राजनीति अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह को लेकर महाराष्ट्र सरकार का प्रगतिशील कदम June 15, 2018 / June 15, 2018 by जावेद अनीस | Leave a Comment जावेद अनीस 6 मई 2018 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खबर के अनुसार महाराष्ट्र सरकार अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए कानून बनाने पर विचार कर रही है ताकि अपनी जाति,धर्म से बाहर प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को सुरक्षा प्रदान किया जा सके. इसको लेकर राज्य के सामाजिक न्याय […] Read more » “विशेष विवाह अधिनियम” Featured अंतर-जाति व अंतर-धर्म विवाह अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह को लेकर महाराष्ट्र सरकार का प्रगतिशील कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण र महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हिन्दू-मुस्लिम
राजनीति इन्दिरा गांधी घोषित आपात्काल में , अमरिका का संघ स्वयंसेवक June 15, 2018 / June 15, 2018 by डॉ. मधुसूदन | 4 Comments on इन्दिरा गांधी घोषित आपात्काल में , अमरिका का संघ स्वयंसेवक डॉ. मधुसूदन कुछ लोग अलग ही मिट्टी के बने होते हैं. जब संसार समस्याओं से दूर भागता है, तब ये लोग समस्याओं के बवण्डर में साहस से घुसते हैं; आगे बढते हैं; समाज को संगठित कर संकट का सामना करते हैं. ऐसे कठिन प्रकल्प सिरपर लेनेवाले वीर विरला ही होते हैं. जब इन्दिराजी ने १९७६ […] Read more » Featured अमरिका का संघ स्वयंसेवक इन्दिरा गांधी घोषित आपात्काल में डॉ. फारुख प्रेसवाला डॉ. मुकुन्द मोदी डॉ. हसमुख शाह सुभाष मेहता
राजनीति राजनीतिक दलों की मतभिन्नता देश के लिए एक अभिशाप June 15, 2018 / June 15, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य लोकतंत्र मतभिन्नता की अनुमति इसलिए देता है कि अंत में सब पक्षों में मतैक्यता हो जाये। किसी भी विषय में गुणावगुण पर सब पक्ष खुलकर बहस करें और फिर किसी एक सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुंच कर एक मत हो जाएं। भारतवर्ष के संविधान ने लोगों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसलिए […] Read more » Featured कांग्रेस क्षेत्र जाति देश के लिए एक अभिशाप भाजपा भाषा राजनीतिक दलों की मतभिन्नता लिंग संप्रदाय
राजनीति समाज भारत में ब्लड बैंक सिस्टम सुधारने की आवश्यकता June 14, 2018 / June 14, 2018 by देवेंद्रराज सुथार | Leave a Comment देवेंद्रराज सुथार रक्तदान जिंदगी, से जूझ रहे लोगों को नया जीवन प्रदान करता हैं। इसलिए रक्तदान को महानदान व जीवनदान कहा गया है। रक्तदान के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने व रक्त की ज़रूरत पड़ने पर उसके लिए पैसे देने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए जैसे उद्देश्यों को ध्यान में रखकर विश्व स्वास्थ्य संगठन […] Read more » Featured आंध्र प्रदेश पश्चिम बंगाल भारत में ब्लड बैंक सिस्टम सुधारने की आवश्यकता मध्यप्रदेश महाराष्ट्र रक्तदान जिंदगी हिमाचल प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह
राजनीति विश्ववार्ता अमेरिका में प्रवासी भारतीय संकट में June 14, 2018 / June 14, 2018 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव अमेरिकी नागरिक बन जाने की प्रबल इच्छा रखने वाले भारतियों के लिए बुरी खबर सामने आई है। यहां ग्रीन कार्ड प्राप्त करने वालों की सूची इतनी लंबी हो गई है कि कई लोगों को 92 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है। इतनी लंबी प्रतिक्षा वहीं कर सकते हैं, जिन्हें भगवान ने सवा […] Read more » Featured अमेरिका जाॅर्ज वाशिंगटन बेरोजगारी भारत सरकार में प्रवासी भारतीय संकट में
