कमी के समय कीमतों में कमी लाये सरकारी बफर स्टॉक
Updated: July 15, 2024
गेहूं और चने की खुले बाजार में बिक्री से अनाज और दालों की बढ़ती महंगाई को रोकने में मदद मिली है। बढ़ती जलवायु-संचालित आपूर्ति झटकों…
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भारतीय परम्पराओं के अनुपालन से देश बढ़ रहा आगे
Updated: July 15, 2024
भारत जो किसी वक्त में सोने की चिड़िया रहा है जिसका किसी वक्त में वैश्विक अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान रहा है, उस भारत के गुलाम होने के बाद उसकी अर्थव्यवस्था को मुगलों ने एवं अंग्रेजों ने तहस-नहस किया है। भारत का सनातन चिंतन जितना अधिक शक्तिशाली था गुलामी के उस दौर में उस पर किए गए आक्रमण उसे कमजोर बनाने में कामयाब रहे। परंतु, अब समय आ गया है कि भारत के प्राचीन आर्थिक चिंतन को गंभीरता के साथ देखते हुए वर्तमान आर्थिक विकास की दृष्टि को उसके साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए तभी जाकर आर्थिक विकास की दृष्टि से भारत के वैभवकाल को पुनः प्राप्त किया जा सकेगा। भारत में प्राचीन ऋषियों और मनीषियों की परंपरा एक गृहस्थ परंपरा रही है और उस गृहस्थ परंपरा में आध्यात्म के साथ-साथ सामाजिक,राजनीतिक एवं आर्थिक चिंतन भी जुड़ा रहा है। अपने राज्य के ऋषियों के जीवन यापन की चिंता जहां राजा की प्राथमिकता में रहता था वहीं राजा को राज्य चलाने के लिए उचित मार्गदर्शन देने का सांस्कृतिक कार्य उन ऋषि-मुनियों द्वारा किया जाता था। इसलिए उन मनीषियों का चिंतन आर्थिक दिशा में भी सदैव बना रहता था। राजा अपने राज्य का विस्तार करने के साथ-साथ उसे आर्थिक रूप से और अधिक समृद्ध कैसे बनाएं इसके बारे में ऋषि-मुनियों के साथ बैठकर ही राज दरबार में चिंतन होता था और राज्य आर्थिक रूप से सशक्त बन जाते थे। इसलिए भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। प्राचीन भारत में धार्मिक आयोजनों एवं धार्मिक पर्यटन का भारत के आर्थिक विकास पर पूर्ण प्रभाव रहा है। प्राचीन भारत में धार्मिक आयोजनों से अर्थव्यवस्था को बल मिलता रहा है इसलिए उस कालखंड में धार्मिक आयोजन निरंतर होते रहे हैं। भारत की ऋषि परंपरा ने जन सामान्य को उन सबके साथ जोड़ कर रखा था। त्यौहारों की निरंतरता और उन्हें मनाए जाने का उत्साह भारत की तत्कालीन अर्थव्यवस्था को गति देता रहा है। आज के वक्त में भी धार्मिक पर्यटन के चलते भारतीय पर्यटन उद्योग में रोजगार के नए अवसर निर्मित हो रहे हैं। वर्तमान केंद्र सरकार के द्वारा भी पिछले 10 वर्षों में भारत में विभिन्न तीर्थस्थलों को विकसित किया जा रहा है। अभी तक जो तीर्थस्थल विकसित हो चुके हैं,वहां का पर्यटन एकदम से कई गुना बढ़ गया है। वहां की आर्थिक समृद्धि बढ़ गई है। वहां के लोगों का जीवन स्तर बढ़ गया है। वहां संपत्तियों के दाम बढ़ गए हैं। इसलिए इस दिशा में सरकार अब आगे और कार्य करने जा रही है तथा कई नवीन धार्मिक कारीडोर बनाने जा रही है,क्योंकि इससे रोजगार के लाखों नए अवसर उत्पन्न होंगे। भारत की कुटुंब व्यवस्था अपने आप में एक अनूठी कुटुंब व्यवस्था है। भारत के संयुक्त परिवार विश्व के लिए आश्चर्य का विषय रहे हैं। इन