सपनों के पर
Updated: May 17, 2025
चिड़िया सी उड़े, सपनों की डोर,आसमान छूने का हो हर ओर शोर।नन्हे पंखों में हो इतनी ताक़त,हर मुश्किल से लड़ने का हो हिम्मत। तारों की…
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दूरसंचार क्रांति : कबूतर से की-बोर्ड तक का “सफर”
Updated: May 17, 2025
विश्व दूरसंचार दिवस 17 मई पर विशेष… प्रदीप कुमार वर्मा प्राचीन काल में कोई संदेश या कोई चिट्ठी भेजने के लिए कबूतरों या फिर दूत और संदेशवाहक की परंपरा देखने को मिलती है। डाक सेवा के शुरू होने के बाद में पोस्टमैन से यह काम करते थे लेकिन समय के साथ बदलते दौर में अब सूचना और संदेश के भेजने की प्रकृति तथा जरिया भी बदल चुका है। आज इंटरनेट की वजह से संदेश पहुंचाना आसान हो गया है। आज का युग सूचना का युग है। इसी वजह है कि बदले जमाने में “दूरसंचार” ने पृथ्वी और आकाश की सम्पूर्ण दूरी को मिटा दिया है। दूरसंचार क्रांति के माध्यम से ना केवल देश,अपितु विश्व के कोने-कोने में सूचनाओं का आदान-प्रदान तीव्र गति से हो रहा है। यही वजह है कि आज फोन, मोबाइल और इंटरनेट लोगों की प्रथम आवश्यकता बन गये हैं। दूरसंचार क्रांति का ही असर है कि अब सूचना का सफर कबूतर से लेकर कीबोर्ड तक आ चुका है। दूरसंचार का उदेश्य था कि देश दुनिया के हर आदमी तक सूचना पंहुचे ओर संचार सुलभ हो। इसलिए विश्व दूरसंचार दिवस के दिन सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के फायदों के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा की जाती है। यह दिन अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ की स्थापना और साल 1865 में पहले अंतर्राष्ट्रीय टेलीग्राफ समझौते पर हस्ताक्षर होने की याद में मनाया जाता है। मार्च 2006 में एक प्रस्ताव को अपनाया गया था, जिसमें कहा गया है कि हर साल 17 मई को विश्व सूचना समाज दिवस मनाया जाएगा। विश्व दूरसंचार दिवस मनाने की परंपरा 17 मई 1865 में शुरू हुई थी लेकिन आधुनिक समय में इसकी शुरुआत वर्ष 1969 में हुई। तभी से पूरे विश्व में इसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भारत में दूरसंचार क्रांति के अतीत के बारे में पता चलता है कि वर्ष 1880 में दो टेलीफोन कंपनियों ‘द ओरिएंटल टेलीफोन कंपनी लिमिटेड’ और ‘एंग्लो इंडियन टेलीफोन कंपनी लिमिटेड’ ने भारत में टेलीफोन एक्सचेंज की स्थापना करने के लिए भारत सरकार से संपर्क किया। इस अनुमति को इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया गया कि टेलीफोन की स्थापना करना सरकार का एकाधिकार था और सरकार खुद यह काम शुरू करेगी। इसके बाद वर्ष 1881 में सरकार ने अपने पहले के फैसले के ख़िलाफ़ जाकर इंग्लैंड की ‘ओरिएंटल टेलीफोन कंपनी लिमिटेड’ को कोलकाता, मुंबई, मद्रास (चेन्नई) और अहमदाबाद में टेलीफोन एक्सचेंज खोलने के लिए लाइसेंस दिया। इससे 1881 में देश में पहली औपचारिक टेलीफोन सेवा की स्थापना हुई। इसी क्रम में 28 जनवरी, 1882 भारत के टेलीफोन इतिहास में ‘रेड लेटर डे’ है। इस दिन भारत के तत्कालीन गवर्नर-जनरल काउंसिल के सदस्य मेजर ई. बैरिंग ने कोलकाता, चेन्नई और मुंबई में टेलीफोन एक्सचेंज खोलने की घोषणा की। कोलकाता के एक्सचेंज का नाम ‘केंद्रीय एक्सचेंज’ था। केंद्रीय टेलीफोन एक्सचेंज के 93 ग्राहक थे। मुंबई में भी 1882 में ऐसे ही टेलीफोन एक्सचेंज का उद्घाटन किया गया था। इसके बाद में संचार क्रांति में बदलाव आया और 2जी के बाद 3जी, 4जी तथा 5 जी स्पेक्ट्रम के जरिए मोबाइल सेवा अस्तित्व में आई। दूरसंचार के क्षेत्र में इंटरनेट के जरिये हमें घर में मोबाइल , कंप्यूटर, लैपटॉप,या टीवी में देखने में मिलता है। वर्तमान समय में दूरसंचार का एक बहुत बड़ा हिस्सा इंटरनेट है। इसमें कोई शक नहीं है कि जिन लोगों की पहुंच इंटरनेट तक है, उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। दूरसंचार की सहायता से हम ऑनलाइन मोबाइल के द्वारा