राजनीति पढ़े लिखे लोगों को मूर्ख बनाने की कला में माहिर है केजरीवाल June 13, 2018 / June 13, 2018 by डॉ. मनीष कुमार | Leave a Comment डॉ मनीष कुमार एक पुरानी कहावत है, भैंस अगर पूंछ उठाएगी तो गोबर ही करेगी. लेकिन केजरीवाल के केस में ये कहावत केजरीवाल के मुंह पर लागू होती है. केजरीवाल एक पेशेवर झूठे व्यक्ति हैं. ये झूठ बोल कर लोगों को झांसा देने को ही वो राजनीति समझते हैं. वो एक आत्मकामी (narcissist) व्यक्ति है […] Read more » Featured आंदोलन केजरीवाल पढ़े लिखे लोगों भ्रष्टाचार मायावती मूर्ख बनाने की कला में माहिर है केजरीवाल लालू यादव संविधान निर्माताओं
राजनीति मध्यप्रदेश के लिये अमित शाह का नया गेम प्लान June 13, 2018 / June 13, 2018 by जावेद अनीस | Leave a Comment जावेद अनीस भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पिछले साल अगस्त महीने में जब भोपाल आये थे तो उन्होंने ऐलान किया था कि 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से शिवराज सिंह चौहान चेहरा होगें और उनके अलावा किसी दूसरे नाम पर विचार नहीं किया जाएगा. मध्यप्रदेश में इस साल के […] Read more » Featured अमित शाह गेम प्लान भाजपा मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव शिवराजसिंह
राजनीति सरकार में ताजा हवा का झोंका June 12, 2018 / June 12, 2018 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में अब 10 संयुक्त सचिव नियुक्त किए जाएंगे, जो कि बाहर से लिये जाएंगे। वैसे संयुक्त सचिव के ऊंचे पद तक वे ही सरकारी अफसर पदोन्नति के जरिए पहुंच पाते हैं, जो पहले से सरकारी नौकरियों में होते हैं। इस नई पहल का विरोध कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से […] Read more » 10 संयुक्त सचिव नियुक्त 1993 में रुसी मोदी को एयर इंडिया Featured भारत सरकार विभिन्न मंत्रालयों समाजवादी या कम्युनिस्ट या कांग्रेस विचारधारा सरकार में ताजा हवा का झोंका
राजनीति नौकरशाही में नये प्रयोग की सार्थकता June 11, 2018 / June 11, 2018 by ललित गर्ग | Leave a Comment ललित गर्ग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया भारत निर्मित करना चाहते हैं, इसके लिये देश के प्रशासनिक क्षेत्र को सशक्त बनाने एवं नौकरशाही को दक्ष, प्रभावी एवं कार्यकारी बनाने की तीव्र आवश्यकता है। नौकरशाही को प्रभावी, सक्षम एवं कार्यक्षम बनाने और उसमें नए तौर-तरीकों को समाहित करने के इरादे से संयुक्त सचिव पद के स्तर पर […] Read more » Featured आर्थिक मामले की सार्थकता कृषि नवीकरणीय ऊर्जा नागरिक उड्डयन और वाणिज्य नौकरशाही में नये प्रयोग पर्यावरण पोत परिवहन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजस्व वित्तीय सेवा सड़क परिवहन एवं राजमार्ग सामाजिक व राष्ट्रीय ढांचे
राजनीति समाज “इफ़्तारनामा” : ज़रूरत, धर्म के मर्म को समझने की June 11, 2018 / June 11, 2018 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तनवीर जाफ़री ‘इफ़्तार’ उस प्रक्रिया का नाम है जो मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा माह-ए-रमज़ान में रखे जाने वाले रोज़े के समापन के समय अमल में लाई जाती है। सीधे शब्दों में रोज़ा अथवा व्रत खोलने को इफ़्तार कहा जाता है। भारतवर्ष चूंकि एक धर्मनिरपेक्ष देश है इसलिए यहां मुसलमानों द्वारा कठिन से कठिन […] Read more » "इफ़्तारनामा" : ज़रूरत Featured अतार्किक अधार्मिक व अमानवीय क़िस्म इफ़्तार पार्टियां धर्म के मर्म को समझने की बेबुनियाद मुख्यमंत्री आवासों राजभवनों विभिन्न राजनैतिक दलों सरकारी व ग़ैर सरकारी कार्यालयों
