हैं। Read more » ban on NDTV मर्यादा उल्लंघन मर्यादा उल्लंघन का दंड
मीडिया सिनेमा खत्म हुई मुश्किल October 25, 2016 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment चूंकि जिन फिल्मों के प्रदर्शन को लेकर विवाद चल रहा है, उन फिल्मों में काम करने वाले कलाकार वैध तरीके से वीजा लेकर काम कर रहे हैं। इसलिए फिल्मों में न तो उन्हें काम देना गलत है और न ही उनका काम करना गलत है। इसलिए इन कलाकारों की फिल्मों पर रोक वैधानिक नहीं कहीं जा सकती थी ? वैसे हमारे यहां अभिव्यक्ति की आजादी को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है। Read more » ‘ऐ दिल है मुश्किल
मीडिया विविधा पाक कलाकारों पर पाबंदी का औचित्य October 23, 2016 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment हालांकि पाक या किसी भी देश के संस्कृतिकर्मियों को आतंकवादियों से न तो तुलना की जा सकती है और न ही उन्हें उस दृष्टि से देखा जा सकता है। वैसे भी भारत ने हमेशा पाक कलाकारों का मान रखा है। पाक गायक कलाकार अदनान सामी को तो भारतीय नागरिकता तक दी है। इसी तरह बांग्लादेश मूल की लेखिका तस्लीमा नसरीन को भारतीय मुस्लिमों के विरोध के बावजूद भारत षरण व संरक्षण दिए हुए हैं। Read more » ban of pakistani artists ban of pakistani artists in hindi cinema Featured pakistani artists in indian cinema पाक कलाकारों पर पाबंदी
मीडिया कथित कलाकारों का कच्चापन….!! October 22, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment फर्क सिर्फ इतना है कि शहरों में नेता चंदे के लिए कारोबारियों के पीछे भागते हैं । वहीं बड़े कारोबारियों के पीछे बड़े राजनेता उनके प्रदेश में निवेश के लिए कि भैया कुछ निवेश हमारे राज्य में भी करो। बड़ी बेरोजगारी है यहां। छोटे हों या बड़े कारोबारी हर खेमे को साधने में गजब का संतुलन दिखाते हैं। देश में जब कभी कलाकारों की राष्ट्रीयता को लेकर विवाद छिड़ता है मुझे अतीत की ऐसी घटनाएं बरबस ही याद आ जाती है। Read more »
मीडिया मुझे भी गालियाँ पड़ती हैं, पर मै आपकी तरह सार्वजनिक रुदन नहीं करता, रवीश कुमार! October 19, 2016 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | 1 Comment on मुझे भी गालियाँ पड़ती हैं, पर मै आपकी तरह सार्वजनिक रुदन नहीं करता, रवीश कुमार! मेरी ही तरह और भी तमाम लेखक मित्रों को ये सब सुनना पड़ता होगा, लेकिन उन्हें भी कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन ऐसी ही प्रतिक्रियाओं से रवीश का जीना मुश्किल हो गया है, तो इसका क्या मतलब समझा जाय ? या तो ये कि उनकी निर्भीकता की सब बातें हवाई हैं अथवा ये कि वे डरने का बहुत अच्छा अभिनय कर रहे हैं। बिलकुल वैसा ही ‘अच्छा अभिनय’ जैसा रवीश की रिपोर्ट में करते थे। सच क्या है, रवीश ही जानें। हाँ, सोए हुए को जगाया जा सकता है, सोने का अभिनय करने वाले को नहीं। पत्रकारिता के छात्रों से भी कहना चाहूँगा कि चयन का अधिकार आपको है, लेकिन अपना पत्रकारीय आदर्श चुनने से पहले महान निर्भीक पत्रकारों की विरासत और अपने वर्तमान चयन की तुलना कर लीजिएगा। Read more » रवीश कुमार
मीडिया पत्रकारिता : मानक नहीं मान्यता बदलना होगी October 15, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment आज के दौर में पत्रकारिता के मानक जो नये बन रहे है वो आने वाली पीढ़ी के साथ भी न्याय नहीं कर रहे है, वर्तमान की कलम ने भविष्य के अध्याय जो लिखने लगे है वो कालांतर में शर्म का विषय बन कर रह जाएँगे | अब तो कोई राजेंद्र माथुर , माखन लाल चतुर्वेदी नहीं बनना चाहता, कोई संघर्ष कर के अस्तिस्व नहीं बचना चाहता ...... हालात इतने बदतर होते जा रहे है की सोच कर भी सिहरन उठ जाती है ,किस दौर में आ गई पत्रकारिता , कैसे कैसे हालत बन गये , आख़िर क्या ज़रूरत थी मानको के साथ खिलवाड़ करने की , कौन सा अध्याय लिख आई ये पीढ़ी पत्रकारिता की अवधारणा में ? Read more » Featured पत्रकारिता
