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हॉकी और हनुमानगढ़… बल्ले बल्ले!

राष्ट्रीय खेल दिवस ( 29 अगस्त)

हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद को समर्पित

~साधना सोलंकी

स्वतंत्र पत्रकार

सचमुच…हॉकी और हनुमानगढ़ की सरजमीं का कुछ ऐसा ही नाता है कि जिसने भी इसे जाना- समझा… इसके नशे को घूंट घूंट पिया तो मुंह से उल्लास की बोली पंजाबियत की महक लिए फूट पड़ी…बल्ले बल्ले! दरअसल यह शहर पंजाब का पड़ौसी है। श्रीगंगानगर जिले से यह शहर सन 1994 में अलग होकर स्वतन्त्र जिला बना। वीर बजरंगी हनुमान के नाम पर इस शहर का नामकरण पुरातन ऐतिहासिक भटनेर से बदलकर हनुमानगढ़ हुआ। जंक्शन और टाउन में बंटे हनुमानगढ़ जिले में हॉकी खेल की जो बल्ले बल्ले हुई…हो रही है, वह आकर्षक है। कहा जा सकता है कि हॉकी प्रेम का यही जुनून ए प्रयास कायम रहा तो यह बल्ले बल्ले सदाबहार हो बरसती रहेगी ! आइए जानते हैं पंच गौरव में शामिल हॉकी और हनुमानगढ़ की दिलचस्प कहानी हॉकी के पूर्व खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों की जुबानी। कहानी जो कि एनएम कालेज हनुमानगढ़ टाउन से परमजीत सिंह गुमान (पूर्व चीफ कोच भारतीय विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय )की अगुवाई में सन 1971 में शुरू होती है और 1974 में इसके उत्साहवर्धक परिणाम आने शुरू हो जाते हैं। यहां से हॉकी राज्य से बाहर झांकती देस परदेस में जीत के तमगे, ट्राफी बटोरती, जशन मनाती राजीव गांधी हॉकी स्टेडियम तक पहुंचती है।

इसके बाद अब जी तोड़ मशक्कत जारी रखते स्टेडियम को एस्ट्रोटर्फ की सौगात से नवाजने की चाहत! हनुमानगढ़ के इन जांबाज खिलाड़ियों, प्रशिक्षको का पांच दशक से आगे बढ़ता सफर पंच गौरव के तहत बाधाओं को परे ढकेलता, उम्मीदों से लबरेज जारी है!

नाज है अपने खिलाड़ियों पर

हरफूल सिंह उम्र के सत्तर बसंत देख चुके हैं। एनएम कालेज मैदान से बतौर खिलाड़ी हॉकी सफर 1974 से 1979 के बीच खूब परवान चढ़ा। पांच बार राजस्थान यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व किया। सीनियर व जूनियर नेशनल को भी रिप्रजेंट किया। बतौर कोच देश को सुरेन्द्र पलाड(कांस्य पदक, टोक्यो ओलंपिक 2021), राजकुमार पाल(ओलंपिक पेरिस 2024), उत्तम सिंह(कैप्टन जूनियर हॉकी टीम विश्व कप, गोल्ड मैडेलिस्ट एशियन हॉकी चैंपियनशिप चाइना 2024), जगवंत सिंह(गोल्ड मैडेलिस्ट जूनियर हॉकी टीम जूनियर एशियन हॉकी चैंपियनशिप हैदराबाद 2008) जैसे अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय खिलाड़ी दिए। 1992 से 2008 के दौरान हरफूल ने एसएआई ट्रेनिंग सेन्टर कुरुक्षेत्र को अपने अनुभव की प्रशासनिक सेवा से नवाजा। 2009 से 2014 एनआईएस पटियाला में चीफ कोच रह यहीं से सेवानिवृत्ति ली।इस बारे में गाजीपुर करमपुर उत्तर प्रदेश के उत्तम सिंह कहते हैं, हरफूल सर की अपने खिलाड़ियों के लिए संवेदना में एक दोस्त, पिता, अभिभावक जैसा प्यार घुला है। वे फटकार भी लगाते हैं और गले से भी लगाते हैं।

~दिल है कि मानता नहीं!

दर्शन सिंह संधु

(पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी, पूर्व राष्ट्रीय रेल्वे खिलाड़ी, वर्तमान में निरंतर व्यक्तिगत तौर पर खिलाड़ियों की हौसलाअफजाई के लिए प्रयासरत )

हनुमानगढ़ के ही खिलाड़ी और कोच दर्शन सिंह का हॉकी प्रेम जैसे जुनून का पर्याय है। उम्र को पीछे धकेल इस खेल को युवा रखने की उनकी चाहत कमाल है। सांझ उतरी नहीं कि दर्शन के कदम खेल मैदान की ओर खुदबखुद बढ़ने लगते हैं। उनका विशेष झुकाव उन ग्रामीण बेटियों को प्रोत्साहित करने पर रहता है, जो बेहद कमजोर आर्थिक हालात से जूझते इस खेल में रुचि रखती हैं। दर्शन तमाम बच्चों, युवाओं में हॉकी हुनर को रोपते हैं और उनमें खेल के भावी सुनहरे भविष्य को पुख्ता करते हैं। भावुक अपील भी करते हैं कि कृपया नियमित सांय वेला में साथियो सहित खेल मैदान में अवश्य पहुंचे और खेल की सेहतमंद सौगात से भविष्य संवारें। हंसकर कहते है…दिल है कि मानता नहीं!

नशा मुक्ति का बेहतर विकल्प

दर्शन सिंह सहित बातचीत के दौरान खुलासा करते हैं कि यह

खेल सामाजिक सास्कृतिक सरोकारों से भी जुड़ा है। श्रीगंगानगर जिला हो या हनुमानगढ़ और तमाम आस पास का इलाका… नशा लत की बेड़ियों से जकड़ा है। यह लत विशेषकर युवाओं के भविष्य को डस रही है और उन्हें पंगु बना रही है। खेल के प्रति नई पीढ़ी का रुझान बढ़ता है, तो स्वस्थ सेहतमंद सांसो की सकारात्मकता का संदेशा उन्हें जीवन के प्रति आस्थावान बनाता है। यह बदलाव समाज के प्रति संवेदनशील भी बनाता है।

गांव की ये बच्चियां हैं अनमोल!

राजीव गांधी स्टेडियम में दर्शन सिंह के अलावा कोच गुरदीप सिंह ( पास के गांव गुरुसर में पीटीआई शिक्षक) और हरबीर सिंह(एनआईएस कोच राजीव गांधी स्टेडियम) का ग्रामीण कमजोर तबके की बच्चियों, बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए समर्पण काबिले तारीफ है। इनके अथक प्रयास का ही नतीजा है कि इन द्वारा प्रशिक्षित बच्चियां अंडर 14 और अंडर 17 राजस्थान विजेता रहीं। दर्शन बताते हैं कि गुरुदीप सिंह अपनी जेब से रोजाना वैन किराया जो कि 500 रुपए करीब है, देकर खिलाड़ियों को स्टेडियम लाते हैं।

जुड़वां भाई मस्तान सिंह नसीब सिंह

एनएम कालेज से ही जुड़े हॉकी प्रेमी, फिजिकल एजुकेशन टीचर व एम्पायर मस्तान सिंह और जुड़वां भाई नसीब सिंह के चर्चे भी खूब हैं। हॉकी के अलावा मस्तान लोकप्रिय कार्टूनिस्ट भी हैं। विविध स्थापित पत्र पत्रिकाओं को उनके इस हुनर ने खूब नवाजा। इनके चलते वे बतौर वोटू भी जाने गए।

मस्तान सिंह के नेतृत्व में प्रशिक्षक के रूप में एनपीएस स्कूल हनुमानगढ़ ने सीबीएसई वेस्ट जोन अंडर 14 हॉकी प्रतियोगिता में तीन गोल्ड मेडल( बॉयज व गर्ल्स) में जीते, साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर दो बार ब्रॉन्ज मेडल (कांस्य पदक) भी जीते गए।

हॉकी जगत हनुमानगढ़ में राष्ट्रीय खिलाड़ी एनआई एस कोच इकबाल सिंह ढिल्लो, हॉकी प्रेमी जन नेता श्योपत सिंह का योगदान भी सराहनीय है। लब्बोलुआब यह कि हनुमानगढ़ को आज हॉकी का गढ़ कहा जाता है तो वजह इस जमीं से जुड़े खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों, हॉकी लवर्स का दमखम ही है!

एस्ट्रोटर्फ आए…बात बन जाए!

हनुमानगढ़ जिले का खेल हॉकी तय होने के बाद यहां एस्ट्रोटर्फ की चाहत पुख्ता हुई है।

साढ़े नौ करोड़ रुपए की लागत से एस्ट्रोटर्फ लगाने व खिलाड़ियों को वाजिब सुविधाएं प्रदान करने की मांग पर सैद्धांतिक सहमति बनी है। जिला खेल विभाग के उक्त प्रस्ताव को मंजूरी देकर राज्य क्रीड़ा परिषद ने खेलो इंडिया को भेज दिया है। राज्य सरकार योजना में हॉकी को पंच गौरव में शामिल करने के बाद उम्मीद के पाखी राजीव गांधी जिला स्टेडियम स्थित हॉकी मैदान की ओर उड़ चले हैं।

दर्शन बताते हैं कि एस्ट्रोटर्फ लगाने के प्रस्ताव पर राज्य क्रीड़ा परिषद ने सहमति रखते इसे केन्द्र सरकार के खेलो इंडिया नई दिल्ली को भेज दिया है।

जिला कलेक्टर कानाराम सहित अन्य अधिकारियों का इसमें विशेष सहयोग रहा।

एस्ट्रोटर्फ से खेल क्षमता में जबरदस्त सुधार

एस्ट्रोटर्फ ( कृत्रिम मैदान) की संख्या कुछ साल पहले तक प्रदेश में ना के बराबर थी। अब यह चार मैदानों पर लगाए जा चुके हैं। जहां यह लगाए जाते हैं, वहां के खिलाडिय़ों के खेल में जबरदस्त सुधार देखने को मिलता है।

भविष्य का हॉकी हब

एस्ट्रोटर्फ लगने पर हनुमानगढ़ राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं का हब बन सकता है।

एस्ट्रोटर्फ के लाभ

इससे हॉकी मैदान को एक समतल और सुखद सतह मिलती है। गेंद का उछाल और खिलाड़ियों की गति नियंत्रित रहती है। मौसम की हर मार से अछूता है और प्राकृतिक घास की तुलना में अधिक टिकाऊ है। खिलाडिय़ों को चोट लगने का जोखिम कम रहता है।

भारत कब बनेगा विश्व की खेल शक्ति?

