लेख आधुनिक होते आंगनबाड़ी केंद्रों में सुविधाओं की कमी

आधुनिक होते आंगनबाड़ी केंद्रों में सुविधाओं की कमी

भारती सुथारबीकानेर, राजस्थान इस माह के पहले सप्ताह में राजस्थान के गृह सचिव ने महिला एवं बाल विकास विभाग की समीक्षा बैठक में राज्य के सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को…

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लेख भारतीय धर्म और मन्दिर

भारतीय धर्म और मन्दिर

भारतीय संस्कृति व धर्म में मन्दिरों को सदा से ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, मन्दिर धर्म के आधारभूत अंगो में सदा से ही विद्यमान हैं। सनातन धर्म में वृक्ष, वन भी मन्दिर हैं यहाँ तक कि मानव शरीर को भी मन्दिर के सदृश माना गया है; परन्तु दुर्भाग्यवश भारतीय संस्कृति के आधारभूत अंग मन्दिरों को आज सोशल मीडिया से मस्त भारतवासी मान्दरों को सेल्फी पॉइट व नाच-गान करके रील बनाने में व्यक्त हैं, और मन्दिरों को धूमिल करने मे लगे हुये हैं, इन भारतवासियों ने नाट्य-शास्त्र को भी दूषित कर दिया है।  भारतवासियों ने ब्रह्म को अपनी चेतना से अभिव्यक्त कर ईश्वर को साकार रूप में प्रदर्शित करने हेतु बुद्धि, चेतना के द्वारा मूर्तियों का निर्माण किया मूर्तियों को स्थापित करने के लिये शास्त्रों के गहन अध्ययन, ज्यामिति अध्ययन, “गणित व अभियांत्रिकी के फलस्वरूप ईश्वर के साकार रूप की विद्यमान करने हेतु शास्त्रीय संरचनाओं का निर्माण किया जो मंदिर कहलायीं।  योग ने मानव शरीर की भाँति पृथ्वी पर भी कुछ स्थान पवित्र स्थान बताये है जिनका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, वही क्षेत्र तीर्थ कहलाये महान तपस्वियों ने संपूर्ण भारतवर्ष का विचरण किया और मन्दिर निर्माणस्थलों का चुनाव भी किया, वस्तुत: जब मानव अपने अंतः करण से वास्तु कला के माध्यम से प्रतिबिंबित करता है, वही मन्दिर है मन्दिर निर्माण में स्थान के साथ-साथ अन्य भौतिक व आध्यात्मिक घटक भी अनिवार्य होते हैं, ज्यामिति, गणित, स्थान के साथ-साथ उस स्थान का आध्यात्मिक इतिहास का अध्ययन भी किया जाता है; मान्दरों का निर्माण उस स्थान पर किया जाता है जहाँ जीवन शाक्त विद्यमान हो, उदाहरणतः प्राचीन मान्दर जीवनदायिनी नदियों के निकट, वृक्षों के निकट बनाये जाते थे, जिनका उद्देश्य मानव को प्रकृति के निकट पहुँचाकर आनन्द की अनुभूति करना है। रूपरहित ब्रह्म इस संसार की माता है चूंकि एक माता ही इस अनन्त संसार, चेतनारहित वस्तु, जीव-जन्तु का पालन पोषण करती है, विष्णु, शिव, का रूप है, रूपरहित ब्रह्म अनन्त है, उसका न कभी जन्म हुआ। ब्रह्म को दिव्यदृष्टि से देखने वाला वीर अर्जुन भी घबरा गया, जब उसे ब्रह्म ने अपने चतुर्भन रूप को दिखाकर शांति दी, उसी दिव्यदृष्टि व चतुर्भुजी रूप का प्रत्यक्ष रूप सूर्यदेव हैं।    मन्दिरों में देवताओं की प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, जिसके पश्चात वह प्रतिमा देवताओं की छावे रूप मे मन्दिर में सदा विद्यमान रहती है. मन्दिरों में प्रतिमा बनाने के लिये दिनो उपवास करते हैं, अपनी चेतना की पराकाष्ठा से देवता को साकार रूप में विराजित होने का आग्रह करते हैं, और अपने हाथों से ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप प्रतिमाओं व मूर्तियों के रूप में प्रदर्शित करते भारतीय संस्कृति में  चेतनारहित पत्थर में भी प्रतीत होती है, चूंकि वह भी ब्रह्म की रचना है अर्थात ब्रह्म का ही रूप है प्राणप्रतिष्ठा के पश्चात प्रतिमाओं को भोग, काव्य. संगीत व नाट्य शास्त्र भी समर्पित किया जाता है। लिंग पुराण के लिंग ज्योति है अर्थात ब्रह्म का ही रूप है, अनुसार जिस भाँति आग का लिंग परिचय) धुंआ है, उसी प्रकार ब्रह्म का लिंग जगत है। भारतीय संस्कृति में शिवरात्रि के दिन शिव लिंग रूप में प्रकट हुये। भारतवर्ष में धर्मनिष्ठ काम के मन्दिर हुआ करते थे, काम यहाँ देवता है, लोग काम के मन्दिरों में उत्सव व दर्शन करते थे। यहाँ मृत्यु के देवता के लिये भी मन्दिर विद्यमान हैं, चूंकि भारतवासी जीवन के चक्र अर्थात जन्म-मृत्यु से भली भाँति परिचित थे भारतवासी वट वृक्ष में शिव, पीपल में विष्णु व नीम में सूर्य का निवास मानकर उनकी स्तुति करते हैं। यहाँ नाट्य- शास्त्र के द्वारा भी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है. महायोगी शिव भरतमुनि के नारयशास्त्र के अनुसार नटराज कहलाये जिनकों चरणों के नीचे मुक्ति है नटराज की नेत्रों में शांति है, मुख पर तेज है, भुजाओं में अग्नि,डमरू कंपन का प्रतीक है, जटाये उड रही हैं, और नीचे मुक्ति चरणों में है। उपास्य के नाम साकार रूप के बिना उपासना अत्यधिक कठिन है। आक्रमणकारियों ने मन्दिर तोड़े उनके ही वंशज राष्ट्र के टूटने के लिये जिम्मेदार हैं,धर्मनिष्ठ काम के मन्दिर तोडने वाले रिलीजनों ने संस्कृति को तीव्र ठेस पहुचाई। मंदिरों को तोड़कर अपनी संरचनाएं बना डाली। उन्होंने भारतीयों से ज्ञान भी लिया और घृणा भी की, सबको एक किताब व एक भगवान में बदलने में कभी सफल नहीं हो सके चूँकि जिस संस्कृति को महाकाल ने बनाया हो उसका काल क्या ही कर पायेगा  पवन गोला 