राजनीति विश्ववार्ता शांघाई में नए आयाम June 11, 2018 / June 11, 2018 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment डॉ. वैदिक शांघाई सहयोग संगठन की यह बैठक इस दृष्टि से महत्वपूर्ण थी कि पिछले 17 साल में भारत और पाकिस्तान, इसके दो पूर्ण सदस्य बने। चीन के चिंगदाओ नगर में संपन्न होनेवाली इस बैठक में भारत के प्रधानमंत्री ने पहली बार भाग लिया। भारत इसके पहले भी इसकी बैठकों में जाता रहा है लेकिन […] Read more » Featured अमेरिका चीन और रुस ब्रह्मपुत्र नदी भारत भारत और पाकिस्तान शांघाई में नए आयाम
राजनीति आरक्षण या संरक्षण ? June 10, 2018 / June 10, 2022 by अरूण कुमार जैन | Leave a Comment आरक्षण एक पूर्णरूपेण व्यवस्था है जिसमें पालन-पोषण, सुरक्षा इत्यादि स्वतः ही समाहित हो जाती है। जिस प्रकार माता-पिता का बच्चों को संरक्षण प्राप्त होता है उसे स्वाभाविक ;छंजनतंसद्ध संरक्षण कहा जाता है जबकि किसी एक देश के व्यक्ति को दूसरे देश में संरक्षण प्राप्त होता है तो उसे राजनीतिक संरक्षण कहा जाता है यानी संरक्षण के प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इस संरक्षण का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि संसाधनों के अभाव में किसी का पालन-पोषण एवं विकास रुक न जाये। इसको यदि उदाहरण के तौर पर देखा जाये तो जब कोई बच्चा अनाथ हो जाता है या उसके मां-बाप या संरक्षक उसका पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं होते हैं तो उसकी जिम्मेदारी जो लोग स्वतः लेते हैं या जिन्हें आग्रह करके दिया जाता है, ऐसे लोग संरक्षक की भूमिका में आ जाते हैं एवं इस पूरी प्रक्रिया को संरक्षणवाद कहा जा सकता है। यह संरक्षण सामाजिक स्तर पर भी हो सकता है तो इसका आधार पारिवारिक या किसी भी रूप में हो सकता है किंतु इसे जब संवैधानिक तौर-तरीकों या कानूनी रूप से किया जाता है तो निश्चित रूप से इसका पूरा तरीका बदल जाता है और सही अर्थों में देखा जाये तो इसे ही आरक्षण कहा जाता है। आरक्षण संरक्षण से भिन्न शब्द है जो कि एक अल्पकालिक सुविधा है चाहे वह किसी बस, टेªेन, हवाई जहाज या सिनेमा हाल में हो या यूं कहिए कि जहां पर आवेदन-निवेदन करने के पश्चात निश्चित समय के लिए प्राप्त हुई यह सुविधा का समय रहता है। तब तक इसमें अधिकार समाहित रहता है मगर यह अधिकार समय सीमा की समाप्ति पर स्वतः ही समाप्त हो जाता है। भारतीय संविधान में जिस उद्देश्य से, जिस लक्ष्य को लेकर आरक्षण व्यवस्था की गयी है उसके मूल में जाकर हम देखते हैं तो ज्ञात होता है कि एक वर्ग जो कि सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से समाज की मुख्य धारा से कटा हुआ है, उसके लिए एक सक्षम प्रतिनिधित्व तैयार हो सके, ऐसा सोचकर ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति’ शब्द को संविधान में शामिल किया जाये और इसी कड़ी में अत्यंत पिछड़े वर्ग को भी सम्मिलित कर दिया जाये। आरक्षण का उद्देश्य मूलतः सामाजिक आरक्षण को राजनीति के माध्यम से आरक्षण था और उसका प्रावधान दस वर्ष तक के लिए था परंतु राजनीतिक ठेकेदारों ने समाजोत्थान की इस भावना को धूमिल कर एवं तोड़-मरोड़कर राजनीतिक कारणों से सामाजिक आरक्षण को जातिगत या जाति आधारित आरक्षण बना दिया। आज स्थिति यह है कि तमाम जातियां इस आरक्षण की श्रेणी में आने के लिए बेचैन हैं और संघर्ष भी कर रही हैं। राजस्थान में गुर्जरों का