दिनों संयुक्त परिवार विघटित अवश्य होते जा रहे हैं,लेकिन बावजूद उसके आपातकाल में एक दूसरे के लिए सबके एकत्र होने की जो जिजीविषा उन सबके भीतर है वह भारत में कुटुंब व्यवस्था का अनूठा स्वरूप है, तथा यह स्वरूप देश की अर्थव्यवस्था को भी आगे बढ़ाने का काम करता है। एक परिवार में दो हाथ कमाने जाते हों और वहीं दस हाथ कमाने जाते हों, दोनों बातों का फर्क होता है। इसलिए कुटुंब व्यवस्था में एक दूसरे के लिए आपस में खड़े होने का जो व्यवहार होता है,वह व्यवहार आर्थिक चिंतन के साथ भी जुड़ कर परिवार को आगे बढ़ाने का काम करता है। भारत में प्राचीन काल से पर्यावरण को पर्याप्त महत्व दिया जाता रहा है। देश में नदियां शुद्ध रहती थी वृक्ष घने जंगलों के रूप में रहते थे और पूरा पर्यावरण शुद्ध रहता था। पूरे विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां पर नदियों को,वृक्षों को,धरती को पूजा जाता है। पूरे पर्यावरण से परिवार का जुड़ाव धार्मिक रूप से रहता है। बहुत सारे व्रत और त्यौहार पर्यावरण से जुड़े हुए रहते हैं। इसलिए सनातन काल से भारत में पर्यावरण की चिंता रही है। जैविक विविधता ने भी भारत के सनातन काल को समृद्ध किया। पर्यावरण संरक्षण को उस समय में नैतिक कर्तव्य माना गया है। बाद में जब मुगलों ने भारत में शासन किया और हिंदुओं का धर्मांतरण किया तो बहुत सारी परंपराएं भी खंडित होने लगी। सनातन काल में जिस गौ माता को पूजा जाता था मुस्लिम उस गौ माता को खाने लगे। मुस्लिम शासन काल भारत के पतन और विखंडन का समय था। उनके बाद जब इस देश में अंग्रेज आ गए तो उनकी निगाह में भारतीय अपरिपक्व और मूर्ख रहे इन दोनों के समय में, मुगलों ने और अंग्रेजों न भारत को दोनों हाथों से लूटकर खाली कर दिया। जो भारतीय अर्थव्यवस्था कभी विश्व की अर्थव्यवस्था का 33 प्रतिशत हिस्सा थी वह बहुत नीचे जा चुकी थी। पर्यावरण बिखरने लगा। नालंदा जैसे विश्वविद्यालय को नुकसान पहुंचाया गया। उसकी लाइब्रेरी को जला दिया गया। इस सब के पीछे भारत को ज्ञान के स्तर पर समाप्त करने की साजिश काम कर रही थी। मुस्लिम शासक हिंदुओं के धर्मांतरण पर, हिंदुओं को मारने पर और उनकी संपत्ति हड़पने पर काम कर रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि औरंगजेब ब्राह्मणों को मारकर रोज सवा मन जनेऊ जलाता था। मंदिरों को नष्ट कर उन पर मस्जिदें बना दी गई। दक्षिण ने अपने आपको इस मुस्लिम आक्रमण से बहुत बचाया और इसीलिए भारत के दक्षिण भाग में आज भी समृद्ध मंदिर हैं,जो उस कालखंड के गौरव की प्रस्तुति के रूप में हमारे सामने खड़े हुए हैं। इसी कालखंड में भारत का भक्ति काल जरूर समृद्ध हुआ और उसने भारत के निवासियों को मानसिक ताकत प्रदान की। तुलसीदास की भक्ति के सामने अकबर जैसा आदमी डर गया और झुक गया। भारत की आजादी की लड़ाई तो सफलतापूर्वक लड़ी गई परंतु एक दुष्परिणाम भारत विभाजन के रूप में भी सामने आया,जिसमे लाखों हिंदुओं का नरसंहार हुआ। आजादी के 70 वर्ष में भारत की वह आर्थिक उन्नति नहीं हो पाई जैसी कि अपेक्षा की गई थी। वर्ष 2014 में केंद्र में एक मजबूत सरकार ने शासन को संभाला। कठोर आर्थिक निर्णय लिए। जनता का भी उन्हें साथ मिला तथा लगभग 10 वर्ष के कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हो गई। वर्तमान सरकार के समक्ष बहुत बड़ी बड़ी चुनौतियां हैं और आज भारत, बहुत सी विदेशी ताकतों एवं उनके षड्यंत्रों के साथ जूझ रहा है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि जो संकल्प लेकर भारतीय परम्पराओं के अनुरूप सरकार काम कर रही है, उसमें भारत की अर्थव्यवस्था शीघ्र ही विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। यह इस अर्थव्यवस्था की ताकत है कि कोरोना खंडकाल में भारत ने अपने 80 करोड़ गरीब लोगों को निशुल्क अन्न उपलब्ध कराया तथा कोरोना की वैक्सीन भी समस्त नागरिकों को निशुल्क उपलब्ध कराई गई। भारत अब न सिर्फ सड़क निर्माण के क्षेत्र में बड़ा काम कर रहा है, अपितु वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है। साफ सफाई, गरीबों के लिए मकान, गरीबों के लिए शौचालय जैसे छोटे-छोटे विषय भी सरकार की प्राथमिकता में हैं। सरकार किसानों का ध्यान रख रही है, किसानों को समृद्ध बना रही है और उद्योगों को भी नई दिशा प्रदान कर रही है, नए संसाधन प्रदान कर रही है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत है कि जब विश्व के अन्य देशों में मंदी की स्थिति बन रही है और वहां की अर्थव्यवस्था नीचे की ओर जा रही है तब भारत की अर्थव्यवस्था दिन-ब-दिन समृद्ध होती जा रही है। देश में कुटीर एवं लघु उद्योग के गौरवशाली दिन वापिस लाने हेतु निरंतर कई प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार ने सहकारिता मंत्रालय का गठन कर देश में सहकारिता आंदोलन को सफल होने का रास्ता खोला है। भारत के आर्थिक विकास में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संस्थानों का भी बहुत बड़ा योगदान होने लगा है। बहुत सारे धार्मिक संस्थान बड़े-बड़े अस्पताल खोलकर सेवा का कार्य कर रहे हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के द्वारा इलाज की बहुत सारी सुविधाएं देश में कई अस्पतालों में मुफ्त में प्रदान की जा रही है। सरकार ने भी एम्स के माध्यम से चिकित्सा सुविधाएं सारे देश में उपलब्ध करवाने का काम किया है। विभिन्न सामाजिक संगठन भी अपना योगदान समाज की सेवा के साथ देश की अर्थव्यवस्था के विकास में प्रदान कर रहे हैं। भारत का योग सारे विश्व के लिए मार्गदर्शक हो गया है और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत के साथ अन्य राष्ट्र भी उन्नति करते जा रहे हैं। भारतीय नागरिक विदेशों में जाकर झंडे गाड़ रहे हैं। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है। प्रवासी भारतीय कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भारतीयों का डंका आज पूरे विश्व में बज रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में प्रवासी भारतीय भी अपना योगदान कर रहे हैं। विश्व के कई देशों में भारतीय मूल के नागरिकों की बढ़ती संख्या एवं भारतीय सनातन दर्शन का प्रसार विदेशों में हो रहा है। भारत की तरह वहां पर भी मंदिरों का निर्माण हो रहा है। भारत की साधना पद्धति वहां स्वीकार की जाने लगी है।
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देश की तस्वीर बदल देंगे नये कानून ?