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कविता मेरी लाज तुम्हारे हाथ, पवनसुत अंजनी के लाला

मेरी लाज तुम्हारे हाथ, पवनसुत अंजनी के लाला

मेरी लाज तुम्हारे हाथ, पवनसुत अंजनी के लाला -2हो मेरी लाज तुम्हारे हाथ -2, पवनसुत अंजनी के लाला | मेरी लाज तुम्हारे हाथ…..

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लेख क्या प्रवासी मजदूरों के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार नहीं है?

क्या प्रवासी मजदूरों के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार नहीं है?

मुकेश कुमार योगीउदयपुर, राजस्थान वर्ष 2009 में बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम प्रदान कर उन्हें शिक्षा से जोड़ने का बहुत…

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आर्थिकी भारतीय रिजर्व बैंक को अब ब्याज दरों में कटौती के बारे में गम्भीरता से विचार करना चाहिए

भारतीय रिजर्व बैंक को अब ब्याज दरों में कटौती के बारे में गम्भीरता से विचार करना चाहिए

भारतीय रिजर्व बैंक ने लगातार 8वीं बार रेपो दर में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं करते हुए इसे 6.50 प्रतिशत पर ही जारी रखा…

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कविता अब कोई सपना नहीं

अब कोई सपना नहीं

अब कोई सपना नहीं।सब टूट गया सपना वहीं।।जब बेटी ने जन्म लिया।तब पिता की आंखें नम हुई।अब जितना मैं कमाऊंगा।संजोकर उसे रख पाऊंगा।ताकि बेटी की…

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कविता भगवान राम कृष्ण काल्पनिक नहीं थे

भगवान राम कृष्ण काल्पनिक नहीं थे

—विनय कुमार विनायकअक्सर लोग कहा करते कि राम कृष्ण ब्राह्मणी कल्पना प्रसूत थेफिर क्यों राम कृष्ण कृषक खत्ती-खत्तीय या क्षत्री-क्षत्रिय सपूत थे?क्यों नहीं याजक ब्राह्मणों…