    डॉ० घनश्याम बादल

    आज हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती को देश खेल दिवस के रूप में मना रहा है तो मौका है कि हम खेलों के हालात पर आत्म मंथन करें  । यदि पिछले एक वर्ष में खेलों में भारत की उपलब्धियों पर एक नजर डाली जाए तो यें काफी संतोषजनक लगती हैं । वैसे यह बात भी सही है कि भी अभी आसमान छूना बहुत दूर है। 

    पैरालंपिक्स 2024 में  भारतीय खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया और अभूतपूर्व सफलता हासिल की उन्होंने कुल 29 पदक: 7 स्वर्ण, 9 रजत और 13 कांस्य, जीते जो भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। इन खेलों में

प्रमुख पदक विजेता थे: अवनी लेखारा, नीतेश कुमार, सुमित अंतिल, धरमबीर, हरविंदर सिंह और नवदीप सिंह। पैरिस ओलंपिक 2024 में भी धमाकेदार प्रदर्शन जारी रहा वहां हमने कुल 6 पदक — 1 रजत (नीरज चोपड़ा, जेवलिन थ्रो) और 5 कांस्य जीते।  शूटर मणि भाकर: 10 मीटर एयर पिस्टल  में दो कांस्य पदक, एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी तो स्वप्निल कुशाल भी पीछे नहीं रही और उन्होंने 50 मीटर राइफल थ्री–पोजीशन में कांस्य जीता। अमन सेहरावत  पुरुषों की फ्रीस्टाइल (57 किलो) में कांस्य लेकर  भारत के सबसे युवा ओलंपिक पदक विजेता होने का श्रेय पाया।  पुरुष हॉकी टीम ने स्पेन को हराकर लगातार दूसरा ओलंपिक पदक जीता यह सफलता 1972 के बाद हुई पहली बार मिली है । कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने सर्वाधिक गोल किए (10) किए और टॉप स्कोरर रहे।

क्रिकेट में भी Iआई सी सी चैंपियंस ट्रॉफी 2025  का खिताब जीता, फाइनल में न्यूजीलैंड को 4 विकेट से हराया। टीम ने बिना कोई मैच हारें ट्रॉफी जीती।  यह पहली बार हुआ कि कोई टीम बिना हार के इस ट्रॉफी को जीती है।  बाद में संन्यास ले लेने वाले हिटमैन रोहित शर्मा को ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ चुना गया। शतरंज में व

डी गुकेश ने 18 वर्ष की उम्र में सबसे कम उम्र में वर्ल्ड चेस चैंपियन बनने का गौरव प्राप्त किया।

भारतीय पुरुष और महिला शतरंज टीमों ने 45वीं फीडे चेस ओलंपियाड, बुडापेस्ट में स्वर्ण पदक जीते तो  एथलेटिक्स में नीरज चोपड़ा का ने मई 2025 में दोहा डायमंड लीग में 90.23 मीटर की थ्रो दर्ज कर 90 मीटर क्लब में शामिल होते हुए ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।

     पर लाख टके का सवाल यह है कि140 करोड़ लोगों के दुनिया के सबसे बड़े देश के लिए क्या इतनी सीमित सफलता से संतुष्ट हुआ जा सकता है? 

आज हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन गए हैं और हमारा लक्ष्य 2047 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने का है परन्तु खेलों में हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती । एक तरफ दुनिया में क्यूबा , कोरिया, जापान , बुल्गारिया, रोमानिया, इटली ही नहीं वरन् कई छोटे – छोटे व गरीब देश हैं जो भारत से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं । वहीं ओलंपिक व विश्व खेलों में अमेरिका, चीन, रूस व ब्राजील जैसे देश खेल जगत की विश्वशक्ति बने हुए हैं पर हम कहां हैं ?  

हम पिछले तीन ओलंपिक व  शुरु के कुछ ओलंपिक खेलों में ज़रुर गिनती के पदक जीत सके हैं अन्यथा तो हम खेलों में हम फिसड्डी देश के रूप  ही जाने जाते हैं । पर ,एक मज़ेदार बात यह भी है कि हम भले ही फिसड्डी रहे हों पर हमारे पास हॉकी के जादूगर , क्रिकेट के भगवान , बैडमिंटन के विश्व चैंपियन , युगल टेनिस के विंबलडन विजेता, स्नूकर व बिलियर्ड के वर्ल्ड चैंपियन भी रहे हैं यानि व्यक्तिगत स्तर पर हमने काफी उपलब्धियां पाई भी हैं पर, एक देश के रूप में खेलों में हम बेहद पीछे खड़े दिखते हैं । खेलों के प्रति हमारा नज़रिया ही इस क्षेत्र में दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण रहा है । हमारे यहां तो ‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब ,खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब’ की कहावत रही है , रोजी रोटी कमाने में खेल यहां यूजलेस माने जाते रहे हैं , जिसके चलते खिलाड़ी होने का मतलब नालायक होना बन गया , ऊपर से खर्चे की मार ने खेलों कों उपेक्षित कर दिया ।

    पर, अब ऐसा नहीं है । पढ़-लिखकर भले ही नवाब न बन पाएं पर अगर आप खेलों  में चमक गए तो फिर तो आपकी बल्ले बल्ले है। आज खेलों में शौहरत पैसा, इज्जत तो हैं ही एक सोशल स्टेटस तथा सेलिब्रेटी का रुतबा भी है । अभी कुछ दशकों पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था कि कोई खिलाड़ी करोड़ों या अरबों का मालिक हो सकता है मगर आज देश के एक नहीं कई खिलाड़ी इस हैसियत को रखते हैं।

    अब मां बाप की सोच में भी परिवर्तन आ रहा है वें भी बच्चों के अब केवल पढ़ाई के पीछे भागने पर जोर नहीं देते बल्कि अपने होनहार बच्चे में नीरज चोपड़ा, डी गुकेश, शुभ्मन गिल, विराट, वाइचुंग भुटिया, मैरीकोम, मिताली या जसपाल अथवा अभिनव बिंद्रा, सायना,, राजवर्धन सिंह राठौर विनेश फोगाट नीरज चोपड़ा और सानिया जैसा भविष्य देख रहे हैैं । यकीनन इससे खेलों की दुनिया का स्कोप बढ़ा है । पर , अब भी हमें खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए बहुत कुछ करना होगा ।

    क्रिकेट में  भारतीय खिलाड़ी आज सुपर स्टार हैं, एक समय राष्ट्रीय खेल होने के बावजूद बर्बाद हो चुकी हॉकी भी पिछले दो ओलंपिक खेलों में पदक जीत कर आस जगा रही है । लेकिन जिस तरह से हमारे परंपरागत खेल यूरोपीय देशों की कूटनीति के शिकार हो कर अंतर्राष्ट्रीय , ओलंपिक या राष्ट्रमंडल खेलो सें से गायब हो रहे हैं उससे जूझने के लिए हमें जागना और अड़ना लड़ना होगा । 

स्कूल बनें खेल हब:

   अभी भी स्कूल स्तर पर हमें अच्छे खिलाड़ी तराशने का लक्ष्य हासिल करना बाकी है । आज भी अधिकांश स्कूलों का लक्ष्य अच्छी किताबी शिक्षा देना ही है जिसका मतलब छात्रों के लिए केवल अच्छे अंक, प्रतिशत या ग्रेड़ तक सीमित है वें उसी में अपना भविष्य तलाशते हैं, यहां योग्यता का अर्थ केवल एकेडेमिक एक्सीलेंस बन गया है क्योंकि उसी से कैरियर बनता या बिगड़ता है । उच्च पदों से पैसा कमाने का सीधा संबंध है । जबकि खेल केवल मनांरजन  के सबब समझे जाते हैं। खेलों के बल पर रोजगार पाने वाले बिरले ही भाग्यशाली निकलते हैं अन्यथा आज भीे खेलों में खिलाड़ी युवावस्था गुजरते ही गरीबी , बेरोजगारी , अभावों के अंधेरे में खोने को विवश हैं । उस सोच व हालातों का बदलना होगा अगर खेल में भारत को महाशक्ति बनना है तो ।

    डॉ घनश्याम बादल 

रामचरितमानस में श्रीराम दर्शन

डॉ. नीरज भारद्वाज

भगवान श्रीराम के दर्शनों के लिए यह मानव रूपी जीव लालायित रहा है। भगवान का धरा धाम पर आना भी एक पूर्ण योजना के आधार पर ही होता है। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि, जबजब होई धर्म कै हानी बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।। तब तब धरि प्रभु विविध शरीराहरहि दयानिधि सज्जन पीरा।। भगवान श्रीमद्भगवतगीता के अध्याय चार के श्लोक सात में कहते हैं कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। अर्थात जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है तो भगवान अधर्मियों का नाश करने के लिए आते हैं। इसके साथ ही जन्म-जन्म से भक्ति में लगे हुए भक्तों का उद्धार करने और उन्हें दर्शन देने के लिए भगवान इस धरा धाम पर आते हैं। गोस्वामी जी लिखते हैं कि राम जन्म के हेतु अनेका परम विचित्र एक से एका अर्थात भगवान के धरा धाम पर आने के कितने ही कारण हैं।

भक्तों की दृष्टि से समझे तो भगवान भूलोक पर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए, उन्हें आवागमन के चक्कर से मुक्त करने के लिए आते हैं। मीरा कहती हैं, अँखियां हरी दर्शन की भूखी। भक्त भगवान के दर्शन के लिए कितने ही भाव और शब्दों का प्रयोग करते हैं। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास भगवान श्रीराम के ब्रह्म होने और उनके दर्शन की बात अलग-अलग स्थान पर बताते-समझते रहे हैं। जन्म के समय ही भगवान श्रीराम ने माता कौशल्या को गर्भ में ही अपने दिव्य दर्शन दे दिए। माता कौशल्या भगवान को शिशु लीला करने की बात कहती हैं। माता पुनि बोली सो मति डोलीतजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसिला यह सुख परम अनूपा।। भगवान माता की बात मान लेते हैं और मानव लीला करने के लिए इस भूलोक पर आते हैं।