आरक्षण पाने के लिए जो संघर्ष रहा है उससे अन्य जातियां भी प्रेरित हो रही हैं। ऐसे में स्थिति यह भी बन सकती है कि कौन-सी जाति आरक्षण के योग्य नहीं है। बहस का विषय यह होगा। इस देश में तमाम ऐसे नेता हैं जिनका मानना है कि कुछ लोग आरक्षण समाप्त करने की बात कर रहे हैं, जबकि अभी तो आरक्षण मांगने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। स्थिति यदि ऐसे ही रही तो भविष्य में चर्चा इस बात की होगी कि कौन-सी जाति आरक्षण से बाहर रहेगी और 100 प्रतिशत में कितना हिस्सा ऐसा होगा जो आरक्षण की श्रेणी से बाहर होगा। आरक्षण के कारणों से जिस प्रकार खंडित भावनाओं की उत्पत्ति में बढ़ोत्तरी हुई है वह देश के लिए आत्मघाती है। इस आरक्षण के कारण क्षेत्राीय, जातीय और भाषायी आधार पर आरक्षण की मांगों का प्रतिपादन हुआ है। अपनी राजनीतिक पूर्ति के लिए नेताओं ने सत्ता लोलुपता के कारण समय-समय पर इन भावनाओं को भड़काया, उकसाया एवं हवा भी दी और अपनी राजनीतिक रोटियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए देश भावना को दिन-प्रतिदिन खंडित कर रहे हैं। जब कोई व्यक्ति सर्वोच्च पद पर पहुंच जाता है तो वह देश का प्रतिनिधित्व करता है न कि किसी वर्ग, जाति और क्षेत्रा का। आज के राजनीतिज्ञ इन सब बातों को जानते एवं समझते हुए भी अपने को देशभक्ति से ओत-प्रोत बताते हुए भी सत्ता लोलुपता के कारण इन सभी पहलुओं को ध्वस्त कर, पूरे देश में विघटनकारी वातावरण बनाये रखना चाहते हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, संविधान निर्माता डॉ. भीम राव अंबेडकर, लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, इंदिरा गांधी, जय प्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, अब्दुल कलाम जैसे राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय नेता हुए हैं जिन्होंने विघटनकारी ताकतों को कभी भी प्रोत्साहित नहीं किया और अपनी कार्यशैली से समय-समय पर राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा दी। ऐसे में अगर हम उनकी जाति, क्षेत्रा या भाषा आधारित बातें करें या उन्हें जानें तो यह सरासर बेमानी होगा। आज देखने में आ रहा है कि अपनी-अपनी जाति एवं मजहब के हिसाब से लोगों ने महापुरुषों का बंटवारा कर लिया है। राष्ट्र एवं समाज के लिए किस महापुरुष की क्या भूमिका रही है, इस पर विचार किये बिना लोग अपनी-अपनी राजनीति के हिसाब से महापुरुषों को आधार बनाकर राजनीति करने में मशगूल हैं जबकि इसके परिणाम बहुत घातक हो सकते हैं और इससे समाज बिखराव की तरफ और बढ़ता जायेगा। मजहब, जाति एवं वर्ग पर आधारित राजनीति करने वालों को यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि वे तभी तक अपनी राजनीतिक रोटी सेंक पायेंगे, जब तक समाज में सुख-शांति बनी हुई है। अन्यथा राजनीति करने वालों के मंसूबे धरे के धरे रह जायेंगे? क्या ऐसे लोगों के लिए सीरिया जैसी स्थिति में राजनीति कर पाना आसान होगा? जातीय भावानाओं को भड़काने का एक मामला उस समय बहुत व्यापक रूप से देखने को मिला जब पूरे देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बंद का आह्वान किया गया। दरअसल, पूरे मामले में विचार किया जाये तो 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया था उसके तहत अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून में मुख्य बात यह थी कि सुप्रीम कोर्ट इस कानून के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत की अनुमति प्रदान कर दी और बिना पूरी छानबीन के गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला इसलिए दिया कि अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून के दुरुपयोग की खबरें लंबे समय से सुनने को मिलती रही हैं। इस लिहाज से देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट ने सराहनीय कार्य किया है किंतु सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले के विरोध में कुछ संगठनों एवं व्यक्तियों द्वारा विवादास्पद बयान दिया गया और उससे राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया। इन बयानों से अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग में संदेह एवं असुरक्षा का भाव उत्पन्न हुआ जिसके कारण सामाजिक स्तर पर विद्वेष का वातावरण निर्मित हुआ, जबकि इस देश में तमाम ऐसे उदाहरण सामने हैं जिनमें इसी कानून के तहत दर्ज मामलों में गिरफ्तारी तब तक नहीं हुई जब तक कि पूरी छानबीन नहीं हुईं। कुल मिलाकर स्थिति इस प्रकार की बनी कि यदि किसी से यह कह दिया जाये कि उसका कान लेकर कोई कौवा भाग रहा है और वह व्यक्ति अपने कान की तहकीकात किये बिना ही उस कौवे के पीछे दौड़ पड़े और जब उसे यह एहसास हो कि उसका कान तो उसके पास ही है। ऐसे में उस व्यक्ति के पास पछताने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता है। कुछ इसी प्रकार की स्थिति अपने देश में तमाम मामलों में देखने को मिल रही है। बात सिर्फ आरक्षण की नहीं बल्कि तमाम मामलों में ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस प्रकार की स्थिति में किसका भला होने वाला है? सच्चाई तो यह है कि संविधान में आरक्षण की परिकल्पना पर स्वयं डॉ. अंबेडकर का मानना था कि कहीं यह लोगों के लिए मात्रा बैसाखी बनकर न रह जाये और लोग इसी पर आश्रित होकर न रह जायें। बाबा साहब का यह भी मानना था कि आरक्षण की वजह से गुणवत्ता प्रभावित न हो, उस समय बाबा साहब के मन में जो भी आशंका थी वह पूरी तरह सही साबित हो रही है। आरक्षण की बात की जाये तो भाजपा के वरिष्ठ नेता विनय कटियार ने बहुत पहले कहा था कि यदि कोई व्यक्ति एक बार आरक्षित सीट से चुनाव लड़ लेता है तो दुबारा उसे स्वतः ही छोड़ देना चाहिए और उसे अपना भाग्य किसी सामान्य सीट से आजमाना चाहिए और आरक्षित सीट से किसी कमजोर भाई-बहन को सक्षम बनने का अवसर प्रदान होने देना चाहिए, किंतु वर्तमान समय में कितने ऐसे लोग हैं जो इस फार्मूले पर सहमत होंगे क्योंकि देखने में आ रहा है कि एक बार जिसने आरक्षणरूपी मलाई का स्वाद चख लिया है वह छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। इस व्यवस्था से पूरे वर्ग या समुदाय का भला नहीं हो पा रहा है। आरक्षण वंचितों एवं आर्थिक दृष्टि से कमजोर व्यक्तियों के लिए एक अस्थायी प्रावधान है। इसको स्थायित्व प्रदान करने का कोई प्रावधान न था और न ही इसके लिए किसी ने प्रयास किया मगर राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए नेतागण इसको संरक्षण हर पल देते रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी नेता एवं सामाजिक क्षेत्रा में काम करने वाले लोग इस बात के लिए प्रयास करें कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः’ यानी सभी सुखी हों, सभी निरोग हों। भारतीय सभ्यता-संस्कृति में यह बात बहुत गहराई से निहित है कि जब पूरी दुनिया में अमन-चैन होगा तभी हम भी सुख-शांति से रह पायेंगे। भारत के पड़ोसी देशों में यदि अशांति होगी तो भारत में कहां से शांति आयेगी? इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के परमाणु बम यदि आतंकियों के हाथ लग गये तो क्या होगा? अतः, […] Read more » Reservation or protection? आरक्षण या संरक्षण