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राजनीति भारत में लैंगिक असमानता की बढ़ती खाई

भारत में लैंगिक असमानता की बढ़ती खाई

 ललित गर्ग विश्व आर्थिक मंच द्वारा हाल में प्रस्तुत किये गए लैंगिक अंतर के आंकड़ों ने एक ज्वलंत प्रश्न खड़ा किया है कि शिक्षा,…

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राजनीति फिर आतंकी हमलें, कायम हो शांति का उजाला

फिर आतंकी हमलें, कायम हो शांति का उजाला

-ः ललित गर्ग:- यह आशंका सच साबित हो रही है कि भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिलने पर कश्मीर में आतंकी घटनाएं बढ़ेंगी एवं पाकिस्तान…

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कविता खोदी धरती बोई बीज

खोदी धरती बोई बीज

किरण दोसादगरुड़, उत्तराखंड खोदी धरती बोई बीज,ये मिट्टी है बड़े काम की चीज,इसने दिया भोजन हमको,सूरज ने दिया जब ताप,फूटा अंकुर उसमें जब,ऊपर आया अपने…

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आर्थिकी भारत सहित विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक बढ़ा रहे है अपने स्वर्ण भंडार

भारत सहित विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक बढ़ा रहे है अपने स्वर्ण भंडार