गुरु वशिष्ठ और गुरु विश्वामित्र भगवान श्रीराम के देव रूप को जानते हैं। उनकी लीलाओं को भी जानते हैं। जब धनुष भंग होता है तो उस समय भगवान परशुराम आते हैं और भगवान श्रीराम के दर्शन कर उन्हें प्रणाम कर अपने धाम को लौट जाते हैं। श्रीलक्ष्मण जी भगवान के दिव्य रूप को जानते हैं। रामचरितमानस में जब श्रीलक्ष्मण जी निषाद जी को बताते हैं कि राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।। भगवान श्रीराम ब्रह्म हैं अर्थात श्रीलक्ष्मण जी के माध्यम से निषाद जी को भी भगवान के दर्शन हो जाते हैं। भक्त केवट भी गंगा पार करने के बाद भगवान श्रीराम से कहते हैं कि अब कछु नाथ ना चाहिए मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।। अर्थात केवट भी भगवान के दर्शन कर अपने को धन्य कर चुके हैं। माता सीता जी के हरण से पहले रावण विचार करता है और कहता है कि खर दूषण मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारई बिनु भगवंता।। अर्थात रावण भी भगवान के दर्शन कर मुक्ति चाहता है।

श्रीहनुमान जी विप्र का वेश बनाकर आते हैं और जैसे ही भगवान श्रीराम से परिचय होता है, वह भगवान के दर्शन कर जन्म-जन्म की भक्ति का फल प्राप्त कर लेते हैं। बाली वध के समय भी बाली भगवान श्रीराम से कहते हैं कि धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि व्याध की नाईं।। अर्थात बाली भी भगवान के दिव्य दर्शन कर परमधाम को पहुंच जाता है। श्रीहनुमान जी जब लंका में माता सीता जी का पता लगाने जाते हैं तो वहां विभीषण जी से भेंट होती है। श्रीहनुमान जी और विभीषण जी का संवाद भी है। विभीषण जी रावण से कहते भी हैं कि तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।। ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।। अर्थात विभीषण जी भगवान श्रीराम के बारे में जानते हैं। रावण अपने दरबार से उसे भगा देता है और विभीषण जी सीधे भगवान श्रीराम जी के पास आते हैं और कहते हैं कि समदरसी इच्छा कुछ नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माही।। अर्थात आपके दर्शन के बाद मेरे अंदर का सुख-दुख, राग-विराग सभी कुछ नष्ट हो गया है।

भगवान श्रीराम अपने सभी भक्तों को दर्शन देते हैं। उन्हें देखने-समझने वाली दृष्टि होनी चाहिए। भगवान श्रीराम हम सभी के तारणहार हैं। राम नाम का सुमिरन करते रहेंगे तो भवसागर से पर उतर जाएंगे। जय श्रीराम

डॉ. नीरज भारद्वाज

लोक मेले बचा सकते हैं ग्रामीण कुटीर उद्योगों की सांसें  


अमरपाल सिंह वर्मा


राजस्थान सरकार ने हाल ही में ‘विकसित राजस्थान 2047’ विजन डॉक्यूमेंट को मंजूरी दी है। इसमें राज्य को 2047 तक 4.3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य न केवल बड़े औद्योगिक निवेश बुनियादी ढांचे के निर्माण पर निर्भर करेगा बल्कि ग्रामीण समाज की भागीदारी पर भी इसमें महत्वपूर्ण है। सरकार गांवों के उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ाने की इच्छुक है। यह सोच निश्चित ही दूरदर्शी है लेकिन बड़ा सवाल है कि इसे जमीन पर उतारने का व्यावहारिक रास्ता क्या है?
अगर सरकार की सोच धरातल पर उतरती है तो गांवों में रोजगार को खूब बढ़ावा मिल सकता है। गांवों की महिलाएं बुनाई, कताई और कढ़ाई में माहिर हैं। हजारों परिवार पीढिय़ों से खादी, हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी की कलाकृतियां या अन्य घरेलू उद्योग चला रहे हैं. उनकी बिक्री न के बराबर है। गांवों के कुटीर उद्योग केवल रोजगार का साधन नहीं थे, वे हमारी संस्कृति और आत्म निर्भरता की पहचान थे लेकिन बाजार की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण कुटीर उद्योग कमजोर पड़ रहे हैं। बड़ी तादाद में लोग बेरोजगारी और आय की कमी के कारण गांव छोडक़र शहरों का रुख कर रहे हैं।  
प्रश्न उठता है कि इस समाधान का क्या है? इस प्रश्न का उत्तर कहीं न कहीं राजस्थान मेला आयोजक संघ के सचिव जगराम गुर्जर के सुझाव में छिपा है। गुर्जर तीन दशक से लोक मेले आयोजित कर रहे हैं। उनका कहना है कि विभिन्न धार्मिक, पर्यटन महत्व के स्थानों सहित अकेले राजस्थान में ही सौ से अधिक लोक मेले हर साल आयोजित होते हैं और देश भर में इनकी संख्या हजारों में है। इन मेलों में हजारों लोग खरीदारी के लिए आते हैं। ऐसे में अगर राज्य के ग्रामीण कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, खादी और ग्रामोद्योग से जुड़े उत्पादों को मेलों में मंच दिया जाए तो कारीगरों को खरीदार और पहचान दोनों मिल सकते हैं।
गुर्जर का यह सुझाव इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि ग्रामीण उत्पादों की सबसे बड़ी समस्या बाजार का अभाव है। अगर ग्रामीणों को इन लोक मेलों में जोड़ दिया जाए तो उन्हें उत्पाद बेचने के लिए बड़ा अवसर मिल सकता है। स्थानीय से वैश्विक तक का सफर इस जरिए से शुरू किया जा सकता है।
सरकार को गांवों के उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए चरणबद्ध रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले जरूरी है कि किसी जिले के उत्पाद को उसी जिले में पहचान दिलाई जाए। उसके बाद बड़े मेलों के माध्यम से उसे अन्य जिलों तक पहुंचाया जाए। जब राज्य भर में ब्रांड वैल्यू बने तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया जाए और अंतत: उसी ब्रांड को वैश्विक बाजार में उतारा जाए, यानी वैश्विक पहचान का रास्ता स्थानीय पहचान से होकर ही जाता है।
इस काम में सरकार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। केवल विजन डॉक्यूमेंट में बड़े लक्ष्य लिख देने से कुछ नहीं हो सकता। सरकार को जिला उद्योग केंद्रों के माध्यम से गांवों के  हस्तशिल्पियों, कारीगरों और बुनकरों का सर्वे कराना चाहिए। उनकी सूची बनाकर उन्हें मेलों में भागीदारी के लिए प्रेरित और सहयोग करना चाहिए। राज्य में लगने वाले मेले महज उत्सव नहीं हैं, वे ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को गति देने का सर्वसुलभ बाजार साबित हो सकते हैं। गांवों के उत्पादों को ग्लोबल बनाने का संकल्प निश्चय ही सराहनीय है लेकिन यह सपना तभी साकार होगा जब सरकार और समाज मिलकर ग्रामीण उद्योगों को स्थानीय से वैश्विक तक की यात्रा तय करने में सहयोग दें। जगराम गुर्जर का मेला मॉडल इस यात्रा का सशक्त कदम हो सकता है। इससे न केवल कारीगरों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है बल्कि राजस्थान के पारंपरिक कुटीर उद्योगों को भी नई पहचान मिलना संभव है।

अमरपाल सिंह वर्मा

कांग्रेस, बीजेपी और राहुल गांधी का खेल

 

शिवानन्द मिश्रा

1968 से 1992 तक अमेरिका के लिए रिपब्लिकन युग कहा जा सकता है क्योंकि इन 24 वर्षों में सिर्फ 4 साल डेमोक्रेट्स के पास रहे, शेष 20 साल रिपब्लिकन पार्टी का राज रहा। 1988 के चुनाव में जब जॉर्ज बुश जीते, उनके उपराष्ट्रपति ने खुलकर कहा था कि अब डेमोक्रेट्स को जीवित रखना हमारी जिम्मेदारी है ताकि कोई तीसरा मोर्चा उभर ना पाए।

डेमोक्रेट्स ने इस उपहास को गंभीरता से लिया और 1992 में बिल क्लिंटन के नेतृत्व में जीत दर्ज कर अपनी वापसी की।

आज भारत में बीजेपी उसी रिपब्लिकन स्थिति में है जहाँ कांग्रेस को जीवित रखना बीजेपी का रणनीतिक हित बन गया है ताकि तीसरी पार्टियों का खतरा कम हो। आज कांग्रेस पंजाब, राजस्थान, हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना तक सिमट चुकी है। 

राहुल गांधी की सबसे बड़ी “उपलब्धि” यही है कि उन्होंने राज्य स्तर पर खुद को शून्य किया, प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद में। कांग्रेस को अब अपनी खोई हुई जमीन पाने के लिए सैकड़ों प्रमोद महाजन या अमित शाह जैसे नेताओं की आवश्यकता होगी।

उनकी 99 सीटें उनकी उच्चतम उपलब्धि थीं; उसके बाद शुरू हुआ पतन। अब मामला वोट चोरी तक पहुंच चुका है। एक अनुमान के मुताबिक अगला टारगेट न्यायपालिका, पुलिस या सेना हो सकता है। यह वही सत्ता की निराशा है जिसे मुहम्मद अली जिन्ना ने भी झेला।

जब से ममता बनर्जी ने राहुल को नेता प्रतिपक्ष पद से हटने का सुझाव दिया, उनके लिए खुद को प्रासंगिक बनाए रखना जरूरी हो गया है।

बिहार में वे खुद शून्य हैं, साथ में आधा दर्जन सीटों वाला तेजस्वी यादव उनके साथ। अब ये दोनों हुड़दंग को जन आंदोलन बताने में लगे हैं। 

बीजेपी के हित में यही जरूरी है कि कांग्रेस प्रासंगिक रहे, ताकि कोई तीसरा चेहरा कांग्रेस से ऊपर ना उठ पाए। राहुल गांधी की “ट्यूशन से सीखी राजनीति” से निपटना आसान है लेकिन कोई जननेता आ जाए तो चुनौती बढ़ जाएगी।

