मीडिया मीडिया का बाजारवाद August 10, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 1 Comment on मीडिया का बाजारवाद मनोज कुमार मीडिया का बाजारवाद कहें अथवा बाजार का मीडिया, दोनों ही अर्थों में मीडिया और बाजार एक-दूसरे के पर्याय हैं। मीडिया का बाजार के बिना और बाजार का मीडिया के बिना गुजारा नहीं है। दरअसल, दोनों ही एक सायकल के दो पहिये के समान हैं जहां एक पहिया बाहर हुआ तो सायकल विकलांग होने […] Read more » मीडिया का बाजारवाद
मीडिया विधि-कानून विविधा आरटीआर्इ के दायरे में राजनीतिक दल June 10, 2013 / June 10, 2013 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव राजनीतिक दलों में पारदर्शिता लाने के नजरिये से इन्हें आरटीआर्इ के दायरे में लाना एक ऐतिहासिक घटना है। केंद्रीय सूचना आयोग ने राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाकर उल्लेखनीय पहल की है। अब प्रमुख दल मांगे गए सवाल का जवाब देने के लिए बाध्यकारी होंगे। अब चिंता यही […] Read more » आरटीआर्इ आरटीआर्इ के दायरे में राजनीतिक दल राजनीतिक दल
मीडिया राजनीति समाज जब अन्याय और अत्याचार चर्म पर पहुँचता है तो नक्सलवाद जन्मता है! June 3, 2013 / June 3, 2013 by डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' | 1 Comment on जब अन्याय और अत्याचार चर्म पर पहुँचता है तो नक्सलवाद जन्मता है! छत्तीसगढ में नक्सलियों के हमले में अनेक निर्दोष लोगों सहित वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के मारे जाने के बाद देशभर में एक बार फिर से नक्सलवाद को लेकर गरमागर्म चर्चा जारी है। यह अलग बात है कि नक्सलवादियों द्वारा पिछले कई वर्षों से लगातार निर्दोष लोगों की हत्याएँ की जाती रही हैं, लेकिन इस बारे में […] Read more » जब अन्याय और अत्याचार चर्म पर पहुँचता है तो नक्सलवाद जन्मता है!
मीडिया कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे May 30, 2013 / May 31, 2013 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | 1 Comment on कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे सिद्धार्थ मिश्र”स्वतंत्र” एक बहुत पुराना गीत है “कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे” । आज सुबह इस गीत को सुन रहा था कि अचानक कुछ विचार मन में कौंध उठे । बेहद अर्थपूर्ण ये गीत आज वाकई हिंदी पत्रकारिता की दुर्दशा को स्वर देता प्रतीत हुआ । भारतीय पत्रकारिता का उद्भव गुलामी के विषम काल […] Read more » पत्रकारिता
मीडिया डमी मीडिया का समाजवाद May 24, 2013 / May 24, 2013 by विकास कुमार गुप्ता | 2 Comments on डमी मीडिया का समाजवाद पत्रकार-सर हम ब्यूरो चीफ है। स्त्रैण आवाज में बोलते हुए ”सर हम आपकी पत्रिका से जुड़ना चाहते है।“ मैगजीन देखने के बाद और फिर आवाज को थोड़ा मजबूत करते हुए, ”आपकी मैगजीन में तो विज्ञापन दिख ही नहीं रहा। आप इस पत्रिका और अखबार को देखियें। यह अखबार तो चलता भी नहीं। इशारा करते हुए […] Read more » डमी मीडिया का समाजवाद
मीडिया व्यवसायिक हितों के लिए आम आदमी को दाव पर लगा रहा है मीडिया May 7, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 1 Comment on व्यवसायिक हितों के लिए आम आदमी को दाव पर लगा रहा है मीडिया पिछले दिनों पाक जेल में हुई भारतीय कैदी सरबजीत की मौत से पूरा देश गुस्से से लाल दिखा। हर तरफ पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगे। लोग भारत सरकार से ये मांग कर रहे थे कि वो पकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अपनाये। लेकिन क्या वास्तव में सरबजीत की मौत के लिए पूरी तरीके से पाक सरकार जिम्मेदार है? […] Read more » extent of media influence of media