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी बैंकों में रखे भारत के 100 टन सोने को ब्रिटेन से वापिस भारत में ले आया गया है। यह सोना भारत ने ब्रिटेन के बैंक में रिजर्व के तौर पर रखा था और इस पर भारत प्रतिवर्ष कुछ फीस भी ब्रिटेन के बैंक को अदा करता रहा है।    समस्त देशों के केंद्रीय बैंक अपने यहां सोने के भंडार रखते हैं ताकि इस भंडार के विरुद्ध उस देश में मुद्रा जारी की जा सके (भारत में 308 टन सोने के विरुद्ध रुपए के रूप में मुद्रा जारी की गई है, यह सोने के भंडार भारतीय रिजर्व बैंक के पास जमा हैं) और यदि उस देश की अर्थव्यवस्था में कभी परेशानी खड़ी हो एवं उस देश की मुद्रा का तेजी से अवमूल्यन होने लगे तो इस प्रकार की परेशानियों से बचने के लिए उस देश को अपने स्वर्ण भंडार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचना पड़ सकता है। इस कारण से विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक अपने पास स्वर्ण के भंडार रखते हैं। पूरे विश्व में उपलब्ध स्वर्ण भंडार का 17 प्रतिशत हिस्सा विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों के पास जमा है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास भी 822 टन के स्वर्ण भंडार हैं। सुरक्षा की दृष्टि से इसका 50 प्रतिशत से अधिक भाग, अर्थात लगभग 413.8 टन, भारत के बाहर अन्य केंद्रीय बैंकों विशेष रूप से बैंक आफ इंग्लैंड एवं बैंक आफ इंटर्नैशनल सेटल्मेंट  के पास रखा गया है। उक्त वर्णित 308 टन के अतिरिक्त 100.3 टन स्वर्ण भंडार भी भारतीय रिजर्व बैंक के पास जमा है। वर्ष 1947 में भारत के राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ही भारत ने अपने स्वर्ण के भंडार बैंक आफ इंग्लैड में रखे हुए हैं। इसके बाद 1990 के दशक में भी भारत ने अपनी आर्थिक परेशानियों के बीच अपने स्वर्ण भंडार को बैक आफ इंग्लैंड में गिरवी रखकर अमेरिकी डॉलर उधार लिए थे। विभिन्न देशों द्वारा लंदन में स्वर्ण भंडार इसलिए रखे जाते हैं क्योंकि लंदन पूरे विश्व का सबसे बड़ा स्वर्ण बाजार है और यहां स्वर्ण को सुरक्षित रखा जा सकता है। यहां के बैकों द्वारा विभिन्न देशों को स्वर्ण भंडार के विरुद्ध अमेरिकी डॉलर एवं ब्रिटिश पाउंड में आसानी से ऋण प्रदान किया जाता है बल्कि यहां पर स्वर्ण भंडार को आसानी से बेचा भी जा सकता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण के कई खरीदार यहां आसानी से उपलब्ध रहते हैं। कुल मिलाकर इंग्लैंड स्वर्ण का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ा बाजार हैं। लंदन के बाद न्यूयॉर्क को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण का एक बड़ा बाजार माना जाता है।  भारत को इस स्वर्ण भंडार को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिवर्ष फी के रूप में कुछ राशि बैंक आफ इंग्लैंड को अदा करनी होती थी अतः अब भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 100 टन स्वर्ण भंडार को भारत लाने के बाद इस फी की राशि को अदा करने से भी भारत बच जाएगा। दूसरे अपने यहां स्वर्ण भंडार रखने से भारत के पास सदैव तरलता बनी रहेगी। जब चाहे भारत इस स्वर्ण भंडार का इस्तेमाल स्थानीय अथवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने हित के लिए कर सकता है।  वर्ष 2009 में भारत ने 200 टन का स्वर्ण भंडार अंतरराष्ट्रीय बाजार में 670 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि अदा कर खरीदा था। 15 वर्ष वर्ष बाद पुनः भारत ने अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि करने का निश्चय किया है। स्वर्ण भंडार सहित आज भारत के विदेशी मुद्रा भंडार 65,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गए हैं और यह भारत के लगभग एक वर्ष के आयात के बराबर की राशि है। अतः अब भारत को अपने स्वर्ण भंडार बेचने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी इसलिए भी भारत ने ब्रिटेन में स्टोर किए गए अपने स्वर्ण भंडार को भारत में वापिस लाने का निर्णय किया है।     विश्व में आज विभिन्न देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के उद्देश्य से अपने पास स्वर्ण के भंडार भी बढ़ाते जा रहे हैं। आज पूरे विश्व में अमेरिका के पास सबसे अधिक 8133 मेट्रिक टन स्वर्ण के भंडार है, इस संदर्भ में जर्मनी, 3352 मेट्रिक टन स्वर्ण भंडार के साथ दूसरे स्थान पर एवं इटली 2451 मेट्रिक टन स्वर्ण भंडार के साथ तीसरे स्थान पर है। फ्रान्स (2437 मेट्रिक टन), रूस (2329 मेट्रिक टन), चीन (2245 मेट्रिक टन), स्विजरलैंड (1040 मेट्रिक टन) एवं जापान (846 मेट्रिक टन) के बाद भारत, 812 मेट्रिक टन स्वर्ण भंडार के साथ विश्व में 9वें स्थान पर है। भारत ने हाल ही के समय में अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि करना प्रारम्भ किया है एवं यूनाइटेड अरब अमीरात से 200 मेट्रिक टन स्वर्ण भारतीय रुपए में खरीदा था। हाल ही के समय में चीन का केंद्रीय बैंक भारी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वर्ण की खरीद कर रहा है। कुछ अन्य देशों के केंद्रीय बैंक भी अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि करने में लगे हैं। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वर्ण के दामों में बहुत अधिक वृद्धि देखने में आई है और यह 2400 अमेरिकी डॉलर प्रति आउंस तक पहुंच गई है।      कई देश संभवत: अपने विदेशी मुद्रा के भंडार में अमेरिकी डॉलर की तुलना में स्वर्ण भंडार को अधिक महत्व दे रहे हैं, क्योंकि अमेरिकी डॉलर पर अधिक निर्भरता से कई देशों को आर्थिक नुक्सान झेलना पड़ रहा है। यदि अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत हो रहा हो तो उस देश की मुद्रा का अवमूल्यन होने लगता है। इससे उस देश में वस्तुओं का आयात महंगा होने लगता है और उस देश में मुद्रा स्फीति के बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। इन विपरीत परिस्थितियों में घिरे देश के लिए स्वर्ण भंडार बचाव का काम करते हैं। इसलिए आज लगभग प्रत्येक देश के केंद्रीय बैंक अपने स्वर्ण भंडार को बढ़ाने के बारे में विचार करते हुए नजर आ रहे हैं।      प्रहलाद सबनानी 

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पुस्तक समीक्षा प्रकाशनार्थ पुस्तक समीक्षा: मोदी vs खान मार्केट गैंग

प्रकाशनार्थ पुस्तक समीक्षा: मोदी vs खान मार्केट गैंग

पुस्तक लेखक: श्री अशोक श्रीवास्तव (खातिलब्ध एंकर, दूरदर्शन समाचार)समीक्षा लेखक: शिवेश प्रताप (लेखक एवं स्तंभकार) विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकसभा चुनाव संपन्न हुए…

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