Updated: July 15, 2024
नये कानूनों को प्रैक्टिस मे ंतो आने दीजिये स्मार्ट पुलिस, स्मार्ट थाने, स्मार्ट जज, स्मार्ट कोर्ट …
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25 जून अब संविधान हत्या दिवस
Updated: July 15, 2024
अभी हाल ही में संपन्न हुए 18वीं लोकसभा के चुनावों के समय कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अक्सर यह कहते रहे कि वर्तमान मोदी सरकार…
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श्री राम प्रभु का नाम, जगत में सबसे प्यारा है
Updated: July 15, 2024
मेरे राम प्रभु का नाम, मेरे राघव जी का नामजगत में सबसे प्यरा है -4, मेरे राम प्रभु का नाम……….
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मेरे मानस के राम – अध्याय 12 : सुग्रीव से मित्रता और बालि वध
Updated: July 12, 2024
कबंध ने अपनी पराजय के पश्चात श्री राम और लक्ष्मण जी को यह बताया था कि यदि वह अपने मनोरथ में सफलता प्राप्त करना चाहते…
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मेरे मानस के राम- अध्याय 11 : जटायु , अयोमुखी और कबंध
Updated: July 12, 2024
जिस समय लंका का राजा रावण सीता जी को वायु मार्ग से अपहरण करके ले जा रहा था उस समय सीता जी विलाप करुण चीत्कार…
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स्त्री की प्यारी दुनिया
Updated: July 13, 2024
कल्पना जोशीकक्षा-9 ,उम्र-17गरुड़ , बागेश्वरउत्तराखंड स्त्री की प्यारी दुनिया,इतनी न्यारी होगी क्या?दर्द झेलती दुनिया से सारी,फिर भी न समझे कोई प्यारा,समाज से करते इसे हैं…
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मुझे भी तो चाहिए आजादी
Updated: July 13, 2024
दीपा लिंगढियागरुड़, बागेश्वरउत्तराखंड मुझे भी तो चाहिए आजादीहां, थी मैं अनजान की,दुनिया ऐसी भी होती है,बचपन की हर बात याद आती है,तुम किसी से बात…
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रूस और ऑस्ट्रिया की यात्राओं से भारत की नई उड़ान
Updated: July 13, 2024
– ललित गर्ग –प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस और ऑस्ट्रिया की यात्रा के निष्कर्षों के साथ-साथ इसके वैश्विक निहितार्थ भी तलाशे जा रहे हैं। इन…
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गठिया रोग: कारण, उपचार और मनोवैज्ञानिक समर्थन
Updated: July 12, 2024
डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणागठिया जिसे अंग्रेजी में arthralgia (जोड़ों का दर्द), arthritis (गठिया/वात रोग/जोड़ों का प्रदाह), bone ache (हड्डी में दर्द/अस्थि वेदना), gout (गाउट/संधिवात), joint…
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वित्तीय स्थिरता प्रतिवेदन के अनुसार भारत की वित्तीय प्रणाली बहुत मजबूत है
Updated: July 12, 2024
जून 2024 के अंतिम सप्ताह में, 27 जून 2024 को, भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय स्थिरता प्रतिवेदन जारी किया है। यह प्रतिवेदन वर्ष में दो बार, 6 माह के अंतराल पर, जारी किया जाता है। इस प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत की वित्तीय प्रणाली लगातार मजबूत बनी हुई है और बेहतर तुलन पत्र के आधार पर, भारत के बैंक एवं वित्तीय संस्थान लगातार ऋण विस्तार के माध्यम से देश की आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने में अपनी प्रभावी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। 