बिजली एवं नल का बिल, डिस्क रिचार्ज, बैंकिंग, बीमा तथा अन्य काम अपने घर में बैठे-बैठे ही पूरा कर सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा फायदा महिला, बच्चे तथा बुजुर्गों को मिलता है। जिनके लिए यह सभी काम बहुत आसान और आरामदायक बन जाते है। इंटरनेट के जरिए हम असंख्य सूचनाओं को पलक झपकते ही मात्र कुछ चंद सेकेंड में प्राप्त कर लेते हैं। इंटरनेट सिर्फ सूचनाओं के लिहाज से ही नहीं, बल्कि सोशल नेटवर्किग के लिए अब अहम बन चुका है। गूगल के ई-मेल, अन्य सोशल मीडिया के माध्यम जैसे फेसबुक, स्नैपचैट, इंस्टाग्राम, थ्रेड तथा अन्य सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए से हजारों किलोमीटर की दूरियां सिमट कर अब चंद सेकेंड के फासले में बदल गयी हैं। …
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अंतर समीक्षा में चूक करती भारतीय राजनीति
Updated: May 21, 2025
पहलगाम आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री श्री मोदी ने जिस प्रकार देश का नेतृत्व किया है, उससे उनके व्यक्तित्व में और चार चांद लग गए…
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युद्ध विराम के फलादेश
Updated: May 16, 2025
विजय सहगल 11 मई 2025 को भारत पाकिस्तान के बीच चल रहे युद्ध के बीच, दोनों देशों के मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशकों के बीच जैसे ही…
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क्या सुप्रीम कोर्ट के नहले पर राष्ट्रपति के दहले से निकल पाएगा कोई सर्वमान्य हल
Updated: May 16, 2025
कमलेश पांडेय भारत में विधायिका-कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका का टकराव अब कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधेयक पर फैसला लेने की समयसीमा तय किए जाने पर पहले तो उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताई गई, वहीं अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कतिपय महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, जिनका जवाब सर्वोच्च न्यायालय को देना चाहिए। बता दें कि समयसीमा तय किए जाने पर राष्ट्रपति ने सवाल उठाते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है! इसलिए सुलगता हुआ सवाल है कि जब कोई प्रावधान ही नहीं है तब इतना बड़ा न्यायिक अतिरेक कैसे सामने आया जिससे भारत की कार्यपालिका और विधायिका में भूचाल आ गया। बता दें कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गत 8 अप्रैल 2025 को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दर्जनाधिक नीतिगत सवाल उठाए हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में आदेश दिया था कि राज्यपालों और राष्ट्रपति को एक तय समय में उनके समक्ष पेश विधेयकों पर फैसला लेना होगा। याद दिला दें कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर काफी हंगामा हुआ था, जो अब भी विभागीय शीत युद्ध के रूप में जारी है। इसी का परिणाम है कि अब राष्ट्रपति ने इस पर आपत्ति जताई है और साफ साफ कहा है कि जब देश के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट किस आधार पर यह फैसला दे सकता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से राज्यपाल की शक्तियों, न्यायिक दखल और समयसीमा तय करने जैसे विषयों पर स्पष्टीकरण मांगा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में दिए अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है। राज्यपाल की ओर से भेजे गए विधेयक पर राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा। अगर तय समयसीमा में फैसला नहीं लिया जाता तो राष्ट्रपति को राज्य को इसकी वाजिब वजह बतानी होगी। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि राष्ट्रपति किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए राज्य विधानसभा के पास वापस भेज सकते हैं। वहीं यदि विधानसभा उस विधेयक को फिर से पारित करती है तो राष्ट्रपति को उस पर अंतिम फैसला लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति के फैसले की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। अगर राज्यपाल ने मंत्रिपरिषद की सलाह के खिलाफ जाकर फैसला लिया है तो सुप्रीम कोर्ट के पास उस विधेयक को कानूनी रूप से जांचने का अधिकार होगा। यही वजह है कि राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे 14 सवाल पूछे हैं, जो इस प्रकार हैं- पहला, राज्यपाल के समक्ष अगर कोई विधेयक पेश किया जाता है तो संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत उनके पास क्या विकल्प हैं? दूसरा, क्या राज्यपाल इन विकल्पों पर विचार करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं? तीसरा, क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा लिए गए फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है? चतुर्थ, क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 200 के तहत लिए गए फैसलों पर न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह से रोक सकता है? पांचवां, क्या अदालतें राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 200 के तहत लिए गए फैसलों की समयसीमा तय कर सकती हैं, जबकि संविधान में ऐसी कोई समयसीमा तय नहीं की गई है? छठा, क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा लिए गए फैसले की समीक्षा हो सकती है? सातवाँ, क्या अदालतें अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा फैसला लेने की समयसीमा तय कर सकती हैं? आठवां, अगर राज्यपाल ने विधेयक को फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया है तो क्या अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट की सलाह लेनी चाहिए? नवम, क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा क्रमशः अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिए गए फैसलों पर अदालतें लागू होने से पहले सुनवाई कर सकती हैं। दशम, क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों में बदलाव कर सकता है? ग्यारह, क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की मंजूरी के बिना राज्य सरकार कानून लागू कर सकती है? बारह, क्या सुप्रीम कोर्ट की कोई पीठ अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच को भेजने पर फैसला कर सकती है? तेरह, क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसे निर्देश/आदेश दे सकता है जो संविधान या वर्तमान कानूनों मेल न खाता हो? चौदह, क्या अनुच्छेद 131 के तहत संविधान इसकी इजाजत देता है कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही सुलझा सकता है? दरअसल, ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब देने में सुप्रीम कोर्ट को काफी माथापच्ची करनी होगी क्योंकि ये सवाल उसी नौकरशाही द्वारा तैयार किये गए होंगे, जिसका परोक्ष शिकंजा खुद कोर्ट भी महसूस करता आया है और इससे निकलने के लिए कई बार अपनी छटपटाहट भी नहीं छिपा पाता है। इसलिए सुप्रीम जवाब का इंतजार अब नागरिकों और सरकार दोनों को है, ताकि एक और ‘लीगल पोस्टमार्टम’ किया जा सके। इसलिए लोगों के जेहन में यह बात उठ रही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के नहले पर राष्ट्रपति के दहले से निकल पाएगा कोई सर्वमान्य हल? कमलेश पांडेय
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चलती चिता बनती बसें: निजी परिवहन की अंधी दौड़ और बेबस यात्रियों की चीखें
Updated: May 16, 2025
अशोक कुमार झा 15 मई 2025 की वह सुबह लखनऊ के लिए एक और मनहूस सुबह बनकर आई, जब बिहार के बेगूसराय से दिल्ली की ओर जा रही एक…
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सीजफायर पर रजामंदी, जारी आर्थिक “मोर्चाबंदी”, पाक के लिए भारतीय बंदरगाह एवं एयर स्पेस बंद
