भाषाई राजदूत मध्यप्रदेश
Updated: July 11, 2025
प्रो. मनोज कुमार मध्यप्रदेश के भौगोलिक गठन को लेकर निराश होता था. लगता था कि देश का ह्दयप्रदेश कहलाने वाले मध्यप्रदेश की कोई एक भाषा,…
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भगवान भोलेनाथ को “मनाने” चले भक्त कावड़िये
Updated: July 11, 2025
प्रदीप कुमार वर्मा मन में भगवान भोलेनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा। जुबान पर बम बम भोले का जय घोष। कंधों पर पवित्र गंगाजल से भरी…
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समावेशी शासन की प्राथमिकता
Updated: July 11, 2025
डॉ.बालमुकुंद पांडेय समावेशी शासन के लिए सरकार ने ‘ सेवा ,सुशासन एवं गरीब कल्याण’ के 11 वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह 11 वर्ष गरीबों का कल्याण करने, मध्यम वर्ग को सुविधानुकूल वातावरण प्रदान…
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केंद्रीय ट्रेड यूनियंस व उनके सहयोगी संगठनों द्वारा आहूत ‘भारत बंद’ के मायने
Updated: July 11, 2025
कमलेश पांडेय देश भर की 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और उनके सहयोगी संगठनों ने भाजपा नीत राजग के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की कथित ‘मजदूर विरोधी, किसान विरोधी और…
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मराठी बोलना गर्व की बात, लेकिन हिन्दी से घृणा क्यों ?
Updated: July 11, 2025
अजय जैन ‘विकल्प’ अपनी स्थापना से ही भारत विविधताओं का देश बना हुआ है और भाषा इसकी सबसे खूबसूरत विशेषताओं में से एक है। इसलिए यहाँ अनेकता…
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मतदाता सूची में सुधार पर सुप्रीम सहमति सराहनीय
Updated: July 11, 2025
-ललित गर्ग-बिहार में मतदाता सूची सुधार पर सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी सिर्फ एक न्यायिक फैसला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल्य को पुष्ट करने वाला…
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ट्रंप की वापसी और व्यापार युद्ध की वैश्विक आग: दुनिया के लिए चेतावनी की घंटी
Updated: July 11, 2025
डोनाल्ड ट्रंप की संभावित वापसी के साथ वैश्विक व्यापार युद्ध का खतरा फिर गहराने लगा है। उन्होंने विभिन्न देशों को शुल्क बढ़ोतरी की चेतावनी देते…
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ई-वोटिंग: लोकतंत्र की मजबूती या तकनीकी जटिलता?
Updated: July 11, 2025
ई-वोटिंग मतदान प्रक्रिया को सरल, सुलभ और व्यापक बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। बिहार के प्रयोग से स्पष्ट है कि…
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चातुर्मास है अध्यात्म की फसल उगाने का अवसर
Updated: July 11, 2025
चातुर्मास शुभारंभ-06 जुलाई 2025 पर विशेष– मंत्र महर्षि डॉ. योगभूषण महाराज – सृष्टि का चक्र अनवरत गतिशील है-गर्मी, वर्षा और शीत ऋतु इसका पर्याय हैं।…
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दलाई लामा के चयन पर चीन का साजिशपूर्ण हस्तक्षेप
Updated: July 11, 2025
ललित गर्ग तिब्बत के आध्यात्मिक नेता एवं वर्तमान 14वें दलाई लामा, तेनजिन ग्यात्सो की उत्तराधिकार प्रक्रिया न केवल बौद्ध धर्म और तिब्बत की…
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गुरु पूर्णिमा : गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते का पर्व
Updated: July 10, 2025
-प्रदीप कुमार वर्मा गुरु पूर्णिमा यानि आषाढ़ मास की पूर्णिमा। प्रसिद्ध ब्रज तीर्थ गोवर्धन में मुड़िया पूर्णिमा। श्रीमद्भभागवत और अट्ठारह पुराण आदि साहित्यों के रचियता…
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भारत और त्रिनिदाद — दो तट, एक आत्मा।
Updated: July 10, 2025