31 मार्च 2024 को समाप्त वित्तीय वर्ष में भारत के अनुसूचित वाणिज्यिक बैकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 16.8 प्रतिशत का रहा है तथा सकल अनर्जक आस्ति अनुपात पिछले कई वर्षों के सबसे निचले स्तर अर्थात 2.8 प्रतिशत पर एवं निवल अनर्जक आस्ति अनुपात केवल 0.6 प्रतिशत पर आ गया है जो अपने आप में एक रिकार्ड है। न केवल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक मजबूत बने हुए हैं अपितु गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी स्वस्थ बनी हुई हैं, जिनका पूंजी पर्याप्तता अनुपात 26.6 प्रतिशत, सकल अनर्जक आस्ति अनुपात 4.0 प्रतिशत और आस्तियों पर प्रतिलाभ 3.3 प्रतिशत रहा है। पूंजी पर्याप्तता अनुपात का मजबूत स्थिति में रहने का आश्य यह है कि इन बैकों के पास पर्याप्त मात्रा में पूंजी उपलब्ध है और इन बैकों में किसी प्रकार की आर्थिक परेशानी आने पर यह बैंक सफलतापूर्वक उस आर्थिक परेशानी का सामना कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, अनर्जक आस्ति अनुपात का सबसे कम स्तर पर आने का आश्य यह है कि बैकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋणों की अदायगी समय पर हो रही है एवं इन ऋणों पर पर कोई दबाव दिखाई नहीं दे रहा है। उक्त प्रतिवेदन में भारतीय रिजर्व बैंक ने भारतीय अर्थव्यवस्था में पनप रहे कुछ जोखिमों की ओर भी इशारा किया है। हालांकि वैश्विक स्तर पर कई विकसित देशों द्वारा अभी भी सख्त मौद्रिक नीति का अनुपालन किया जा रहा है एवं इन देशों द्वारा ब्याज दरों को अभी भी उच्च स्तर पर बनाए रखा गया है क्योंकि मुद्रा स्फीति की दर इन देशों में स्वीकार्य स्तर तक नीचे नहीं आ पाई है। भारत के लिए जरूर इस प्रकार के जोखिम कमजोर पड़े हैं क्योंकि भारत में मुद्रा स्फीति की दर को नीचे लाने में सफलता मिली है। परंतु, भारत में एक तो विशेष रूप से कोविड महामारी के बाद से नागरिकों पर ऋण का अतिरिक्त बोझ बड़ा है और दूसरे भारतीय नागरिकों की वित्तीय बचत की दर में कमी आई है। उक्त प्रतिवेदन में विशेष रूप से इन दो जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 में नागरिकों की बचत दर घटकर सकल घरेलू उत्पाद के 18.4 प्रतिशत तक नीचे आ गई है जो वर्ष 2013 से 2022 के बीच में औसतन 20 प्रतिशत की रही है। इसी प्रकार, एक अन्य मानक के अनुसार, वर्ष 2013 से 2022 के बीच भारतीय नागरिक अपनी कमाई का औसतन 39.8 प्रतिशत भाग बचत करते थे परंतु वित्तीय वर्ष 2022-23 में यह भाग घटकर 28.5 प्रतिशत तक नीचे आ गया है। बचत, दरअसल, दो प्रकार की होती है, एक वित्तीय बचत और दूसरे, सम्पत्ति निर्मित करने हेतु बचत। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, भारतीय नागरिकों की वित्तीय बचत जरूर कम हुई है परंतु सम्पत्ति निर्मित करने हेतु की गई बचत में वृद्धि दृष्टिगोचर है। जैसे, मकान बनाने हेतु एवं कार खरीदने हेतु की गई बचत को सम्पत्ति निर्मित करने हेतु की गई बचत की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में हाल ही के वर्षों में सम्पत्ति निर्मित करने हेतु बचत का रुझान बहुत तेज गति से आगे बढ़ा है। आवास एवं कार आदि जैसी सम्पत्तियां खरीदने हेतु भारत में मध्यवर्गीय परिवार अपनी बचत के साथ ही बैकों से