अमित शाह का उदय हाल के दिनों में तेज़ हुआ है। मोदीजी उनके भरोसे संसद के बिल पास करवा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि अगले दशक में अमित शाह का युग लगभग निश्चित है। 2029 में मोदीजी अगर फिर चुनाव लड़े तो नेहरू का रिकॉर्ड टूट सकता है लेकिन 2029 या 2034 से अमित शाह का समय शुरू होना लगभग तय है। जो कांग्रेसी अब मोदीजी को “वोट चोर” बोल रहे हैं, वे भविष्य में मोदी का फोटो लगाकर रोते नजर आएंगे। मोदीजी अब नेता वाली लीग से बाहर, उनका नाम अमर। संघर्ष अब नए नेताओं का है और जब विपक्ष में राहुल गांधी हों तो ये संघर्ष आसान होता है।

राजनीतिक रणनीति यही है:

कांग्रेस अगर सिर्फ 4-5 राज्यों में लड़े तो हमेशा नंबर 2 बनेगी और यह बीजेपी के लिए उचित परिणाम होगा। बस शर्त यही है कि उनके यहाँ डेमोक्रेटिक पार्टी जैसा कोई बिल क्लिंटन न आए, जो रास्ते खुद कांग्रेस ने बंद कर रखे हैं।

 राजनीति = गणित + रणनीति + धैर्य

राहुल गांधी और कांग्रेस का खेल इस समय सिर्फ बीजेपी के हित में प्रासंगिक बने रहने का है।

शिवानन्द मिश्रा 

अंतरिक्ष की गहराई में अनुसंधान करेगा भारत

संदर्भः- राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने किया देश का उत्साहवर्धन
प्रमोद भार्गव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिक्ष में गहराई से नए अनुसंधानों के लिए वैज्ञानिकों को प्रेरित किया है। राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के अवसर पर आभासी पटल पर बोलते हुए मोदी ने कहा कि इस वर्ष का विषय ‘आर्यभट्ट से गगनयान तक‘ भारत के अतीत के आत्मविश्वास और भविष्य के संकल्प दोनों को दर्शाता है। इसी से प्रेरणा लेते हुए भारत जल्दी ही गगनयान मिशन शुरू करेगा और अपना अंतरिक्ष स्टेशन भी स्थापित करेगा। हम चंद्रमा और मंगल पर पहले ही पहुंच चुके हैं और अब अंतरिक्ष के नए क्षेत्रों में अनुसंधान करेंगे। याद रहे चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर सबसे पहले पानी की खोज भारत ने ही की थी। अब भारत अंतरिक्ष में नए खनिजों की खोज के लिए अपने अभियानों को आगे बढ़ाएगा। इस दृश्टि से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने ‘इसरो स्पेस रोडमैप-2040‘ भी बना लिया है। यह सोच न केवल भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को रेखांकित करती है, बल्कि देश को आने वाले वर्शों में वैश्विक स्तर पर अग्रणी अंतरिक्ष षक्तियों की कतार में खड़ा करने का संकल्प भी दिखाती हैं।
भारत 2035 तक स्वयं का भारतीय अंतरिक्ष केंद्र-बीएएस स्थापित करेगा, जो देश की वैज्ञानिक और तकनीकि क्षमता को आसमानी ऊंचाईयों तक ले जाएगा। अंतरिक्ष स्टेशन के प्रतिदर्श (मॉडल) को भी प्रस्तुत कर दिया है। इसरो 2028 तक परियोजना का पहला मॉड्यूल प्रक्षेपित कर देगा और 2035 तक स्टेशन चालू हो जाने की उम्मीद है। इस मंच से सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण (माइक्रोग्रैविटी) अध्ययन और लंबी अवधि के मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए प्रौद्योगिकियों के परीक्षण करना शामिल है। भारत की अपनी स्वदेशी कक्षीय प्रयोगशाला स्थापित करने की यात्रा उसके अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक बड़ी छलांग है। 2040 तक भारत चंद्रमा से मिट्टी और पत्थरों के नमूने लाने के लक्ष्य को लेकर भी आगे बढ़ रहा है। इस रोडमैप में चंद्रयान-4, षुक्रयान, डीपस्पेस मिशन और नेक्सट जेनरेशन लांचर (एनजीएल) जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं षामिल हैं। भविश्य की ये उपलब्धियां भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की दिशा में बड़ी छलांग साबित होंगी। यही उपलब्धियां भारत को अंतरिक्ष अणवेशण में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में उसकी स्थिति को मजबूत करेंगी। चंद्रयान तीन के चांद के दक्षिणी धु्रव पर सफल प्रक्षेपण के बाद लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान ने पानी और खनिजों की खोज के उद्देश्य से लगातार काम कर रहा है। ये यहां पानी के साथ आग की भी तलाश करेंगे। यदि आग और पानी मिल जाते हैं तो चांद पर मनुश्य के आबाद होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।
दरअसल आज के समय में चंद्रमा और मंगल के साथ अन्य मिशन भविश्य की वैश्विक रणनीति के अहम् मंच बन गए हैं। भविश्य की आर्थिकी इन्हीं मंचों से तय होगी। राश्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अव्यावहारिक बयानों और टैरिफ की बाध्यता को लेकर भारत-अमेरिका के संबंधों में खटास आ गई है। रूस से तेल की खरीद को लेकर भी ट्रंप और मोदी के बीच मनमुटाव बढ़ा है। ऐसे में भारत अमेरिका को दरकिनार कर रूस या चीन के साथ मिलकर चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाएगा, ऐसी संभावना भी बढ़ रही है ? क्योंकि अब चंद्रमा केवल वैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा न रहकर भविष्य की रणनीति का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। दरअसल भारत 2023 में अपने चंद्र-अभियान के अंतर्गत दक्षिणी धु्रव पर रोवर उतारकर अपनी सक्षमता सिद्ध कर चुका है। अब होड़ इस बात को लेकर है कि चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर आवश्यक संरचनात्मक ढांचा कौन तैयार कर पाता है। क्योंकि यहां से पानी हो या खनिज उसके दोहन के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होगी। इस ऊर्जा उत्पादन की एकमात्र कुंजी परमाणु ऊर्जा है। भविश्य में चंद्रमा ही अन्य ग्रहों तक के सफर के लिए आधार केंद्र बनेगा। अमेरिका 2030 तक चंद्रमा पर 100 किलोवाट क्षमता वाला न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने का लक्ष्य साधे हुए है, वहीं, चीन और रूस 2035 तक आधा मेगावाट रिएक्टर बनाने के प्रयास में लगे हैं। दरअसल रूस की परमाणु ऊर्जा एजेंसी रोसाटॉम ने दावा किया है कि भारत अंतरराष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन (आईएलआरएस) परियोजना का हिस्सा बनने में रुचि ले रहा है, जिसमें चीन भी शामिल है। हालांकि भारत ने इसे अभी अधिकारिक रूप में घोशित नहीं किया है, लेकिन बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों में इसे एकाएक नकारना भी मुश्किल है। अमेरिका के साथ तनाव और भारत चीन के रिश्तों में हो रहे सुधार के चलते नया विकल्प खुला है, लेकिन चुनौतीपूर्ण है। भारत को तय करना होगा कि वह अमेरिका के साथ मर्यादित द्विपक्षीय संबंध स्थापित रखे या रूस-चीन के साथ मिलकर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़े। दोनों रास्तों में अवसर और खतरे हैं। क्योंकि रूस ने तो भारत का साथ प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में दिया है, लेकिन अमेरिका और चीन ऐसा नहीं कर पाए हैं। बावजूद अंतरिक्ष में हस्तक्षेप के लिए पहल तो करनी ही होगी। क्योंकि चंद्रमा की सतह पर जो देश ऊर्जा के लिए परमाणु संयंत्र बना लेंगे वही विश्व में धाक जमा पाएंगे।  
बहरहाल अंतरिक्ष में भारतीय मानव मिशन के सफल होने के बाद ही चंद्रमा और मंगल पर मानव भेजने का रास्ता खुलेगा। इन पर बस्तियां बसाए जाने की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी। आने वाले वर्शों में अंतरिक्ष पर्यटन के भी बढ़ने की उम्मीद है। इसरो की यह सफलता अंतरिक्ष पर्यटन की पृश्ठभूमि का भी एक हिस्सा है। यह अभियान देश में अंतरिक्ष षोधकार्यों को बढ़ावा देगा। साथ ही भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नई प्रोद्यौगिकी तैयार करने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों का तो यहां तक दावा है कि दवा, कृशि, औद्योगिक सुरक्षा, प्रदूशण, कचरा प्रबंधन तथा पानी एवं खाद्य स्रोत प्रबंधन के क्षेत्र में भी तरक्की के नए मार्ग अंतरिक्ष में हस्तक्षेप से खुलेंगे।        
चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर सघन रूपों में बड़ी मात्रा में पानी उपलब्ध होने के तत्व मिले हैं। लेकिन ये जहां इंसान रहेगा वहां से बहुत दूर भी हो सकते हैं। इसलिए आरंभ में चांद के मौसम की जानकारी के साथ वहां के वायुमंडल में गैसों की मौजूदगी का भी पता लगाना होगा, जिससे उनके अनुकूल जीवन को संभव बनाया जा सके। हालांकि कई शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि चंद्रमा पर गुफाओं की अनेक संरचनाएं हैं। कुछ गुफाओं में तापमान भी मनुष्य के अनुकूल है। इन गुफाओं के इर्द-गिर्द गड्ढे हैं और इन गड्ढों में पृथ्वी जैसा तापमान है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार वहां 17 डिग्री सेल्सियस तापमान पाया गया है। परंतु चंद्रमा की सतह पर तापमान बदलता रहता है। दिन के समय यह 260 डिग्री तक और रात में यह तापमान शून्य से 280 डिग्री सेल्सियस नीचे चला जाता है। इसलिए प्रज्ञान ऐसे स्थलों की खोज भी कर रहा है, जहां तापमान स्थिर रहता हो। चंद्रमा पर एक दिन या रात पृथ्वी के दो सप्ताह से थोड़े ज्यादा होते हैं। इस कारण भी मनुश्य का रहना आसान नहीं हो पा रहा है। हालांकि नवीनतम अनुसंधानों से पता चला है कि 200 से अधिक ऐसे गड्ढे हैं, जो लावा फूटने के कारण बने हैं। इनकी तलाश 2009 में ही कर ली गई थी। 2009 में ही भारत के चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी के साक्ष्य लिए थे।  
 नौवें दशक से चंद्रमा को लेकर दुनिया के सक्षम देशों की दिलचस्पी इसलिए बढ़ी, क्योंकि चंद्रमा पर बर्फीले पानी और भविश्य के ईंधन के रूप में हीलियम-3 की बड़ी मात्रा में उपलब्ध होने की जानकारियां मिलने लगीं थीं। वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि हीलियम से ऊर्जा उत्पादन की फ्यूजन तकनीक के व्यावहारिक होते ही ईंधन के स्रोत के रूप में चांद की उपयोगिता बढ़ जाएगी। यह स्थिति आने वाले दो दशकों के भीतर बन सकती है। गोया, भविश्य में उन्हीं देशों को यह ईंधन उपलब्ध हो पाएगा, जो अभी से चंद्रमा तक के यातायात को सस्ता और उपयोगी बनाने में जुटे हैं। मंगल हो या फिर चंद्रमा कम लागत के अंतरिक्ष यान भेजने में भारत ने विशेष दक्षता प्राप्त कर ली है। दूसरी तरफ जापान ने चंद्रमा पर 50 किमी लंबी एक ऐसी प्राकृतिक सुरंग खोज निकाली है, जिससे भयंकर लावा फूट रहा है। चंद्रमा की सतह पर रेडिएशन से युक्त यह लावा ही अग्नि रूपी वह तत्व है, जो चंद्रमा पर मनुष्य के टिके रहने की बुनियादी शर्तों में से एक है। इन लावा सुरंगों के इर्द-गिर्द ही ऐसा परिवेश बनाया जाना संभव है, जहां मनुष्य जीवन-रक्षा के कृत्रिम उपकरणों से मुक्त रहते हुए, प्राकृतिक रूप से जीवन-यापन कर सके।