Updated: May 16, 2025
प्रदीप कुमार वर्मा कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत में आतंकवाद पर कड़े प्रहार के लिए “ऑपरेशन सिंदूर” चला कर आतंकी तथा उनके आकाओं को करारा जवाब दिया है। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच छिड़े अघोषित युद्ध के बाद तीन दिन में ही दोनों देशों के बीच सीजफायर पर रजामंदी हो गई है लेकिन भारत ने आतंकवादी गतिविधियों की साजिश एवं साथ देने के चलते पाकिस्तान के विरुद्ध की गई प्रभावी आर्थिक “मोर्चाबंदी” अभी जारी है। भारत द्वारा पाकिस्तान से आयात तो निर्यात पर लगाई रोक जारी है। वहीं, भारत के एयर स्पेस और भारत के बंदरगाहों पर पाकिस्तान के जलपोतों पर भी लगाई गई पाबंदी भी फिलहाल लागू है। इसके बाद पहले से ही आर्थिक संकट जल रहे पाकिस्तान में अब आर्थिक हालत ज्यादा खराब होने तय हैं। यही नहीं, भारत के आवाम ने पाकिस्तान का सहयोग देने वाले तुर्कीए और अजरबैजान के विरुद्ध भी आर्थिम मोर्चा खोल दिया है। भारत और पाकिस्तान के बीच वैसे व्यापार बहुत ज्यादा नहीं है। साल 2019 में हुए पुलवामा हमले के बाद इसमें और कमी आई थी। दोनों देशों ने एक-दूसरे के साथ व्यापार को लेकर कई बैन लगाए लेकिन कुछ आवश्यक वस्तुओं का लेन-देन दोनों देशों के बीच होता रहता है। यह ज्यादातर तीसरे देशों जैसे दुबई या सिंगापुर के रास्ते होता है। बताते चलें कि साल 2023-24 में भारत ने पाकिस्तान से 3 मिलियन डॉलर का आयात किया था जबकि 1.2 अरब डॉलर का निर्यात किया था। साल 2024 में भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार 127 फीसदी की बंपर बढ़ोतरी के साथ 1.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था। भारत पाकिस्तान से कई चीजें आयात करता है। इसमें ड्राई फ्रूट्स, तरबूज और अन्य फल, सीमेंट, सेंधा नमक, पत्थर, चूना, मुल्तानी मिट्टी, चश्मों का ऑप्टिकल्स, कॉटन, स्टील, कार्बनिक केमिकल्स, चमड़े का सामान आदि शामिल हैं। पाकिस्तान से आयात बैन होने के कारण अब वहां से न तो ड्राई फ्रूट्स आएंगे और न सेंधा नमक। भारत में सेंधा नमक का इस्तेमाल व्रत के समय काफी मात्रा में किया जाता है। भारत भी पाकिस्तान को कई चीजें एक्सपोर्ट करता है। इसमें जैविक और अजैविक केमिकल, दवाइयां, कृषि उत्पाद, कपास और सूती धागा, चीनी, मिठाइयां, प्लास्टिक, मशीनरी आदि शामिल हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार पर बैन लगने के कारण अब भारत पाकिस्तान को न तो दवाइयां भेज पाएगा और न ही चीनी। भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे ज्यादा व्यापार अटारी और बाघा बॉर्डर के जरिए होता है। पहलगाम पर हुए आतंकी हमले का बदला लेने के लिए उठाए गए कदमों में भारत द्वारा इस बार्डर को बंद कर दिया गया है। इसके साथ ही भारत ने पाकिस्तानी झंडे वाले शिप की देश में एंट्री पर भी बैन लगाया है। इसके बाद समुद्री रास्ते से व्यापार बंद है। भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान से आने वाले किसी भी प्रकार के डाक और पार्सल सेवाओं पर लगाई रोक जारी है। पहलगाम हमले के बाद में भारत ने पाकिस्तान के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर रखा है। पाकिस्तान का साथ देने वाले तुरकिए और अजरबैजान के विरुद्ध भी भारतीयों ने अब “आर्थिक मोर्चाबंदी” शुरू कर दी है। सोशल मीडिया पर बीते तीन चार दिन से बायकॉट तुर्कीए एंड अजरबैजान ट्रेंड कर रहा है। भारत के लोगों के गुस्से का आलम यह है कि भारतीयों ने अपनी तुरकिए की यात्रा रद्द कर दी है। भारतीयों में तुर्कीए के खिलाफ आक्रोश सिर्फ यात्रा तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि भारत का हर वर्ग अब तुर्कीए को इसकी सजा देने को तैयार है। देश के व्यापारियों ने भी तुर्कीए के सामानों के आयात से मनाही कर दी है। इसमें तुर्की से सेब, ग्रेनाइट मार्बल समेत अन्य सामान खरीदने बंद कर दिए