ऋण लेकर भी इन सम्पत्तियों का निर्माण कर रहे हैं। इससे अर्थव्यवस्था के चक्र में भी तेजी दिखाई देने लगी है क्योंकि मकान बनाने के लिए स्टील, सिमेंट, आदि पदार्थों की खपत भी बढ़ रही है एवं इन उत्पादों का उत्पादन भी विनिर्माण इकाईयों द्वारा अधिक मात्रा में किया जा रहा है, इससे देश में रोजगार के अवसर भी निर्मित हो रहे हैं। कुल मिलाकर, इससे देश के अर्थ चक्र में तेजी दिखाई देने लगी है। साथ ही, वित्तीय बचत कम इसलिए भी हो रही है क्योंकि अब देश का पढ़ा लिखा नागरिक वित्तीय रूप से अधिक साक्षर हो गया है एवं अब यह स्थिति समझने लगा है कि बैंकों एवं पोस्ट ऑफिस में बचत करने पर मिल रहे ब्याज की तुलना में शेयर (पूंजी) बाजार में निवेश करने तथा सोने एवं चांदी जैसे पदार्थों में निवेश करने से अधिक आय का अर्जन सम्भव होता दिखाई दे रहा है। साथ ही, भूमि का टुकड़ा खरीदकर उस पर भवन का निर्माण कर तुलनात्मक रूप से अधिक आय का अर्जन किया जा सकता है। अतः बैकों एवं पोस्ट ऑफ़िस के स्थान पर अब देश के नागरिक देश के पूंजी बाजार में अपनी बचत का निवेश करने लगे हैं। दूसरे, मध्यवर्गीय परिवार अब अपने बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। इससे, इनकी कुल आय का अधिक प्रतिशत अब इन मदों पर खर्च होता दिखाई दे रहा है, इससे अंततः इन परिवारों की बचत में भी कमी दृष्टिगोचर हो रही है। इसी कारण के चलते नागरिकों की शुद्ध वित्तीय बचत में 11.3 प्रतिशत की भारी भरकम गिरावट दर्ज हुई है जो वर्ष 2022-23 में 28.5 प्रतिशत की रही है और पिछले 10 वर्षों के दौरान औसतन 39.8 प्रतिशत की रही थी। कोरोना महामारी के दौरान चूंकि पूरे देश में लाक्डाउन लगाया गया था अतः इस दौरान भारत में घरेलू बचत दर बढ़कर 51.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। परंतु कोरोना महामारी के बाद जैसे ही लाक्डाउन को हटाया गया, नागरिकों ने अपने खर्चों में वृद्धि करना शुरू कर दिया एवं आस्तियों में निवेश भी करना शुरू किर दिया था, इससे घरेलू बचत की दर में भारी भरकम गिरावट दर्ज हुई है। अब तो देश के नागरिक आस्तियों में निवेश करने के उद्देश्य से बैकों से ऋण प्राप्त करने में भी किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं कर रहे हैं। इस सम्बंध में भारतीय बैकों ने भी अपने नियमों को शिथिल किया है। इससे भारत में ऋण में वृद्धि दर लगातार 15 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है वहीं जमाराशि में वृद्धि दर लगातार कम होती जा रही है जिसका प्रभाव वृद्धात्मक ऋण:जमा अनुपात पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है जो अब 100 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया है। एक और दिलचस्प पहलू यह भी उभरकर सामने आया है कि अब पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन को भी वित्तीय जोखिम की तरह ही माना जा रहा है। अर्थात, अब जलवायु जोखिम एवं साइबर जोखिम को भी गम्भीर खतरे के रूप में देखा जा रहा है। आगे आने वाले समय में इन दोनों जोखिमों की वजह से भारतीय वित्तीय प्रणाली पर भारी दबाव पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के चलते तो भारत की मौद्रिक नीति पर भी प्रभाव पड़ सकता है जिससे अंततः वित्तीय तंत्र के लिए भी जोखिम बढ़ सकता है। प्रहलाद सबनानी
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