गणेश वंदना

वक्रतुण्ड महाकाय,
तेज तुम्हारा अनुपम छाय।
सूर्यकोटि सम प्रभु दाता,
विघ्न हरन जग के त्राता॥

गणपति बाप्पा मोरया,
विघ्न विनाशक मोरया।
सर्वकार्य सिद्धि कराओ,
करुणा धारा बरसाओ॥

जहाँ तुम्हारा नाम लिया जाए,
वहाँ न संकट पास आए।
भक्ति-दीप हम जलाएँ,
मन मंदिर में तुम्हें समाएँ॥

ज्ञान-विवेक का दीप जलाओ,
भक्तों को सुख-शांति दिलाओ।
मंगल-कथा सदा सुनाएँ,
सिद्धि विनायक घर बसाएँ॥

गणपति बाप्पा मोरया,
विघ्न विनाशक मोरया।
सर्वकार्य सिद्धि कराओ,
करुणा धारा बरसाओ॥

तेरी शरण में सुख ही सुख है,
तेरे चरण में जीवन अद्भुत है।
भक्तों की नैया पार लगाएँ,
दुख का हर बंधन तोड़ भगाएँ।

तेरी महिमा कौन बताए,
हर दिन तेरा गुण गाए।
विघ्नहर्ता, सबके साथी,
संकट मोचन दाता त्रिनाथी।

तेरा दास ‘राहत’ पुकारे,
विघ्न दूर करें मेरे सारे॥

“राहत टीकमगढ़”

अर्धनग्न मुजरे के दौर में गुम होती साहित्यिक स्त्रियाँ

“सोशल मीडिया की चमक-दमक के शोर में किताबों का स्वर कहीं खो गया है।”

इंस्टाग्राम और डिजिटल मीडिया का दौर है। यहाँ आकर्षण और तमाशा सबसे ज्यादा बिकते हैं। लेकिन समाज की आत्मा को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि स्त्रियाँ फिर से साहित्य की ओर लौटें। इंस्टाग्राम का शोर कुछ समय बाद थम जाएगा,

पर साहित्य के शब्द अमर रहेंगे। साहित्य पढ़ने वाली स्त्रियाँ कभी गुम नहीं होतीं, वे हर उस किताब के पन्नों में जीवित रहती हैं जिसे कोई दिल से खोलता है।

-डॉ. प्रियंका सौरभ

आज के समय में जब हर हाथ में स्मार्टफोन और हर मन में लाइक्स व फॉलोअर्स की भूख पल रही है, तब साहित्य और किताबें पढ़ने वाली स्त्रियों का अस्तित्व कहीं पीछे छूटता जा रहा है। यह दौर इंस्टाग्राम रील्स, टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल मनोरंजन का है। यहाँ अर्धनग्न होकर मुजरा करने वाली छवियाँ सेकंडों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती हैं, पर वहीँ गंभीर साहित्य, कविता या आलोचना पढ़ने वाली स्त्रियों की आवाज़ मानो कहीं दबकर रह जाती है। यह केवल एक सामाजिक विडंबना नहीं बल्कि सांस्कृतिक संकट भी है।

सदियों से स्त्रियाँ साहित्य के माध्यम से समाज की आत्मा को संवेदनाओं और करुणा से सींचती रही हैं। महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाएँ न केवल साहित्य रचती थीं बल्कि स्त्री की अस्मिता और समाज की चेतना का प्रतीक भी थीं। लेकिन आज का समय उन्हें पढ़ने से अधिक उन्हें “कोट्स” बनाकर इंस्टाग्राम स्टोरी पर सजाने में व्यस्त है।

आज की पीढ़ी का बड़ा हिस्सा विज़ुअल कंटेंट में उलझा है। वीडियो और तस्वीरों की त्वरित खपत ने किताबों की धीमी, गहरी और आत्ममंथन कराने वाली दुनिया को पीछे धकेल दिया है। स्त्रियाँ, जो कभी किताबों में आत्मा का सहारा खोजती थीं, अब सोशल मीडिया पर ग्लैमराइज्ड आइडेंटिटी गढ़ने में मजबूर हो रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि सोशल मीडिया स्त्रियों को मंच देता है, पर यह मंच अक्सर उनके शरीर को अधिक महत्व देता है, विचारों को नहीं। यही कारण है कि इंस्टाग्राम पर एक नृत्य या अर्धनग्न अभिनय लाखों लाइक्स पा लेता है, लेकिन किसी स्त्री द्वारा किया गया साहित्यिक विश्लेषण सैकड़ों पर भी नहीं पहुँचता।

साहित्य पढ़ने और रचने वाली स्त्रियाँ समाज में गहरी छाप छोड़ती थीं। वे अपने लिखे से व्यवस्था को चुनौती देती थीं, रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ती थीं और स्त्री-पुरुष समानता की नई जमीन तैयार करती थीं। लेकिन आज, प्राथमिकताएँ बदल गई हैं। आधुनिक स्त्री अक्सर अपने को साबित करने के लिए सोशल मीडिया की दौड़ में शामिल हो जाती है। यहाँ सुंदरता और आकर्षण अधिक बिकते हैं, विचार और भावनाएँ कम। यह विडंबना है कि जिस साहित्य ने स्त्रियों को आवाज़ दी, वही साहित्य अब उनकी आवाज़ की प्रतीक्षा कर रहा है।

महादेवी वर्मा की कविताएँ स्त्री की करुणा, पीड़ा और सौंदर्य का ऐसा प्रतिरूप थीं, जिन्हें पढ़कर आत्मा झंकृत हो जाती थी। वे लिखती थीं—“मैं नीर भरी दुख की बदली…” उनकी कविताओं में स्त्री की आत्मा बोलती थी, पर आज वही आत्मा इंस्टाग्राम फिल्टर और बैकग्राउंड म्यूज़िक के शोर में दबती जा रही है। जहाँ पहले स्त्रियाँ समाज से कहती थीं कि “मेरी आवाज़ सुनो”, आज वे मजबूर हैं यह कहने पर कि “मेरे डांस को लाइक करो।” यही सबसे बड़ा सांस्कृतिक पतन है।

हालाँकि यह कहना पूरी तरह उचित नहीं होगा कि साहित्य पढ़ने वाली स्त्रियाँ गायब हो गईं। वे अब भी मौजूद हैं, पर उनका दायरा सीमित हो गया है। पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों और छोटे-छोटे साहित्यिक मंचों पर अब भी स्त्रियाँ साहित्य पढ़ रही हैं, लिख रही हैं और चर्चा कर रही हैं। फर्क बस इतना है कि उनका स्वर उतना बुलंद नहीं है जितना सोशल मीडिया के ग्लैमरस कंटेंट का है। असल में समस्या प्लेटफॉर्म की भी है। इंस्टाग्राम का एल्गोरिद्म ही ऐसा है जो मनोरंजन और तड़क-भड़क को प्राथमिकता देता है। गंभीर साहित्य या लंबी पढ़ाई वहाँ “ट्रेंडिंग” नहीं बन पाती।

साहित्य पढ़ने का अर्थ है—अपने भीतर झाँकना, दूसरों की पीड़ा को समझना, और आत्मा को गहराई से महसूस करना। जब समाज साहित्य से दूर होता है, तो वह अपनी संवेदनशीलता भी खो देता है। स्त्रियों की करुणा और कोमलता ही समाज को संतुलित रखती हैं। लेकिन जब यही स्त्रियाँ केवल बॉडी शो तक सीमित हो जाएँ और आत्मा की गहराई को दरकिनार कर दें, तो समाज के संवेदनशील होने की उम्मीद भी घट जाती है।

इस स्थिति से निकलने के लिए जरूरी है कि परिवार और शिक्षा व्यवस्था किताबों के प्रति प्रेम जगाए। घर और स्कूलों में बच्चों, खासकर बेटियों को किताबें पढ़ने की आदत डालनी होगी। साहित्यकारों और प्रकाशकों को चाहिए कि वे सोशल मीडिया पर साहित्य को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करें। सरकार और समाज को साहित्य पढ़ने और लिखने वाली स्त्रियों को ज्यादा मंच देना चाहिए, ताकि उनकी आवाज़ दबे नहीं। स्त्रियों को आपस में साहित्यिक समूह और बुक क्लब बनाने चाहिए, जो एक-दूसरे को प्रेरित करें।

