घुरती मेला का संघर्ष : क्या हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं?
Updated: July 10, 2025
अशोक कुमार झा रांची की धरती न केवल जंगलों, जल और जनजातीय आत्मा की पहचान रही है, बल्कि यहां की परंपराएं और सांस्कृतिक मेलों ने सदियों से इस धरती…
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राजनाथ सिंहः रक्षा, राष्ट्रीयता और राजनीतिक कौशल के प्रतीक
Updated: July 10, 2025
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के 74वें जन्मदिवस – 10 जुलाई, 2025-ललित गर्ग- भारत के राजनीतिक आकाश पर जिन व्यक्तित्वों ने अपनी सादगी, दृढ़ता, राष्ट्रभक्ति और कर्मठता से…
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भाषाई विवाद और सावरकर जी का हिंदी प्रेम
Updated: July 29, 2025
कांग्रेस के चरित्र का यदि अवलोकन किया जाए तो पता चलता है कि इस पार्टी ने प्रारंभ से ही ‘हिंदुस्थानी हिंदी’ के सामने ‘संस्कृतनिष्ठ हिंदी’…
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ग़ज़ल
Updated: August 25, 2025
जवानी के दिन हमने यूँ ही गँवाए,न मौजें उड़ाईं, न पैसे कमाए। न आँखों में डूबे, हँसे, खिलखिलाए,न वादी में घूमे, न बारिश नहाए। अगर…
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अमेरिकी कृषि उत्पाद बेचने से बचे भारत
Updated: July 7, 2025
प्रमोद भार्गवभारत और अमेरिका के बीच 9 जुलाई से पहले व्यापार समझौता होना हैं। यदि भारत अमेरिका की षर्तें नहीं माना है तो 9 जुलाई…
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भाषायी विवादों के पीछे विभाजनकारी षड्यंत्र
Updated: July 7, 2025
~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल संत ज्ञानेश्वर और हिंदवी स्वराज्य प्रणेता छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यभूमि में राजनीतिक वितंडावादियों ने ‘भाषा’ के नाम पर जिस अराजकता का…
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शिक्षक या सेल्समैन?
Updated: July 7, 2025
यह कहानी है अविनाश सर की—एक ईमानदार, आदर्शवादी और प्रतिभाशाली शिक्षक की, जो शिक्षा को अपने जीवन का धर्म समझते हैं और विद्यालय को मंदिर।…
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बारिश का कहरः प्रकृति का विक्षोभ या विकास की विफलता?
Updated: July 7, 2025
ललित गर्ग बीते कुछ वर्षों में पहाड़ों में बारिश एवं बादल फटना अब डर, कहर और तबाही का पर्याय बन गई है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश,…
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मोदी-शाह की जोड़ी ने साकार किया डा. श्यामप्रसाद मुखर्जी का अखंड सपना
Updated: July 7, 2025
अशोक बजाज आज़ादी के साथ कश्मीर समस्या हमें विरासत में मिली थी जो भारत के लिए नासूर बन गई थी. आज़ादी के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू…
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झारखण्ड का एक अनोखा जंगली मशरूम पुटू
Updated: July 7, 2025
–अशोक “प्रवृद्ध” झारखण्ड और छतीसगढ़ की सीमावर्ती जिलों के वनों, जंगलों में वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक काल में स्वतः ही उगने, निकलने वाली पुटू नामक मशरूम के…
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सुशासन की सरकार पर सवालिया निशान खेमका की हत्या
Updated: July 7, 2025
कुमार कृष्णन अपने बिहार दौरे में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जिस जंगलराज के बहाने महागठबंधन को घेरने की कोशिश की, वह उलट सावित हो रहा…
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कहीं महंगा न पड़ जाये आस्था से मजाक
Updated: July 7, 2025
सचिन त्रिपाठी भारत की सांस्कृतिक परंपरा पर्वों की उस रंग-बिरंगी माला के समान है जिसका प्रत्येक मनका किसी ऋतु, किसी फसल, किसी प्राकृतिक तत्व या किसी लौकिक सत्य से बंधा हुआ है। यहां उत्सव केवल उल्लास नहीं, ऋतुओं का स्वागत है, आकाश-पवन-नदी का वंदन है, और भूमि माता के चरणों में अर्पित श्रद्धा है। मकर संक्रांति के साथ जब सूर्य उत्तरायण होता है तो वह मात्र खगोल घटना नहीं होती, वह अन्नदाता के हृदय में नई आशा की किरण भी जगाता है। छठ पूजा में सूर्य को अर्घ्य देते समय केवल एक देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रकाश व्यवस्था के प्रति आभार प्रकट किया जाता है किंतु दुःख की बात यह है कि आज इन्हीं पर्वों को उपहास का विषय बना दिया गया है, कभी