सचिन त्रिपाठी जब भारत की पवित्र गंगा के घाटों से कुछ गरीब और मजबूर हाथ नावों में सवार हुए थे, तब उन्हें नहीं पता था कि उनके भाग्य की पतवार किसी और ही तट पर लगने वाली है। त्रिनिदाद और टोबैगो कैरेबियन सागर का यह छोटा सा द्वीपीय देश भारत से हजारों मील दूर होते हुए भी, भारतीय हृदय और इतिहास से गहराई से जुड़ा है। यह रिश्ता केवल कूटनीति या व्यापार का नहीं, बल्कि एक सामूहिक स्मृति और साझा संस्कृति का है। इस रिश्ते की शुरुआत 30 मई 1845 को हुई, जब ‘फाटेल रोज़ैक’ नामक जहाज भारत से 225 श्रमिकों को लेकर त्रिनिदाद पहुंचा। ब्रिटिश साम्राज्य ने दास प्रथा समाप्त होने के बाद भारत से मजदूरों को गिरमिटिया व्यवस्था के तहत भेजना शुरू किया। 1917 तक लगभग 1.5 लाख भारतीयों को त्रिनिदाद लाया गया। वे खेतों में गन्ना काटते थे पर अपने साथ अपने रामचरितमानस, भोजपुरी लोकगीत, त्योहारों की परंपराएं और देवताओं की मूर्तियां भी लाए। वो परदेश को देश बनाने की यात्रा थी। मंदिर बने, मस्जिदें खड़ी हुईं, दीवाली और होली मनाई जाने लगी। त्रिनिदाद की माटी में तुलसी और नीम के पौधे पनपने लगे। आज त्रिनिदाद में 500 से अधिक मंदिर, रामलीला मंडलियां, और भोजपुरिया संस्कृति की झलक हर कोने में देखी जा सकती है। भारत और त्रिनिदाद का यह रिश्ता केवल सांस्कृतिक नहीं, राजनीतिक भी बना। बासदेव पांडे, एक गिरमिटिया वंशज, त्रिनिदाद के प्रधानमंत्री बने (1995–2001)। बाद में कमला प्रसाद बिसेसर भी प्रधानमंत्री बनीं। आज वहां की कुल जनसंख्या लगभग 14 लाख है, जिसमें से 37% लोग भारतीय मूल के हैं। वे राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा, और मीडिया में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। कूटनीतिक दृष्टि से भारत और त्रिनिदाद के संबंध 1962 में त्रिनिदाद की स्वतंत्रता के साथ ही औपचारिक रूप से स्थापित हुए। पोर्ट ऑफ स्पेन में भारतीय उच्चायोग न केवल राजनयिक काम करता है बल्कि हिंदी, योग, भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य को भी बढ़ावा देता है। 2025 में इस संबंध ने एक नई ऊंचाई तब छुई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में त्रिनिदाद की ऐतिहासिक यात्रा पर गए। उन्होंने वहां की संसद को संबोधित किया और देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद और टोबैगो” प्राप्त किया। यह सम्मान केवल भारत के प्रधानमंत्री को ही नहीं बल्कि उस पूरी ‘गिरमिटिया’ विरासत को समर्पित था जो शोषण से संस्कृति तक का सफर तय कर चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा केवल औपचारिकता नहीं थी, वह भारत की सॉफ्ट पावर, डायस्पोरा नीति और ग्लोबल साउथ लीडरशिप की स्पष्ट घोषणा थी। इस दौरान भारत और त्रिनिदाद के बीच 6 अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए जिनमें डिजिटल गवर्नेंस, स्वास्थ्य, कृषि, संस्कृति, खेल और शिक्षा शामिल हैं। भारत ने त्रिनिदाद को 2000 लैपटॉप, आधुनिक स्वास्थ्य उपकरण, और डिजिटल एजुकेशन प्लेटफार्म प्रदान किए। साथ ही, भारतीय मूल के नागरिकों के लिए ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया सुविधा अब छठवीं पीढ़ी तक लागू कर दी गई है जिससे त्रिनिदाद में बसे भारतीय मूल के लोग अपने पुरखों की धरती से और मजबूती से जुड़ सकें। इस यात्रा के दौरान त्रिनिदाद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की पूरी तरह से समर्थन की भी घोषणा की। यह भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक कूटनीतिक विजय है हालांकि, विरोध के स्वर भी उठे। कुछ स्थानीय संगठनों ने भारत में मानवाधिकार स्थिति को लेकर आपत्ति जताई पर ये स्वर सीमित रहे। बहुसंख्य भारतीय समुदाय और सरकार ने इस दौरे को एक सांस्कृतिक उत्सव की तरह अपनाया। भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ यहां खुलकर चमकी. योग दिवस, हिंदी सप्ताह, भारतीय फिल्म महोत्सव और रामायण मंचन जैसे कार्यक्रमों ने त्रिनिदाद की नई पीढ़ी को फिर से भारत की ओर मोड़ा है। हिंदी भाषा अब वहाँ के स्कूलों में एक वैकल्पिक विषय बन चुकी है। भारत और त्रिनिदाद का संबंध आज केवल इतिहास की विरासत नहीं रहा, वह एक जीवंत, क्रियाशील और गहराता हुआ संवाद है। कभी जो रिश्ता ‘आंसुओं’ और ‘अनुबंधों’ से शुरू हुआ था, वह आज पुरस्कारों, समझौतों और विश्वास के पुल से जुड़ा है। यह संबंध बताता है कि भारत की आत्मा कहीं भी हो, वह मिटती नहीं, वह पनपती है। त्रिनिदाद की मिट्टी में गंगा की गूंज, तुलसी की खुशबू और रामायण की चौपाइयां आज भी जीवित हैं। प्रधानमंत्री मोदी की हालिया यात्रा ने इस पुल को नया रंग दिया है। अब यह सिर्फ संस्कृति की नहीं, तकनीकी, शिक्षा, वैश्विक नेतृत्व और विकास की साझेदारी बन चुकी है और यह साझेदारी आने वाले दशकों में भारत की वैश्विक भूमिका को और सशक्त बनाएगी। सचिन त्रिपाठी
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