इतिहास गवाह है कि जब भी समाज अंधकार में डूबा, साहित्य ने ही राह दिखाई। और उस साहित्य में स्त्रियों की भूमिका हमेशा निर्णायक रही। चाहे वह मीरा हों, चाहे महादेवी, या फिर समकालीन स्त्रियाँ—उन्होंने अपने शब्दों से समाज की दिशा तय की। आज भी यदि स्त्रियाँ किताबों को गले लगाएँगी, तो आने वाली पीढ़ी को सिर्फ “फॉलोअर्स” और “लाइक्स” नहीं, बल्कि जीवन की गहरी समझ भी मिलेगी।

आज का निष्कर्ष यही है कि इंस्टाग्राम और डिजिटल मीडिया का दौर है। यहाँ आकर्षण और तमाशा सबसे ज्यादा बिकते हैं। लेकिन समाज की आत्मा को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि स्त्रियाँ फिर से साहित्य की ओर लौटें। क्योंकि इंस्टाग्राम का शोर कुछ समय बाद थम जाएगा, पर साहित्य के शब्द अमर रहेंगे। साहित्य पढ़ने वाली स्त्रियाँ कभी गुम नहीं होतीं—वे केवल समाज की लापरवाही के कारण धुंधली दिखने लगती हैं। जब भी कोई किताब खोली जाएगी, वे फिर से जीवित हो उठेंगी।

अंतरिक्ष में खेती-किसान

प्रमोद भार्गव

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के प्रवासी भारतीय शुभांशु शुक्ला ने भविष्य की सुरक्षित खेती-किसानी के लिए अंतरिक्ष में बीज बो दिए हैं। यह सुनने में आश्चर्य होता है कि अंतरिक्ष लोक में खेती ? आखिर कैसे संभव है ? मनुष्य धरती का ऐसा प्राणी है, जिसकी विलक्षण बुद्धि नए-नए मौलिक प्रयोग करके धरती के लोगों का जीवन सरल व सुविधाजनक बनाने में लगी है। इसी क्रम में अब अंतरिक्ष में किया जा रहा खेती करने का प्रयोग है।
  तीन अन्य साथी यात्रियों के साथ शुभांशु ने एक्सिओम-4 अभियान के अंतर्गत अंतरिक्ष की उड़ान भरी थी। 28 घंटे में 420 किमी की यात्रा कर यान अपनी मंजिल पर पहुंचा था। यहां यह भी हैरानी पाठकों की हो सकती है कि जब फाल्कन-9 ड्रैगन रॉकेट की गति 27 हजार किमी थी, फिर इतना समय कैसे लग गया ? प्रश्न तार्किक है। इसकी मुख्य वजह है, वायुमंडल का गुरुत्वाकर्षण! असल में यहां शून्य गुरुत्वाकर्षण के साथ ‘निर्वात‘ यानी खाली जगह की मौजदूगी है। अर्थात यह ऐसी स्थिति दर्शाता है, जहां कोई हवा या गैस उपस्थित नहीं होती है। इस कारण यान की गति धीमी होती है। अब तक 633 यात्री अंतरिक्ष स्टेशन पर अपने कदम रख चुके हैं। शुभांशु 634वें यात्री थे। इस अभियान का लक्ष्य इस अंतरिक्ष ठिकाने पर विशेष खाद्य पदार्थ और उनके पोषण संबंधी 60 प्रयोग करना था । इनमें सात इसरो यानी भारतीय अनुसंधान संगठन के थे। अंतरिक्ष स्टेशन प्रतिदिन पृथ्वी की 16 बार परिक्रमा करता था। यात्रियों को विभिन्न 16 सूर्योदय और 16 सूर्यास्त देखने का रोमांच और आनंद मिलता था। ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है, सूर्य अनेक हैं। सात दिशाएं हैं, उनमें नाना सूर्य हैं।
शुभांशु मेथी और मूंग की दाल के जो बीज अंतरिक्ष में बोकर अंकुरित करने के प्रयोग का नेतृत्व धरती से दो कृषि विज्ञानी रविकुमार होसामणि और सुधीर सिद्धपुरेड्डी कर रहे थे। एक्सिओम स्पेस अभियान की ओर से जारी एक बयान में कहा है कि यात्रियों के धरती पर लौटने के बाद बीजों को कई पीढ़ियों तक उगाया जाएगा। तंत्र और पोषण की क्रमिक विकास की संरचना होने वाले बदलावों को ज्ञात किया जा सके। षुभांशु एक अन्य प्रयोग के लिए सूक्ष्म शैवाल ले गए थे ,जिससे भोजन, प्राणवायु (ऑक्सीजन) और यहां तक की जैव ईंधन उत्पन्न करने की क्षमता को वैज्ञानिक ढंग से परखा जा सके।
अंतरिक्ष में आनुवंशिकी सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी तंत्र और उनकी पोषण संरचना की जानकारी हमें अपने प्राचीन संस्कृत ग्रंथ श्रीमद्भागवत में भी मिलती है। कश्यप-दिति पुत्र हिरण्यकश्यप केवल बाहुबलि ही नहीं है, अपितु अपनी मेधा और अनुसंधानमयी साधना से उन्होंने चमत्कारिक वैज्ञानिक उपलब्धियां भी प्राप्त की हुई थी। सभी बुद्धिमान जानते हैं कि प्रकृति में उपलब्ध प्रत्येक पदार्थ के सूक्ष्म कण स्वमेव संयोजित होकर केवल नव-सृजन ही नहीं करते हैं, अपितु उन्हें संयोजित और वियोजित (विघटित) भी करते हैं। अतएव इस अनंत ब्रह्मांड में दृश्य एवं अदृश्यमान संपूर्ण पदार्थों के तत्व उपलब्ध हैं। सूर्य की किरणों में भी सभी पदार्थों को उत्सर्जित करने वाले तत्वों की उपस्थिति मानी जाती है। 
अब दुनिया के भौतिक विज्ञानी मानने लगे हैं कि अंतरिक्ष और अनंत ब्रह्मांड में विविध रूपों में जीव-जगत व वनस्पतियों का सृजन करने वाले बीजों के सूक्ष्म कण हमेशा विद्यमान रहते हैं। गन्ना (ईख) एक बार बोने के बाद कई साल तक फसल देता है। रूस के वैज्ञानिकों ने ऐसे संपुटिका (कैपस्यूल) बना लिए हैं, जिनमें बीजों के कई-कई मूल कण संयोजित रहते हैं। आनुवंशिक रूप से बीजों को परिवर्धित करके कुछ इसी तरह के उपाय किए जा रहे हैं।

प्रमोद भार्गव

समर्पण, सेवा और संगठन की सौ वर्षीय यात्रा से विश्वगुरु भारत की ओर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष : उपलब्धियाँ और नये क्षितिज”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं। संघ का उद्देश्य है परिवार को सुदृढ़ करना, पर्यावरण का संरक्षण करना, समाज में समरसता लाना, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को अपनाना तथा नागरिक कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित करना। इन पाँच संकल्पों से भारत का भविष्य उज्ज्वल और आत्मनिर्भर बनेगा। संघ मानता है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर देशभर में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। इसी क्रम में एक तीन दिवसीय शताब्दी महोत्सव भी प्रस्तावित है, जिसमें संघ की सौ वर्षीय यात्रा, उपलब्धियाँ और भविष्य की रूपरेखा पर प्रकाश डाला जाएगा। पहले दिन संघ के इतिहास और संस्थापकों के योगदान पर आधारित प्रदर्शनी और गोष्ठियाँ होंगी। दूसरे दिन सेवा कार्यों, शिक्षा, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक समरसता पर कार्यरत संगठनों का विवरण प्रस्तुत किया जाएगा। तीसरे दिन “नये क्षितिज” विषय पर राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन होगा, जिसमें देशभर से स्वयंसेवक, शिक्षाविद, समाजसेवी और विचारक भाग लेंगे। यह तीन दिवसीय आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि आने वाले शताब्दी काल के लिए संघ का संकल्प-पत्र होगा।

 -डॉ प्रियंका सौरभ 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। उस समय यह सोचना भी कठिन था कि कुछ गिने-चुने स्वयंसेवकों के साथ आरंभ हुआ यह प्रयास आने वाले सौ वर्षों में भारतीय समाज जीवन का सबसे बड़ा और सबसे व्यापक संगठन बन जाएगा। सौ वर्ष किसी संस्था के जीवन में केवल समय की गिनती नहीं होते, बल्कि यह उसकी प्रासंगिकता, जीवंतता और समाज पर पड़े उसके प्रभाव का प्रमाण होते हैं। संघ की सौ वर्षीय यात्रा संघर्ष, सेवा, संगठन और संस्कारों से भरी हुई है।

संघ का प्रारंभ शाखा के रूप में हुआ। साधारण से दिखने वाले खेल, व्यायाम, गीत और अनुशासन ने केवल शारीरिक क्षमता का ही निर्माण नहीं किया, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी को तैयार किया जिसने समाज के प्रति समर्पण और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। अनेक बार इस संगठन पर प्रतिबंध लगे, कठिनाइयाँ आईं, विरोध हुआ, किंतु संघ हर बार और सशक्त होकर उभरा। 1947 के बाद के राजनीतिक परिवर्तनों, आपातकाल की कठोर परिस्थितियों और अनेक आलोचनाओं के बावजूद संघ ने अपने कार्य की गति धीमी नहीं की।

आज संघ केवल शाखाओं तक सीमित नहीं है। इसकी पहचान सेवा कार्यों से होती है। जब भी देश में कोई आपदा आती है, सबसे पहले स्वयंसेवक सहायता के लिए पहुँचते हैं। बाढ़, भूकंप, चक्रवात, महामारी—हर जगह संघ के कार्यकर्ता निःस्वार्थ भाव से सेवा करते दिखते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती के हजारों विद्यालय बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों से भी जोड़ते हैं। ग्राम विकास, वनवासी सेवा, स्वदेशी उत्पादों का प्रचार और सामाजिक समरसता के अभियान संघ की पहचान बन चुके हैं।

सौ वर्षों की यात्रा का सबसे बड़ा योगदान यह है कि संघ ने भारतीय समाज को आत्मगौरव का भाव दिया। सदियों की गुलामी और पराधीनता ने समाज को हीनता और आत्मसंकोच से भर दिया था। संघ ने यह बताया कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता है जो विश्व को दिशा दे सकती है। शाखा में गाया जाने वाला गीत केवल स्वर नहीं, बल्कि आत्मगौरव और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। यही कारण है कि संघ का प्रभाव आज राजनीति, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक संस्थाओं और प्रवासी भारतीय समाज तक फैला हुआ है।