सोशल मीडिया की मीम संस्कृति के माध्यम से तो कभी तथाकथित बुद्धिजीविता के नाम पर। आश्चर्य होता है जब छठ पूजा जैसे विराट और श्रमसाध्य पर्व को ‘रिवर्स योगा’ कहा जाता है या होली जैसे रंगों के उत्सव को जल अपव्यय की उपमा देकर बदनाम किया जाता है। हास्य की यह धारा जब आस्था का उपहास बनने लगे, तब वह केवल मनोरंजन नहीं, सांस्कृतिक विघटन का औजार बन जाती है। कुछ वर्ष पूर्व एक वेब सीरीज में छठ व्रत करने वाली स्त्रियों को ‘गंवार और अंधविश्वासी’ कहकर चित्रित किया गया। यह कोई अलग घटना नहीं बल्कि एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति का उदाहरण था जहां पर्वों को ‘साइंटिफिक टेंपर’ की कसौटी पर कसा जाने लगा किंतु बिना यह समझे कि ये पर्व ही तो भारतीय मानस का विज्ञान हैं, हमारे शरीर, पर्यावरण और समाज के सामूहिक संतुलन का जीवंत उदाहरण हैं। दीपावली के आते ही शोर उठता है ‘पटाखे मत जलाओ, प्रदूषण होता है!’ मानो पूरे वर्ष का पर्यावरणीय संतुलन केवल एक रात के दीपोत्सव से डगमगाने लगे। क्या किसी ने होली के पूर्व गांवों में की जाने वाली तालाब सफाई देखी है? क्या किसी एनजीओ ने छठ पूजा से पूर्व गंगा घाटों की सामूहिक सफाई की सराहना की है? नहीं, क्योंकि अब आलोचना का उद्देश्य सुधार नहीं, अपमान है। भारतीयता को ‘पर्यावरण विरोधी’ दिखाकर, पश्चिमी मानकों की श्रेष्ठता स्थापित करना है। क्या आपने कभी देखा है कि ‘थैंक्स गिविंग’ पर टर्की की बलि का मज़ाक उड़ाया गया हो? क्या ‘ईस्टर’ पर अंडों और चॉकलेट्स की बर्बादी के खिलाफ कोई अभियान चला? लेकिन भारत में तो हर त्योहार के साथ एक झूठा अपराधबोध जोड़ दिया जाता है। गणेश चतुर्थी को ‘नदी प्रदूषण का पर्व’, होली को ‘जल बर्बादी का उत्सव’, और दीपावली को ‘ध्वनि और वायु प्रदूषण का महापर्व’ कहकर प्रस्तुत किया जाता है। पर्व केवल पूजा नहीं होते. वे समाज की चेतना होते हैं। होली, जहां रंगों में जाति-वर्ग-भेद मिट जाता है; छठ, जहां स्त्री प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती है; गणेश चतुर्थी, जहां बुद्धि और बाधाओं के बीच संवाद होता है, इन सभी को ‘जोक्स’ के जरिए तुच्छ बना देना किसी सभ्यता की जड़ों को काटने जैसा है। वर्तमान में सोशल मीडिया ने ‘मीम’ को संवाद का माध्यम बना दिया है लेकिन यह मीम, जहां किसी विदेशी प्रधानमंत्री की टोपी का मजाक हल्के हास्य में लिया जाता है, वहीं जब किसी भारतीय स्त्री की ‘करवा चौथ’ की तस्वीर आती है तो उसके साथ ‘पितृसत्ता की गुलामी’ जैसे कटाक्ष जोड़े जाते हैं। यह केवल मज़ाक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक मानस को चुपचाप नष्ट करने की चेष्टा है। पर्वों के पीछे की वैज्ञानिकता को समझे बिना उन्हें ‘अंधविश्वास’ कहना उस दृष्टिहीन व्यक्ति जैसा है जो सूर्य की गर्मी से डरकर उसे नकारता है। छठ पूजा में जब स्त्रियां व्रत के माध्यम से सूर्य की सीधी किरणों को स्वयं पर लेती हैं तो वह केवल भक्ति नहीं, शरीर और प्रकाश विज्ञान का अनुप्रयोग भी है। दीपावली में जब घरों की सफाई होती है तो वह कीट नियंत्रण का पारंपरिक उपाय है। होलिका दहन कृषि अवशेषों के निपटान का स्थानीय तंत्र है जिसे अब ‘पर्यावरण खतरा’ कहा जाता है। यह आवश्यक है कि हम अपनी नई पीढ़ी को इन पर्वों के मूल तत्व से परिचित कराएं। उन्हें यह सिखाया जाए कि गणेश केवल मूर्ति नहीं, विघ्न-विनाशक ऊर्जा के प्रतीक हैं; कि दीपक केवल तेल और बाती नहीं, चेतना की लौ हैं; और कि छठ केवल सूर्य पूजन नहीं, जल-प्रकाश-व्रत और स्त्री चेतना का महायोग है। यदि हमने इन पर्वों को केवल ‘हास्य’ और ‘फॉरवर्ड्स’ की वस्तु बनने दिया, तो आने वाले समय में हमारी संतति इन्हें ‘संस्कृति’ नहीं, ‘कॉमेडी’ मानेगी। तब हम अपनी पहचान नहीं, अपनी जड़ों से दूर हो चुके होंगे। इसलिए, समय है कि हम अपने पर्वों का पुनर्पाठ करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, सांस्कृतिक श्रद्धा से, और सामाजिक चेतना से। उपहास का उत्तर उपदेश नहीं, ज्ञान है और यह ज्ञान हमें बताता है कि ये पर्व मात्र परंपरा नहीं, प्रकृति से एक सतत संवाद हैं। हंसी उचित है जब वह आदर के साथ हो लेकिन जब वह आस्था पर वज्र की तरह गिरे तो वह केवल व्यंग्य नहीं, आत्म-अपमान बन जाती है। स्मरण रखिए, पर्वों का उपहास प्रकृति के प्रति हमारी निष्ठा को भी खंडित करता है और जो समाज अपनी ऋतुओं, नदियों, और सूर्य की उपेक्षा करता है, वह धीरे-धीरे अपनी ही चेतना से कट जाता है।
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