हैं। वहीं, आम लोगों ने भी तुर्कीए और अजरबैजान घूमने के लिए किए टिकट कैंसिल करवा दिए हैं। भारत-पाकिस्तान में तनाव के बीच भारतीय व्यापारियों में तुर्किये के रुख को लेकर नाराजगी है। राजस्थान, दिल्ली, यूपी से लेकर महाराष्ट्र तक व्यापारियों ने तुर्किये के सामान का विरोध किया है। भारत का मार्बल हब कहे जाने वाले उदयपुर के व्यापारियों ने एक आपात बैठक बुलाकर तुरकिए से मार्बल का आयात बंद करने का फैसला किया है। वहीं, पुणे के व्यापारियों ने भी अब तुर्कीए से सेब की खरीद नहीं करने का ऐलान किया है। व्यापारियों का कहना है कि तुर्किए ने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को ड्रोन भेजे। इन्हीं ड्रोन्स से पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया। इसलिए भारत विरोधी रुक अपनाने वाले तुर्किए से कोई व्यापार नहीं किया जाएगा। उधर,भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच जवाहर लाल यूनिवर्सिटी ने तुर्किये की इनोनू यूनिवर्सिटी के साथ करार खत्म कर दिया है। आर्थिक मामलों के जानकारों द्वारा यह माना जा रहा है कि भारतीयों के इस कदम से तुर्कीए और अजरबेजान के पर्यटन एवं उद्योग पर काफी असर पड़ सकता है। प्रदीप कुमार वर्मा
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पाकिस्तान की शर्मनाक हार और भारत की गौरवपूर्ण जीत
Updated: May 16, 2025
संदीप सृजन पहलगाम हमले के बाद भारत की ओर से की गई सैन्य कार्रवाई ने एक बार फिर भारत-पाकिस्तान की तरफ पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। पहलगाम आतंकी हमले ने भारत को आक्रामक जवाबी कार्रवाई के लिए प्रेरित किया। इस हमले में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों का हाथ पाया गया, जिसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया । इस टकराव में भारत की निर्णायक जीत और पाकिस्तान की शर्मनाक हार ने न केवल क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित किया, बल्कि एक नाजुक युद्धविराम के माध्यम से दोनों देशों को शांति की ओर ले जाने का प्रयास भी किया। इस ऑपरेशन के तहत भारत ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों, विशेष रूप से स्कर्दू, जकोबाबाद, सरगोधा और भुलारी जैसे हवाई अड्डों पर लक्षित हमले किए। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के हवाई रक्षा तंत्र और रडार सिस्टम को नष्ट कर दिया जिससे पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचा। इसके साथ ही, भारत ने अपनी S-400 वायु रक्षा प्रणाली का उपयोग करके पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम कर दिया। इस कार्रवाई ने न केवल भारत की सैन्य ताकत को प्रदर्शित किया, बल्कि पाकिस्तान की रणनीतिक कमजोरियों को भी उजागर किया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत की सैन्य रणनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण था। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने न केवल पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया बल्कि उनकी वायु रक्षा प्रणाली को भी ध्वस्त कर दिया। भारत ने लाहौर, सियालकोट, फैसलाबाद और मुल्तान जैसे शहरों में पाकिस्तान के रक्षा तंत्र को नष्ट किया, जिससे उनकी जवाबी कार्रवाई की क्षमता लगभग समाप्त हो गई। रहीम यार खान में हवाई अड्डे का रनवे भी भारतीय मिसाइल हमलों से क्षतिग्रस्त हो गया जिसने पाकिस्तान की वायुसेना को और कमजोर कर दिया। भारत ने अपनी ब्रह्मोस मिसाइलों और अन्य उन्नत हथियारों का उपयोग करके सटीक हमले किए। इन हमलों ने पाकिस्तान के सैन्य ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया, जबकि नागरिक क्षेत्रों को न्यूनतम क्षति हुई। पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम करने में भारत की S-400 प्रणाली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत किया और पाकिस्तान के हमलों को विफल कर दिया। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों और आतंकी लॉन्च पैड्स की सटीक जानकारी प्रदान की, जिसके आधार पर भारत ने अपने हमलों को अंजाम दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने न केवल सैन्य कार्रवाई की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए प्रभावी कूटनीति का सहारा लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति और विदेश मंत्री की मध्यस्थता में युद्धविराम की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसमें भारत की स्थिति मजबूत रही। भारतीय सेना की बहादुरी और रणनीतिक कौशल ने न केवल पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर किया, बल्कि भारत की क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थिति को और मजबूत किया। पाकिस्तान की इस हार ने उसकी सैन्य और रणनीतिक कमजोरियों को पूरी दुनिया के सामने ला दिया। पाकिस्तान के हवाई रक्षा तंत्र और रडार सिस्टम भारतीय हमलों के सामने पूरी तरह विफल रहे। कई सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाने के बजाय आतंकवादी संगठनों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया, जिसका खामियाजा उसे इस युद्ध में भुगतना पड़ा। पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। इस युद्ध ने उसकी अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर दिया। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने भोजन और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहायता मांगी। पाकिस्तान ने इस संघर्ष के दौरान कई भ्रामक वीडियो और सूचनाएं फैलाईं जिनका उद्देश्य भारतीय जनता को गुमराह करना था। हालांकि, ये प्रयास असफल रहे और उल्टे पाकिस्तान की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा। पाकिस्तान के सांसदों और पत्रकारों के बीच इस हार को लेकर गहरा असंतोष देखा गया। कुछ X पोस्ट्स में दावा किया गया कि पाकिस्तानी नेता और पत्रकार लाइव टीवी पर रो रहे थे, जो उनकी हताशा को दर्शाता है। पाकिस्तान की सेना ने बाद में स्वीकार किया कि उनके एक विमान को मामूली नुकसान हुआ था, और उन्होंने भारतीय पायलट को हिरासत में लेने की खबरों का खंडन किया। यह उनकी हार को स्वीकार करने का एक अप्रत्यक्ष तरीका था। इन कारकों ने मिलकर भारत को इस संघर्ष में एक स्पष्ट विजेता बनाया। 10 मई 2025 को शाम 5 बजे से लागू हुए युद्धविराम ने इस तनावपूर्ण स्थिति को कुछ हद तक शांत किया हालांकि पाकिस्तान ने रात में गोलीबारी करके इस युद्धविराम का उल्लंघन किया, जिसके जवाब में भारत ने सख्त चेतावनी दी कि ऐसी हरकतों को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा। इसके बाद, अमेरिकी मध्यस्थता के तहत दोनों देशों के डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस) के बीच बातचीत हुई, जिसके परिणामस्वरूप 11 मई की सुबह सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिति सामान्य होने लगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्धविराम की सराहना करते हुए कहा कि दोनों देशों के नेताओं ने बुद्धिमानी दिखाई हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में किसी भी आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा, जिससे पाकिस्तान पर दबाव बना रहा। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा, सांबा, पुंछ, जम्मू, अखनूर और राजौरी जैसे क्षेत्रों में युद्धविराम के बाद जनजीवन धीरे-धीरे सामान्य होने लगा है। इस संघर्ष का प्रभाव केवल सैन्य और राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। भारत में इस जीत ने राष्ट्रीय गौरव की भावना को बढ़ाया। बॉलीवुड और साउथ के सितारों जैसे जेनेलिया डी सूजा, अक्किनेनी नागार्जुन और समय रैना ने सोशल मीडिया पर भारतीय सेना की बहादुरी की सराहना की। X पर कई यूजर्स ने इस जीत को भारत की ताकत और पाकिस्तान की शर्मनाक हार के रूप में प्रचारित किया। दूसरी ओर, पाकिस्तान में इस हार ने आंतरिक असंतोष को बढ़ाया। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने पाकिस्तानी नेतृत्व और सेना की आलोचना की, जबकि कुछ ने भारत की सैन्य शक्ति को स्वीकार किया। इस हार ने पाकिस्तान की जनता में निराशा और हताशा की भावना को जन्म दिया, जो उनकी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को और गहरा सकती है। इस संघर्ष और युद्धविराम के दीर्घकालिक प्रभाव कई स्तरों पर देखे जा सकते हैं जैसे भारत की इस जीत ने दक्षिण एशिया में उसकी स्थिति को और मजबूत किया है। पाकिस्तान की सैन्य कमजोरी उजागर होने से उसकी क्षेत्रीय प्रभावशीलता कम हुई है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाएगा। यह नीति भविष्य में पाकिस्तान को और दबाव में डाल सकती है। इस हार ने पाकिस्तान के आंतरिक संकट को और गहरा दिया है। यदि पाकिस्तान अपनी सैन्य और आर्थिक नीतियों में सुधार नहीं करता, तो उसकी स्थिरता और खतरे में पड़ सकती है।.इस युद्धविराम में अमेरिका की मध्यस्थता ने वैश्विक शक्तियों की भूमिका को रेखांकित किया। भविष्य में, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम करने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। पहलगाम हमले के बाद हुआ भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव एक ऐतिहासिक घटना है, जिसने भारत की सैन्य और रणनीतिक श्रेष्ठता को प्रदर्शित किया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के माध्यम से भारत ने न केवल पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों को नष्ट किया, बल्कि उसकी रणनीतिक कमजोरियों को भी उजागर किया। पाकिस्तान की शर्मनाक हार ने उसके आंतरिक और बाहरी संकटों को और गहरा दिया जबकि भारत की जीत ने राष्ट्रीय गौरव और आत्मविश्वास को बढ़ाया। संदीप सृजन
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गणि राजेन्द्र विजयः दांडी पकडे़ गुजरात के उभरते हुए ‘गांधी’
Updated: May 16, 2025
गणि राजेन्द्र विजयजी के 51वें जन्म दिवस: 19 मई 2025 -ललित गर्ग – प्राचीन समय से लेकर आधुनिक समय तक अनेकों संत-मनीषियों, धर्मगुरुओं, ऋषियों ने भी अपने…
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सोशल मीडिया पर देह की नुमाइश: सशक्तिकरण या आत्मसम्मान का संकट ?
Updated: May 16, 2025
“लाइक्स की दौड़ में खोती पहचान: नारी सशक्तिकरण का असली मतलब” सोशल मीडिया पर नारी देह का बढ़ता प्रदर्शन क्या वाकई सशक्तिकरण है या महज़…
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क्यों जरूरी है हर विषयों पर लिखना…
Updated: May 15, 2025
मनोज कुमार एक दौर था जब जवानी इश्क में डूबी होती थी लेकिन एक यह दौर है जहाँ जवानी लेखन में डूबी हुई है. विषय…
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संयुक्त परिवार : मात्र समझौता नहीं, आज की “जरूरत”
Updated: May 15, 2025
अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस 15 मई पर विशेष… प्रदीप कुमार वर्मा कहते हैं कि परिवार से बड़ा कोई धन नहीं। पिता से बड़ा कोई सलाहकार नहीं। मां के आंचल से बड़ी कोई दुनिया नहीं। भाई से अच्छा कोई भागीदार नहीं। और बहन से बड़ा कोई शुभ चिंतक नहीं। यही वजह है कि परिवार के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन है। किसी भी देश और समाज की परिवार एक सबसे छोटी इकाई है। परिवार एक सुरक्षा कवच है और एक मानवीय संवेदना की छतरी भी। एक अच्छा परिवार बच्चे के चरित्र निर्माण से लेकर व्यक्ति की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार से इतर व्यक्ति का बजूद नहीं है। इसलिए परिवार के बिना अस्तित्व के बिषय में कभी सोचा नहीं जा सकता। लोगों से परिवार बनता हैं और परिवार