भविष्य की ओर दृष्टि: नये क्षितिज

शताब्दी का यह क्षण केवल अतीत की स्मृतियों का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का अवसर है। पाँचजन्य में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि यदि किसी व्यवस्था को बिगाड़ने में पचास साल लगते हैं, तो उसे सुधारने में सौ साल लगते हैं। संघ का विश्वास है कि यह कार्य कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं। यही आत्मविश्वास आने वाले समय के लिए नई ऊर्जा का स्रोत है।

संघ ने आने वाले समय के लिए पाँच प्रमुख लक्ष्यों को अपनाया है। इनमें परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता, तथा नागरिक कर्तव्य का पालन प्रमुख हैं। परिवार भारतीय संस्कृति की धुरी है। प्रकृति का संरक्षण जीवन का आधार है। जाति-भेद से ऊपर उठकर समाज को एक करना समय की माँग है। स्वदेशी और आत्मनिर्भरता आर्थिक स्वतंत्रता का मार्ग है। नागरिक कर्तव्यों के पालन से ही राष्ट्र सशक्त बनेगा। ये केवल नारे नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक परिवर्तन के संकल्प हैं।

संघ अब केवल राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक दृष्टि से भी कार्य कर रहा है। “वसुधैव कुटुंबकम्” का संदेश आज दुनिया के लिए मार्गदर्शक है। योग, आयुर्वेद और भारतीय संस्कृति विश्व में सम्मान पा रहे हैं। संघ का सपना है कि भारत केवल राजनीति या अर्थशक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि संस्कृति और अध्यात्म की दृष्टि से भी विश्वगुरु बने।

चुनौतियाँ भी सामने हैं। तकनीकी युग में मूल्य-संरक्षण कठिन होता जा रहा है। मोबाइल और इंटरनेट ने सुविधाएँ दी हैं, पर परिवार और समाज की डोर कमजोर हुई है। उपभोक्तावाद ने जीवन को प्रतिस्पर्धा और दिखावे में बदल दिया है। वैश्वीकरण ने अवसर दिए हैं, परंतु सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरे भी पैदा किए हैं। इन परिस्थितियों में संघ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

संघ का भविष्य दृष्टि-सम्पन्न है। हर गाँव और नगर में सेवा व शिक्षा केंद्र स्थापित करना, युवाओं को डिजिटल माध्यम से जोड़ना, महिलाओं की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करना और भारतीय दृष्टि से अनुसंधान को बढ़ावा देना इसकी प्राथमिकताएँ हैं। शिक्षा को केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार मानना संघ की दृष्टि है।

संघ की शताब्दी यात्रा यह प्रमाणित करती है कि समर्पण और संगठन से असंभव भी संभव हो सकता है। यह यात्रा आने वाले सौ वर्षों की नींव है। नये क्षितिज सामने हैं—समरस समाज का निर्माण, आत्मनिर्भर भारत, पर्यावरण का संरक्षण और विश्व को शांति का संदेश देना। संघ का सपना केवल राजनीतिक सत्ता का नहीं, बल्कि समाज के सर्वांगीण उत्थान का है। शाखा में खड़ा प्रत्येक स्वयंसेवक अपने को राष्ट्र का सेवक मानता है। यही भावना भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में मार्गदर्शक बनेगी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्ष केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि भविष्य की प्रस्तावना हैं। यदि समाज संगठित हो और सेवा व संस्कार जीवन का आधार बनें, तो कोई भी शक्ति भारत को विश्व की अग्रणी संस्कृति बनने से नहीं रोक सकती। शताब्दी वर्ष का यह संकल्प है कि नये क्षितिज की ओर बढ़ते हुए एक ऐसा भारत बने, जहाँ हर नागरिक कर्तव्यनिष्ठ और संस्कारवान हो, जहाँ समाज समरस और आत्मनिर्भर हो और जहाँ से विश्व को शांति और सद्भाव का संदेश मिले। यही संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि और आने वाले समय का लक्ष्य है।

गणेश हैं विघ्नहर्ता-मंगलकर्ता एवं जीवंत राष्ट्रीयता के प्रतीक

गणेश चतुर्थी- 27 अगस्त, 2025 पर विशेष
-ललित गर्ग-

भारतीय संस्कृति और धर्मजगत में गणेशजी का स्थान अद्वितीय है। वे विघ्नहर्ता, बुद्धिदाता, मंगलकर्ता और उन्नत राष्ट्र-निर्माता हैं। वे न केवल भारतीय संस्कृति एवं जीवनशैली के कण-कण में व्याप्त है बल्कि विदेशों में भी घर-कारों-कार्यालयों एवं उत्पाद केन्द्रों में विद्यमान हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके पूजन के बिना अधूरी मानी जाती है। उनके स्वरूप में ही गहन प्रतीकात्मकता निहित है, हाथी का विशाल मस्तक विवेक और दूरदर्शिता का प्रतीक है, छोटा मुख संयमित वाणी का द्योतक है, बड़े कान अधिक सुनने और कम बोलने की शिक्षा देते हैं, छोटा नेत्र गहराई से देखने की प्रेरणा देता है और विशाल उदर सहिष्णुता व समावेशिता का बोध कराता है। मनुष्य के दैनिक कार्यों में सफलता, सुख-समृद्धि की कामना, बुद्धि एवं ज्ञान के विकास एवं किसी भी मंगल कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने हेतु गणेशजी को ही सर्वप्रथम पूजा जाता है, याद किया जाता है। प्रथम देव होने के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है, लोकनायक का चरित्र हैं। गणेश शिवजी और पार्वती के पुत्र हैं, ऐसे सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वदैशिक लोकप्रियता वाले देव का जन्मोत्सव भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को सम्पूर्ण दुनिया में उमंग एवं हर्षोल्लास से मनाया जाता है। गणेशोत्सव हिन्दुओं का एक उत्सव है।
भारतीय धर्म-दर्शन में गणेश जी ‘आरंभ के देवता’ हैं। वैदिक परंपरा से लेकर पुराणों और लोककथाओं तक, वे हर युग में ‘मार्गदर्शक’ बने रहे हैं। यही कारण है कि उन्हें ‘सर्वाेपास्य’ देवता कहा गया, सभी पंथों, संप्रदायों और वर्गों के लोग उनके पूजन में समान रूप से भाग लेते हैं। गणेशजी को प्रथम लिपिकार माना जाता है उन्होंने ही देवताओं की प्रार्थना पर वेद व्यासजी द्वारा रचित महाभारत को लिपिबद्ध किया था। जैन एवं बौद्ध धर्मों में भी गणेश पूजा का विधान है। अनंतकाल से अनेक नामों से गणेश दुख, भय, चिन्ता इत्यादि विघ्न के हरणकर्ता के रूप में पूजित होकर मानवों का संताप हरते रहे हैं। गणेश जी का पूजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय एकता का माध्यम भी है। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप दिया। इससे गणेश चतुर्थी केवल पारिवारिक पर्व न रहकर जनजागरण और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गई। तिलक ने इसे सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना के मंच के रूप में स्थापित किया, जिसने भारत को स्वतंत्रता संग्राम के लिए एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्तमान काल में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना, भावनात्मक एकता और अखंडता की रक्षा के लिए गणेशजी की पूजा और गणेश चतुर्थी के पर्व का उत्साहपूर्वक मनाने का अपना विशेष महत्व है। आज के समय में जब समाज विभिन्न मत-मतांतरों, भाषाओं और संस्कृतियों में बंटा दिखाई देता है, तब गणेशजी पुनः राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बनकर सामने आते हैं। उनका स्वरूप हमें विविधता में एकता, सहिष्णुता, धैर्य और विवेकपूर्ण निर्णय की प्रेरणा देता है। गणेश जी हमें बताते हैं कि बुद्धि और करुणा का समन्वय ही प्रगति का मार्ग है। आज जब विश्व हिंसा, कट्टरता और असहिष्णुता से जूझ रहा है, तब गणेश चतुर्थी का पर्व हमें समन्वय और सहयोग का संदेश देता है। वे केवल धार्मिक आस्था के देवता ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय एकता के जीवंत प्रतीक हैं।