मीडिया सिरील अलमिदा : इसे कहते हैं, पाक पत्रकारिता ! October 13, 2016 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment अलमिदा पर राष्ट्र-द्रोह के आरोप लगाए गए। उन्हें गोपनीयता भंग करने के अपराध में गिरफ्तार करने की मांग की गई और अब उनके विदेश जाने पर रोक लगा दी गई है। सरकार इतनी बौखला गई है कि प्रधानमंत्री और सेनापति को मिलना पड़ा, इस मामले पर विचार करने के लिए। लेकिन ‘डॉन’ के संपादक अड़े हुए हैं Read more » ‘डॉन’ के संवाददाता सिरील अलमिदा Featured अलमिदा अलमिदा पर राष्ट्र-द्रोह के आरोप सिरील अलमिदा
मीडिया विविधा सार्थक पहल एक पाती आदरणीय रविश जी के नाम डॉ नीलम महेंद्र की कलम से October 11, 2016 by डॉ नीलम महेन्द्रा | 3 Comments on एक पाती आदरणीय रविश जी के नाम डॉ नीलम महेंद्र की कलम से अफसोस है कि आप इस देश की मिट्टी से पैदा होने वाले आम आदमी को पहचान नहीं पाए । यह आदमी न तो अमीर होता है न गरीब होता है जब अपनी पर आ जाए तो केवल भारतीय होता है । इनका डीएनए गुरु गोविंद सिंह जी जैसे वीरों का डीएनए है जो इस देश पर एक नहीं अपने चारों पुत्र हंसते हंसते कुर्बान कर देते हैं।इस देश की महिलाओं के डीएनए में रानी लक्ष्मी बाई रानी पद्मिनी का डिएनए है कि देश के लिए स्वयं अपनी जान न्यौछावर कर देती हैं । Read more » Featured
मीडिया पत्रकार हैं पक्षकार नही September 26, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment अर्पण जैन “अविचल” जमाने में बहस जारी है क़ि फलाँ टीवी चैनल उसका समर्थक है, फलाँ इसका | सवाल समर्थन के अधर से शुरू होकर चाटुकारिता के पेट तक पहुँचने में जुटा हुआ है | आख़िर राजा राममोहन राय के आदर्शों से शुरू हुई चिंतन की पराकाष्ठा पर आज मीडिया के कई मानवीय मूल्य दाँव […] Read more » Featured पक्षकार पत्रकार
मीडिया डीएवीपी की विज्ञापन नीति में संशोधन क्यों ? September 19, 2016 by मयंक चतुर्वेदी | Leave a Comment डॉ. मयंक चतुर्वेदी विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) की विज्ञापन नीति में पहले भारत सरकार की ओर से देश की तीन बड़ी संवाद समितियों को वरीयता दी गई थी, साथ में सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं से कहा गया था कि इन तीन में से किसी एक की सेवाएं लेना अनिवार्य है। जैसे ही यह निर्देश […] Read more » Featured डीएवीपी डीएवीपी की विज्ञापन नीति में संशोधन
मीडिया हिंदी दिवस हिंदी दुनिया की जरूरत है September 13, 2016 by मयंक चतुर्वेदी | 1 Comment on हिंदी दुनिया की जरूरत है डॉ. मयंक चतुर्वेदी भाषा के बारे में कहा जाता है कि वह स्व प्रवाहित होती है, आप चाहकर भी उसे रोक नहीं सकते । विश्व में कोई नहीं जिसका कार्य भाषा बिना चलता हो । मनुष्य की बात एक बार को छोड़ भी दीजिए तो पशु, पक्षी, कीट और पतंग भी अपने स्तर पर किसी […] Read more » हिंदी
मीडिया हिंदी दिवस स्वाधीन चेतना की भाषा हिन्दी की उपेक्षा क्यों? September 13, 2016 by मनोज कुमार | 1 Comment on स्वाधीन चेतना की भाषा हिन्दी की उपेक्षा क्यों? मनोज कुमार हिन्दी को लेकर भारतीय मन संवेदनशील है लेकिन उसका गुजारा अंग्रेजी के बिना नहीं होता है। सालों गुजर गए हिन्दी को राष्ट्रभाषा का मान दिलाने का प्रण ठाने लेकिन हिन्दी आज भी बिसूरती हुई अपनी हालत पर खड़ी है। हर साल सितम्बर का महीना हिन्दी के नाम होता है और बाकि के 11 […] Read more » Featured Hindi Diwas स्वाधीन चेतना की भाषा हिन्दी की उपेक्षा