से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व बनता हैं। परिवार के इसी महत्व को जान और समझकर लोग आप संयुक्त परिवार को एक बार फिर से अपनाने लगे हैं। देश और दुनिया में परिवार के दो स्वरूप मुख्य रूप से देखने को मिलते हैं। इनमें पितृसत्तात्मक एवं मातृ सत्तात्मक परिवार शामिल है। किसी भी सशक्त देश के निर्माण में परिवार एक आधारभूत संस्था की भांति होता है, जो अपने विकास कार्यक्रमों से दिनोंदिन प्रगति के नए सोपान तय करता है। कहने को तो प्राणी जगत में परिवार एक छोटी इकाई है। लेकिन इसकी मजबूती हमें हर बड़ी से बड़ी मुसीबत से बचाने में कारगर है। बीते सालों में यह देखने में आया है कि संयुक्त परिवार की जगह अब एकल परिवारों ने ले ली है। समाज के इस नए चलन न केवल परिवारों को बिखराव दिया है, वहीं, समूचे सामाजिक ताने-बाने पर भी संकट छा गया है। हालात ऐसे हैं कि एकल परिवारों के सदस्य अब रिश्तों के नाम तक भूलने लगे हैं, निभाने की बात तो और है। एकल परिवारों में लोग एकाकी जीवन जीने को मजबूर है और इससे उनका मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है । इसी चिंता और देश और दुनिया में परिवार के महत्व को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 1980 के दशक के दौरान परिवार से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना शुरू किया। इसके बाद वर्ष 1983 में आर्थिक और सामाजिक परिषद सामाजिक विकास आयोग ने विकास प्रक्रिया में परिवार की भूमिका पर अपने संकल्प की सिफारिश की और महासचिव से निर्णय लेने वालों और जनता के बीच जागरूकता बढ़ाने का अनुरोध किया। इसके साथ ही जनता को परिवार की समस्याओं और आवश्यकताओं के साथ-साथ उनकी जरूरतों को पूरा करने के प्रभावी तरीकों से अवगत कराया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 9 दिसंबर 1989 के अपने संकल्प 44/82 में परिवार के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष की घोषणा की और 1993 में महासभा ने फैसला किया कि 15 मई को हर साल अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सामाजिक संरचना के तौर पर परिवार का विवेचन करें तो परिवार जन्म, विवाह या गोद लेने से संबंधित दो या अधिक व्यक्तियों का समूह है, जो एक साथ रहते हैं। ऐसे सभी संबंधित व्यक्तियों को एक परिवार के सदस्य माना जाता है। उदाहरण के लिए यदि एक वृद्ध विवाहित जोड़ा, उनका बेटा ओर बहू,पोता-पोती और वृद्ध जोड़े का भतीजा सभी एक ही घर या अपार्टमेंट में रहते हैं। तो वे सभी एक ही परिवार के सदस्य माने जाएंगे। परिवारों की प्रकृति की व्याख्या करें तो ऐतिहासिक दृष्टि से अधिकांश संस्कृतियों में परिवार पितृसत्तात्मक यानि पुरुष-प्रधान परिवार ही देखने में आते हैं। इनमें परिवार के सबसे बड़े पुरुष द्वारा ही परिवार के सभी कार्यों का संचालन अथवा निर्णय लिए जाते हैं। इसके साथ ही आदिवासी समाज सहित कुछ अन्य समाजों में मातृ सत्तात्मक परिवारों की पृष्ठभूमि देखने को मिलती है। ऐसे परिवारों में परिवार की बुजुर्ग महिला की प्रधानता रहती है तथा परिवार एवं समाज के सभी निर्णय लेने में बुजुर्ग महिलाएं मुख्य भूमिका निभाती है। यह सभी परिवार संयुक्त परिवार का एक रूप है जहां तीन पीढ़ियां एक साथ रहती हैं। लेकिन समय के साथ संयुक्त परिवारों की यह संकल्पना अब धूमिल हो रही है। औद्योगीकरण के साथ-साथ शहरीकरण ने जीवन और व्यावसायिक शैलियों में तीव्र परिवर्तन लाकर पारिवारिक संरचना में कई परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। लोग,विशेषकर युवा,खेती छोड़कर औद्योगिक श्रमिक बनने के लिए शहरी केंद्रों में चले गए। इस प्रक्रिया के कारण कई बड़े परिवार बिखर गए। इसके साथ ही युवाओं में अपने निर्णय खुद लेने की प्रवृत्ति तथा रोजी रोजगार के चलते अपने परिवार से दूर रहने के कारण भी एकल परिवार की संख्या बढ़ रही है। …
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