हिन्दुओं में गणेशजी के जन्म के विषय में अलग-अलग कथाएँ प्रचलित हैं। वराह पुराण के अनुसार स्वयं शिव ने पंच तत्त्वों को मिला कर गणेश का निर्माण बहुत तन्मयता से किया। जिससे वे अत्यंत सुन्दर और आकर्षक बने तो देवताओं में खलबली मच गयी, स्थिति को भांप कर शिव ने गणेश के पेट का आकार बढ़ा दिया और सिर को गजानन की आकृति का कर दिया ताकि उनके सौन्दर्य और आकर्षण को कम किया जा सके। शिव पुराण के अनुसार एक बार पार्वती ने अपने उबटन के मैल से एक पुतला बनाया और उसमें जीवन डाल दिया। इसके उपरांत उन्होंने इस जीवधारी पुतले को द्वार पर प्रहरी के रूप में बैठा दिया और उसे आदेश दिया कि वह किसी भी व्यक्ति को अंदर न आने दे। इसके बाद वे स्नान करने लग गई। संयोगवश कुछ ही समय बाद शिव उधर आ निकले। उनसे सर्वथा अपरिचित गणेश ने शिव को भी अंदर जाने से रोक दिया। इस पर शिव अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने अपने त्रिशूल से गणेश का मस्तक काट दिया। पार्वती ने यह देखा तो वे बहुत दुखी हुईं। तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर गणेश के धड़ से लगाकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। तभी से गणेश, गजानन कहलाए। लेकिन बालक की आकृति से पार्वती बहुत दुखी हुई तो सभी देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद और अतुलनीय उपहार भेंट किए, उन्हें प्रथम देव के रूप में सभी अधिकार प्रदत्त किये। इंद्र ने अंकुश, वरुण ने पाश, ब्रह्मा ने अमरत्व, लक्ष्मी ने ऋद्धि-सिद्धि और सरस्वती ने समस्त विद्याएँ प्रदान कर उन्हें देवताओं में सर्वोपरि बना दिया।
ऋद्धि-सिद्धि गणेशजी की पत्नियाँ हैं। वे प्रजापति विश्वकर्ता की पुत्रियां हैं। गणेश की पूजा यदि विधिवत की जाए, तो इनकी पतिव्रता पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि भी प्रसन्न होकर घर-परिवार में सुख-शांति-समृद्धि और संतान को निर्मल विद्या-बुद्धि देती है। सिद्धि से ‘क्षेम’ और ऋद्धि से ‘लाभ’ नाम के शोभा सम्पन्न दो पुत्र हुए। जहां भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है। वहीं शुभ-लाभ हर सुख-सौभाग्य देने के साथ उसे स्थायी और सुरक्षित रखते हैं। जन-जन के कल्याण, धर्म के सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने एवं सुख-समृद्धि-निर्विघ्न शासन व्यवस्था स्थापित करने के कारण मानव-जाति सदा उनकी ऋणी रहेगी। आज के शासनकर्ताओं को गणेश के पदचिन्हों पर चलने की जरूरत है।
गणेशजी की सम्पूर्ण शारीरिक रचना के पीछे भगवान शिव की व्यापक सोच रही है। एक कुशल, न्यायप्रिय एवं सशक्त शासक एवं देव के समस्त गुण उनमें समाहित किये गये हैं। गणेशजी का गज मस्तक हैं अर्थात वह बुद्धि के देवता हैं। वे विवेकशील हैं। उनकी स्मरण शक्ति अत्यन्त कुशाग्र हैं। हाथी की भ्रांति उनकी प्रवृत्ति प्रेरणा का उद्गम स्थान धीर, गंभीर, शांत और स्थिर चेतना में है। हाथी की आंखें अपेक्षाकृत बहुत छोटी होती हैं और उन आँखों के भावों को समझ पाना बहुत कठिन होता है। दरअसल गणेश तत्ववेत्ता के आदर्श रूप हैं। गण के नेता में गुरुता और गंभीरता होनी चाहिए। उनके स्थूल शरीर में वह गुरुता निहित है। उनका विशाल शरीर सदैव सतर्क रहने तथा सभी परिस्थितियों एवं कठिनाइयों का सामना करने के लिए तत्पर रहने की भी प्रेरणा देता है। उनका लंबोदर दूसरों की बातों की गोपनीयता, बुराइयों, कमजोरियों को स्वयं में समाविष्ट कर लेने की शिक्षा देता है तथा सभी प्रकार की निंदा, आलोचना को अपने उदर में रख कर अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है। छोटा मुख कम, तर्कपूर्ण तथा मृदुभाषी होने का द्योतक है।
 गणेश का व्यक्तित्व रहस्यमय हैं, जिसे पढ़ पाना एवं समझ पाना हर किसी के लिये संभव नहीं है। शासक भी वही सफल होता है जिसके मनोभावों को पढ़ा और समझा न जा सके। इस प्रकार अच्छा शासक वही होता है जो दूसरों के मन को तो अच्छी तरह से पढ़ ले परन्तु उसके मन को कोई न समझ सके। दरअसल वे शौर्य, साहस तथा नेतृत्व के भी प्रतीक हैं। उनके हेरांब रूप में युद्धप्रियता का, विनायक रूप में यक्षों जैसी विकरालता का और विघ्नेश्वर रूप में लोकरंजक एवं परोपकारी स्वरूप का दर्शन होता है। गण का अर्थ है समूह। गणेश समूह के स्वामी हैं इसीलिए उन्हें गणाध्यक्ष, लोकनायक, गणपति आदि नामों से पुकारा जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी मनाना केवल धार्मिक परंपरा का निर्वाह नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने, सामाजिक समरसता को मजबूत करने और राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करने का संकल्प है। 

वोटर अधिकार यात्रा बनाम एजेंडा यात्रा

डॉ.वेदप्रकाश

 महात्मा गांधी का जीवन राष्ट्रीय और वैश्विक फलक पर शांति और सद्भाव के लिए समर्पित रहा लेकिन उनके नाम के गैरवारिस राहुल गांधी जो विपक्ष के नेता भी हैं,  आज राष्ट्रीय और वैश्विक फलक पर अशांति फैलाने और वैमनस्य को समर्पित दिखाई दे रहे हैं। अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ से ही वे तथ्यहीन और उल्टी सीधी बातों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। न उन्हें देश के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक वातावरण की जानकारी है और न ही राजनीति की जानकारी क्योंकि राजनीति में आने के लिए उन्होंने कोई पुरुषार्थ नहीं किया। वह उन्हें पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त हो गई और इस देश को जानने के लिए वे कभी घर से निकले नहीं।
        सर्वविदित है कि स्वतंत्रता के बाद से लगातार कई दशकों तक सत्ता में रहने के बाद वर्ष 2014 से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर है। वर्ष 2014 में जनता ने भारी बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी को अपना समर्थन दिया और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। यह भी सर्वविदित है कि वर्ष 2014 से ही भिन्न-भिन्न रूपों में सामान्य व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ रहे हैं। जनकल्याण की विभिन्न योजनाएं पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही हैं।

 राष्ट्रीय और वैश्विक फलक पर भारत लगातार मजबूत होता जा रहा है। देश में कार्य-व्यवसाय, उद्योग एवं आर्थिक क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। करोड़ों लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं और यह भी सर्वविदित है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस यानी आईएनडीआईए का समूचा विपक्षी गठबंधन लगातार नकारात्मक राजनीति कर रहा है। राहुल गांधी और विपक्ष आज एजेंडेवादी बन चुके हैं। ये सभी नकारात्मकता फैलाने का इकोसिस्टम बनाते हैं और फिर लगातार झूठे प्रचार से उसे सच्चा दिखाने का प्रयास करते हैं।


       हम सभी जानते हैं कि जब किसी झूठ को भी बार-बार अलग-अलग ढंग से अलग-अलग लोगों के द्वारा कहा जाता है तो सामान्य व्यक्ति को एक समय के बाद वह सच जैसा दिखने लगता है। वर्ष 2014 में चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने सबसे पहले ईवीएम मशीन पर दोष मढ़ना शुरू किया। मशीन खराब हैं, उनमें बटन कोई भी दबाओ, वोट भाजपा को ही जाती है आदि । यह नैरेटिव काफी चला, फिर असफल होने पर- प्रधानमंत्री चोर है ऐसे असंवैधानिक नारे शुरू किए गए। इसके बाद संविधान खतरे में है। संविधान बदल दिया जाएगा। लोकतंत्र खतरे में है। आने वाले वर्षों में चुनाव नहीं होंगे, सीधे मोदी का ही शासन चलता रहेगा जैसे नैरेटिव  भी खूब चलाए गए। कृषि कानून, नागरिकता संशोधन कानून और धारा 370 जैसे महत्वपूर्ण और संसद में पास हुए गंभीर कानूनों पर भी तरह-तरह का दुष्प्रचार भ्रम और भय फैलाया गया। समूचे विपक्ष ने राहुल गांधी के नेतृत्व में कभी किसानों को भड़काने का काम किया तो कभी मुसलमानों को भी। यह भी नैरेटिव  बनाया गया कि सरकार किसानों की जमीन छीन लेगी, सरकार मुसलमानों की नागरिकता छीन लेगी आदि। कुछ समय बाद इस प्रकार के झूठे नॉरेटिव से देश में बड़ा आर्थिक और सामाजिक नुकसान हुआ।

 हम सभी इस बात से भी परिचित हैं कि राहुल गांधी और विपक्ष के कई नेता संसद में चर्चा में ठीक से हिस्सा नहीं लेते। वे संविधान विरोधी अभद्र भाषा का प्रयोग  हमेशा करते हैं। संसद को बाधित करते हुए शोर शराबा करते हुए बाहर धरने-प्रदर्शन करते हैं। इससे यह भी स्पष्ट है कि वे सवाल जवाब करने में अथवा बहस करने में सक्षम नहीं है। पिछले कई महीनों से राहुल गांधी नए एजेंडे को लेकर पूरे इकोसिस्टम में काम कर रहे हैं। इस बार उन्होंने चुनाव आयोग पर जो संविधान सम्मत संस्था है, भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में वोट चोरी करने का आरोप लगाया है। आरोप की पुष्टि हेतु वह चुनाव आयोग के बार-बार कहने पर भी तथ्य प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे हैं।
          पिछले कुछ दिन राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बिहार में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वोटर अधिकार यात्रा पर हैं। तेजस्वी यादव के दो मतदाता पत्र मिल चुके हैं। अपनी यात्रा में भी वे नैतिकता की सीमाओं के पार जाकर अनर्गल टीका-टिप्पणी कर रहे हैं। तात्पर्य यह है कि वोटर अधिकार यात्रा अथवा वोट चोरी के आरोप भी उनके एजेंट एवं इकोसिस्टम के अंतर्गत चलाया जा रहा अभियान है। विगत में भी सेना  द्वारा आतंकवाद के जवाब में बालाकोट स्ट्राइक एवं ऑपरेशन सिंदूर जैसी साहसिक कार्रवाई पर राहुल गांधी नकारात्मक टिप्पणी करने के साथ-साथ सेना के शौर्य पर भी प्रश्न उठाते रहे हैं। यह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को दिखाता है। सभी जानते हैं कि राहुल गांधी, सोनिया गांधी, लालू यादव, तेजस्वी यादव आदि विपक्ष के बड़े कहे जाने वाले कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। अभी ये जमानत पर हैं। चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में बिहार में मतदाता सूची शोधन हेतु विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान (एफआईआर) के दौरान लाखों मतदाताओं को अपात्र पाया गया। इस प्रक्रिया में बंगाल में भी सघन पुनरीक्षण आरंभ होना है। इसको लेकर भी राहुल गांधी, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव एवं विपक्ष के अन्य नेता झूठ फैला रहे हैं।
     आज यह आवश्यक है कि नेता विपक्ष और सभी विपक्षी दल संसद में अपनी भूमिका के महत्व को समझें। जन कल्याण के लिए योजनाओं हेतु सरकार को सुझाव दें और जनहित में संसद में मुद्दों पर बहस करें। संसद के बाहर झूठे एजेंट चलाने मात्र से राजनीतिक हितों और स्वार्थों की पूर्ति संभव नहीं है।


डॉ.वेदप्रकाश