मीडिया न्यू मीडिया : औजार या हथियार April 8, 2013 / April 8, 2013 by राजीव पाठक | Leave a Comment न्यू मीडिया या मीडिया भारत के गाँव के लिए अभी भी एक नई कहानी से ज्यादा और कुछ नहीं है । आज भी मीडिया से ताल्लुकात रखने वाले लोग इसके किताबी और व्यावहारिक गुत्थियों में उलझ्तें हैं । लेकिन भारत का बहुत बड़ा तबका यानि ग्रामीण हिस्सा एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा है जहाँ […] Read more »
मीडिया साहित्य व शिष्टता से दूर होती पत्रकारिता February 21, 2013 / February 21, 2013 by निर्मल रानी | 4 Comments on साहित्य व शिष्टता से दूर होती पत्रकारिता निर्मल रानी आधुनिकता के वर्तमान दौर में परिवर्तन की एक व्यापक बयार चलती देखी जा रही है। खान-पान, पहनावा,रहन-सहन,सोच-फिक्र, शिष्टाचार, पढ़ाई-लिखाई, रिश्ते-नाते, अच्छे-बुरे की परिभाषा आदि सबकुछ परिवर्तित होते देखा जा रहा है। ज़ाहिर है पत्रकारिता जैसा जि़म्मेदारीभरा पेश भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं है। परंतु परिवर्तन के इस दौर में तमाम क्षेत्रों में […] Read more » Journalism साहित्य व शिष्टता से दूर होती पत्रकारिता
मीडिया विवाद टाइम्स February 6, 2013 / February 6, 2013 by विजय कुमार | 2 Comments on विवाद टाइम्स विजय कुमार शर्मा जी खाली बैठे-बैठे अब ऊबने लगे थे। उनकी पत्नी भी चाहती थी कि वे किसी धंधे से लगकर दिन भर बाहर रहें, जिससे वे अपने पड़ोस की महिलाओं के साथ बैठकर बात कर सकें। दो-चार दिन ऐसा न होने पर उनके पेट में दर्द होने लगता था। इधर सेठ चंदूलाल चमचाकर एक […] Read more »
मीडिया समाज देश को बदनाम करती बेलगाम कट्टरपंथी ताक़तें February 2, 2013 / February 2, 2013 by निर्मल रानी | 2 Comments on देश को बदनाम करती बेलगाम कट्टरपंथी ताक़तें निर्मल रानी भारत में विभिन्न धर्मों में सक्रिय कट्टरपंथी शक्तियां अपने ज़हरीले व नापाक अभियान को आगे बढ़ाने में अपनी पूरी ताक़त झोंके हुए हैं। परिणामस्वरूप देश में सांप्रदायिक सद्भाव बढऩे के बजाए नफरत का बाज़ार गर्म होता जा रहा है। और इसके नतीजे हमें समय-समय पर अलग-अलग रूप में देखने को मिलते रहते हैं। […] Read more »
मीडिया संन्यासी का संचार शास्त्र January 29, 2013 by संजय द्विवेदी | Leave a Comment संजय द्विवेदी स्वामी विवेकानंद ज्यादा बड़े संन्यासी थे या उससे बड़े संचारक (कम्युनिकेटर) या फिर उससे बड़े प्रबंधक ? ये सवाल हैरत में जरूर डालेगा पर उत्तर हैरत में डालनेवाला नहीं है क्योंकि वे एक नहीं,तीनों ही क्षेत्रों में शिखर पर हैं। वे एक अच्छे कम्युनिकेटर हैं, प्रबंधक हैं और संन्यासी तो वे हैं ही। […] Read more » संचार स्वामी विवेकानंद
मीडिया उपेक्षित है ग्रामीण पत्रकारिता January 13, 2013 / January 13, 2013 by डॉ0 आशीष वशिष्ठ | Leave a Comment डॉ. आशीष वशिष्ठ ग्रामीण परिवेश तथा ग्रामीण जन के प्रति भारतीय जनमानस में गहरी संवेदनाएं हैं. प्रेमचंद, रेणु, शरतचंद्र, नागार्जुन जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने ग्रामीण परिवेश पर काफी कुछ लिखा है, मगर आज भी ग्रामीण पत्रकारिता की दयनीय स्थिति काफी कचोटती है. कुछ क्षेत्रीय समाचार पत्रों को छोड़ दें, तो ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति संतोषजनक […] Read more » rural journalism